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Dec 09 2025

हॉर्नबिल महोत्सव

केंद्रीय पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री ने नागालैंड के विश्व प्रसिद्ध हॉर्नबिल महोत्सव में भाग लिया।

  • उन्होंने भारत की एक्ट ईस्ट, एक्ट फास्ट, एक्ट फर्स्ट’ दृष्टि के तहत नागालैंड के लिए ₹650 करोड़ का विकास पैकेज भी जारी किया।

हॉर्नबिल महोत्सव के बारे में

  • ‘हॉर्नबिल महोत्सव’ नागालैंड का प्रमुख सांस्कृतिक उत्सव है, जिसे उत्सवों का उत्सव’ कहा जाता है। यह 17 प्रमुख नागा जनजातियों की सामूहिक धरोहर, परंपराओं और कलात्मक अभिव्यक्तियों को प्रदर्शित करता है।
  • उत्पत्ति: अंतर-जनजातीय सद्भाव को बढ़ावा देने, स्वदेशी संस्कृति को संरक्षित करने और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नागालैंड सरकार द्वारा वर्ष 2000 में शुरू किया गया।
    • नामकरण: हॉर्नबिल पक्षी के नाम पर, जिसे नागा लोककथाओं में सौंदर्य, गरिमा और वीरता का प्रतीक माना जाता है।
  • वर्ष 2025 की थीम: सांस्कृतिक संपर्क’ (Cultural Connect)
  • मुख्य फोकस: वर्ष 2025 संस्करण का मुख्य उद्देश्य सांस्कृतिक कूटनीति, वैश्विक सांस्कृतिक संबंधों और समुदाय आधारित सांस्कृतिक कथाओं को सशक्त बनाने पर है।
  • स्थल: यह महोत्सव प्रत्येक वर्ष 1–10 दिसंबर तक किसामा हेरिटेज विलेज, कोहिमा के निकट आयोजित होता है।
  • वर्ष 2025 साझेदार राष्ट्र: स्विट्जरलैंड, आयरलैंड और यूनाइटेड किंगडम आधिकारिक साझेदार देशों के रूप में शामिल हुए, जिससे महोत्सव का वैश्विक सांस्कृतिक विस्तार और मजबूत हुआ।

महत्व

  • सांस्कृतिक संरक्षण को मजबूत करना, अंतर-जनजातीय एकता को बढ़ावा देना, पर्यटन को बढ़ावा देना, वैश्विक सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाना और नागालैंड को भारत की पूर्वोत्तर सांस्कृतिक कूटनीति के एक जीवंत केंद्र के रूप में स्थापित करना।

ऑस्ट्रेलिया-भारत शिक्षा और कौशल परिषद (AIESC)

ऑस्ट्रेलिया–भारत शिक्षा एवं कौशल परिषद (AIESC) की तीसरी बैठक नई दिल्ली में आयोजित हो रही है, जिसका उद्देश्य शिक्षा, कौशल, अनुसंधान और संस्थागत साझेदारी में सहयोग को गहन बनाना है।

ऑस्ट्रेलिया–भारत शिक्षा एवं कौशल परिषद (AIESC) के बारे में

  • AIESC भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच शिक्षा, कौशल, प्रशिक्षण और अनुसंधान में रणनीतिक सहयोग को संचालित करने वाला उच्च-स्तरीय द्विपक्षीय तंत्र है।
  • उत्पत्ति: यह वर्ष 2011 में ऑस्ट्रेलिया–भारत शिक्षा परिषद (AIEC) के रूप में स्थापित हुई थी। बाद में इसे कौशल क्षेत्र के एकीकरण और अंतरराष्ट्रीयकरण को बढ़ावा देने हेतु AIESC के रूप में विस्तारित किया गया।
  • उद्देश्य: नीतिगत  सहयोग का मार्गदर्शन करना, द्विपक्षीय गतिशीलता को बढ़ाना, अनुसंधान साझेदारी को मजबूत करना, तथा योग्यताओं और संस्थागत संबंधों की पारस्परिक मान्यता का समर्थन करना।
  • प्रमुख बैठकें: पहली बैठक गांधीनगर (वर्ष 2023) में, दूसरी सिडनी (वर्ष 2024) में और तीसरी बैठक नई दिल्ली (वर्ष 2025) में आयोजित की जा रही है।

बैठक के प्रमुख निष्कर्ष

  • प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ECCE), शिक्षक शिक्षा, शिक्षक व्यावसायिक विकास और विद्यालय स्तरीय परस्पर मान्यता ढाँचे को मजबूत करना।
  • उच्च शिक्षा सहयोग का विस्तार, जिसमें भारत में कैंपस स्थापित करने हेतु ‘यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स’ (UNSW) कोलेटर ऑफ इंटेंट’ (LoI) जारी करना शामिल है।
  • यह शैक्षणिक एवं अनुसंधान सहयोग संवर्द्धन योजना (SPARC) के अंतर्गत 10 नई संयुक्त परियोजनाओं के माध्यम से अनुसंधान सहयोग को आगे बढ़ाने तथा शिक्षा एवं कौशल विकास में नए समझौता ज्ञापनों और आशय पत्रों पर हस्ताक्षर करने पर केंद्रित है।

महत्त्व

AIESC भारत–ऑस्ट्रेलिया रणनीतिक साझेदारी को महत्त्वपूर्ण रूप से सुदृढ़ करता है। यह कार्यबल विकास, वैश्विक गतिशीलता और NEP के अनुरूप शिक्षा एवं कौशल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत समर्थन प्रदान करता है।

अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) निधि

हाल ही में भारत अंतरराष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव 2025 में अनुसंधान, विकास और नवाचार निधि को प्रमुखता से रेखांकित किया गया, जहाँ सरकार ने निजी क्षेत्र आधारित तकनीकी नवाचार और वाणिज्यिकरण को प्रोत्साहित करने में इसकी भूमिका पर विशेष बल दिया।

अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) निधि के बारे में

  • RDI निधि एक राष्ट्रीय पहल है, जिसकी राशि ₹1 लाख करोड़ है। इसका उद्देश्य भारत में निजी क्षेत्र द्वारा संचालित अनुसंधान, नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना है।
  • उद्देश्य: इस निधि का उद्देश्य अग्रणी अनुसंधान एवं विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी का विस्तार करना और बाजार आधारित प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण में तेजी लाना है।
    • इसका उद्देश्य आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है।
  • अनुमोदन और शुभारंभ: केंद्र मंत्रिमंडल ने इस निधि को 1 जुलाई 2025 को मंजूरी दी। प्रधानमंत्री ने 3 नवंबर, 2025 को ‘इमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव’ (ESTIC) 2025 में इसका औपचारिक शुभारंभ किया।
  • नोडल एजेंसी एवं प्रशासन
    • इस योजना का समन्वय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा किया जाता है। हालाँकि अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) समन्वित कार्यान्वयन के लिए प्राथमिक संरक्षक के रूप में कार्य करता है।
  • वित्तपोषण तंत्र: RDI निधि, एक दो-स्तरीय संरचना पर संचालित होती है:-
    • ANRF संपूर्ण कोष का प्रबंधन करता है।
    • पेशेवर फंड प्रबंधक, जैसे-अल्टरनेट इन्वेस्टमेंट फंड’, विकास वित्त संस्थान, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड तथा BIRAC प्रत्यक्ष अनुदान देने के स्थान पर दीर्घकालिक ऋण और इक्विटी समर्थन प्रदान करेंगे।
  • प्राथमिकता क्षेत्र: यह निधि रणनीतिक और उभरते क्षेत्रों, जैसे- कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डीप टेक्नोलोजी, सेमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी, चिकित्सा उपकरण, स्वच्छ ऊर्जा, फार्मा नवाचार और डिजिटल अर्थव्यवस्था अनुप्रयोगों को लक्षित करता है।

महत्व

RDI निधि, निजी क्षेत्र के निम्न अनुसंधान एवं विकास निवेश को संबोधित करते हुए, प्रयोगशाला से बाजार’ संबंधी अंतराल को पाटकर तथा ‘विकसित भारत 2047’ की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को सुदृढ़ समर्थन प्रदान कर, देश की नवाचार क्षमता को संरचनात्मक रूप से सशक्त बनाती है।

भारत में पेंशन योजनाओं का विकास

भारत की वृद्ध होती आबादी और पेंशन कवरेज में मौजूद अंतराल ने औपचारिक तथा अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए समावेशी एवं सतत् पेंशन प्रणाली को मजबूत करने पर नया ध्यान केंद्रित किया है।

भारत में पेंशन योजनाओं का विकास

  • प्रारंभिक कल्याण-आधारित सामाजिक सहायता
    • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (वर्ष 1995): गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 65 वर्ष से अधिक आयु के वृद्ध व्यक्तियों को आय-सहायता प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के रूप में प्रारंभ किया गया था।
    • पुरानी पेंशन योजना (OPS):  सरकारी कर्मचारियों के लिए निश्चित लाभ पेंशन सुनिश्चित करती थी, जिसमें सेवानिवृत्ति के बाद आजीवन आय मिलती थी।
  • अंशदायी और समावेशन-उन्मुख मॉडल की ओर परिवर्तन
    • नयी पेंशन योजना (NPS), वर्ष 2004: नए सरकारी भर्ती कर्मचारियों के लिए OPS के स्थान पर अंशदायी ढाँचे को अपनाया गया। बाद में इसे कॉर्पोरेट क्षेत्र तक विस्तारित किया गया।
    • अटल पेंशन योजना (APY), वर्ष 2015–16: अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों में औपचारिक बचत को बढ़ावा देने हेतु अनुकूलित, आवधिक अंशदान और न्यूनतम गारंटीकृत पेंशन का प्रावधान।
    • NPS 2.0, वर्ष 2025: उच्च इक्विटी निवेश की अनुमति तथा मल्टीपल स्कीम फ्रेमवर्क लागू कर युवा और जोखिम निवेशकों को आकर्षित करने का प्रयास।
  • कानूनी और डिजिटल सुधारों के माध्यम से कवरेज बढ़ाना।
  • श्रम संहिता (वर्ष 2020): वेतन की एकसमान परिभाषा लागू कर पेंशन और सामाजिक सुरक्षा गणनाओं का आधार बढ़ाया गया।
  • ई-श्रेय पोर्टल (वर्ष 2021): अनौपचारिक श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार कर उन्हें पात्र सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ने की व्यवस्था।

सुधार की आवश्यकता

  • भारत में वृद्ध आबादी तेजी से बढ़ रही हैं, जबकि औपचारिक पेंशन कवरेज अपर्याप्त है।
  • 88% से अधिक वरिष्ठ नागरिक अनौपचारिक कार्यों में संलग्न हैं, जिनके पास विश्वसनीय सामाजिक सुरक्षा नहीं है।
  • जागरूकता की कमी बनी हुई है; अनेक वृद्धजन NPS जैसे अंशदायी पेंशन विकल्पों से अनभिज्ञ हैं।
    • LASI के अनुसार (वर्ष 2017–18), 55 वर्ष से अधिक आयु के 42% लोग अभी भी NPS और उसकी पात्रता शर्तों से अनभिज्ञ थे।
  • डिजिटल और पंजीकरण बाधाएँ वंचित वर्ग को नई कल्याणकारी प्रणालियों से बाहर कर सकती हैं।

श्योक सुरंग

भारतीय रक्षा मंत्री ने 125 सीमा अवसंरचना परियोजनाओं का उद्घाटन किया, जिनमें लद्दाख की श्योक सुरंग भी शामिल है।

  • ये परियोजनाएँ रणनीतिक सीमा क्षेत्रों में विस्तृत हैं, तथा इनमें सड़कें, सुरंगें और पुल शामिल हैं, जिनका उद्देश्य भारत की सीमाओं पर संपर्क, गतिशीलता और सुरक्षा को सुदृढ़ करना है।

श्योक सुरंग के बारे में

  • अवस्थिति: श्योक सुरंग, लद्दाख के लेह में दुरबुक–श्योक–दौलत बेग ओल्डी (DSDBO) सड़क पर अवस्थित है।
  • विशेषताएँ: यह 920 मीटर लंबीकट-एंड-कवर’ सुरंग है, जिसका निर्माण सीमा सड़क संगठन द्वारा किया गया है।
  • सामरिक महत्त्व: यह सुरंग वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के निकट क्षेत्रों को सभी मौसमों में संपर्क प्रदान करेगी, जिससे सैनिकों की त्वरित तैनाती और लॉजिस्टिक आपूर्ति में सुविधा होगी।

संदर्भ

हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC), जिसकी अध्यक्षता गवर्नर संजय मल्होत्रा द्वारा की गई, ने रेपो दर में 25 आधार अंकों (bps) की कटौती की घोषणा की। इससे रेपो दर 5.50% से घटकर 5.25% हो गई।

महत्त्वपूर्ण तथ्य 

  • RBI गवर्नर ने वर्तमान अवधि को एकदुर्लभ गोल्डीलॉक्स चरण’ बताया, जहाँ मुद्रास्फीति और वृद्धि दोनों का संतुलन उत्तम है।

MPC के प्रमुख निर्णय

  • रेपो दर में कटौती
    • रेपो दर को 25 आधार अंक घटाकर 5.25% किया गया, जो अनुकूल मुद्रास्फीति परिस्थितियों के बीच वृद्धि समर्थन की दिशा में परिवर्तन संकेतित करता है।
    • यह लगातार दो नीतिगत स्थगनों के बाद पहली बार की गई दर में की गई कमी है, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2025 में कुल 125 आधार अंकों की संचयी कटौती हुई।
  • वृद्धि और मुद्रास्फीति के अनुमान
    • वित्त वर्ष 2026 के लिए GDP वृद्धि अनुमान को 6.8% से बढ़ाकर 7.3% किया गया, जो मजबूत आर्थिक वृद्धि दर्शाता है।
    • वित्त वर्ष 2026 के लिए CPI मुद्रास्फीति अनुमान को 2.6% से घटाकर 2% किया गया, जो नियंत्रित मूल्य दबावों को दर्शाता है।
  • मौद्रिक और तरलता से जुड़े उपाय
    • ओपन मार्केट ऑपरेशन’ (OMO): RBI ने बैंकिंग प्रणाली में तरलता बढ़ाने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों में 1 लाख करोड़ रुपये की खरीद की घोषणा की।
    • USD/INR फॉरेक्स स्वैप: दिसंबर में तरलता प्रबंधन के उद्देश्य से 3 वर्ष की अवधि वाला 5 अरब डॉलर मूल्य का USD/INR खरीद-बिक्री स्वैप संचालित किया जाएगा।।
  • नीतिगत दृष्टिकोण
    • MPC ने तटस्थ रुख अपनाया ताकि परिवर्तित आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार नीति लचीली बनी रहे।
    • दरों में कटौती का उद्देश्य निवेश और उपभोग को समर्थन देना साथ ही मूल्य स्थिरता बनाए रखना है।
  • रुपये में अस्थिरता: RBI रुपये के अवमूल्यन को स्वीकार करता है, लेकिन इसे बाजार में होने वाली एक स्वाभाविक घटना मानता है।
    • मुद्रा उतार-चढ़ाव पर निकट निगरानी रखी जाती है ताकि अत्यधिक अस्थिरता आर्थिक स्थिरता को प्रभावित न करे।

गोल्डीलॉक्स’ अर्थव्यवस्था के बारे में

  • गोल्डीलॉक्स’ अर्थव्यवस्था उस स्थिति को दर्शाती है जहाँ व्यापक आर्थिक गतिविधि उचित संतुलन’ पर होती है अर्थात् मुद्रास्फीति नियंत्रित रहती है, आर्थिक वृद्धि पर्याप्त रूप से सुदृढ़ होती है तथा श्रम-बाजार में बेरोजगारी निम्न स्तर पर बनी रहती है।
  • यह ऐसी अवस्था को दर्शाती है जहाँ सतत् वृद्धि, निम्न मुद्रास्फीति और कम बेरोजगारी एक साथ उपस्थित होते हैं, जो दीर्घकालिक विकास के अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

गोल्डीलॉक्स अर्थव्यवस्था में:

  • मध्यम आर्थिक वृद्धि होती है, जो अत्यधिक मुद्रास्फीति उत्पन्न नहीं करती है।
  • बेरोजगारी दर कम रहती है, जो पर्याप्त रोजगार सृजन का संकेत है।
  • मुद्रास्फीति नियंत्रित रहती है, जिससे क्रय-शक्ति क्षीण नहीं होती (सामान्यतः केंद्रीय बैंक के लक्ष्य से नीचे)।

संदर्भ 

लोकसभा ने स्वास्थ्य सुरक्षा से राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर विधेयक, 2025 पारित किया है, जिसके तहत पान मसाला विनिर्माण इकाइयों पर विशेष उपकर आरोपित कर स्वास्थ्य तथा रक्षा आवश्यकताओं हेतु संसाधन जुटाए जाएँगे।

स्वास्थ्य सुरक्षा से राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर विधेयक, 2025 के उद्देश्य

  • समर्पित राजस्व-सृजन: पान मसाला विनिर्माण पर उपकर आरोपित कर राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अतिरिक्त संसाधन एकत्र करना।
  • रक्षा-तैयारी सुदृढ़ करना: प्रणालियाँ, अंतरिक्ष साइबर क्षमताओं के लिए निश्चित एवं विश्वसनीय वित्तीय प्रावधान सुनिश्चित करना।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों का समर्थन: हानिकारक उत्पादों से उत्पन्न स्वास्थ्य जोखिमों के निवारण हेतु राज्यों को उपकर का एक हिस्सा उपलब्ध कराना।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • उत्पादन क्षमता पर उपकर: पान मसाला तथा अधिसूचित उत्पादों के विनिर्माण में प्रयुक्त मशीनों या पूर्णतः हस्तचालित प्रक्रियाओं के स्वामी/नियंत्रक पर प्रति मशीन अथवा प्रति हस्तचालित इकाई के आधार पर उपकर आरोपित किया जाएगा।
  • मशीन-आधारित श्रेणीबद्ध उपकर दरें: उपकर मशीन की गति और पाउच के वजन के अनुसार अलग-अलग होता है, जो ₹1.01 करोड़/माह (≤500 पाउच/मिनट) से लेकर ₹25.47 करोड़/माह (1,001-1,500 पाउच/मिनट) तक होता है।
  • हस्तचालित उत्पादन उपकर: पूर्णतः हस्तचालित इकाइयों पर प्रति कारखाना प्रति माह 11 लाख का उपकर अनिवार्य होगा, चाहे उत्पादन मात्रा कुछ भी हो।
  • प्रवर्तन, लेखा-परीक्षण एवं दंड: आयुक्त स्तर के अधिकारी अभिलेखों का ऑडिट कर सकते हैं, उल्लंघन पर 10,000 रुपये या इसके समतुल्य चोरी किए गए उपकर का जुर्माना लगाया जा सकता है तथा 1 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी के लिए कारावास (1-5 वर्ष) का प्रावधान है।
  • अपील तंत्र: एक संरचित तीन-स्तरीय अपील ढाँचा स्थापित किया गया है, इस व्यवस्था से शिकायतों को अपीलीय प्राधिकरण से सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और सेवा कर अपीलीय न्यायाधिकरण (CESTAT) तक, तथा वहाँ से कानून के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर उच्च न्यायालय तक ले जाना संभव हो जाता है।

वर्तमान कराधान ढाँचा

  • यह उपकर वस्तु एवं सेवा कर के अंतर्गत क्षतिपूर्ति उपकर का स्थान लेता है, परंतु GST राजस्व पर प्रभाव नहीं डालता है।
  • पान मसाला पर उपभोग-आधारित अधिकतम 40% GST की दर यथावत लागू रहेगी।
  • उपकर का हिस्सा राज्यों को दिया जाएगा क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्य का विषय है।

विधेयक के पीछे तर्क

  • रक्षा आवश्यकताओं में वृद्धि: आधुनिक युद्ध के लिए सटीक हथियार, स्वायत्त प्रणालियाँ तथा अंतरिक्ष/साइबर क्षमताएँ अत्यधिक लागत वाली हैं, जिन्हें समय-समय पर अद्यतन निधि की आवश्यकता होती है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य बोझ: पान मसाला/गुटखा गंभीर स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न करते हैं, अतः लक्षित उपकर द्वारा स्वास्थ्य-सुरक्षा कोष का निर्माण न्यायसंगत है।
  • राजस्व अंतर: वर्तमान में उपकर, सकल राजस्व का केवल 6.1% है, जो वर्ष 2010–14 के 7% से कम है, इसलिए स्थायी राजस्व स्रोत आवश्यक हैं।

निष्कर्ष

यह विधेयक उत्पादन क्षमता पर कराधान लागू कर रक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य हेतु एक समर्पित तथा पूर्वानुमेय कोष की स्थापना करता है, जिससे राजकोषीय नीति को समकालीन सुरक्षा एवं स्वास्थ्य चुनौतियों के अनुरूप पुनर्संतुलित किया जा सके।

संदर्भ 

वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के आठ वर्षों के प्रदर्शन की समीक्षा की है तथा हेयरकट (Haircut) या कटौती, मूल्यांकन पद्धतियों, विलंब, और समाधान के बाद आने वाली बाधाओं पर गंभीर चिंताएँ व्यक्त की हैं।

महत्त्वपूर्ण तथ्य 

  • यह रिपोर्ट लोकसभा की चयन समिति द्वारा प्रस्तुत की गई है, जो दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 की जाँच कर रही है। यह विधेयक अगस्त 2025 में लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था।

हेयरकट (Haircut) या कटौती वह अंतर है जो देनदार द्वारा बकाया राशि और समाधान प्रक्रिया में वास्तविक वसूली राशि के बीच होता है।

मुख्य चिंताएँ

  • बड़ी कटौती: समिति ने ऋणदाताओं द्वारा की जाने वाली बड़ी कटौती की ओर ध्यान दिलाया, जो प्रायः संकटग्रस्त बिक्री और खराब मूल्यांकन मानकों के कारण होती है।
  • मूल्यांकन संबंधी चुनौतियाँ: संपत्तियों का मूल्यांकन प्रायः तरलीकृत मूल्य के आधार पर किया जाता है, न कि उद्यम मूल्य के आधार पर; इससे अवमूल्यन और वसूली में कमी आती है।
  • सीमित निविदाकर्त्ता: गुणवत्ता समाधान, आवेदकों की सीमित समूह प्रतिस्पर्द्धा को कम करता है, जिससे अंतिम बोली मूल्य कम हो जाता है।
  • पारदर्शिता का अभाव: समिति ने अपारदर्शी मूल्यांकन प्रक्रियाओं, पंजीकृत मूल्यांककों एवं परिसमापक की अपर्याप्त जवाबदेही, तथा एकरूप मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) की कमी पर चिंता व्यक्त की।
  • जवाबदेही संबंधी मुद्दे: समिति ने समाधान पेशेवरों की जवाबदेही में कमियों को रेखांकित किया, जिससे प्रक्रिया की गुणवत्ता और परिणाम प्रभावित होते हैं।
  • समाधान के बाद की चुनौतियाँ
    • ‘क्लीन-स्लेट’ संबंधी समस्या: नियामकीय मंजूरियों में विलंब के कारण कंपनियाँ समाधान के बाद संचालन पुनः प्रारम्भ नहीं कर पातीं हैं।
    • वित्तपोषण संबंधी बाधाएँ: बैंक, समाधान के बाद भी कंपनियों को ‘डिफॉल्टर’ के रूप में चिह्नित होने के कारण ऋण देने में संकोच करते हैं।
  • विनियामक रिक्तता: IBC के अंतर्गत, एक व्यापक सीमा-पार दिवालियापन रोधी तंत्र की कमी के कारण उच्च मूल्य वाले मामलों में नुकसान होता है, निपटान में देरी होती है, तथा परिसंपत्ति संबंधी वसूली कम होती है।

IBC को सुदृढ़ करने हेतु सिफारिशें

  • उद्यम-स्तरीय मूल्यांकन: पैनल ने ऋणी की परिचालन क्षमता को बेहतर ढंग से दर्शाने और कटौती को कम करने के लिए मूल्यांकन को उद्यम मूल्य की ओर स्थानांतरित करने की सिफारिश की है।
  • वैश्विक निविदा प्रक्रिया: प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाने हेतु वैश्विक सहभागिता सुनिश्चित करते हुए अंतरराष्ट्रीय बोलीदाताओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की सिफारिश है।
  • मानक संचालन प्रक्रियाएँ: SOP में परिसमापकों और पंजीकृत मूल्यांककों की भूमिका स्पष्ट करने, ऑडिट ट्रेल शामिल करने और समाधान-पश्चात मूल्यांकन समीक्षा का प्रावधान करने की अनुशंसा।
  • पारदर्शी तंत्र: समिति ने समाधान पूर्ण होने के बाद कंपनियों के लिए पारदर्शी ऑनलाइन नो-ड्यूज प्रमाणपत्र तंत्र विकसित करने का सुझाव दिया।
  • सीमापार दिवालिया रूपरेखा: समिति ने सीमापार दिवालिया रूपरेखा स्थापित करने संबंधी आवश्यकता को भारत की वैश्वीकरण आधारित अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण बताया।

IBC (संशोधन) विधेयक, 2025 के प्रमुख प्रावधान

  • ऋणदाता-प्रारंभित दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIIRP)
    • यह प्रक्रिया वास्तविक व्यापार विफलताओं का समाधान NCLT के बाहर करने का अवसर देती है।
    • यदि 51% ऋणदाता सहमति दें, तो इस बाह्य समाधान प्रक्रिया को प्रारंभ किया जा सकता है।
  •  समूह दिवालिया ढाँचा
    • एक ही कॉर्पोरेट समूह की कंपनियों के दिवालिया मामलों के समन्वित समाधान की व्यवस्था।
    • सामान्य समाधान पेशेवर की नियुक्ति और संयुक्त ऋणदाता समितियों (CoC) के गठन की अनुमति, ताकि निर्णय-निर्माण सुगम हो सके।
  • सीमापार दिवाला ढाँचा: यह प्रावधान विदेशी न्यायक्षेत्रों में भारतीय दिवाला कार्यवाही की मान्यता को सक्षम बनाता है, जिससे विदेशी संपत्तियों से वसूली सुगम हो सके।
  • परिसमापन के दौरान ऋणदाता
    • समिति की भूमिका: विधेयक CoC को परिसमापन की निगरानी का अधिकार देता है।
    •  CoC, 66% मतदान से परिसमापक को प्रतिस्थापित भी कर सकती है।

संदर्भ 

एक निजी सदस्य द्वारा प्रस्तावितराइट टू डिस्कनेक्ट’ बिल 2025 लोकसभा में प्रस्तुत किया गया, जिससे डिजिटल युग में कर्मचारियों के अधिकारों पर व्यापक बहस प्रारंभ हुई।

राइट टू डिस्कनेक्ट क्या है?

  • राइट टू डिस्कनेक्ट’ बिल का आशय कर्मचारियों के उस विधिक अधिकार से है, जिसके तहत वे कार्य-संबंधी संचार से स्वयं को अलग रख सकते हैं।
  • मानवाधिकार संबंधी आधार: यह अधिकार मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 24 पर आधारित है, जिसमें कहा गया है कि ‘प्रत्येक व्यक्ति को विश्राम और अवकाश का अधिकार है, जिसमें कार्य के घंटों की युक्तिसंगत सीमा तथा सवैतनिक आवधिक अवकाश शामिल है।’

राइट टू डिस्कनेक्ट’  की आवश्यकता

  • कार्यभार और तनाव: दूरस्थ कार्य एवं निरंतर डिजिटल संपर्क कर्मचारियों पर सतत् उपलब्धता का दबाव बढ़ाते हैं, जिससे तनाव, थकान तथा अत्यधिक श्रांति उत्पन्न होती है।
  • कार्य-जीवन संतुलन: प्रौद्योगिकी की सर्वव्यापकता ने व्यावसायिक और व्यक्तिगत क्षेत्रों के बीच पारंपरिक सीमांकन को समाप्त कर दिया है, क्योंकि मोबाइल डिवाइस और संचार प्लेटफॉर्म ने लौकिक और स्थानिक सीमाओं को प्रभावित किया है।
  • मानसिक स्वास्थ्य: निरंतर संपर्क और लगातार कार्य की माँग, चिंता, नैदानिक ​​अवसाद और गंभीर तनाव संबंधी स्थितियों की बढ़ी हुई दरों से संबंधित है।
  • उत्पादकता पर प्रभाव: लगातार अधिक कार्यभार तथा अपर्याप्त विश्राम से संज्ञानात्मक क्षमता, निर्णय-निर्माण और संस्थागत प्रदर्शन में कमी आती है।

राइट टू डिस्कनेक्ट’ बिल, 2025 के बारे में

  • उद्देश्य: व्यावसायिक तनाव को कम करना तथा कार्य और निजी जीवन के संतुलन के लिए विधिक संरक्षण प्रदान करना, जिससे कर्मचारी निर्धारित समय के अतिरिक्त कार्य-संचार से अलग रह सकें।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • राइट टू डिस्कनेक्ट 
    • मना करने का अधिकार: यह विधेयक कर्मचारियों को बिना किसी परिणाम का सामना किए, गैर-कार्य समय के दौरान व्यावसायिक संचार से दूर रहने का वैधानिक अधिकार प्रदान करता है।
    • संपर्क तोड़ने पर कोई दंड नहीं: नियोक्ताओं को उन कर्मचारियों के प्रति प्रतिशोध, या दंड देने से स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है जो निर्धारित कार्य अवधि के बाद संपर्क तोड़ने और कार्य-संबंधी कार्यों से दूर रहने के अपने अधिकार का प्रयोग करते हैं।
  • कर्मचारी कल्याण प्राधिकरण
    • विधेयक में एक कर्मचारी कल्याण प्राधिकरण की स्थापना का प्रस्ताव है, जिसका कार्य कर्मचारियों के ‘कनेक्शन’ तोड़ने के अधिकार का प्रबंधन करना, कानून का पालन सुनिश्चित करना और कार्य घंटों को विनियमित करने के संबंध में मार्गदर्शन प्रदान करना है।
    • यह प्राधिकरण आधारभूत अध्ययन भी करेगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि कर्मचारी कार्य घंटों के बाहर संचार उपकरणों का कितनी बार उपयोग कर रहे हैं।
  • अतिरिक्त समय का पारिश्रमिक: मानक कार्य-घंटों से बाहर कार्यरत कर्मचारियों को उच्च दर पर अतिरिक्त पारिश्रमिक दिया जाएगा।
  • परामर्श और सहभागिता: 10 से अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों को कार्य-घंटा विनियमन और अतिरिक्त समय पारिश्रमिक के विषय में कर्मचारी प्रतिनिधियों से परामर्श करना होगा।
  • कार्य-जीवन संतुलन उपाय
    • विधेयक में कर्मचारियों को कार्य-जीवन संतुलन बेहतर ढंग से प्रबंधित करने में मदद के लिए ‘डिजिटल डिटॉक्स सेंटर’ और परामर्श सेवाओं की स्थापना का भी आह्वान किया गया है।
    • कंपनियों को मानसिक स्वास्थ्य और तनाव प्रबंधन को बढ़ावा देने वाले कर्मचारी कल्याण कार्यक्रमों में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • अनुपालन न करने पर दंड: वैधानिक आवश्यकताओं का पालन न करने वाले उद्यमों को कुल कर्मचारी वेतन के 1% के बराबर मौद्रिक शुल्क के रूप में गणना की गई वित्तीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है, जो प्रवर्तन और संगठनात्मक अनुपालन को सुदृढ़ करता है।

कार्य संस्कृति पर प्रभाव

  • सत्ता-संतुलन में परिवर्तन: कर्मचारियों को समय-सीमा पर अधिक नियंत्रण प्रदान कर पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों को पुनर्परिभाषित करता है।
  • सांस्कृतिक परिवर्तन: सतत्-सक्रिय कार्यसंस्कृति को चुनौती देकर गुणवत्तापरक कार्य को प्रमुखता प्रदान करता है।
  • बर्नआउट’ संस्कृति का अंत: यह विधेयक सतत् कार्य व्यस्तता और व्यावसायिक शिथिलता के विरुद्ध सुरक्षा को संस्थागत बनाकर प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाओं और व्यावसायिक परामर्श सहित उच्च दबाव वाले क्षेत्रों में प्रतिमान परिवर्तन को उत्प्रेरित करता है।

भारत में अन्य प्रयास

  • शशि थरूर का विधेयक (वर्ष 2025): वर्ष 2025 में, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025 प्रस्तुत किया, जिसमें कर्मचारियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणालियों को डिस्कनेक्ट करने और बढ़ावा देने के अधिकार को सुरक्षित करने की माँग की गई।
  • केरल पहल: केरल कांग्रेस (M) के विधायक डॉ. एन. जयराज ने भी सितंबर में इसी तरह का विधेयक प्रस्तुत किया था, जिससे संपर्क हटाने के अधिकार संबंधी कानून पर बहस तेज हो गई थी।

वैश्विक पहल

  • फ्राँस: फ्राँस एल खोमरी’ एक्ट, 2017 के माध्यम से औपचारिक रूप से डिस्कनेक्ट करने के अधिकार को मान्यता देने वाला पहला देश बन गया।
  • ऑस्ट्रेलिया: वर्ष 2024 संशोधन में कर्मचारियों को गैर-कार्य अवधि में संचार उपेक्षित करने का अधिकार, आपात स्थिति जैसे अपवादों को छोड़कर।
  • स्पेन: स्पेन में, श्रमिकों को कार्य अवधि के बाहर अपने उपकरणों को बंद करने का अधिकार दिया गया है, जैसा कि ऑर्गेनिक कानून 3/2018 के अनुच्छेद 88 में उल्लिखित है।

निजी सदस्य विधेयक (PMB)

  • निजी सदस्य विधेयक (PMB) एक ऐसा प्रस्ताव होता है, जिसे संसद के किसी ऐसे सदस्य (MP) द्वारा विधानमंडल में प्रस्तुत किया जाता है, जो मंत्री पद पर नहीं होता है।
    • संविधान में निजी सदस्य विधेयक (PMB) का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
  • सूचना: विधेयक प्रस्तुत करने के इच्छुक मंत्री के अलावा किसी भी सदस्य को विधेयक प्रस्तुत करने के लिए प्रस्ताव लाने के अपने आशय की सूचना देनी होगी।
    • भारतीय संसदीय प्रणाली में, जो सांसद सत्तारूढ़ सरकार का हिस्सा नहीं होते हैं उन्हें निजी सदस्य माना जाता है।
  • क्षेत्र: निजी सदस्य संवैधानिक संशोधन विधेयक प्रस्तुत कर सकते हैं, परंतु धन विधेयक नहीं प्रस्तुत कर सकते हैं।
  • चुनौतियाँ: स्वतंत्रता के बाद केवल 14 निजी सदस्य विधेयक पारित हुए हैं, वर्ष  1970 के बाद कोई भी विधेयक दोनों सदनों से पारित नहीं हुआ।

संदर्भ 

उम्मीद (UMEED) पोर्टल पर वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण अभी तक केवल 27 प्रतिशत ही पूरा हुआ है। कुल 8 लाख संपत्तियों में से अब तक केवल 2.16 लाख का पंजीकरण हो पाया है।

वक्फ को ऐसी किसी भी चल या अचल संपत्ति की स्थायी समर्पण के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसे मुस्लिम विधि द्वारा धार्मिक, कल्याण या परोपकारी उद्देश्य के रूप में मान्यता प्राप्त हो।

उम्मीद (UMEED) पोर्टल क्या है?

  • उम्मीद (UMEED) का पूर्ण रूप है: एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास (Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency, and Development)
  • उद्देश्य: वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण और प्रबंधन को एकीकृत डिजिटल मंच के माध्यम से सुव्यवस्थित और मानकीकृत करना।
  • नागरिकों को नए वक्फ विधि के तहत उनके अधिकारों और दायित्वों पर कानूनी मार्गदर्शन प्रदान करना।

उम्मीद पोर्टल की विशेषताएँ

  • ऑनलाइन पंजीकरण वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण हेतु पूर्णतः डिजिटीकृत प्रणाली उपलब्ध कराता है।
  • पारदर्शिता और दक्षता: सुनिश्चित करता है कि सभी औपचारिकताएँ छह माह के भीतर पूर्ण हों।
  • कानूनी सहायता: नागरिकों को वक्फ शासन ढाँचे के अंतर्गत उनके अधिकारों और दायित्वों को स्पष्ट करते हुए विस्तृत कानूनी मार्गदर्शन उपलब्ध कराता है।
  • विवाद का स्वचालित संदर्भ: जो संपत्तियाँ निर्धारित समय-सीमा में पंजीकृत नहीं होतीं हैं, उन्हें स्वचालित रूप से विवादित चिह्नित कर विशेष न्यायाधिकरणों को शीघ्र निपटारे हेतु भेज दिया जाता है।
  • राज्य वक्फ बोर्डों की निगरानी: राज्य वक्फ बोर्ड, नियामक संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं, विकसित होते कानूनी प्रावधानों के अनुपालन की निगरानी करते हैं और पंजीकरण प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं।

संदर्भ

केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2025 का मसौदा जारी किया है। यह विधेयक भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) के प्रशासनिक ढाँचे में व्यापक सुधार प्रस्तावित करता है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य 

  • मसौदा विधेयक को विशेष रूप से शासन संरचना और शैक्षणिक स्वायत्तता में प्रस्तावित परिवर्तनों को लेकर व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा है।

भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) के बारे में

  • स्वरूप: ISI सांख्यिकी, गणित, संगणक विज्ञान, मात्रात्मक अर्थशास्त्र तथा संबंधित विषयों में अनुसंधान, शिक्षा और अनुप्रयुक्त कार्य के लिए एक प्रमुख संस्थान है।
  • स्थापना: वर्ष 1931 में प्रख्यात सांख्यिकीविद प्रशांत चंद्र महालनोबिस द्वारा स्थापित।
    • वर्ष 1959 में संसद के अधिनियम द्वाराराष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान’ का दर्जा प्राप्त।
  • मुख्यालय एवं केंद्र: ISI का प्राथमिक मुख्यालय कोलकाता में है, तथा इसके क्षेत्रीय केंद्र दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और तेजपुर में हैं।
  • शासन व्यवस्था
    • स्थिति: ISI सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम 1860 और पश्चिम बंगाल सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम 1961 के तहत पंजीकृत सोसाइटी है।
    • 33 सदस्यीय परिषद: इसमें निर्वाचित प्रतिनिधि, सरकारी नियुक्त सदस्य, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का नामित सदस्य और वरिष्ठ संकाय शामिल हैं।
    • निदेशक की नियुक्ति: निदेशक की नियुक्ति परिषद द्वारा की जाती है, जिससे शैक्षणिक, प्रशासनिक और नियुक्ति संबंधी मामलों में संस्थान को पर्याप्त स्वायत्तता मिलती है।
  • प्रकाशन एवं कार्यक्रम: ISI प्रतिष्ठित सांख्य पत्रिका प्रकाशित करता है और सांख्यिकी एवं संबंधित विषयों में डिग्री कार्यक्रम संचालित करता है।

मसौदा विधेयक के तहत प्रस्तावित परिवर्तन

  • सांविधिक निकाय निगम में रूपांतरण: ISI को पंजीकृत सोसाइटी से बदलकर संसद के एक पृथक अधिनियम के माध्यम से एक सांविधिक निकाय निगम बनाया जाएगा।
  • शासन संरचना में परिवर्तन 
    • बोर्ड ऑफ गवर्नेंस (BoG): यह प्रशासनिक अधिकार तथा वित्तीय प्रबंधन करेगा, डिग्री प्रदान करेगा और संस्थान की प्रमुख नियुक्तियों की देखरेख करेगा।
    • संरचना: बोर्ड में सरकार-नामित सदस्यों का प्रभुत्व रहेगा, भारत के राष्ट्रपति द्वारा नामित अध्यक्ष बोर्ड की अध्यक्षता करेगा, जिससे संकाय प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।
  • निदेशक की नियुक्ति और पद से हटाना
    • केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक चयन समिति निदेशक के चयन के लिए उत्तरदायी होगी।
    • बोर्ड ऑफ गवर्नर्स’ के पास निदेशक की नियुक्ति का अधिकार है, जबकि भारत के राष्ट्रपति निदेशक को हटा सकते हैं और संस्थागत जाँच या समीक्षा का आदेश दे सकते हैं।
  • शैक्षणिक परिषद में परिवर्तन: शैक्षणिक परिषद की भूमिका घटाकर केवल बोर्ड ऑफ गवर्नेंस (BoG) को अनुशंसा देने तक सीमित कर दी जाएगी, जिससे संस्थागत निर्णयों में संकाय का प्रभाव घटेगा।

चिंताएँ

  • स्वायत्तता का क्षरण: आलोचकों के अनुसार, विधेयक BoG को अत्यधिक अधिकार देकर ISI की शैक्षणिक स्वतंत्रता कमजोर करता है, क्योंकि यह शैक्षणिक परिषद की अनुशंसाओं को निरस्त कर सकता है।
  • नियंत्रण का केंद्रीकरण: नई संरचना में नियुक्तियों और शासन पर सरकारी नियंत्रण बढ़ेगा, जिससे संकाय-आधारित निर्णय प्रणाली कमजोर होगी।
  • नियुक्तियों को लेकर आशंकाएँ: चयन समिति में सरकारी अधिकारियों की भागीदारी तथा निदेशक के कार्यकाल की आवधिक समीक्षा से नेतृत्व चयन में राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका जताई गई है।
  • परामर्श की कमी: आलोचकों का मत है कि यह विधेयक ISI के हितधारकों से पर्याप्त परामर्श के बिना लाया गया और सुधार मौजूदा वर्ष 1959 के अधिनियम में संशोधन द्वारा किए जाने चाहिए थे, न कि संस्थागत ढाँचे के व्यापक पुनर्गठन द्वारा।

सरकार का दृष्टिकोण

  • विजन: सरकार का तर्क है कि मसौदा विधेयक ISI की संस्थागत स्थिति को अधिक करेगा, इसे IIT और IIM जैसे अन्य प्रमुख राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों के बराबर स्थान देगा, और वर्ष 2031 में अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष के करीब पहुँचने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी प्रतिस्पर्द्धी स्थिति को बढ़ाएगा।
  • समीक्षा समितियों की अनुशंसाएँ: सरकार का तर्क है कि मसौदा विधेयक कई समीक्षा समितियों की अनुशंसाओं को लागू करता है, जिन्होंने शासन सुधार, शैक्षणिक कार्यक्रमों के विस्तार और संस्थागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाने का सुझाव दिया था।

संदर्भ

विश्व मृदा दिवस (WSD) प्रतिवर्ष 5 दिसंबर को मनाया जाता है ताकि कृषि विकास, पारिस्थितिकी तंत्र के कार्यों और खाद्य सुरक्षा में मृदा की भूमिका के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाई जा सके।

विश्व मृदा दिवस के बारे में

  • वैश्विक अधिदेश और संस्थागत उत्पत्ति
    • उत्पत्ति: इस अवधारणा का प्रस्ताव सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय मृदा विज्ञान संघ (IUSS) ने वर्ष 2002 में रखा था।
    • आधिकारिक मान्यता: संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुमोदन (वर्ष 2013) के बाद, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2014 में थाईलैंड के नेतृत्व में विश्व मृदा दिवस (WSD) की आधिकारिक शुरुआत की।
    • संस्थागत समर्थन: खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) वैश्विक मृदा साझेदारी (GSP) के ढाँचे के भीतर WSD के वैश्विक समर्थन को सुगम बनाता है।
  • वर्ष 2025 थीम: ‘स्वस्थ शहरों के लिए स्वस्थ मृदा’ 
    • शहरी अनिवार्यता: यह विषय इस बात पर जोर देता है कि शहरी और उप-शहरी मृदाएँ खाद्य उत्पादन, जल निस्पंदन, कार्बन भंडारण और शहरी ताप नियंत्रण के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण हैं, और विशेष रूप से मृदा संघनन और अनियंत्रित शहरीकरण के प्रति जागरूक करता है।
    • एकल स्वास्थ्य दृष्टिकोण: यह औपचारिक रूप से एकल स्वास्थ्य दृष्टिकोण को अपनाता है, जो मृदा स्वास्थ्य, पर्यावरण और शहरी मानव आबादी के बीच अंतर्निहित संबंध को मान्यता देता है।
    • स्थायी विकास लक्ष्य अभिसरण: यह विषय मूल रूप से सतत् विकास लक्ष्य 11 (सतत् शहर) और सतत् विकास लक्ष्य 15 (स्थल पर जीवन) से संबंधित है।
  • महत्त्वपूर्ण शहरी बुनियादी ढाँचे के रूप में मृदा 
    • जलवायु एवं ताप शमन: वनस्पतियुक्त मृदा वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से शहर को ठंडा रखती है, जिससे शहरी ऊष्मा द्वीप (UHI) प्रभाव का सीधा प्रतिकार होता है।
    • जल विज्ञान संबंधी अनुकूलन: पारगम्य मृदा एक प्राकृतिक स्पंज की तरह कार्य करती है, जो वर्षा को शीघ्रता से अवशोषित करके आकस्मिक बाढ़ को रोकती है और भूजल पुनर्भरण को कुशलतापूर्वक सुगम बनाती है।
    • स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ: यह स्थानीय खाद्य सुरक्षा के लिए शहरी कृषि को बढ़ावा देती है, जैव विविधता को बनाए रखती है, और सार्वजनिक मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हरित स्थानों तक पहुँच प्रदान करती है।
    • गंभीर खतरे: शहरी मृदा व्यापक रूप से मृदा के जमाव (फुटपाथ/निर्माण), रासायनिक संदूषण (भारी धातुएँ), और कार्बनिक पदार्थों के नुकसान से सक्रिय रूप से क्षीण होती है।
  • वर्ष 2024- वर्ष 2025 आपदा वास्तविकता जाँच
    • चेतावनी: वर्ष 2024 की विनाशकारी बाढ़ (दिल्ली, चेन्नई, हिमाचल प्रदेश) और वर्ष 2025 की वायनाड-कालकोड़ भूस्खलन त्रासदी ने एक कठोर वास्तविकता प्रदर्शित की है।
    • नीतिगत विफलता: इन घटनाओं ने यह प्रदर्शित किया है कि कैसे बड़े पैमाने पर मृदा संघनन और वनस्पति आवरण के नुकसान ने कभी प्रबंधनीय रही वर्षा की घटनाओं को व्यवस्थित रूप से शहरी और ग्रामीण आपदाओं में परिवर्तित कर दिया है, जिससे व्यापक मृदा पुनर्स्थापन और शहरी नियोजन सुधारों की तत्काल आवश्यकता रेखांकित होती है।

भारत के लिए मृदा गुणवत्ता का महत्त्व

मृदा एक गैर-नवीकरणीय संसाधन है, जो भारत के राष्ट्रीय अनुकूलन और प्रमुख विकास लक्ष्यों के लिए इसकी गुणवत्ता को आधार प्रदान करती है

  • खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता: मृदा 95% से अधिक खाद्य उत्पादन का आधार है। इसकी स्वास्थ्य स्थिति इष्टतम फसल उपज सुनिश्चित करती है, जिससे बड़ी कृषक आबादी की आजीविका को प्रत्यक्ष रूप से सहारा मिलता है और कृषि संबंधी सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट को रोका जा सकता है।
    • आर्थिक लागत: मृदा क्षरण से भारतीय अर्थव्यवस्था को अनुमानित रूप से प्रतिवर्ष ₹2.5-3 लाख करोड़ का नुकसान होता है।
    • सामाजिक लागत: मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के कारण होने वाली प्रछन्न भुखमरी एक-तिहाई से अधिक आबादी को प्रभावित करती है, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादकता में उल्लेखनीय कमी आती है।
  • जलवायु परिवर्तन शमन: मृदा सबसे बड़ा स्थलीय कार्बन सिंक है, जो वायुमंडल और सभी वनस्पतियों में मौजूद कार्बन के लगभग दोगुने कार्बन का भंडारण करती है।
    • मृदा कार्बनिक कार्बन (SOC) को बढ़ाना भारत के लिए अपने महत्त्वाकांक्षी नेट-जीरो लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु एक महत्त्वपूर्ण रणनीति है।
  • जल एवं शहरी अनुकूलन: पारगम्य मृदा एक प्राकृतिक स्पंज की तरह कार्य करती है, जो वर्षा आधारित कृषि के लिए जल धारण क्षमता में सुधार करती है और प्रदूषकों को हटाती है।
    • शहरों में, यह ‘शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव’ को कम करने में मदद करती है और सतही अपवाह को काफी कम करती है, जिससे शहरी बाढ़ और भूस्खलन को नियंत्रित किया जा सकता है।
  • जैव विविधता और सामाजिक समता: मृदा में विशाल जैव विविधता समाहित होती है। इसका क्षरण लघु एवं सीमांत किसानों और महिला किसानों पर असमान रूप से प्रभाव डालता है। सार्वजनिक भूमि/घास के मैदानों का विनाश, जिन्हें प्रायः ‘बंजर भूमि’ कहा जाता है (जैसा कि बन्नी और सोलापुर क्षेत्रों में देखा गया है), ग्रामीण संकट को बढ़ाता है और शहरों की ओर पलायन को मजबूर करता है।
    • वैश्विक उत्तरदायित्व: विश्व की 17% आबादी का आवास होने के बावजूद, केवल 2.4% भूमि होने के कारण, भारत का नैतिक कर्तव्य है कि वह अपनी मृदा संपदा की रक्षा करे, और इस प्रयास को मानवजाति की नैतिकता और अंतर-पीढ़ीगत न्याय से जोड़े।
    • ग्रामीण-शहरी संबंध: स्वस्थ ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र एक बफर के रूप में कार्य करते हैं, ग्रामीण संकट को कम करते हैं और शहरों की ओर पलायन को रोकते हैं, जिससे अनियंत्रित शहरीकरण और मृदा संघनन का दबाव कम होता है।

भारत के शहरी और ग्रामीण परिदृश्य में मृदा स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ

भारत की धरती को त्रुटिपूर्ण नीतियों और असंवहनीय प्रथाओं से उत्पन्न बहुआयामी खतरों का सामना करना पड़ रहा है।

  • रासायनिक एवं पोषक तत्व क्षरण
    • पोषक तत्व असंतुलन: यूरिया पर भारी सब्सिडी के परिणामस्वरूप नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटेशियम का उपभोग अनुपात (आदर्श 4:2:1 से  विचलित) गंभीर रूप से असंतुलित हो गया है, जिसके कारण जिंक और सल्फर जैसे द्वितीयक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की व्यापक कमी उभर रही है।
      • नवीनतम आकलन से पता चलता है कि 40% से अधिक भारतीय मृदा में जिंक की कमी है, जो एक महत्त्वपूर्ण सूक्ष्म पोषक तत्व है।
    • लवणीकरण और संदूषण: अपर्याप्त सिंचाई के कारण घुलनशील लवणों का संचय (लवणीकरण) होता है। रासायनिक पदार्थों का अंधाधुंध उपयोग और नगरपालिका/औद्योगिक अपशिष्ट (भारी धातुओं) का संचय मृदा और भूजल को दूषित करता है।
  • भौतिक एवं जैविक क्षरण
    • मृदा संघनन और संपीडन: अनियोजित शहरी विस्तार मृदा के स्थान पर कंक्रीट (मृदा संघनन) का उपयोग कर रहा है, जिससे इसकी पारगम्यता और वर्षा जल अवशोषण क्षमता नष्ट हो रही है। शहरी भारत प्रत्येक वर्ष लगभग 50,000 हेक्टेयर मृदा को संपीडन करता है। खेतों में, भारी मशीनरी संघनन का कारण बनती है।
    • कार्बनिक कार्बन की हानि: गहन, रसायन-आधारित एकल-फसल और कुप्रबंधित फसल अवशेषों को जलाने से कार्बनिक पदार्थ नष्ट हो जाते हैं। भारत में पिछले 50 वर्षों में अपने मृदा कार्बनिक कार्बन (SOC) का लगभग 30% समाप्त हो गया है।
      • SOC मृदा में पाए जाने वाले कार्बनिक पदार्थ का कार्बन घटक है, जो विघटित पौधों, जड़ों और सूक्ष्मजीवों से प्राप्त होता है।
  • नीतिगत निरंकुशता
    • बंजर भूमि’ मिथक और घास के मैदान: जैव विविधता वाले अर्द्ध-शुष्क घास के मैदानों और सवाना को ‘बंजर भूमि’ के रूप में वर्गीकृत करने की दोषपूर्ण औपनिवेशिक विरासत उनके निरंकुश रूपांतरण को बढ़ावा देती है।
      • पारिस्थितिक भूमिका: ये महत्त्वपूर्ण मृदा कार्बन पारिस्थितिकी तंत्र हैं (उदाहरण के लिए, गुजरात में बन्नी घास का मैदान) जो गहरी, रेशेदार जड़ प्रणालियों के माध्यम से भारी मात्रा में स्थिर भूमिगत कार्बन का भंडारण करते हैं, जो जल अंतःस्यंदन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
      • नीतिगत परिणाम: गलत नीतिगत हस्तक्षेपों के परिणामस्वरूप प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा’ जैसी आक्रामक प्रजातियों का बड़े पैमाने पर रोपण हुआ, जिसने पशुपालकों की आजीविका पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव डाला।
    • कृषि भूमि का कैनोपी संकट: भारत के परिपक्व कृषि भूमि वृक्ष आवरण में भारी, अत्यंत गिरावट ग्रामीण लचीलेपन को कमजोर कर रही है।
      • लुप्त होते वन: मई 2024 के एक अध्ययन से पता चला है कि वर्ष 2018 तक भारत के लगभग 11% बड़े कृषि वृक्ष विलुप्त हो गए थे। यूरिया पर भारी सब्सिडी के कारण नाइट्रोजन: फॉस्फोरस: पोटेशियम की खपत का अनुपात आदर्श 4:2:1 से अत्यधिक विचलित हो गया है, जिससे द्वितीयक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों (जैसे- जिंक, सल्फर) की व्यापक कमी उत्पन्न हो रही है।
      • किसान प्रोत्साहन: वित्तीय प्रोत्साहन (स्टीवर्डशिप भुगतान) की कमी और आर्थिक दबाव किसानों को परिपक्व वृक्षों को काटने के लिए मजबूर करते हैं, जिससे मृदा स्वास्थ्य और जलवायु अनुकूलन कमजोर होता है।
  • शासन संबंधी चुनौतियाँ 
    • सातवीं अनुसूची के अंतर्गत मृदा और भूमि को राज्य विषय के रूप में वर्गीकृत करने से प्रभावी और एकसमान नीति कार्यान्वयन के लिए महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
    • राष्ट्रीय योजनाओं का असमान कार्यान्वयन: राज्य की प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति में अंतर के कारण प्रमुख केंद्रीय योजनाओं की प्रभावशीलता में व्यापक अंतर होता है।
    • मानकीकृत आँकड़ों का अभाव: मृदा गुणवत्ता निगरानी के लिए कोई एकीकृत राष्ट्रीय मानक मौजूद नहीं है, जिससे मृदा स्वास्थ्य क्षरण की एक व्यापक, वास्तविक समय राष्ट्रीय परिदृश्य प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
    • भूमि उपयोग नीतियों के बीच टकराव: मृदा का प्रबंधन कई अलग-अलग विभागों (कृषि, शहरी विकास) द्वारा किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप संघर्ष होता है जहाँ आर्थिक हित मृदा के पर्यावरणीय कार्य की तुलना में अनियंत्रित शहरीकरण (जिसके परिणामस्वरूप ‘मृदा सीलिंग’ होती है) को प्राथमिकता देते हैं।
    • नियामक सुधारों को लागू करने में कठिनाइयाँ: सख्त राष्ट्रीय नियमों (जैसे- पर्यावरण प्रभाव आकलन में मृदा स्वास्थ्य सूचकांक को अनिवार्य करना) के लिए प्रत्येक राज्य के सहयोग और विधायी समर्थन की आवश्यकता होती है, जिससे प्रवर्तन धीमा और चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

मृदा स्वास्थ्य के लिए वैश्विक पहल

अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में मृदा की महत्त्वपूर्ण भूमिका को मान्यता दी है, जिसके परिणामस्वरूप कई प्रमुख रूपरेखाओं की स्थापना हुई है।

  • नीतिगत एवं शासन ढाँचे
    • मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD): एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता जो सतत् भूमि प्रबंधन पर केंद्रित है। इसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक भूमि क्षरण तटस्थता (LND) (SDG 15.3) प्राप्त करना है, और भूमि की हानि को पुनर्स्थापन प्रयासों के साथ संतुलित करना है।
    • वैश्विक मृदा भागीदारी (GSP) (FAO): FAO द्वारा आयोजित, GSP सतत् मृदा प्रबंधन (SSM) को बढ़ावा देता है और मृदा प्रशासन को सुदृढ़ करता है।
      • इसके प्रमुख परिणामों में विश्व मृदा दिवस की स्थापना तथा संशोधित विश्व मृदा चार्टर शामिल हैं।
    • UNFCCC और NDC का संबंध: पेरिस समझौते के अंतर्गत मृदा स्वास्थ्य को राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाओं (NAP) के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) में एकीकृत किया गया है, जिसमें जलवायु अनुकूलन और शमन में मृदा की भूमिका पर जोर दिया गया है।
      • ‘4 प्रति 1000′ पहल (2015) का संस्थापक हस्ताक्षरकर्ता होने और UNCCD के अंतर्गत LDN-2030 के लिए प्रतिबद्ध होने के बावजूद, भारत ने अभी तक अपने NDC में SOC संवर्द्धन को एक अलग, मात्रात्मक लक्ष्य नहीं बनाया है।
  • जलवायु शमन एवं कार्बन पृथक्करण
    • ‘4 प्रति 1000′ पहल (4‰): COP 21 में शुरू की गई इस स्वैच्छिक पहल का उद्देश्य मृदा की ऊपरी 30-40 सेमी परत में मृदा कार्बनिक कार्बन (SOC) के भंडार को वार्षिक रूप से 0.4% की दर से बढ़ाना है, जिससे मानवजनित CO₂ उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलेगी। यह कृषि पारिस्थितिकी, संरक्षित कृषि और कृषि वानिकी को बढ़ावा देती है।
  • कार्रवाई, वित्त और निगरानी
    • मृदा स्वास्थ्य कार्रवाई गठबंधन (CA4SH): एक बहु-हितधारक मंच, जो मृदा-अनुकूल प्रथाओं को अपनाने में आने वाली बाधाओं का समाधान करता है। इसके कार्यक्षेत्र में मृदा स्वास्थ्य प्रथाओं का विस्तार, निगरानी और साक्ष्य में वृद्धि, और मृदा स्वास्थ्य को नीति में एकीकृत करने के लिए निवेश जुटाना शामिल है।
    • वैज्ञानिक और निगरानी प्रयास: मृदा पर अंतर-सरकारी तकनीकी पैनल (ITPS) मृदा संबंधी मुद्दों पर आधिकारिक वैज्ञानिक सलाह प्रदान करता है।
    • यूनेस्को की पहल: मृदा गुणवत्ता मापन को वैश्विक स्तर पर मानकीकृत करने हेतु विश्व मृदा स्वास्थ्य सूचकांक की दिशा में कार्य करना।

भारत द्वारा की गई पहल

भारत सरकार ने कई नीतिगत और विज्ञान-समर्थित हस्तक्षेप शुरू किए हैं:-

  • संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के लिए नीति उपकरण
    • मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) योजना: किसानों को मृदा-विशिष्ट निदान और पोषक तत्वों की सिफारिशें प्रदान करती है, जिससे उर्वरकों का अधिक सटीक उपयोग संभव होता है और मृदा पर उर्वरक-संबंधी दबाव कम होता है।
    • नीम-लेपित यूरिया (NCU): नाइट्रोजन उत्सर्जन को धीमा करके नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) को बढ़ाता है, जिससे नाइट्रोजन की हानि, अपवाह और उर्वरक के दुरुपयोग में कमी आती है।
    • परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY): जैविक खेती समूहों को बढ़ावा देती है जो मृदा कार्बनिक कार्बन (SOC) को समृद्ध करते हैं, सूक्ष्मजीवी गतिविधि को मजबूत करते हैं और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करते हैं।
    • कृषक सशक्तीकरण: जैव-उर्वरक उत्पादन में सहयोगात्मक निवेश और संरक्षण कृषि को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए मृदा स्वास्थ्य FPO के गठन को बढ़ावा देना।
  • सतत् भूमि प्रबंधन प्रथाएँ
    • एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM): रासायनिक उर्वरकों, जैविक खादों और जैव-उर्वरकों के संतुलित मिश्रण को प्रोत्साहित करता है, जिससे आदर्श नाइट्रोजन: फास्फोरस: पोटेशियम अनुपात पुनर्स्थापित होता है और मृदा उर्वरता में दीर्घकालिक सुधार होता है।
    • संरक्षण कृषि (CA): शून्य जुताई, अवशेष प्रतिधारण और फसल चक्र के माध्यम से, मृदा अपरदन को कम करने, नमी बनाए रखने और कार्बनिक पदार्थों को बढ़ाने में मदद करता है।
    • कृषि वानिकी: वृक्षों को फसल भूमि के साथ एकीकृत करता है, मृदा स्थिरता में सुधार करता है, वायु/जल अपरदन को कम करता है, और कृषि जैव विविधता एवं सूक्ष्म जलवायु विनियमन को बढ़ाता है।
  • शहरी मृदा गुणवत्ता पर ध्यान देना
    • स्मार्ट सिटी मिशन: शहरी/अर्द्ध-शहरी कृषि, हरित अवसंरचना, पारगम्य फुटपाथ और वर्षा उद्यानों को प्रोत्साहित करता है ताकि मृदा संघनन से निपटा जा सके, स्टॉर्म वाटर का प्रबंधन किया जा सके और नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव को कम किया जा सके।
      • सिंगापुर की सिटी-इन-नेचर’ पहल तथा यूरोपीय संघ की मृदा-रणनीति 2030, जो वर्ष 2050 तक नेट जीरो भूमि अधिग्रहण और कानूनी रूप से बाध्यकारी मृदा विवरण का लक्ष्य निर्धारित करती है तथा ऐसे प्रभावी उदाहरण प्रस्तुत करती हैं, जिनका भारत स्मार्ट सिटी मिशन और अमृत 2.0 के अंतर्गत अनुकरण कर सकता है।
  • पुनर्स्थापन एवं तकनीकी लाभ
    • CAMPA निधि के माध्यम से पुनर्स्थापन: सोलापुर चरागाह पुनर्स्थापन जैसी सफल पहलों ने दो वर्षों में SOC में 21% की वृद्धि हासिल की, जिससे देशज प्रजातियों के पुनर्जनन और लक्षित वनीकरण की क्षमता पर प्रकाश डाला गया।
    • उभरते तकनीकी समाधान: भारत डेटा-आधारित मृदा पुनर्स्थापन और संसाधन अनुकूलन को सक्षम करने के लिए AI-आधारित पोषक तत्व मानचित्रण, मृदा सेंसर, परिशुद्ध कृषि उपकरण और इसरो के ‘रिमोट-सेंसिंग प्लेटफॉर्म’ (जैसे- मृदा नमी मानचित्रण) का विस्तार कर रहा है।
      • परिशुद्ध पोषक तत्व निगरानी और परिवर्तनीय दर उर्वरक अनुप्रयोग के लिए ड्रोन प्रौद्योगिकी और हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग का लाभ उठाना।

मृदा संरक्षण में भारतीय राज्यों की सफलता की कहानियाँ

राज्य प्राथमिक रणनीति प्रमुख हस्तक्षेप परिणाम/प्रभाव
महाराष्ट्र व्यापक जलग्रहण प्रबंधन (समुदाय-नेतृत्व)। समोच्च गर्त, बाँध, चेक डैम, सख्त जल-उपयोग नियम (रालेगण सिद्धि, हिवरे बाजार)। भूजल स्तर में नाटकीय वृद्धि, बहु-मौसमी फसल की ओर रुझान, निरंतर उच्च आय।
राजस्थान पारंपरिक जल संचयन एवं टिब्बा स्थिरीकरण। जोहड़ों (मृदा के चेकडैम) का पुनरुद्धार, शेल्टरबेल्ट और चेकरबोर्ड रोपण (थार रेगिस्तान)। नदी पुनरुद्धार (अरावली), महत्त्वपूर्ण भूजल पुनर्भरण, वायु अपरदन पर नियंत्रण।
गुजरात  खड्ड पुनर्ग्रहण एवं खेत की मेड़बंदी। माही बीहड़ों में जैव-इंजीनियरिंग (छत/बगीचे), खोदे गए तालाब (वेजलपुरा)। खड़ी ढलानों का स्थिरीकरण, मृदा क्षति में कमी, वर्षा आधारित उपज में 42% तक की वृद्धि।
हरियाणा  एकीकृत पहाड़ी क्षेत्र जलग्रहण क्षेत्र मृदा निर्मित बाँध, बाड़ लगाना/चारणपर रोक (सुखोमाजरी)। अपवाह और गाद में कमी, फसल की पैदावार में स्थिरता, वनस्पति आवरण में पुनर्जीवन।
ओड़िसा  एकीकृत आजीविका एवं संरक्षण। बागवानी के साथ संयुक्त सीढ़ीनुमा निर्माण, मेड़बंदी और कृषि तालाब (नुआपाड़ा जिला)। मृदा की उर्वरता में सुधार हुआ, भूजल स्तर 7 मीटर तक बढ़ा, संकटग्रस्त प्रवास में कमी आई।
तेलंगाना  शुष्कभूमि अनुकूलन और सूक्ष्म हस्तक्षेप। समोच्च मेढ़, अंतर-फसल, उर्वरक की सूक्ष्म मात्र का प्रयोग (कोथापल्ली)। भूजल स्तर में 45% की वृद्धि हुई, मक्का की पैदावार में चार गुना वृद्धि हुई।

आगे की राह 

वास्तविक मृदा अनुकूलन प्राप्त करने के लिए, भारत को सहकारी संघवाद का लाभ उठाते हुए मृदा-केंद्रित शासन मॉडल की ओर बढ़ना होगा:-

  • नीति सुधार और मिशन: मापनीय लक्ष्यों के साथ मृदा कार्बनिक कार्बन (SOC) पर एक राष्ट्रीय मिशन शुरू करना।
    • शहरी विकास परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) में मृदा स्वास्थ्य सूचकांक को अनिवार्य करना।
  • उपनिवेशवाद-विरोध और प्रोत्साहन: जैव विविधता आधारित घास के मैदानों से बंजर भूमि’ का टैग हटाकर उन्हें महत्त्वपूर्ण मृदा कार्बन पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में नामित करना।
    • प्रबंधन भुगतान के साथ एक राष्ट्रीय कृषि भूमि वृक्ष नीति लागू करना और उपग्रह मानचित्रण का उपयोग करके कृषि भूमि वृक्ष रजिस्ट्री बनाना।
  • शहरी मृदा स्वास्थ्य अधिदेश: मृदा संघनन की समस्या से निपटने के लिए नए शहरी परिदृश्य में 40% पारगम्य सतही अनुपात सुनिश्चित करना।
    • छत और अर्द्ध-नगरीय कृषि को बढ़ावा देने के लिए शहरी कृषि नीति 2.0 लागू करना।
  • संवैधानिक और संसाधन सुधार: अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 48-A के तहत स्वस्थ मृदा और पर्यावरण के अधिकार को सुनिश्चित करना।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 में स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को बार-बार शामिल किया है (सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, 1991; वेल्लोर नागरिक, 1996 – निवारक सिद्धांत)।
    • बायोचार ट्रेंच और कृषि तालाबों जैसे मृदा संरक्षण कार्यों के लिए मनरेगा का उपयोग करना।
    • जलवायु कार्रवाई के लिए भारत के NCD में मृदा कार्बनिक कार्बन (SOC) वृद्धि को एक लक्ष्य के रूप में शामिल करना।
  • कानूनी और वित्तीय प्रोत्साहन: फॉस्फोरस, पोटेशियम और सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग को संतुलित करने के लिए पोषक तत्व-आधारित सब्सिडी (NBS) व्यवस्था अपनाना।
    • किसान क्रेडिट कार्ड और फसल बीमा को मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) के प्रदर्शन से जोड़ना, जिससे मृदा संरक्षण को प्रोत्साहन मिले।
    • वृक्ष संरक्षण के लिए किसानों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के लिए पायलट कार्यक्रम शुरू करना और उच्च पारदर्शिता वितरण के लिए ई-रुपे जैसे प्लेटफार्मों का संभावित रूप से लाभ उठाना।
  • शैक्षिक और प्रशासनिक सुधार: स्कूलों में 5 दिसंबर को मृदा संरक्षण दिवस घोषित करना और दीर्घकालिक शैक्षिक प्रभाव के लिए NCERT की पाठ्यपुस्तकों में मृदा पारिस्थितिकी के अध्यायों को शामिल करना।
    • ग्राम पंचायतों के माध्यम से मृदा संरक्षण प्रयासों का विकेंद्रीकरण करना, जिससे मनरेगा समर्थित मृदा पुनर्स्थापन परियोजनाओं में जमीनी स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित हो।
  • वैश्विक प्रतिबद्धता और संरेखण: UNCCD के तहत वैश्विक मृदा भागीदारी (GSP) और भूमि क्षरण तटस्थता (LDN) लक्ष्यों के साथ भारत के प्रयासों को संरेखित करना, जिससे वैश्विक मृदा संरक्षण में भारत की भूमिका सुदृढ़ होगी।

निष्कर्ष 

स्वस्थ मृदाएँ एक सुदृढ़, विकसित भारत की आधारशिला हैं। विश्व मृदा दिवस 2025 भारत से आग्रह करता है कि वह शोषण से प्रबंधन की ओर बढ़े, और खाद्य प्रणालियों, जलवायु स्थिरता एवं दीर्घकालिक पारिस्थितिक कल्याण को सुरक्षित करने के लिए प्रत्येक शहरी और कृषि योजना में मृदा स्वास्थ्य को शामिल करे।

अभ्यास प्रश्न  शहरी मृदा, सतत शहरी नियोजन के एक महत्त्वपूर्ण किंतु उपेक्षित घटक के रूप में उभर रही है। विश्व मृदा दिवस 2025 के संदर्भ में, खाद्य असुरक्षा, प्रदूषण, बाढ़ और शहरी ताप तनाव जैसी चुनौतियों से निपटने में स्वस्थ शहरों के लिए स्वस्थ मृदा’ की भूमिका पर चर्चा कीजिए। 

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