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भारत-अमेरिकी रक्षा संबंधों के परिप्रेक्ष्य में भारत के लिए रक्षा स्वायत्तता की आवश्यकता

Lokesh Pal March 28, 2025 05:00 37 0

“लोग उस चीज़ से डरते हैं, जिसे वे समझ नहीं सकते और जिसे वे नियंत्रित नहीं कर सकते।” -एंड्रयू स्मिथ

संदर्भ:

हाल ही में, एयरो इंडिया-2025 में रक्षा मंत्री और IAF प्रमुख ने तेजस MK1A के लिए पहला रियर फ्यूज़लेज सौंपे जाने की सूचना दी।

भारत के रक्षा क्षेत्र की चुनौतियाँ

  • निर्भरता: रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रम (DPSUs) भारतीय सशस्त्र बलों के लिए कैप्टिव आपूर्तिकर्ता हैं, जबकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को भारतीय वायु सेना (IAF) की आवश्यकताओं को पूरा करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
    • आत्मनिर्भर भारत अभियान द्वारा बढ़ाई गई इस निर्भरता के कारण भारतीय वायुसेना में स्क्वाड्रन की शक्ति कम हो गई है।
  • धीमा उत्पादन: HAL द्वारा धीमी उत्पादन दर के परिणामस्वरूप भारतीय वायुसेना को कम विमानों के साथ काम चलाना पड़ रहा है।
  • SIPRI की रिपोर्ट: स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट के अनुसार भारत वर्ष 2020 से 2024  में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक राष्ट्र है।
  • उच्च आयात व्यय: इस कमी के बावजूद, विमान, टैंक और रडार जैसी उच्च लागत वाली हथियार प्रणालियाँ भारत के हथियार आयात का एक बड़ा हिस्सा बनी रहेंगी, जिससे आयात बिल उच्च बना रहेगा। 2015-19 से आयात में 9.3% की कमी आई है।

स्वदेशी लड़ाकू विमानों की ओर रुख

  • पहल: भारतीय वायुसेना LCA तेजस Mk1A, Mk2 और AMCA  (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) जैसे स्वदेशी लड़ाकू विमानों के विकास का पुरजोर समर्थन कर रही है।
  • प्रभाव: इन विमानों को अमेरिकी इंजन के साथ नियोजित किया गया है, जिससे भारत की रक्षा क्षमता अमेरिकी नीतियों पर निर्भर हो गई है।
  • चिंताएँ: रूस पर भारत की निरंतर निर्भरता के संबंध में विभिन्न प्रश्न हैं, जो अभी भी हथियारों के आयात का 36% हिस्सा है। (उदाहरण के लिए: सुखोई और एस-400 मिसाइल प्रणाली की खरीद)

 भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग

  • पूर्व पहल: 2012 की रक्षा प्रौद्योगिकी और व्यापार पहल (DTTI), अत्यधिक प्रचारित होने के बावजूद, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी में अपेक्षित प्रगति नहीं ला पाई।
  • 2016 संयुक्त वक्तव्य: अप्रैल 2016 में अमेरिकी रक्षा सचिव एश्टन कार्टर की भारत यात्रा के बाद, संयुक्त वक्तव्य में इस बात पर बल दिया गया, कि रक्षा संबंध अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी का एक महत्त्वपूर्ण घटक है।
  • लेन-देन संबंधी नीति: हाल ही में घोषित अमेरिका-भारत प्रमुख रक्षा साझेदारी ढाँचे को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के तहत वर्तमान अमेरिकी प्रशासन की लेन-देन प्रकृति के प्रकाश में जाँच का सामना करना पड़ रहा है।
  • हालिया वार्ता: ट्रम्प-मोदी वार्ता के बाद भी इसी तरह की भावनाएँ प्रतिध्वनित हुईं, जिससे रक्षा सहयोग के विचार को मज़बूती मिली।
  • साझेदारी अथवा भागीदारी: जबकि “साझेदारी” शब्द का बार-बार उपयोग किया जाता है, इस बारे में संदेह बना हुआ है कि क्या अमेरिका और भारत अपने सांस्कृतिक, वित्तीय और विश्व दृष्टिकोण के अंतरों को देखते हुए वास्तव में समान भागीदार के रूप में कार्य कर सकते हैं।

अपरिहार्यता कारक

  • अन्ना सिमंस का दृष्टिकोण (2013-14): अन्ना सिमंस (रक्षा विषयों की प्रोफेसर) के अनुसार, साझेदारी तभी सफल हो सकती है जब यह पारस्परिक अपरिहार्यता पर आधारित हो। 
    • इससे कम निर्भरता उत्पन्न होती है, जिसे वास्तविक साझेदारी नहीं माना जा सकता।
  • भारत-अमेरिका संबंध परीक्षण
    • समानता: क्या दोनों देश समान भागीदार हैं, या एक दूसरे पर निर्भर है?
    • कार्यों का विभाजन: क्या संयुक्त कार्यक्रमों में कार्यों का स्पष्ट विभाजन संभव है?
    • पूरक विशेषज्ञता: क्या दोनों देशों की क्षमताएँ एक दूसरे की पूरक हो सकती हैं, खासकर रक्षा क्षेत्र में?
  • रूस, इज़राइल और फ्रांस: अपरिहार्यता के बारे में इसी तरह के प्रश्न रूस, इज़राइल और फ्रांस जैसे अन्य रणनीतिक साझेदारों के साथ भारत के संबंधों के बारे में भी उठाए जा सकते हैं।
  • राजनीतिक अपरिहार्यता: इन साझेदारियों में भारत की राजनीतिक अपरिहार्यता का भाग यह निर्धारित करता है, कि वे वास्तव में रणनीतिक हैं या केवल परिस्थितिजन्य। उदाहरण के लिए:
    • अमेरिका-पाकिस्तान ‘साझेदारी’: अमेरिका-पाकिस्तान संबंध एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, जो तब समाप्त हो गया जब पाकिस्तान वाशिंगटन के भू-राजनीतिक हितों से बाहर चला गया।
    • अमेरिका-यूरोप संबंध: ट्रम्प के शासन में यूरोप के साथ अमेरिका की साझेदारी के टूटने से ऐसे गठबंधनों की दीर्घकालिक विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं।

आगे की राह

  • विचार: महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है- क्या भारत अपनी सामरिक हथियार आवश्यकताओं के लिए अमेरिका पर निर्भर रहकर सही दिशा में आगे बढ़ रहा है?
    • भारत अमेरिका के साथ जिस वास्तविक साझेदारी की तलाश कर रहा है, वह इस बात पर निर्भर करती है कि वाशिंगटन भारत को अपने हितों के लिए राजनीतिक रूप से अपरिहार्य बनाने के लिए तैयार है या नहीं।
  • नीतिगत परिवर्तन का जोखिम: भारत को अमेरिका द्वारा किसी भी नीतिगत परिवर्तनों से सावधान रहना चाहिए, विशेष रूप से अस्थिर भू-राजनीतिक वातावरण में, जहाँ बदलते गठबंधन भारत की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।
  • रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करना: भारत को अपनी सामरिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए सतर्क और सक्रिय होना चाहिए।
    • अमेरिका से महत्त्वपूर्ण रक्षा उपकरण आयात करते समय भारत को बाह्य आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भरता से बचना होगा, क्योंकि इससे उसकी स्वतंत्रता को संकट हो सकता है।

निष्कर्ष

चूँकि भारत अमेरिका से विमान और अन्य महत्त्वपूर्ण रक्षा प्रणालियाँ आयात करना जारी रखता है, इसलिए उसे अपने रणनीतिक हितों को सबसे आगे रखना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि वह इस सीमा तक निर्भर न हो जाए कि उसे अपनी संप्रभु निर्णय लेने की क्षमता का परित्याग करना पड़े।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न 

भारत की रक्षा साझेदारी, विशेष रूप से अमेरिका के साथ, तकनीकी उन्नति और रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के बीच एक रणनीतिक दुविधा प्रस्तुत करती है। भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादन लक्ष्यों और भू-राजनीतिक बाधाओं के संदर्भ में इस संतुलन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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