100% तक छात्रवृत्ति जीतें

रजिस्टर करें

कमलेसन मामला और उसके निहितार्थ

Lokesh Pal November 29, 2025 02:41 8 0

संदर्भ 

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसन की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया और उनकी बर्खास्तगी को बरकरार रखा।

  • यह मामला व्यक्तिगत विवेक, धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद-25) और सशस्त्र बलों की अनुशासन, एकता और सामंजस्य (अनुच्छेद-33 द्वारा अनुमोदित) की आवश्यकता के बीच गहरे संघर्ष को उजागर करता है।

विशेष अनुमति याचिका (SLP) के बारे में 

  • संवैधानिक आधार: अनुच्छेद-136 सर्वोच्च न्यायालय को यह विवेकाधीन अधिकार प्रदान करता है कि वह किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण (सैन्य न्यायालयों को छोड़कर) के निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति याचिका के तहत अपील करने की अनुमति दे सके।
  • प्राथमिक उद्देश्य: गंभीर अन्याय के विरुद्ध एक संवैधानिक सुरक्षा उपाय के रूप में कार्य करना, यह सुनिश्चित करता है कि जब किसी नियमित अपील का प्रावधान न हो, तो असाधारण त्रुटियाँ न्यायिक जाँच से बच न सकें।
  • उपाय की प्रकृति: अपील का अधिकार नहीं; विशेष अनुमति याचिका एक असाधारण और अवशिष्ट अधिकार क्षेत्र है, जिसका प्रयोग केवल अन्याय के असाधारण मामलों में ही किया जाता है।
  • स्वीकृति के आधार: केवल न्यायदोष, विकृत निष्कर्ष, प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन या विधि के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के मामलों में ही दायर की जाती है।
  • ‘कौन’ दायर कर सकता है: कोई भी पीड़ित पक्ष दायर कर सकता है।
  • समय सीमा: निर्णय की तारीख से 90 दिनों के भीतर अथवा उच्च न्यायालय द्वारा समीक्षा याचिका खारिज किए जाने की तारीख से 60 दिनों के भीतर।
  • महत्त्व: देश भर में एक समान न्याय सुनिश्चित करने वाले ‘सुरक्षा वाल्व’ के रूप में कार्य करता है।
    • हालाँकि, अति प्रयोग ने विशेष अनुमति याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की वृद्धि में एक प्रमुख योगदानकर्ता बना दिया है, जिससे इसकी असाधारण विशेषता कमजोर हो गई है।
  • सीमाएँ: वैधानिक अपीलों को दरकिनार करने के लिए नहीं।
    • सर्वोच्च न्यायालय सामान्यतः अंतरिम आदेशों में हस्तक्षेप नहीं करता, जब तक कि मामले में किसी गंभीर अवैधता या न्याय के स्पष्ट विघटन का संकेत न दिखाई दे।

मामले की पृष्ठभूमि

  • रेजिमेंटल लोकाचार और नेतृत्व अपेक्षाएँ: लेफ्टिनेंट कमलेसन एक सिख-जाट-राजपूत रेजिमेंट में कार्यरत थे, जहाँ अनुष्ठानों में भागीदारी, यूनिट की पहचान, एकजुटता और मनोबल का मुख्य प्रतीक है।
    • अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अधिकारी-जवान के बंधन को मजबूत करने के लिए सैन्य रीति-रिवाजों का पालन करें और व्यक्तिगत आस्था की परवाह किए बिना अनुष्ठानों में भाग लें।
  • कमलेसन द्वारा इनकार करना: लेफ्टिनेंट कमलेसन, एक प्रोटेस्टेंट ईसाई, सभी बाहरी परेड अनुष्ठानों में शामिल हुए, लेकिन आस्था का हवाला देते हुए गर्भगृह में प्रवेश करने या पूजा/आरती करने से इनकार कर दिया।
    • हालाँकि, उन्होंने परेड के अन्य सभी पहलुओं में लगातार भाग लिया। उन्होंने सम्मानपूर्वक बाहर खड़े रहने की पेशकश की।
  • सेना द्वारा इनकार की व्याख्या: सेना ने इस इनकार को रेजिमेंटल रीति-रिवाजों से सार्वजनिक अलगाव, एक वैध आदेश की अवज्ञा और घोर अनुशासनहीनता के रूप में देखा।
    • इस कृत्य की व्याख्या निजी विश्वास के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे आचरण के रूप में की गई, जिसने नेतृत्व की विश्वसनीयता, मनोबल और एकजुटता को कमजोर किया।
  • संस्थागत और अनुशासनात्मक चिंताएँ: ऐसी छूट प्रदान करने से सैन्य अनुशासन कमजोर पड़ सकता है, जैसा कि भारतीय वायु सेना (IAF) की दाढ़ी संबंधी विवादित घटनाओं में पूर्व में देखने को मिला था।
  • मामले का परिणाम: सेना अधिनियम की धारा 19 और नियम 14 के तहत कार्यवाही के बाद, उन्हें मार्च 2021 में बर्खास्त कर दिया गया।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने बर्खास्तगी को बरकरार रखा और कहा कि सैन्य अनुशासन तथा सामूहिक लोकाचार, व्यक्तिगत धार्मिक विवेक पर प्रभावी होते हैं।
    • सेना अधिनियम, 1950 की धारा 19, केंद्र सरकार को किसी अधिकारी को कदाचार या अनुपयुक्तता के आधार पर बर्खास्त करने की अनुमति देती है, जबकि सेना नियम, 1954 का नियम 14, कारण बताओ नोटिस जैसी उचित प्रक्रिया के बाद, कोर्ट मार्शल के बिना बर्खास्तगी की अनुमति देता है।

व्यक्तिगत विवेक पर सैन्य अनुशासन का न्यायिक समर्थन

  • उच्च न्यायालय का तर्क
    • अनुशासन: दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह मुद्दा सैन्य आदेश के पालन का था, धार्मिक स्वतंत्रता का नहीं।
    • उदाहरण: इसने मोहम्मद जुबैर (2017), आर. विश्वान (1983) और एल.डी. बालम सिंह (2002) मामलों का हवाला देते हुए अनुच्छेद-33 के तहत अनुशासन तथा एकरूपता की प्रधानता की पुष्टि की।
    • भूमिका दायित्व: न्यायालय ने माना कि एक अधिकारी के रूप में, उन पर रेजिमेंटल एकता का नेतृत्व करने, उसे प्रेरित करने और उसे बनाए रखने के अतिरिक्त दायित्व भी थे।
    • न्यायिक सम्मान: न्यायालय ने कहा कि सशस्त्र बलों की आवश्यकताओं पर “सामान्य व्यक्ति” का मानक लागू नहीं किया जा सकता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
    • सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक सम्मान के सिद्धांत को दोहराया और इस बात पर जोर दिया कि अदालतों को अनुशासन, सामंजस्य तथा संचालनात्मक आवश्यकता के मामलों में सैन्य विशेषज्ञता पर संदेह नहीं करना चाहिए।
    • आवश्यक परीक्षण: पीठ ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद-25 के तहत प्रत्येक धार्मिक भावना ‘आवश्यक व्यवहार’ नहीं मानी जा सकती है।
    • नेतृत्व की विफलता: न्यायालय ने उनके आचरण को ‘घोर अनुशासनहीनता’ कहा और उन्हें ‘सेना के लिए अनुपयुक्त’ बताया।
    • विवेक बनाम आदेश: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि इनकार करना वैध आदेश की अवज्ञा है, न कि आस्था का प्रयोग करना।
    • अंतिम परिणाम: सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष अनुमति याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि सैन्य संदर्भ में संस्थागत आवश्यकता और बल का सामंजस्य किसी व्यक्ति द्वारा विवेक-आधारित आपत्ति करने पर वरीयता प्राप्त कर सकते हैं।

धार्मिक स्वतंत्रता और सैन्य अनुशासन को नियंत्रित करने वाला संवैधानिक एवं कानूनी संवैधानिक ढाँचा

  • अनुच्छेद-25: धार्मिक विश्वास की स्वतंत्रता और किसी अन्य धर्म के अनुष्ठानों से विरत रहने के अधिकार की गारंटी देता है।
    • न्यायमूर्ति बागची: अनुच्छेद-25 आवश्यक धार्मिक विशेषताओं की रक्षा करता है, न कि प्रत्येक भावना की।”
  • अनुच्छेद-33: संसद को सशस्त्र बलों के कर्मियों के अनुशासन और दक्षता बनाए रखने के मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करने की अनुमति देता है, जो वर्तमान फैसले का आधार है।
  • वैध आदेश सिद्धांत: वैध आदेश को अस्वीकार करना सैन्य कानून के तहत कदाचार माना जाता है।
  • सहिष्णुता की संवैधानिक नैतिकता: बिजो इमैनुएल जैसे उदाहरण इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि सम्मानजनक रूप से भागीदारी न करना संवैधानिक नैतिकता को दर्शाता है, अवज्ञा को नहीं।
  • संतुलन परीक्षण: न्यायालय ने एक ऐसा ढाँचा लागू किया, जहाँ सैन्य संदर्भ में संस्थागत आवश्यकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता से अधिक महत्त्वपूर्ण थी।

मुख्य नैतिक दुविधाएँ

  • व्यक्तिगत विवेक बनाम संस्थागत कर्तव्य
    • नैतिक स्वायत्तता: कमलेसन ने अपने विवेक को प्राथमिकता दी और गंभीर परिणामों के बावजूद ईमानदारी और नैतिक साहस का परिचय दिया।
    • कर्तव्य अनिवार्यता: सेना ने आज्ञाकारिता, अनुशासन और कमान की जिम्मेदारी को सर्वोच्च मानते हुए यह तर्क दिया कि नेतृत्वकर्ता को एकरूप व्यवहार का आदर्श प्रस्तुत करना आवश्यक है।।
    • नैतिक पक्ष: यह व्यक्तिगत विश्वास और सार्वजनिक कर्तव्य के बीच एक उत्कृष्ट नैतिक संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है।
  • सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता बनाम नकारात्मक स्वतंत्रता
    • सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता: रेजिमेंटल अनुष्ठान सर्वधर्म समभाव का उदाहरण हैं, जो साझा प्रथाओं के माध्यम से एकता को मजबूत करते हैं।
      • भारतीय सेना जीवंत धर्मनिरपेक्षता के आदर्श का पालन करती है, जहाँ साझा अनुष्ठान धार्मिक बाध्यता के बजाय भाईचारे के प्रतीक के रूप में कार्य करते हैं और विभिन्न धर्मों में समान पहचान को मजबूत करते हैं।
    • नकारात्मक स्वतंत्रता: अधिकारी ने धार्मिक कृत्यों से दूर रहने के अपने अधिकार पर जोर दिया, यह तर्क देते हुए कि जबरन भागीदारी बल प्रयोग से स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
    • नैतिक प्रश्न: क्या प्रतीकात्मक भागीदारी नैतिक रूप से व्यक्तिगत आस्था की सीमाओं को लाँघ सकती है?
  • नेतृत्व नैतिकता और कमान अखंडता
    • कमान की अपेक्षाएँ: अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे आदर्श प्रस्तुत करते हुए नेतृत्व करें, जिससे सैनिकों में विश्वास और सामूहिक पहचान सुदृढ़ हो। सैन्य नैतिकता में ‘एकजुटता’ का सिद्धांत नेतृत्व की अपेक्षाओं को आकार देता है, जिसके तहत अधिकारी की प्रत्यक्ष भागीदारी, सैनिकों के मनोबल और सामूहिक दृढ़ता का प्रतीकात्मक आधार बन जाती है।
    • अनुमानित अनादर: न्यायालय ने इनकार को सैनिकों का अपमान माना, जिससे उनका विश्वास, मनोबल और आत्मविश्वास कम हुआ।
    • नेतृत्व विफलता: यह मामला अनुकरणीय नेतृत्व की नैतिकता पर प्रकाश डालता है, जहाँ व्यक्तिगत विकल्प, पूरी यूनिट के मनोविज्ञान को प्रभावित करते हैं।
  • उपयोगितावादी बनाम कर्तव्यवादी तर्क
    • उपयोगितावादी तर्क: सेना ने व्यापक कल्याण (एकजुटता, तत्परता और राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखना) पर जोर दिया।
    • नैतिक कर्तव्य: अधिकारी ने तर्क दिया कि परिणामों की परवाह किए बिना, विवेक का उल्लंघन करना स्वाभाविक रूप से गलत है।
    • नैतिक विभाजन: यह मामला परिणाम-आधारित नैतिकता और सिद्धांत-आधारित नैतिकता के बीच टकराव पैदा करता है।
  • आनुपातिकता और संस्थागत अनुकूलन
    • दंड की गंभीरता: बर्खास्तगी से असमानुपातिक दंड संबंधी चिंताएँ उत्पन्न हुईं।
      • आनुपातिकता के नैतिक परीक्षण के लिए यह आवश्यक है कि दंड अनुशासन पर वास्तविक प्रभाव के अनुरूप हो, विशेषतः जब आपत्ति संकीर्ण, गंभीर और सम्मानपूर्वक व्यक्त की गई हो।
    • समायोजन की संभावना: एक छोटा-सा समायोजन, जैसे कि पवित्र स्थान के बाहर सम्मानजनक उपस्थिति की अनुमति, यूनिट की एकजुटता और अधिकारी की नैतिक स्वायत्तता, दोनों को बनाए रख सकता था, जिससे नैतिक आनुपातिकता प्रदर्शित होती।

आगे की राह

  • स्पष्ट अनुष्ठान दिशा-निर्देश: ऐसे नियम स्थापित करना, जो प्रतीकात्मक उपस्थिति और अनुष्ठान में भागीदारी के बीच अंतर करें, जिससे सामंजस्य बनाए रखते हुए अधिकार का दुरुपयोग रोका जा सके।
  • उचित समायोजन: संस्थागत ढाँचों को औपचारिक रूप से विवेक-आधारित आपत्तियों को मान्यता देनी चाहिए और सीमित, स्पष्ट रूप से परिभाषित समायोजनों की अनुमति देनी चाहिए (जैसे कि अनुष्ठान में शामिल हुए बिना प्रतीकात्मक उपस्थिति) ताकि व्यक्तिगत गरिमा तथा संस्थागत अनुशासन एक साथ सुरक्षित रहें।
  • क्रमिक प्रतिबंध: विवेक-आधारित विवादों में अंतिम दंड से पहले आनुपातिक अनुशासनात्मक कदम उठाना।
  • नैतिकता और विविधता संबंधी प्रशिक्षण: नेतृत्व विकास में नैतिकता, बहुलवाद और विविधता-जागरूकता को शामिल किया जाना चाहिए, जिससे कमांडरों को कठोर प्रवर्तन के बजाय संवाद, सहानुभूति और प्रासंगिक निर्णय के माध्यम से आस्था-आधारित दुविधाओं को हल करने में सक्षम बनाया जा सके।
  • समावेशी नेतृत्व संस्कृति: विश्वास-तटस्थ नेतृत्व के उदाहरण प्रदर्शित करना (जैसे- ब्रिगेडियर डेसमंड हेडे, लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोरे और कर्नल सोफिया कुरैशी) इस बात पर बल देते हैं कि वास्तविक सैन्य नेतृत्व एकजुटता पर आधारित होता है, न कि औपचारिक अनुरूपता पर।
  • संस्थागत शिक्षा: स्व-आधारित आपत्तियों का जवाब देने में अत्यधिक संस्थागत कठोरता, बहुलवादी नेतृत्व और विश्वास की नैतिक नींव को कमजोर करती है।
    • सबसे मजबूत संस्था भी ऐसी परिपाटी में फँस सकती है, जहाँ रीति-रिवाज कठोर बन जाते हैं और कठोरता बहिष्कार बन जाती है। एरिक लिडेल का उदाहरण दर्शाता है कि टीम की एकता को तोड़े बिना, सच्चे विश्वास का सम्मान किया जा सकता है।
  • संवैधानिक संवेदनशीलता: इस नैतिकता को बनाए रखना कि अनुशासन सहिष्णुता के साथ-साथ रहना चाहिए, जो बिजो इमैनुएल मामले की भावना को प्रतिबिंबित करता है।
    • बिजो इमैनुएल मामला (1986): यहोवा के तीन बच्चों को राष्ट्रगान न गाने के कारण निष्कासित कर दिया गया; सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद-25 के तहत उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को बरकरार रखा और सम्मानजनक गैर-भागीदारी पर जोर दिया।
    • संवैधानिक नैतिकता की माँग है कि संस्थाएँ अनुशासन बनाए रखें और साथ ही यह सुनिश्चित करें कि सहिष्णुता, सम्मान और समझौते एक विविध लोकतंत्र में कार्यप्रणाली के लिए केंद्रीय बने रहें।

एरिक लिडेल, स्कॉटिश धावक, जिन्होंने वर्ष 1924 के पेरिस ओलंपिक में 100 मीटर क्वालीफाइंग हीट में दौड़ने से इनकार कर दिया था क्योंकि वह रविवार को निर्धारित थी। सजा मिलने के बजाय, ब्रिटिश ओलंपिक टीम ने उनकी स्पर्द्धा को 400 मीटर में बदल दिया, जिस दौड़ में उन्होंने बाद में स्वर्ण पदक जीता, एक ऐसी उपलब्धि, जिसकी उनसे प्रायः उम्मीद नहीं की जाती थी क्योंकि यह उनकी विशेषज्ञता नहीं थी।

निष्कर्ष

जब कर्तव्य और विवेक के बीच सामंजस्य स्थापित हो जाता है, तब नैतिक आचरण का उद्देश्य किसी एक को दूसरे पर वरीयता देना नहीं, बल्कि ऐसा संतुलित क्षेत्र निर्मित करना होता है, जहाँ दोनों साथ-साथ विद्यमान रह सकें। कमलेसन मामला यह पुष्टि करता है कि यद्यपि अनुच्छेद-33 के अंतर्गत अनुशासन अनिवार्य है, परंतु एक विविधतापूर्ण लोकतंत्र में दीर्घकालिक विश्वास बनाए रखने हेतु समायोजन तथा आनुपातिकता का सिद्धांत समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

THE MOST
LEARNING PLATFORM

Learn From India's Best Faculty

      

Final Result – CIVIL SERVICES EXAMINATION, 2023. PWOnlyIAS is NOW at three new locations Mukherjee Nagar ,Lucknow and Patna , Explore all centers Download UPSC Mains 2023 Question Papers PDF Free Initiative links -1) Download Prahaar 3.0 for Mains Current Affairs PDF both in English and Hindi 2) Daily Main Answer Writing , 3) Daily Current Affairs , Editorial Analysis and quiz , 4) PDF Downloads UPSC Prelims 2023 Trend Analysis cut-off and answer key

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.