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गर्भकालीन मधुमेह (GDM)

Lokesh Pal December 16, 2025 02:59 101 0

संदर्भ 

दक्षिण भारत के प्रसवपूर्व क्लीनिकों में किए गए हालिया स्ट्राइड (STRiDE) अध्ययन से यह सामने आया है कि प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह की व्यापकता देर से होने वाले गर्भकालीन मधुमेह की तुलना में अधिक है तथा इससे माताओं में दीर्घकालिक मधुमेह का जोखिम भी अधिक रहता है।

  • इस अध्ययन का उद्देश्य एशियाई भारतीय महिलाओं में प्रारंभिक की तुलना में देर से होने वाले गर्भकालीन मधुमेह की व्यापकता और जोखिम कारकों का आकलन करना तथा गर्भावस्था के प्रारंभ में ही देर से होने वाले मधुमेह की भविष्यवाणी हेतु जोखिम-अंकन प्रणाली विकसित करना है।

स्ट्राइड (STRiDE) अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

  • प्रारंभिक और विलंबित गर्भकालीन मधुमेह की व्यापकता: प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह (EGDM) की व्यापकता 21.5% थी और विलंबित गर्भकालीन मधुमेह (LGDM) की व्यापकता 19.5% थी।
  • प्रारंभिक शुरुआत के प्रमाण: शोध से पुष्टि होती है कि गर्भकालीन मधुमेह का विकास मानक 16 सप्ताह की समय-सीमा से पहले ही प्रारंभ हो जाता है।
    • भारत, यूनाइटेड किंगडम और केन्या में किए गए STRiDE अध्ययन में लगभग प्रत्येक पाँच में से एक महिला में प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह पाया गया।
    • दीर्घकालिक मधुमेह का जोखिम: प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह से पीड़ित महिलाओं में आगे चलकर टाइप-2 मधुमेह विकसित होने का जोखिम, देर से होने वाले गर्भकालीन मधुमेह की तुलना में अधिक पाया गया।

संबंधित जोखिम कारक

  • प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह के लिए
    • प्रारंभिक गर्भावस्था मधुमेह (EGDM): EGDM का संबंध गर्भावस्था के शुरुआती दौर में अधिक वजन, बॉडी मास इंडेक्स (BMI), कमर की परिधि, रक्तचाप और ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन (HbA1c) से था।
      • EGDM के मामलों में पहले से गर्भकालीन मधुमेह (जेस्टेशनल डायबिटीज मेलिटस) का प्रसार अधिक पाया गया।
  • अनुशंसित जाँच पद्धति: 16 सप्ताह से पहले प्रारंभिक जाँच में ‘फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज’ तथा ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन का उपयोग।
    • जिन महिलाओं में प्रारंभिक परिणाम असामान्य पाए गए, उनकी 24–28 सप्ताह के बीच पुनः जाँच की गई।

गर्भकालीन मधुमेह के बारे में

  • परिभाषा: गर्भावस्था के दौरान पहली बार दिखने वाला उच्च रक्त शर्करा स्तर, जो सामान्यतः प्रसव के बाद समाप्त हो जाता है।
  • वर्गीकरण
    • प्रारंभिक गर्भकालीन मधुमेह: गर्भावस्था के 20 सप्ताह से पहले निदान।
    • देर से होने वाला गर्भकालीन मधुमेह: गर्भावस्था के 24–28 सप्ताह के बीच निदान।
  • कारण
    • हार्मोनल परिवर्तन तथा इंसुलिन प्रतिरोध में वृद्धि।
    • इससे शरीर की रक्त शर्करा नियंत्रित करने की क्षमता प्रभावित होती है।
  • निदान का समय: सामान्यतः 24 से 28 सप्ताह के बीच पहचाना जाता है।
  • प्रारंभिक जाँच क्यों आवश्यक है?
    • शीघ्र कार्रवाई की आवश्यकता: विशेषज्ञ अब गर्भावस्था के आठवें सप्ताह तक ग्लूकोज जाँच की सिफारिश करते हैं।
    • कारण: गर्भावस्था की पहली तिमाही में उच्च रक्त शर्करा शिशु के चयापचय को प्रभावित कर सकती है तथा भविष्य में रोगों का जोखिम बढ़ा सकती है।

गर्भकालीन मधुमेह: वैश्विक बनाम भारतीय पहल

वर्ग पहल
वैश्विक पहल
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) गर्भकालीन मधुमेह (GDM) को गर्भावस्था के दौरान पहली बार पता चलने वाले उच्च रक्त शर्करा स्तर (हाइपरग्लाइसेमिया) के रूप में परिभाषित करता है और 24-28 सप्ताह में स्क्रीनिंग की सिफारिश करता है, जिसमें उच्च जोखिम वाली महिलाओं के लिए प्रारंभिक स्क्रीनिंग का सुझाव दिया जाता है।
  • इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ डायबिटीज एंड प्रेग्नेंसी स्टडी ग्रुप्स’ (IADPSG) ‘ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट’ (OGTT) का उपयोग करके वैश्विक नैदानिक ​​सीमाएँ निर्धारित करता है।
  • इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन’ (IDF) GDM को भविष्य में टाइप-2 मधुमेह और अंतरपीढ़ीगत चयापचय जोखिम के एक कारक के रूप में उजागर करता है, अधिकांश उच्च आय वाले देश जोखिम-आधारित स्क्रीनिंग का पालन करते हैं।
भारत की पहल
  • केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) ने सार्वभौमिक गर्भकालीन मधुमेह (GDM) स्क्रीनिंग को अनिवार्य कर दिया है।
  • भारत एकल-चरणीय OGTT पद्धति का पालन करता है।
  • GDM को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और प्रजनन, मातृ, नवजात, बाल एवं किशोर स्वास्थ्य (RMNCH+A) रणनीति में एकीकृत किया गया है।
  • भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) प्रारंभिक गर्भावस्था में प्रारंभिक मधुमेह (EGDM) की उच्च व्यापकता के कारण प्रारंभिक गर्भावस्था स्क्रीनिंग का समर्थन करती है।
  • आयुष्मान भारत- स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (AB-HWC) सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग और अनुवर्ती सेवाएँ प्रदान करते हैं।

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