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चिकित्सा संबंधी नैतिकता

Lokesh Pal December 31, 2025 02:15 8 0

संदर्भ

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री ने अहमदाबाद में एक राष्ट्रीय चिकित्सा सम्मेलन को संबोधित करते हुए, चिकित्सा संबंधी नैतिकता के आधुनिकीकरण और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की भूमिका पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला, क्योंकि यह वर्ष 2025 में अपनी 100वीं वर्षगाँठ मना रहा है।

संबंधित तथ्य

  • IMA के बारे में: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) भारत में चिकित्सकों का एक राष्ट्रीय स्वैच्छिक संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष  1928 में हुई थी।
    • यह आधुनिक चिकित्सा पद्धति का अभ्यास करने वाले डॉक्टरों के हितों का प्रतिनिधित्व करता है और इसका उद्देश्य समग्र रूप से समाज के कल्याण को बढ़ावा देना है।
  • स्वास्थ्य को प्राथमिकता: केंद्रीय मंत्री ने डॉक्टरों से “स्वास्थ्य को प्राथमिकता” देने और उपचार के साथ-साथ स्वास्थ्य, जीवन शैली और सेवा को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया।
  • सम्मेलन में प्रदर्शित उपलब्धियाँ: भारत में मलेरिया के मामलों में 97% की कमी दर्ज की गई है और देश जल्द ही इस बीमारी से मुक्त हो जाएगा।
    • डेंगू से मृत्यु दर घटकर मात्र 1% रह गई है।
    • मातृ मृत्यु दर में 25% की कमी आई है।
    • केंद्र का स्वास्थ्य बजट अब 1.28 लाख करोड़ रुपये है।

चिकित्सा संबंधी नैतिकता के बारे में

  • चिकित्सा संबंधी नैतिकता वे नैतिक सिद्धांत और मूल्य हैं, जो चिकित्सकों और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों को निष्पक्ष, जिम्मेदार और मानवीय तरीके से निर्णय लेने और देखभाल प्रदान करने में मार्गदर्शन करते हैं।
  • चिकित्सा संबंधी नैतिकता के मूल सिद्धांत
    • स्वायत्तता: रोगी के सूचित निर्णय लेने के अधिकार का सम्मान करना।
    • परोपकारिता: रोगी के सर्वोत्तम हित में कार्य करना।
    • अहिंसा: रोगियों को हानि पहुँचाने से बचना।
    • न्याय: सभी रोगियों के साथ निष्पक्ष और समान व्यवहार करना।
  • चिकित्सकीय नैतिकता (हिप्पोक्रेटिक) संबंधी शपथ: चिकित्सकीय नैतिकता संबंधी (हिप्पोक्रेटिक) शपथ चिकित्सकों द्वारा ली जाने वाली एक पारंपरिक नैतिक प्रतिज्ञा है, जिसका श्रेय आधुनिक चिकित्सा के जनक ‘हिप्पोक्रेट्स’ को दिया जाता है।
    • यह चिकित्सा संबंधी नैतिकता के मूलभूत सिद्धांतों को निर्धारित करती है, जो चिकित्सकों को ईमानदारी, करुणा और जिम्मेदारी के साथ चिकित्सा का अभ्यास करने के लिए मार्गदर्शन करती है।

भारत में चिकित्सा संबंधी नैतिकता संहिता

  • ढाँचा: भारतीय चिकित्सा परिषद (पेशेवर आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियम, 2002, भारत में पंजीकृत चिकित्सकों द्वारा पालन किए जाने वाले पेशेवर आचरण, शिष्टाचार और नैतिक दायित्वों के मानकों को निर्धारित करते हैं।
  • संहिता स्थापित करने वाला प्राधिकरण: ये विनियम भारतीय चिकित्सा परिषद द्वारा तैयार किए गए थे, जिसका स्थान अब राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने ले लिया है।
  • वर्ष 2002 के विनियम के अनुसार, चिकित्सा संबंधी नैतिकता संहिता के प्रमुख प्रावधानों में निम्नलिखित शामिल हैं:
    • जेनेरिक दवाओं का प्रिस्क्रिप्शन और दवाओं का तर्कसंगत उपयोग।
    • यह सुनिश्चित करना कि चिकित्सा अभ्यास में केवल योग्य और पंजीकृत व्यक्ति ही सहायता करें।
    • मरीज की गोपनीयता बनाए रखना और उनकी गरिमा एवं स्वायत्तता का सम्मान करना।
    • प्रक्रियाओं से पहले सूचित सहमति प्राप्त करना।
    • मरीज की भुगतान क्षमता की परवाह किए बिना आपातकालीन देखभाल प्रदान करने का कर्तव्य।
    • अनैतिक या अक्षम चिकित्सा व्यवहार की संबंधित अधिकारियों को अनिवार्य रिपोर्टिंग।
    • चिकित्सा अनुसंधान और नैदानिक ​​परीक्षणों में नैतिक मानदंडों का पालन।

समकालीन समय में चिकित्सा संबंधी नैतिकता को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता

  • जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ: हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में वृद्धि के कारण केवल उपचार ही नहीं, बल्कि रोकथाम, स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना आवश्यक हो गया है।
  • तकनीकी प्रगति: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, टेलीमेडिसिन, जीनोमिक्स, अंग प्रत्यारोपण आदि गोपनीयता, सहमति, जवाबदेही और मानवीय निगरानी से संबंधित नई नैतिक दुविधाओं को जन्म दे रहे हैं।
  • स्वास्थ्य सेवा का व्यावसायीकरण: कॉरपोरेट अस्पताल, बीमा-आधारित देखभाल और लाभ के उद्देश्य अति-निदान, अनावश्यक प्रक्रियाओं और असमान पहुँच के विरुद्ध नैतिक सुरक्षा उपायों को अनिवार्य बनाते हैं।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियाँ: कोविड-19 जैसी महामारियों ने व्यक्तिगत अधिकारों और सामूहिक हित, संसाधन आवंटन और देखभाल के कर्तव्य के बीच नैतिक संघर्षों को प्रदर्शित किया है।
  • समानता और सामाजिक न्याय संबंधी चिंताएँ: निरंतर बनी हुई स्वास्थ्य असमानताएँ ऐसी नैतिकता की माँग करती हैं, जो स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों, सार्वभौमिक पहुँच और संसाधन वितरण में निष्पक्षता को संबोधित करती हो।

रोग की तुलना में स्वास्थ्य: स्वास्थ्य सेवा में नैतिक परिवर्तन

  • रोकथाम और स्वास्थ्य संवर्द्धन: स्वास्थ्य संबंधी दृष्टिकोण निवारक देखभाल, स्वस्थ जीवनशैली और प्रारंभिक हस्तक्षेप को प्राथमिकता देता है, जिससे चिकित्सा संबंधी नैतिकता प्रतिक्रियात्मक उपचार से हटकर सक्रिय कल्याण और जीवन की बेहतर गुणवत्ता की ओर अग्रसर होती है।
  • स्वास्थ्य की समग्र अवधारणा: यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा स्वास्थ्य की परिभाषा से संरेखित है, जिसमें स्वास्थ्य को पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की स्थिति के रूप में परिभाषित किया गया है तथा नैतिक उत्तरदायित्व को उपचार से आगे तक विस्तारित किया गया है।
  • आर्थिक लाभ: दीर्घकालिक और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की रोकथाम करके, स्वास्थ्य संबंधी मॉडल नैतिक रूप से दीर्घकालिक स्वास्थ्य देखभाल लागत को कम करता है, अनावश्यक पीड़ा से बचाता है और समाज पर समग्र रोग भार को कम करता है।
  • समान सेवाएँ: स्वास्थ्य-उन्मुख नैतिक ढाँचा प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ करता है, जिससे सुलभ, समान और स्थायी स्वास्थ्य देखभाल वितरण सुनिश्चित होता है।

निवारक और स्वास्थ्य-आधारित स्वास्थ्य देखभाल के संबंध में अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम पद्धतियाँ

  • जापान: मेटाबो कानून के तहत मोटापे से संबंधित बीमारियों की रोकथाम के लिए वार्षिक स्तर पर कमर की माप और जीवनशैली संबंधी परामर्श अनिवार्य है, जो स्वास्थ्य पर आधारित निवारक स्वास्थ्य सेवा नीति को दर्शाता है।
  • सिंगापुर: ‘नेशनल स्टेप्स चैलेंज’, स्वास्थ्य संवर्द्धन बोर्ड (HPB) द्वारा शुरू की गई एक शारीरिक गतिविधि पहल है, जिसका उद्देश्य सिंगापुर के निवासियों को प्रतिदिन अधिक शारीरिक रूप से सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित करना है।
  • चूजिंग वाइजली कैंपेन’ टूलकिट: यह ABIM (अमेरिकन बोर्ड ऑफ इंटरनल मेडिसिन) फाउंडेशन का एक संसाधन है, जो स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और रोगियों को अनावश्यक चिकित्सा परीक्षणों, उपचारों और प्रक्रियाओं की पहचान करने तथा उन पर चर्चा करने में मदद करता है।

चिकित्सा क्षेत्र में नैतिक मुद्दे

  • सूचित सहमति: जानकारी की कमी, अशिक्षा तथा सहमति को केवल औपचारिकता मानने के कारण, मरीजों को प्रायः उपचार संबंधी निर्णयों की समझ नहीं होती।
    • उदाहरण: एक मरीज संभावित जटिलताओं को समझे बिना सर्जरी के लिए सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर कर देता है।
  • गोपनीयता और निजता: मरीज का डेटा बिना सहमति के प्रकट किया जा सकता है।
    • उदाहरण: किसी मरीज की एचआईवी स्थिति को नियोक्ताओं या समुदाय के सदस्यों को बताना।
  • नैदानिक ​​परीक्षण और अनुसंधान नैतिकता: कमजोर आबादी का शोषण और सूचित सहमति का अभाव स्वायत्तता का उल्लंघन करता है तथा प्रतिभागियों को अनुचित जोखिम में डालता है।
    • उदाहरण: यह आरोप लगाया गया था कि भोपाल में कोवैक्सिन के नैदानिक ​​परीक्षणों में उचित रूप से सूचित सहमति न लेकर, कमजोर लोगों (गरीब, निरक्षर, गैस पीड़ित) का शोषण करके, प्रतिकूल प्रभावों की रिपोर्ट न करके और प्रतिभागियों की अनुवर्ती कार्रवाई सुनिश्चित न करके नैतिकता का उल्लंघन किया गया।
  • संसाधन आवंटन: दुर्लभ चिकित्सा संसाधनों का वितरण सामाजिक-आर्थिक स्थिति, जाति या भौगोलिक स्थिति के आधार पर निष्पक्ष नहीं हो सकता है।
    • उदाहरण: कोविड-19 के दौरान ICU बेड का आवंटन चिकित्सा आवश्यकता के बजाय प्रभाव के आधार पर किया गया था।
  • जीवन के अंतिम निर्णय: जीवन की अवधि बढ़ाने और गरिमा सुनिश्चित करने के बीच एक नैतिक दुविधा है।
    • उदाहरण: असाध्य रोग से ग्रसित रोगियों में जीवन रक्षक उपकरण हटाना जीवन और गरिमा का सम्मान करने के बीच एक दुविधा पैदा करता है, खासकर जब उपचार की लागत गरीब परिवारों पर बोझ डालती है।
  • हितों का टकराव: चिकित्सा संबंधी नैतिकता में हितों का टकराव तब उत्पन्न होता है, जब वित्तीय या व्यक्तिगत हित निष्पक्ष चिकित्सा निर्णय लेने को प्रभावित करते हैं, जिससे रोगी देखभाल और अनुसंधान की सत्यनिष्ठा से समझौता होता है।

भारत में चिकित्सा संबंधी नैतिकता को नियंत्रित करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय

  • इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम वी.पी. शांता (1995): उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 में चिकित्सा सेवाओं को ‘सेवा’ की परिभाषा के अंतर्गत रखा गया है, जिससे रोगियों को चिकित्सकीय लापरवाही के लिए निवारण प्राप्त करने का अधिकार मिलता है।
  • परमानंद कटारा बनाम भारत संघ (1989): जीवन का अधिकार (अनुच्छेद-21) डॉक्टरों को कानूनी औपचारिकताओं या भुगतान की परवाह किए बिना तत्काल आपातकालीन देखभाल प्रदान करने के लिए बाध्य करता है।
  • जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य (2005): आपराधिक दायित्व केवल घोर लापरवाही के मामलों में ही उत्पन्न होता है; डॉक्टरों को गलत अभियोजन से संरक्षित किया जाना चाहिए।
  • समीरा कोहली बनाम डॉ. प्रभा मनचंदा (2008): सहमति वास्तविक, सूचित और प्रक्रिया-विशिष्ट होनी चाहिए; सामान्य सहमति अनैतिक और अमान्य है।
  • कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018 और 2023): सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार के हिस्से के रूप में गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को मान्यता दी।
    • इसने निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल को मान्यता दी, जिससे असाध्य रोग से पीड़ित रोगियों की गरिमा और स्वायत्तता को बनाए रखा जा सके।

भारत में चिकित्सा संबंधी नैतिकता को लागू करने में चुनौतियाँ

  • स्वास्थ्य सेवाओं का व्यावसायीकरण: बढ़ते निगमीकरण से रोगी कल्याण की तुलना में लाभ को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे अनावश्यक निदान, अनावश्यक प्रक्रियाएँ और हितों के टकराव को बढ़ावा मिलता है।
    • उदाहरण: आंध्र प्रदेश सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के तहत जिला अस्पतालों और सार्वजनिक भूमि को निजी निवेशकों को दीर्घकालिक पट्टे पर देकर मेडिकल कॉलेजों का विस्तार कर रहा है।
  • स्वास्थ्य प्रणाली पर अत्यधिक बोझ: अधिक रोगी भार, डॉक्टरों की कमी और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा सार्थक सूचित सहमति और नैतिक निर्णय लेने के लिए उपलब्ध समय को कम कर देते हैं।
    • उदाहरण: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) डॉक्टर-रोगी अनुपात 1:1,000 निर्धारित करता है। केवल एलोपैथिक डॉक्टरों को शामिल करने पर भारत में यह अनुपात लगभग 1:1,200 है।
  • नैतिकता शिक्षा में कमियाँ: चिकित्सा संबंधी नैतिकता के लिए असंगत प्रशिक्षण और सीमित व्यावहारिक अनुभव स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच नैतिक संवेदनशीलता को कमजोर करते हैं।
  • कमजोर प्रवर्तन तंत्र: नियामक निकायों की क्षमता सीमित है, जिसके परिणामस्वरूप कार्रवाई में देरी होती है और नैतिक मानकों का असमान प्रवर्तन होता है।
  • उदाहरण: हाल ही में, केरल के जनरल प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन (GPA) ने बताया कि राज्य चिकित्सा परिषदों द्वारा अपर्याप्त निगरानी के कारण, अपंजीकृत विदेशी मेडिकल स्नातक और वैकल्पिक चिकित्सा के चिकित्सक अवैध रूप से आधुनिक चिकित्सा का अभ्यास कर रहे हैं।
  • सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएँ: निरक्षरता, पितृसत्तात्मक चिकित्सा संस्कृति और परिवार-प्रधान निर्णय लेने की प्रक्रिया रोगी की स्वायत्तता और सूचित विकल्प को कमजोर करती है।
  • तीव्रता से तकनीकी परिवर्तन: AI, टेलीमेडिसिन और डिजिटल स्वास्थ्य उपकरणों को तेजी से अपनाने से गोपनीयता, जवाबदेही और सहमति पर नैतिक दिशा-निर्देशों का पालन नहीं हो पा रहा है।
  • अनुसंधान परिवेश में असुरक्षा: गरीबी और जागरूकता की कमी हाशिए पर स्थित आबादी को नैदानिक ​​परीक्षणों में नैतिक उल्लंघनों के प्रति संवेदनशील बनाती है।

भारत में चिकित्सा संबंधी नैतिकता को दिशा देने के लिए सरकार के प्रयास

  • गुड क्लिनिकल प्रैक्टिस (GCP): भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और मानव उपयोग के लिए फार्मास्यूटिकल्स की तकनीकी आवश्यकताओं के सामंजस्य के लिए अंतरराष्ट्रीय परिषद (ICH) के मानकों के अनुरूप गुड क्लिनिकल प्रैक्टिस (GCP) को अपनाया है।
    • गुड क्लिनिकल प्रैक्टिस (GCP) वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त एक मानक है, जो नैदानिक ​​परीक्षणों की नैतिक और वैज्ञानिक अखंडता सुनिश्चित करता है।
      • यह परीक्षण डेटा की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता सुनिश्चित करते हुए मानव प्रतिभागियों के अधिकारों, सुरक्षा और कल्याण की रक्षा के लिए डिजाइन किए गए कठोर प्रोटोकॉल की रूपरेखा तैयार करता है।
  • टेलीमेडिसिन अभ्यास दिशानिर्देश (2020): भारत सरकार ने टेलीमेडिसिन के अभ्यास के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करने हेतु दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनमें चिकित्सक-रोगी संबंध, सूचित सहमति और प्रौद्योगिकी के उपयोग जैसे पहलुओं को शामिल किया गया है।
  • आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM): सहमति आधारित स्वास्थ्य डेटा साझाकरण और गोपनीयता सुरक्षा उपायों को बढ़ावा देता है।
  • रोगी अधिकारों का चार्टर: स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) ने रोगी अधिकारों के चार्टर की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए एक परिपत्र जारी किया है, जिसे सभी स्वास्थ्य संस्थानों द्वारा प्रदर्शित और पालन किया जाना अनिवार्य है।
  • चिकित्सा शिक्षा सुधार: सरकारी निर्देश नैतिक व्यवहार, सहानुभूति और रोगी-केंद्रित अभ्यास को बढ़ावा देने के लिए चिकित्सा पाठ्यक्रम में दृष्टिकोण, नैतिकता और संचार (AETCOM) मॉड्यूल को शामिल करने का समर्थन करते हैं।
  • आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80D: निवारक स्वास्थ्य जाँच पर कर छूट प्रदान करती है, जिससे व्यक्तियों को शीघ्र निदान और नियमित चिकित्सा जाँच को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

आगे की राह 

  • नैतिक विनियमन और निगरानी को सुदृढ़ बनाना: चिकित्सा संबंधी नैतिकता संहिता को AI, टेलीमेडिसिन, डेटा गोपनीयता और नैदानिक ​​परीक्षणों सहित उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए अद्यतन किया जाना चाहिए, जिसमें उचित  जवाबदेही तंत्र शामिल हों।
  • स्क्रीनिंग कवरेज का विस्तार: सरकार को 30 वर्ष से अधिक आयु के वयस्कों (और उच्च जोखिम वाले युवा समूहों) के लिए सार्वभौमिक कवरेज सुनिश्चित करने के लिए देशव्यापी गैर-संचारी रोग (NCD) की स्क्रीनिंग का विस्तार करना चाहिए।
    • स्क्रीनिंग में दूरस्थ, आदिवासी और शहरी-गरीब क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिसके लिए स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों (HWCs) और मोबाइल यूनिट्स का उपयोग करके मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर आदि का शीघ्र पता लगाया जा सके।
  • स्वास्थ्य सेवा के व्यावसायीकरण पर अंकुश लगाना: नियामक प्राधिकरणों को पारदर्शिता लागू करनी चाहिए, दवा-चिकित्सक संबंधों को विनियमित करना चाहिए और लाभ के उद्देश्य से प्रेरित अनावश्यक जाँच और प्रक्रियाओं को हतोत्साहित करना चाहिए।
  • नैतिक शिक्षा और व्यावसायिक मूल्यों को बढ़ावा देना: चिकित्सा शिक्षा संस्थानों को स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच नैतिक क्षमता को मजबूत करने के लिए स्नातक पाठ्यक्रम और सतत् व्यावसायिक विकास में नैतिकता, संचार कौशल तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य नैतिकता को एकीकृत करना चाहिए।

निष्कर्ष 

“चिकित्सकीय नैतिकता में पेशेवर उत्तरदायित्व और रोगी के विश्वास के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। डॉक्टरों पर सार्वजनिक विश्वास को सुदृढ़ करना उनकी भूमिका के पुनर्परिभाषण तथा यह सुनिश्चित करने से जुड़ा है कि चिकित्सा देखभाल करुणामय, साक्ष्य-आधारित और नैतिक रूप से जवाबदेह हो।

अभ्यास प्रश्न चिकित्सा नैतिकता को प्रासंगिक और प्रभावी बने रहने के लिए बदलते सामाजिक मूल्यों और तकनीकी प्रगति के साथ विकसित होना आवश्यक है। चर्चा कीजिए।

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