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Lokesh Pal
January 02, 2026 05:33
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शीतयुद्ध के बाद की एकध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब चीन के आर्थिक-तकनीकी उत्थान और यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की बढ़ती आक्रामकता के कारण कमजोर पड़ रही है तथा अमेरिका–चीन रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता के निकट बहुध्रुवीय स्वरूप ग्रहण कर रही है।
उभरती हुई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था संरचना की दृष्टि से बहुध्रुवीय, किंतु व्यवहार में द्विध्रुवीय होती जा रही है, जिसे महाशक्तियों की तीव्र प्रतिस्पर्धा और निरंतर बदलते गठबंधन आकार दे रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में भारत के लिए रणनीतिक अनिवार्यता यह है कि वह सामरिक स्वायत्तता को न केवल बनाए रखे, बल्कि उसे प्रभावी रूप से क्रियान्वित भी करे; विविध साझेदारियों को सुदृढ़ करे; तथा पश्चिम और वैश्विक दक्षिण के मध्य एक सेतु के रूप में अपनी स्थिति का उपयोग करते हुए अनिश्चितता को प्रभाव और स्थिरता में रूपांतरित करे।
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