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संवैधानिक नैतिकता: न्यायिक स्वतंत्रता की मार्गदर्शक

Lokesh Pal January 10, 2026 05:00 18 0

सन्दर्भ:

77वें संविधान दिवस के अवसर पर, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत ने संवैधानिक नैतिकता के विचार को स्पष्ट किया, जो संविधान में गहनता से निहित है

संवैधानिक नैतिकता की नींव और उत्पत्ति

  • इस शब्द का प्रयोग ब्रिटिश इतिहासकार जॉर्ज ग्रोट ने अपनी कृति ‘ए हिस्ट्री ऑफ ग्रीस’ में किया था।
  • मूल अर्थ: संवैधानिक नैतिकता एक ऐसी भावना है, जो लिखित संवैधानिक नियमों का आधार होती है और लोकतांत्रिक शासन को बनाए रखती है।
    • यह संवैधानिक मानदंडों के पालन और कानूनी नियमों और विनियमों से परे संस्थानों के प्रति सम्मान को बढ़ावा देता है।
  • संवैधानिक नैतिकता के मुख्य स्तंभ: स्वतंत्रता (सभी की स्वतंत्रता का सम्मान करना) और आत्म-संयम (सत्ताधारियों द्वारा अपने अधिकार का दुरुपयोग न करना, भले ही कानून इसकी अनुमति देता हो)।

संविधानिक नैतिकता पर अंबेडकर का दृष्टिकोण (1948)

  • नैतिकता में अंतर: डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने संवैधानिक नैतिकता और जाति एवं परंपरा में निहित सामाजिक नैतिकता के बीच स्पष्ट अंतर बताया
  • संवैधानिक विफलता की संभावना: उन्होंने संविधान सभा को चेतावनी दी, कि एक अच्छी तरह से तैयार किया गया संविधान भी व्यवहार में विफल हो सकता है।
  • कुप्रशासन का खतरा: उन्होंने चेतावनी दी, कि कुप्रशासन के माध्यम से संवैधानिक स्वरूप को विकृत किया जा सकता है जिससे संविधान की भावना विफल हो जाती है।
  • संवैधानिक नैतिकता का कठोरता से पालन करने के कारण: 
    • जवाबदेही से परे सत्ता का खतरा: संवैधानिक प्रतिबंधों के कमजोर होने पर सत्ताधारी जवाबदेही से परे हो जाते हैं।
    • लोकतांत्रिक हेरफेर की संभावना: लोकतंत्र स्वयं ही वैधता की आड़ में परिवर्तन के अवसर उत्पन्न करता है। इसलिए, लोकतंत्र की रक्षा के लिए संवैधानिक नैतिकता (संवैधानिक मूल्यों में विश्वास) का कठोरता से पालन करना आवश्यक है।
  • संविधान में न्यायशास्त्रीय आस्था (Jurisprudential Faith): अंबेडकर संवैधानिक नैतिकता को संविधान में न्यायशास्त्रीय आस्था उत्पन्न करने के रूप में देखते थे।
    • यह आस्था स्वतंत्रता, गरिमा, समानता, बंधुत्व और तर्कसंगतता को अर्थ प्रदान करती है।
    • न्यायाधीश इन संवैधानिक वादों को विषयवस्तु और संदर्भ प्रदान करने हेतु उत्तरदायी हैं।

आपातकाल की अवधि

  • आपातकाल की अवधि (1975-77): राष्ट्रीय आपातकाल की अवधि में न्यायपालिका सहित लोकतांत्रिक संस्थानों के साथ गंभीर विश्वासघात देखने को मिला।
  • न्यायिक इतिहास का सबसे काला क्षण: एडीएम जबलपुर मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने आपातकाल के दौरान मूल अधिकारों पर विचार किया
  • जीवन के अधिकार का निलंबन (अनुच्छेद 21): सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया, कि आपातकाल के दौरानअनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार को भी निलंबित किया जा सकता है।
  • नैतिकता पर वैधता को प्राथमिकता: न्यायालय ने मानवाधिकारों और नैतिक संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की बजाय आपातकालीन आदेशों के कानूनी अनुपालन को चुना
  • संस्थागत विफलता का मूल कारण: यह संवैधानिक नैतिकता की विफलता को दर्शाता है, जहाँ औपचारिक वैधता ने वास्तविक न्याय का स्थान ले लिया।
  • नैतिक प्रतिबद्धता के बिना वैधता अन्याय को वैधता प्रदान करने का जोखिम पैदा करती है, जो संस्थानों के भीतर नैतिक जिम्मेदारी की आवश्यकता को उजागर करती है।
  • एकमात्र असहमति जताने वाले न्यायाधीश – न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना: उन्होंने इस बात पर बल दिया कि, विधि का शासन संवैधानिक पाठ से स्वतंत्र और इतर मौजूद है।
    • उनका मानना ​​था, कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्राकृतिक अधिकार हैं, जिन्हें कोई भी राज्य आपातकाल के दौरान भी छीन नहीं सकता
    • उनके असहमतिपूर्ण मत ने यह प्रदर्शित किया, कि न्याय के प्रति नैतिक प्रतिबद्धता को संकीर्ण कानूनी औपचारिकता पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

विगत 50 वर्षों में संवैधानिक नैतिकता का विकास

  • आपातकाल के बाद न्यायिक भूमिका में बदलाव: आपातकाल के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं को कानून के निष्क्रिय व्याख्याकार की बजाय “संवैधानिक मूल्यों के संरक्षक” के रूप में पुनर्गठित किया।
  • मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में संवैधानिक नैतिकता: न्यायिक निर्णय की प्रक्रिया में संवैधानिक नैतिकता का प्रतिबिंब तेज गति से दिखाई देने लगा, जिसमें न्याय, गरिमा और अधिकारों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
  • संवैधानिक नैतिकता के प्रमुख उपकरण: 
    • मूल संरचना का सिद्धांत (केशवानंद भारती वाद): संसद संविधान की मूल विशेषताओं में संशोधन या उन्हें नष्ट नहीं कर सकती, जिससे इसकी मूल पहचान संरक्षित रहती है।
      • जनहित याचिका (पीआईएल) के माध्यम से न्याय तक पहुँच का विस्तार: जनहित याचिका ने गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों को न्यायालय तक पहुँचने में सक्षम बनाया, जिससे न्याय तक पहुँच में प्रक्रियात्मक बाधाएँ कम हुईं।
      • पत्र-प्रधान अधिकार क्षेत्र का उपयोग: न्यायालयों ने कमजोर समूहों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए पत्र तथा पोस्टकार्डों को रिट याचिकाओं के रूप में स्वीकार किया।

आधुनिक चुनौती: मुख्य न्यायाधीश और संस्थागत नैतिकता

  • संस्थाओं में संवैधानिक नैतिकता का विस्तार: संवैधानिक नैतिकता संस्थाओं के कार्यों और प्रक्रियाओं पर लागू होती है, न कि केवल उनके अंतिम निर्णयों या परिणामों पर।
  • मामलों के निपटान के लिए रोस्टर का प्रयोग: भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के पास विभिन्न पीठों को मामले सौंपने की महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक शक्ति है।
    • मनमानी और पक्षपात को रोकने के लिए इस शक्ति का प्रयोग पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से किया जाना चाहिए।
    • मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय की नैतिक अधिकारिता और वैधता को बनाए रखने के लिए, रोस्टर शक्तियों का निष्पक्ष प्रयोग आवश्यक है।
  • समकालीन न्यायिक दृष्टिकोण: वर्तमान दृष्टिकोण यह है, कि संवैधानिक नैतिकता को न्यायिक प्रशासन का मार्गदर्शन करना चाहिए, विशेष रूप से पीठों को मामलों का निष्पक्ष आवंटन करने में।

आलोचनात्मक विश्लेषण

  • न्यायालय संवैधानिक व्याख्याकार के रूप में: संवैधानिक नैतिकता का उत्तरदायी उपयोग यह सुनिश्चित करता है, कि न्यायालय संवैधानिक व्याख्याकार बने रहें, न कि नैतिक मध्यस्थ।
    • नैतिकता के नाम पर न्यायिक हस्तक्षेप संवैधानिक संतुलन को खराब कर सकता है।
  • प्रत्येक मुद्दा नैतिक संकट नहीं होता: संवैधानिक नैतिकता असाधारण परिस्थितियों के लिए होती है, और प्रत्येक कानूनी या संवैधानिक मुद्दा लोकतंत्र की नैतिक विफलता या संविधान के साथ विश्वासघात को नहीं दर्शाता है।
  • इसके उपयोग को उचित ठहराने वाली स्थितियाँ: यह तब लागू होता है, जब संवैधानिक अधिकारों, प्रक्रियाओं और कार्यविधियों का स्पष्ट उल्लंघन होता है।
    • यह तब प्रासंगिक हो जाता है, जब सत्ताधारी लोग संवैधानिक गारंटियों की विधिक मान्यता के बावजूद गैर-उत्तरदायी तरीके से कार्य करते हैं।
  • न्यायिक सर्वोच्चता नहीं, अन्याय के विरुद्ध ढाल: यह संवैधानिक अन्याय के विरुद्ध ढाल के रूप में कार्य करता है।
    • इसका प्रयोग न्यायिक सर्वोच्चता को बढ़ावा देने के हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

संवैधानिक नैतिकता एक नागरिक भावना से विकसित होकर लोकतंत्र की मार्गदर्शक सुरक्षा बन गई है यह केवल विधिक ग्रंथों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के प्रति दृढ़ नैतिक प्रतिबद्धता के माध्यम से भी जीवित रहती है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: “संवैधानिक नैतिकता संविधान में ही निहित है और इसकी मूल भावना पर आधारित है।” न्यायपालिका की विकसित होती भूमिका के संदर्भ में चर्चा कीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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