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मलयालम भाषा विधेयक, 2025

Lokesh Pal January 13, 2026 03:17 7 0

संदर्भ

कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण (KBADA) ने यह माँग की है कि केरल के कासरगोड जिले में भाषायी अल्पसंख्यक क्षेत्रों को वर्ष 2025 के मलयालम भाषा विधेयक के प्रावधानों से स्पष्ट रूप से बाहर रखा जाए, जो विद्यालयों में मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा घोषित करने का प्रावधान करता है।

संबंधित तथ्य

  • पूर्व में, कर्नाटक सरकार ने औपचारिक रूप से केरल के राज्यपाल से यह आरोप लगाते हुए इस विधेयक को अस्वीकार करने का आग्रह किया था, कि यह असंवैधानिक है और विशेषकर केरल के कासरगोड जिले में कन्नड़-भाषी अल्पसंख्यकों के भाषायी अधिकारों का उल्लंघन करता है।

मलयालम भाषा विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • आधिकारिक भाषा का दर्जा: यह विधेयक संवैधानिक प्रावधानों के अधीन, सरकार, शिक्षा, न्यायपालिका, सार्वजनिक संचार, वाणिज्य तथा डिजिटल क्षेत्र में उपयोग के लिए मलयालम को केरल की आधिकारिक भाषा के रूप में औपचारिक रूप से घोषित करता है।
  • विद्यालयों में भाषा संबंधी अनिवार्यता: कक्षा 10 तक सभी सरकारी और सहायता-प्राप्त विद्यालयों में मलयालम अनिवार्य प्रथम भाषा होगी।
    • वर्तमान में, राज्य अंग्रेजी और मलयालम दोनों को आधिकारिक भाषाओं के रूप में मान्यता देता है।
  • न्यायपालिका और विधायिका
    • निर्णयों और न्यायालयी कार्यवाहियों का चरणबद्ध तरीके से मलयालम में अनुवाद किया जाएगा।
    • विधेयक और अध्यादेश मलयालम में प्रस्तुत किए जाएँगे।
    • वर्तमान में अंग्रेजी में प्रकाशित महत्त्वपूर्ण केंद्रीय और राज्य अधिनियमों का मलयालम में अनुवाद किया जाएगा।
  • डिजिटल और IT एकीकरण: सूचना प्रौद्योगिकी विभाग IT क्षेत्र में मलयालम के प्रयोग को सुगम बनाने के लिए ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर और उपकरण विकसित करेगा।
  • संस्थागत ढाँचा
    • कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार (आधिकारिक भाषा) विभाग का नाम बदलकर मलयालम भाषा विकास विभाग किया जाएगा।
    • विभाग के अंतर्गत मलयालम भाषा विकास निदेशालय का गठन किया जाएगा।

अनुच्छेद-345: किसी राज्य की विधायिका, कानून द्वारा उस राज्य में प्रचलित किसी एक या अधिक भाषाओं को अथवा हिंदी को उस राज्य की सभी अथवा किसी आधिकारिक प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा/भाषाएँ अपना सकती है।

विधेयक के विवादित प्रावधान

  • अनिवार्य प्रथम भाषा: विधेयक की धारा 2(6) केरल में कक्षा 10 तक सभी सरकारी और सहायता-प्राप्त विद्यालयों में मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा बनाती है।
  • अनुच्छेद-350 और 350A: कर्नाटक ने तर्क दिया कि भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधा प्रदान करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है।
    • अल्पसंख्यक अधिकारों का उल्लंघन: याचिका में अनुच्छेद-30, 347, 350, 350A और 350B के उल्लंघन का आरोप लगाया गया, जो सामूहिक रूप से भाषायी अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा करते हैं।
  • बलपूर्वक भाषा थोपना: कर्नाटक ने कहा कि विधेयक की स्वीकृति से बाध्यकारी भाषा-अध्ययन होगा, जो संवैधानिक संरक्षणों का अतिक्रमण करेगा।
  • अल्पसंख्यक छात्रों पर प्रभाव: कासरगोड के कन्नड़-भाषी छात्र, जो वर्तमान में कन्नड़ को प्रथम भाषा के रूप में पढ़ते हैं, मलयालम सीखने के लिए बाध्य हो सकते हैं।
  • ऐतिहासिक दृष्टांत: इसी प्रकार का एक विधेयक [मलयालम भाषा (प्रसार और समृद्धि) विधेयक, 2015, जो वर्ष 2017 में पारित हुआ] पहले राष्ट्रपति द्वारा अस्वीकृत किया गया था, जिससे कर्नाटक के तर्क को बल मिलता है।
    • अनुच्छेद-200 के तहत, राज्यपाल विधेयक को मंजूरी दे सकते हैं या रोक लगा सकते हैं अथवा विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकते हैं।

भाषायी और अल्पसंख्यक अधिकारों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद-29 और 30: अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की रक्षा करते हैं, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना तथा प्रशासन का अधिकार शामिल है।
  • अनुच्छेद-347: किसी राज्य की जनसंख्या के एक वर्ग द्वारा बोली जाने वाली भाषा की आधिकारिक मान्यता का प्रावधान करता है।
  • अनुच्छेद-350A: राज्यों को भाषायी अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों के लिए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व का प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद-350B: संवैधानिक संरक्षणों के क्रियान्वयन की निगरानी और रिपोर्टिंग के लिए भाषायी अल्पसंख्यकों हेतु एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
    • नोट: भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है, जिसे राष्ट्रपति संसद के समक्ष रखते हैं।

कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण की मुख्य माँग

  • स्पष्ट छूट की माँग: KBADA ने कासरगोड में कन्नड़-भाषी भाषायी अल्पसंख्यक क्षेत्रों को मलयालम को अनिवार्य प्रथम भाषा की आवश्यकता से स्पष्ट रूप से छूट देने की माँग की।
  • कन्नड़ का संरक्षण: प्राधिकरण ने जोर दिया कि इन अल्पसंख्यक-बहुल क्षेत्रों में कन्नड़ को प्रथम भाषा के रूप में रहने की अनुमति दी जानी चाहिए।

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