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रोमियो–जूलियट क्लॉज

Lokesh Pal January 13, 2026 03:28 21 0

संदर्भ 

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार से ‘लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम’ (POCSO) में “रोमियो–जूलियट क्लॉज” (Romeo–Juliet Clause) को शामिल करने पर विचार करने का आग्रह किया है।

मामले की पृष्ठभूमि

  • यह निर्णय उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध दायर अपील से उत्पन्न हुआ, जिसमें अंतरिम जमानत दी गई थी।
  • उच्च न्यायालय ने पीड़िता की आयु को लेकर स्कूल के रिकॉर्ड और उसकी स्वयं की आयु एवं घनिष्ठता/अंतरंगता (Intimacy) से संबंधित उसके बयानों में व्यापक असंगतियों पर विश्वास किया था।

POCSO के दुरुपयोग पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ

  • विधिक उपाय के रूप में प्रयोग करना:  न्यायालय ने चेतावनी दी कि “कल्याणकारी उद्देश्य” से बनाया गया कानून अब बदला लेने के लिए उपयोग किया जा रहा है।
  • न्यायिक चेतावनी: न्यायालयों ने POCSO के दुरुपयोग और गलत अनुप्रयोग को लेकर बार-बार चिंता जताई है।
  • पारिवारिक विरोध: इस कानून का उपयोग प्राय: दुर्व्यवहार से बचाने के लिए नहीं अपितु ऐसे परिवारों द्वारा किया जाता है, जो उन रिश्तों को समाप्त करना चाहते हैं, जिनका वे विरोध करते हैं।
  • दो परस्पर विरोधी वास्तविकताएँ
    • घृणित यौन अपराधों से पीड़ित बालक भयभीत रहते हैं और गरीबी तथा सामाजिक अलगाव की स्थिति का सामना करते हैं।
    • साक्षरता, सामाजिक और आर्थिक पूँजी विशेषाधिकार प्राप्त परिवार कानून का दुरुपयोग करने में सक्षम होते हैं।

‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ क्या है?

  • उद्भव: सर्वप्रथम संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के कुछ हिस्सों में विकसित हुआ।
  • उद्देश्य: यह प्रावधान सहमति से होने वाली लैंगिक गतिविधियों को अपराध नहीं मानता है, बशर्ते सहमति की आयु कम न की जाए और दोनों किशोरों की आयु लगभग समान हो।
  • मुख्य उद्देश्य
    • बाल-संरक्षण कानून की सशक्तता को बनाए रखना, साथ ही उसे अत्यधिक अपराधीकरण के एक उपाय के रूप में विकृत होने से रोकना।
    • सहमति-आधारित और आयु संबंधी मामलों में दुष्कर्म के तहत आपराधिक अभियोजन को रोकना।

नोट: ‘रोमियो–जूलियट क्लॉज’ न तो सहमति की आयु को कम करता है और न ही सामान्यतः नाबालिगों के विरुद्ध यौन अपराधों को अपराधमुक्त करता है। यह केवल ‘क्लोज-इन-एज’ (Close-in-age) अपवाद प्रदान करता है।

सहमति की आयु

  • सहमति की आयु वह कानूनी रूप से निर्धारित आयु है, जिस पर कोई व्यक्ति यौन गतिविधियों के लिए वैध सहमति प्रदान कर सकता है।
  • भारत में यह आयु 18 वर्ष है, जैसा कि POCSO अधिनियम, 2012, भारतीय दंड संहिता (IPC) और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में निर्धारित है।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ और आँकड़े

  • प्रारंभिक यौन अनुभव: NFHS-4 के अनुसार, लगभग 39% भारतीय किशोरियों ने 18 वर्ष से पहले अपना पहला यौन अनुभव होने की सूचना दी, जो सामाजिक वास्तविकताओं और कानूनी सीमाओं के बीच अंतर को दर्शाता है।
  • POCSO मामलों की प्रकृति: एनफोल्ड (Enfold) और प्रोजेक्ट-39A (2016–2020) के अध्ययनों में पाया गया कि लगभग 25% POCSO मामले सहमति-आधारित किशोर संबंधों से जुड़े थे, न कि यौन शोषण या दोहन से।
  • मामलों के बदलते पैटर्न: POCSO के बढ़ते मामलों में अभिभावकों द्वारा किशोर रोमांटिक संबंधों के विरोध को प्रतिबिंबित किया गया है, जो अपराधों से निपटने के स्थान पर किशोर व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए आपराधिक कानून के बढ़ते उपयोग को दर्शाता है।

वर्तमान कानूनी ढाँचा

  • POCSO अधिनियम, IPC की धारा 375, और BNS की धारा 63 के तहत 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के साथ कोई भी प्रवेशात्मक यौन कृत्य कठोर दंड को आकर्षित करता है।
  • POCSO की धारा 6, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 की धारा 9, तथा IPC/BNS के प्रावधान सहमति-आधारित मामलों में भी कठोर दंड का प्रावधान करते हैं।

बच्चों का यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012 के बारे में

  • उद्देश्य: बच्चों को यौन शोषण, यौन उत्पीड़न और अश्लीलता से संरक्षण।
  • बच्चे की परिभाषा: 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति।
  • सहमति: 18 वर्ष से कम आयु के सभी व्यक्तियों को वैध सहमति देने में अक्षम माना गया है।
  • अपराधों की प्रकृति: कठोर देयता अपराध; नाबालिग की सहमति कानूनी रूप से अप्रासंगिक।
  • बाल-अनुकूल प्रक्रिया: विशेष न्यायालय, ‘इन-कैमरा’ सुनवाई, वीडियो-रिकॉर्डेड गवाही और समयबद्ध प्रक्रियाएँ।
  • प्रमाण का भार: अभियुक्त के विरुद्ध दोष का अनुमान, जब तक कि विपरीत स्थिति सिद्ध न हो।
  • लैंगिक तटस्थता: सभी बच्चों पर लागू, पुरुष और ट्रांसजेंडर बाल पीड़ितों सहित।

विधि आयोग का दृष्टिकोण (2023)

  • सहमति की आयु कम करने के विरुद्ध।
  • अनुशंसित दृष्टिकोण: 16–18 वर्ष के बच्चों के बीच स्वैच्छिक, सहमति-आधारित संबंधों वाले मामलों में सजा के निर्धारण के दौरान “मार्गदर्शित न्यायिक विवेक” को अपनाना।

न्यायिक अनुशंसाएँ

  • मद्रास उच्च न्यायालय (2021): विजयलक्ष्मी बनाम राज्य प्रतिनिधि: 
    • सहमति-आधारित किशोर संबंधों में आयु-अंतर पाँच वर्ष से अधिक न हो — ऐसा सुझाव।
    • कानूनी साक्षरता: किशोरों को यौन अपराध कानूनों और उनके परिणामों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए।

PW OnlyIAS विशेष

वैचारिक विश्लेषण: स्वभावतः गलत कृत्य बनाम विधि द्वारा निषिद्ध कृत्य (Mala in Se vs Mala Prohibita)

  • स्वभावतः गलत कृत्य: ऐसे कृत्य जो प्रकृति में गलत हैं, जैसे- हिंसा और शोषण, जिन पर आपराधिक दंड उचित है।
  • विधि द्वारा निषिद्ध कृत्य: ऐसे कृत्य, जो केवल कानून द्वारा निषिद्ध होने के कारण अपराध माने जाते हैं।
  • किशोरों के बीच सहमति-आधारित निकट संबंध: सामान्यतः विधि द्वारा निषिद्ध कृत्यों की श्रेणी में आते हैं, क्योंकि इन्हें आयु के कारण अपराध माना गया है, न कि अंतर्निहित हानि के कारण।

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