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चंपारण सत्याग्रह और नीले रंग का राजनीतिक प्रतीकवाद

Lokesh Pal January 15, 2026 02:05 156 0

संदर्भ

चंपारण सत्याग्रह (1917), भारत में गांधीजी का पहला सविनय अवज्ञा आंदोलन था, जो नील की खेती करने वाले किसानों के शोषण के विरुद्ध एक अभिव्यक्ति थी।

  • बाद में नील का ‘नीला’ रंग लोगों की स्मृति से लुप्त हो गया, लेकिन अंबेडकर के प्रतीकों के माध्यम से यह फिर से उभर आया और इसने स्थायी राजनीतिक और सामाजिक अर्थ प्राप्त कर लिया।

चंपारण सत्याग्रह (1917)

यह भारत में गांधीजी के नेतृत्व में संचालित किया गया पहला सत्याग्रह आंदोलन था और इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण विद्रोह माना जाता है। चंपारण उत्तर पश्चिमी बिहार का एक जिला है।

पृष्ठभूमि

  • तिनकठिया प्रणाली: इसकी शुरुआत उन्नीसवीं सदी के आरंभ में हुई, जब किसानों को उनकी जमीन के 3/20 हिस्से पर नील की खेती करने के लिए मजबूर किया गया। इस प्रथा को तिनकठिया प्रणाली के नाम से जाना जाता है।
  • जर्मन कृत्रिम रंगों का प्रभाव: उन्नीसवीं सदी के अंत तक, इसने प्राकृतिक नील की मांग को कम कर दिया, जिससे यूरोपीय बागान मालिकों के लिए नील की खेती अलाभकारी हो गई।
  • बागान मालिकों का शोषण: किसानों को बिना शर्त मुक्त करने के स्थान पर, यूरोपीय बागान मालिकों ने नील की खेती से मुक्त करने के बदले में बढ़ी हुई किराया राशि और अवैध भुगतान की मांग की।
  • प्रारंभिक किसान प्रतिरोध: दमनकारी प्रणाली के विरुद्ध प्रतिरोध वर्ष 1908 में ही शुरू हो गया था, लेकिन किसानों की शिकायतें कई वर्षों तक अनसुलझी रहीं।

गांधी जी का हस्तक्षेप

  • राज कुमार शुक्ला की भूमिका: चंपारण के किसान राज कुमार शुक्ला ने महात्मा गांधी का देश भर में निरंतर अनुसरण किया और उन्हें नील की खेती करने वालों की दुर्दशा की स्थिति को देखने हेतु चंपारण आने के लिए आग्रह किया।
  • गांधी का चंपारण आगमन: महात्मा गांधी राजेंद्र प्रसाद, मजहरुल हक, महादेव देसाई, नरहरि पारेख और जे.बी. कृपलानी जैसे नेताओं के साथ किसानों की शिकायतों की जानकारी लेने के लिए चंपारण पहुँचे।
  • अन्यायपूर्ण आदेशों के विरुद्ध सविनय अवज्ञा: उनके आगमन पर, औपनिवेशिक अधिकारियों ने गांधी को तुरंत चंपारण छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन उन्होंने आदेश का उल्लंघन किया और अवज्ञा के लिए दंड भुगतने की इच्छा व्यक्त की।
    • पूर्ववर्ती नेताओं से तुलना: यह घटना असाधारण थी, क्योंकि बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसंट जैसे पूर्ववर्ती नेताओं ने इसी तरह के निष्कासन आदेशों का पालन किया था।
    • अग्रणी अहिंसक प्रतिरोध: गांधी का यह विरोध भारत में अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक व्यवस्था के विरुद्ध सविनय अवज्ञा या अहिंसक प्रतिरोध के शुरुआती उदाहरणों में से एक था, जिसने राजनीतिक संघर्ष की एक नई पद्धति को जन्म दिया।
  • सरकारी वापसी और जाँच: जनता के बढ़ते समर्थन को देखते हुए, अधिकारियों ने अपना आदेश वापस ले लिया और चंपारण मुद्दे की जाँच के लिए एक समिति नियुक्त की, जिसमें गांधीजी भी सदस्य थे।
  • गांधीजी की साक्ष्य-आधारित मांग: लगभग 8,000 किसानों की गवाही के आधार पर, गांधीजी ने तिनकठिया प्रथा को समाप्त करने और अवैध रूप से वसूले गए करों के लिए मुआवजे की मांग सफलतापूर्वक रखी।
  • मुआवजे पर समझौता: एक रणनीतिक समझौते के रूप में, गांधीजी बागान मालिकों द्वारा अवैध रूप से वसूले गए धन का केवल 25% वापस करने पर सहमत हुए, जिसमें उन्होंने भौतिक क्षतिपूर्ति के बजाय नैतिक विजय पर जोर दिया।
  • अंतिम परिणाम: एक दशक के भीतर, यूरोपीय बागान मालिकों ने चंपारण को पूरी तरह से छोड़ दिया, जो भारतीय धरती पर सविनय अवज्ञा में गांधीजी की पहली बड़ी सफलता थी।

संबद्ध नेता: चंपारण सत्याग्रह से जुड़े प्रमुख नेताओं में ब्रजकिशोर प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिन्हा, रामनवमी प्रसाद और शंभूशरण वर्मा शामिल थे।

ऐतिहासिक महत्त्व

  • चंपारण सत्याग्रह को भारत में गांधी जी का सत्याग्रह का पहला निर्णायक प्रयोग और एक ऐसा बिंदु माना जाता है जिसने किसानों के मुद्दों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा।
  • बाद के आंदोलनों से संबंध: इस आंदोलन के तुरंत बाद वर्ष 1918 में अहमदाबाद मिल मजदूरों की हड़ताल और खेड़ा सत्याग्रह हुआ, और बाद में इसने रॉलेट एक्ट के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलनों और असहयोग आंदोलन को प्रेरित किया।

अंबेडकर और नीले रंग की वापसी

  • प्रतीकात्मक पुनरुत्थान: नीला रंग बी.आर. अंबेडकर के माध्यम से फिर से प्रचलन में आया, जिनकी सार्वजनिक छवि में हमेशा नीले रंग का सूट और संविधान शामिल रहा।
  • राजनीतिक संस्थागतकरण: अंबेडकर ने अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ (1942) और बाद में इंडियन जस्टिस पार्टी (1956) के ध्वज के रंग के रूप में नीले रंग को चुना।
  • शास्त्रीय जुड़ाव: ‘हिंदू धर्म की पहेलियाँ’ में, अंबेडकर ने हिंदू धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए वर्ण को रंग से जोड़ा, और बताया कि शूद्रों को गहरे रंग, अक्सर काले या नीले रंग से प्रतिबिंबित किया जाता था।

नीला चक्र और संवैधानिक मूल्य

  • राष्ट्रीय प्रतीकवाद: भारतीय ध्वज के केंद्र में स्थित नीला चक्र, अशोक चक्र, धर्म, न्याय और गति का प्रतीक है।
  • गहरा अर्थ: नीला चक्र शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार, सविनय अवज्ञा और हाशिए पर स्थित लोगों के मुद्दों को शामिल करने का प्रतीक है।
  • संवैधानिक आदर्श: यह उन संवैधानिक आदर्शों, विशेषकर सामाजिक न्याय, की भी याद दिलाता है जिन्हें अभी पूरी तरह से साकार होना बाकी है।

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