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सर्वोच्च न्यायालय ने स्पीकर के जाँच पैनल की स्थिति को बरकरार रखा

Lokesh Pal January 20, 2026 04:22 84 0

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया और लोकसभा अध्यक्ष द्वारा न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के तहत जाँच समिति गठित करने के निर्णय को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

  • प्रारंभ: मार्च 2025 में, कथित रूप से दिल्ली में न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास से आधे जले हुए नोटों से भरे बोरे पाए गए। उस समय वे दिल्ली उच्च न्यायालय के कार्यरत न्यायाधीश थे।
  • घटनाक्रम: बाद में न्यायमूर्ति वर्मा का स्थानांतरण इलाहाबाद उच्च न्यायालय कर दिया गया।
  • ‘इन-हाउस’ जाँच: तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा शुरू की गई ‘इन-हाउस’ जाँच में उनके हटाने की सिफारिश की गई और यह सिफारिश संसद को भेजी गई।
  • संसदीय कार्रवाई: न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में प्रस्ताव पेश किए गए।
  • जाँच समिति: अगस्त 2025 में, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के प्रस्ताव को स्वीकार किया और तीन सदस्यीय जाँच समिति का गठन किया।

न्यायाधीशों को हटाने से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद-124(4) एवं 217(1)(b): सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय/उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाना।
  • संसद की भूमिका: राष्ट्रपति हटाने का आदेश तभी जारी कर सकते हैं, जब संसद के दोनों सदन एक ही संसदीय सत्र में हटाने का अभिभाषण पारित करना चाहिए।
    • यह अभिभाषण विशेष बहुमत से समर्थित होना चाहिए।
  • संसद की विनियामक शक्ति: अनुच्छेद-124(5) संसद को यह अधिकार देता है कि वह न्यायाधीशों के विरुद्ध हटाने का प्रस्ताव प्रस्तुत करने की प्रक्रिया तथा आरोपों की जाँच तथा प्रमाण से संबंधित कानून बनाए।

न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के अंतर्गत प्रक्रिया

  • हटाने का प्रस्ताव: किसी न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव निम्नलिखित द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए:
    • लोकसभा के कम-से -कम 100 सदस्य, या
    • राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्य।
  • प्रस्ताव की स्वीकृति: लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति, जैसा भी मामला हो, उचित परामर्श के बाद प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
  • जाँच समिति: प्रस्ताव की स्वीकृति के पश्चात् तीन सदस्यीय जाँच समिति गठित की जाती है, जिसमें शामिल होते हैं:
    • सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश,
    • किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, और
    • एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता, जैसा कि अध्यक्ष या सभापति द्वारा उपयुक्त समझा जाए।
  • पदच्युत करना
    • यदि जाँच समिति न्यायाधीश को कदाचार या अक्षमता का दोषी पाती है, तो संसद के दोनों सदनों को एक ही सत्र में आवश्यक विशेष बहुमत के साथ हटाने का प्रस्ताव पारित करना होता है।
    • इसके बाद राष्ट्रपति न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं।

अब तक, उच्चतर न्यायपालिका (सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय) के किसी भी न्यायाधीश को सफलतापूर्वक महाभियोग द्वारा हटाया नहीं गया है।

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