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नाटो और ग्रीनलैंड संकट

Lokesh Pal January 22, 2026 02:00 10 0

संदर्भ

ग्रीनलैंड को लेकर नाटो सहयोगियों पर रणनीतिक, आर्थिक और राजनयिक दबाव डालने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा हाल ही में किए गए प्रयास, गठबंधन-आधारित सुरक्षा और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की बहुपक्षीय व्यवस्था के भीतर गहरे तनाव का संकेत देते हैं।

मुख्य विकासक्रम

  • अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड का अधिग्रहण: यह मुद्दा नाटो सदस्य डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को हासिल करने में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई रुचि पर केंद्रित है।
  • दबाव के रूप में टैरिफ: ग्रीनलैंड के विरोध के चलते, अमेरिका ने हाल ही में 1 फरवरी, 2026 से अपने 8 नाटो सहयोगी देशों पर 10% अमेरिकी टैरिफ लगाए हैं।

  • समझौता या शुल्क: यदि अमेरिका ग्रीनलैंड का अधिग्रहण नहीं करता है, तो जून तक टैरिफ बढ़कर 25% हो जाएँगे।
  • सुरक्षा कवच: अमेरिका रूस-चीन के अतिक्रमण का हवाला देता है और आर्कटिक मिसाइल शील्ड (‘गोल्डन डोम’) का प्रस्ताव रखता है।

अमेरिका को ग्रीनलैंड की आवश्यकता क्यों ?

  • आर्कटिक में रणनीतिक स्थान: उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित ग्रीनलैंड आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए महत्त्वपूर्ण है, विशेष रूप से अटलांटिक महासागर में आवागमन और उभरते आर्कटिक समुद्री मार्गों की निगरानी के लिए।
  • प्राकृतिक संसाधन और महत्त्वपूर्ण खनिज: ग्रीनलैंड में दुर्लभ मृदा तत्त्व (REE) के संभावित भंडार हैं, जैसे- यूरेनियम, लोहा, तेल और गैस।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका के पास वर्तमान में REE के लिए एक विश्वसनीय घरेलू आपूर्ति शृंखला नहीं है। चीन इस क्षेत्र में अग्रणी है, जो वैश्विक REE खनन का लगभग 60% और प्रसंस्करण का 90% से अधिक हिस्सा रखता है।
  • सैन्य और पूर्व चेतावनी महत्त्व: अमेरिका पिटुफिक अंतरिक्ष बेस (पूर्व में थुले एयरबेस) का संचालन करता है, जो मिसाइल पूर्व चेतावनी प्रणालियों, अंतरिक्ष निगरानी और आंतरिक सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण है तथा अमेरिकी एवं नाटो रक्षा संरचना का एक प्रमुख हिस्सा है।
  • आर्कटिक भू-राजनीति और जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघलने से नए जहाजरानी मार्ग और रणनीतिक क्षेत्र खुल रहे हैं, जिससे आर्कटिक भू-राजनीति में ग्रीनलैंड का महत्त्व बढ़ रहा है।
  • महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता (अमेरिका-रूस-चीन): अमेरिका, रूस के आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ते सैन्यीकरण और चीन की बढ़ती वाणिज्यिक और रणनीतिक उपस्थिति को नाटो के उत्तरी हिस्से के लिए खतरा मानता है, जिससे ग्रीनलैंड शक्ति प्रतिस्पर्द्धा का केंद्र बन गया है।
  • अमेरिका की दीर्घकालिक सैन्य उपस्थिति: वर्ष 1951 के अमेरिका-डेनमार्क रक्षा समझौते के तहत, अमेरिका को ग्रीनलैंड में व्यापक रक्षा अधिकार प्राप्त हैं और उसके पहले से ही 17 सैन्य अड्डे वहाँ उपस्थित हैं, जो ग्रीनलैंड में उसकी गहरी ऐतिहासिक भागीदारी को दर्शाते हैं।
  • अमेरिकी रणनीतिक हितों की निरंतरता: पिछली अमेरिकी सरकारों ने भी ग्रीनलैंड को हासिल करने का प्रयास किया था, जो दर्शाता है कि वर्तमान कदम किसी आकस्मिक नीतिगत परिवर्तन के बजाय दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।

अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड को प्राप्त करने के पिछले प्रयास

  • वर्ष 1867-1868: अलास्का खरीद के पश्चात् 
    • रूस से अलास्का खरीदने के बाद, विदेश मंत्री विलियम एच. सेवर्ड ने ग्रीनलैंड को हासिल करने की संभावनाओं का पता लगाया।
  • वर्ष 1910: भूमि की अदला-बदली का प्रस्ताव
    • राष्ट्रपति विलियम हावर्ड टैफ्ट के कार्यकाल में, अमेरिकी राजनयिकों ने भूमि विनिमय योजना का प्रस्ताव रखा।
    • अन्य क्षेत्रों में रियायतों के बदले ग्रीनलैंड को अमेरिका को हस्तांतरित किया जाना था।
  • वर्ष 1946: ट्रूमैन का 100 मिलियन डॉलर का प्रस्ताव
    • शीतयुद्ध की शुरुआत में, राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन के प्रशासन ने औपचारिक रूप से डेनमार्क को ग्रीनलैंड के बदले 100 मिलियन डॉलर का स्वर्ण देने की पेशकश की।

नाटो पर अमेरिकी कदम का प्रभाव

  • गठबंधन के भीतर दबाव: नाटो सहयोगियों के विरुद्ध शुल्क, राजनीतिक दबाव और रणनीतिक धमकियों का उपयोग गठबंधन के मूल सिद्धांत, पारस्परिक विश्वास और स्वैच्छिक सहयोग को चुनौती देता है, जिससे आंतरिक कलह उत्पन्न होती है।
  • सामूहिक रक्षा विरोधाभास (अनुच्छेद-5): नाटो का अनुच्छेद-5 बाहरी शत्रुओं के हमलों से निपटने के लिए बनाया गया था, न कि आंतरिक विवादों के लिए।
    • डेनमार्क ने संकेत दिया है कि यदि ग्रीनलैंड को खतरा होता है तो वह अनुच्छेद-5 का सहारा ले सकता है, जिससे गठबंधन के भीतर कानूनी और राजनीतिक अनिश्चितता उत्पन्न हो जाती है।
    • अनुच्छेद-5 का सहारा लेने से पूर्व, डेनमार्क अनुच्छेद-4 का सहारा ले सकता है, जो किसी सदस्य देश की क्षेत्रीय अखंडता या सुरक्षा को खतरे में होने पर परामर्श अनिवार्य करता है।
  • राजनीतिक और नैतिक अपेक्षाओं का उल्लंघन: डेनमार्क एक विश्वसनीय नाटो सहयोगी रहा है, जिसने सैनिकों और बलिदानों का योगदान दिया है (उदाहरण के लिए, 9/11 के बाद अफगानिस्तान में 43 सैनिक शहीद हुए)।
    • ग्रीनलैंड के विरुद्ध कोई भी अमेरिकी कदम, गठबंधन की एकजुटता की नैतिक और राजनीतिक अपेक्षाओं के विपरीत होगा।
  • नाटो की विश्वसनीयता और प्रतिरोधक क्षमता के लिए खतरा: गठबंधन के मानदंडों को कमजोर करने वाली कार्रवाइयाँ नाटो की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर सकती हैं, जिससे बाहरी शत्रुओं के लिए इसकी विश्वसनीयता कम हो सकती है।

उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के बारे में

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ से उत्पन्न सुरक्षा खतरे का सामना करने और यूरोप में और अधिक अस्थिरता को रोकने के लिए 4 अप्रैल, 1949 को नाटो की स्थापना की गई थी।
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच सामूहिक रक्षा और अंतर-अटलांटिक राजनीतिक-सैन्य सहयोग को संस्थागत रूप देना था।
  • सदस्यता: गठबंधन की शुरुआत 12 संस्थापक सदस्यों के साथ हुई और धीरे-धीरे बढ़कर 32 सदस्य हो गए (मार्च 2024 तक), जो इसकी निरंतर रणनीतिक प्रासंगिकता को दर्शाता है।
    • अल्बानिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, कनाडा, क्रोएशिया, चेकिया, डेनमार्क, एस्टोनिया, फिनलैंड, फ्राँस, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, आइसलैंड, इटली, लातविया, लिथुआनिया, लक्जमबर्ग, मोंटेनेग्रो, उत्तरी मैसेडोनिया, नॉर्वे, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन, स्वीडन, नीदरलैंड, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका।
  • मुख्यालय: बेल्जियम के ब्रुसेल्स में नाटो का मुख्यालय।
  • नाटो की मुख्य भूमिका और उद्देश्य
    • सामूहिक रक्षा (अनुच्छेद-5): नाटो का आधार अनुच्छेद-5 है, जिसमें कहा गया है कि किसी एक सहयोगी पर हमला सभी सहयोगियों पर हमला माना जाएगा, जो गठबंधन का प्राथमिक निवारक है।
    • सुरक्षा परामर्श (अनुच्छेद-4): अनुच्छेद-4 सदस्यों को साझा सुरक्षा चिंताओं के मामलों पर परामर्श करने में सक्षम बनाता है, जिससे नाटो की भूमिका क्षेत्रीय रक्षा से परे विस्तारित होती है।
    • विस्तारित सुरक्षा अधिदेश: नाटो का मिशन यूरोप से परे आतंकवाद-विरोधी, साइबर सुरक्षा, समुद्री डकैती, शांति स्थापना और संकट प्रबंधन को शामिल करने के लिए विकसित हुआ है।
  • परिचालनात्मक भूमिका और मिशन
    • क्षेत्रीय अभियान: नाटो ने अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र द्वारा गठित अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (ISAF) का नेतृत्व किया और कोसोवो, बाल्कन और भूमध्य सागर में भी अभियान चलाए हैं।
    • प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण: गठबंधन संयुक्त सैन्य अभ्यास आयोजित करता है, अंतर-संचालनीयता को मजबूत करता है और संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और अफ्रीकी संघ जैसे सहयोगी संगठनों को सहयोग प्रदान करता है।
  • उत्तर अटलांटिक परिषद (NAC): NAC नाटो का प्रमुख राजनीतिक निर्णय लेने वाला निकाय है, जहाँ सभी सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व होता है और निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं, जिससे संघर्ष प्रबंधन के लिए एक राजनीतिक मंच के रूप में नाटो की भूमिका मजबूत होती है।
  • वित्तपोषण तंत्र
    • साझा वित्तीय उत्तरदायित्व: सदस्य देश सकल राष्ट्रीय आय (GNI) के आधार पर नाटो के मुख्यालय, कमान संरचनाओं, मिशनों और संयुक्त उपकरणों के वित्तपोषण में योगदान करते हैं।
    • सैन्य योगदान: प्रत्येक देश केवल वित्तीय भुगतानों पर निर्भर रहने के बजाय, सैनिकों, क्षमताओं और रक्षा व्यय में भी योगदान देता है।
    • संयुक्त नवाचार पहल: नाटो अनुसंधान और उभरती रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए बहुराष्ट्रीय निधियों का समर्थन करता है।

नाटो की समकालीन प्रासंगिकता

  • अंतर-अटलांटिक सुरक्षा का स्तंभ: समन्वित रक्षा योजना और संयुक्त तैयारी के माध्यम से यूरो-अटलांटिक स्थिरता सुनिश्चित करता है।
  • सामूहिक रक्षा (अनुच्छेद-5): प्रतिरोध को मजबूत करता है और छोटे राज्यों को आश्वस्त करता है।
  • रूस के विरुद्ध रोकथाम: यूक्रेन युद्ध के बाद, नाटो ने पूर्वी यूरोप में तैनाती और सक्रियता बढ़ा दी है।
  • नए सुरक्षा क्षेत्र: साइबर, अंतरिक्ष और हाइब्रिड खतरों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, आधुनिक संघर्ष के अनुकूल होना।

नाटो के सामने प्रमुख चुनौतियाँ

  • ट्रंप के टैरिफ और ग्रीनलैंड का संबंध
    • सहयोगी देशों पर आर्थिक दबाव: यूरोपीय नाटो सदस्यों पर अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ ने गठबंधन के भीतर सीधे संघर्ष की आशंका उत्पन्न कर दी है।
    • ग्रीनलैंड से संबंध: विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, ये टैरिफ ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के दबाव से जुड़े थे, जबकि यूरोपीय देशों का दावा है कि ग्रीनलैंड पहले से ही नाटो की सामूहिक सुरक्षा ढाँचे के अंतर्गत आता है।
  • शक्तिशाली सदस्यों द्वारा एकतरफा कार्रवाई: प्रमुख सदस्यों द्वारा एकतरफा रूप से की गई कार्रवाइयाँ सर्वसम्मति-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया को कमजोर करने का जोखिम पैदा करती हैं, जो नाटो के कामकाज और वैधता के लिए केंद्रीय है।
  • आंतरिक राजनीतिक विभाजन और विश्वास की कमी: सदस्यों के बीच खतरे की धारणाओं और घरेलू राजनीति में अंतर ने विश्वास की कमी पैदा कर दी है, जिससे एकता और समन्वित प्रतिक्रियाएँ प्रभावित हो रही हैं।
  • गठबंधन के भीतर विवादों का प्रबंधन: नाटो के पास अपने सदस्यों के बीच विवादों को सुलझाने के लिए स्पष्ट संस्थागत तंत्रों का अभाव है, जिससे आंतरिक संकटों का प्रबंधन करना कठिन हो जाता है।
  • अमेरिकी नेतृत्व पर अत्यधिक निर्भरता: सैन्य क्षमताओं और नेतृत्व के लिए अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता गठबंधन के अंतर्गत चुनौतियों को साझा करने और रणनीतिक स्वायत्तता के बारे में चिंताएँ बढ़ाती है।
  • आर्कटिक जैसे उभरते रणनीतिक मोर्चे: आर्कटिक क्षेत्र में नाटो की बढ़ती भागीदारी ने एक स्पष्ट शासन और सुरक्षा ढाँचे के विकास को पीछे छोड़ दिया है, जिससे रणनीतिक अस्पष्टता बढ़ गई है।

नाटो के लिए सुधार की प्राथमिकताएँ

  • संप्रभुता और गैर-दबाव नीति की पुष्टि: नाटो को आपसी विश्वास बनाए रखने के लिए सदस्यों के बीच संप्रभुता के सम्मान और गैर-दबावपूर्ण व्यवहार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दोहराना चाहिए।
  • विवाद-समाधान तंत्रों का संस्थागतकरण: विवाद-समाधान के लिए औपचारिक आंतरिक तंत्र विकसित करने से गठबंधन के भीतर संघर्षों को बिना बढ़ाए प्रबंधित करने में मदद मिलेगी।
  • यूरोपीय रक्षा क्षमता को मजबूत करना: नाटो संरचनाओं के भीतर यूरोपीय सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने से गठबंधन की एकता बनाए रखते हुए अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सकती है।
  • एक सुसंगत आर्कटिक सुरक्षा सिद्धांत विकसित करना: प्रतिस्पर्द्धा का प्रबंधन करने और क्षेत्रीय स्थिरता की रक्षा के लिए एक स्पष्ट और साझा आर्कटिक रणनीति आवश्यक है।

बहुपक्षवाद का संकट और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था

  • गठबंधन आधारित और बहुपक्षीय व्यवस्था का क्षरण: ग्रीनलैंड संकट युद्धोत्तर गठबंधन और बहुपक्षीय व्यवस्था के कमजोर होने का संकेत देता है।
    • यह नियम-आधारित, संस्था-संचालित सहयोग से एकतरफा और शक्ति-प्रेरित व्यवस्थाओं की ओर परिवर्तन को दर्शाता है।
  • प्रतिद्वंद्वी शक्तियों को सामरिक लाभ: रूस नाटो में स्पष्ट विभाजन का लाभ उठा रहा है, जो पश्चिमी एकता को कमजोर करने के उसके उद्देश्य के अनुरूप है।
    • चीन आंतरिक दरारों का लाभ उठाकर अपना सामरिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ा रहा है, विशेष रूप से आर्कटिक जैसे विवादित क्षेत्रों में।
  • आर्कटिक में सैन्यीकरण में तेजी: बढ़ते तनाव से आर्कटिक में सैन्य निर्माण में तेजी आ रही है, जिससे पहले कम संघर्ष वाले क्षेत्र में गलत अनुमान, दुर्घटनाओं और संघर्ष बढ़ने का खतरा बढ़ रहा है।
  • परमाणु प्रसार के बढ़ते खतरे: कमजोर नाटो सहयोगियों के बीच सुरक्षा संबंधी चिंताओं को जन्म दे सकता है, जिससे जर्मनी, पोलैंड, कनाडा, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को परमाणु प्रतिरोध पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जिससे एक नई हथियारों की होड़ प्रारंभ हो सकती है।

वैश्विक व्यवस्था के विखंडन में भारत की रणनीतिक दुविधा

  • सहभागिता और बहुपक्षीय वैधता के बीच संतुलन बनाना
    • रणनीतिक चिंताएँ: भारत के सामने प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध स्थापित करने की चुनौती है, साथ ही उसे संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संस्थानों की विश्वसनीयता भी बनाए रखनी है, जहाँ दीर्घकालिक सुधार और नेतृत्व की आवश्यकता है।
    • बहुपक्षीय रणनीति का पुनर्मूल्यांकन: शक्तिशाली देशों द्वारा वैश्विक संस्थानों की बढ़ती अनदेखी भारत को अपनी कूटनीति को अधिक शक्ति-प्रधान अंतरराष्ट्रीय प्रणाली के अनुरूप ढालने के लिए विवश करती है।
  • क्षेत्रीय और द्विपक्षीय विचारणीय बिंदु
    • पाकिस्तान का प्रभाव: पश्चिम एशिया और आर्कटिक में बदलते भू-राजनीतिक समीकरण क्षेत्रीय प्रभाव संतुलन को बदल सकते हैं, जिससे भारत के रणनीतिक हित बाधित हो सकते हैं।
    • टैरिफ का खतरा: भारत को कुछ क्षेत्रों में अमेरिका द्वारा 50% तक टैरिफ का सामना करना पड़ता है, जिससे व्यापार संबंध उसकी विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण कारक बन जाते हैं।
    • वीटो की होड़: बहुपक्षीय संस्थाओं के कमजोर होने से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए भारत के लंबे समय से चल रहे अभियान पर अप्रत्यक्ष रूप से असर पड़ सकता है।
  • वैश्विक सुरक्षा पर इसके सकारात्मक प्रभाव
    • नाटो का कमजोर होना: वैश्विक सुरक्षा खतरों के परस्पर संबंध को देखते हुए, नाटो और पश्चिमी गठबंधनों के भीतर अस्थिरता, अप्रत्यक्ष रूप से भारत के रणनीतिक वातावरण को प्रभावित करती है।
    • आर्कटिक और संसाधन संबंधी निहितार्थ: आर्कटिक में बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा भविष्य के व्यापार मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा और महत्त्वपूर्ण खनिज भू-राजनीति को प्रभावित करती है, जो भारत की बढ़ती रुचि के क्षेत्र हैं।
  • मानक और रणनीतिक स्थिति निर्धारण
    • सामरिक स्वायत्तता: संप्रभुता, बहुपक्षवाद और नियम-आधारित व्यवस्था पर भारत का ज़ोर, दबावपूर्ण गठबंधन की राजनीति के विपरीत है, जो लचीली और मुद्दे-आधारित साझेदारियों के प्रति उसकी प्राथमिकता को सुदृढ़ करता है।
    • सामरिक अवसर: पश्चिमी देशों की अस्थिरता वैश्विक मामलों में भारत की कूटनीतिक लचीलेपन और गठबंधन-रहित, लक्षित साझेदारियों की प्रासंगिकता को उजागर करती है।

आगे की राह

  • नाटो और पश्चिमी गठबंधन के लिए
    • साझा सिद्धांतों पर गठबंधन को पुनः केंद्रित करना: नाटो को संप्रभुता और सर्वसम्मति-आधारित निर्णय लेने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दोहराना चाहिए, जो गठबंधन की नैतिक और राजनीतिक नींव हैं।
    • संस्थागत कूटनीति के माध्यम से तनाव कम करना: आंतरिक मतभेदों को औपचारिक राजनीतिक परामर्श और मध्यस्थता तंत्र के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए, एकतरफा दबाव या रणनीतिक धमकी से बचना चाहिए।
    • व्यापार और सुरक्षा उपकरणों का राजनीतीकरण न करना: टैरिफ और प्रतिबंध जैसे आर्थिक उपकरणों का प्रयोग सहयोगियों के विरुद्ध हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे विश्वास कम होता है और गठबंधन की एकता कमजोर होती है।
    • कानूनी और रणनीतिक सीमा रेखा स्पष्ट करना: नाटो को गठबंधन के भीतर आचरण के लिए स्पष्ट मानदंड विकसित करने चाहिए, जिसमें यह भी शामिल है कि आंतरिक संकटों में अनुच्छेद-5 कैसे लागू होता है, ताकि अस्पष्टता और तनाव बढ़ने से रोका जा सके।
    • सहयोगी आर्कटिक सुरक्षा ढाँचा विकसित करना: सैन्यीकरण और पारदर्शिता, विश्वास निर्माण और संयम पर केंद्रित एक साझा आर्कटिक सिद्धांत आवश्यक है।
  • अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए
    • अंतरराष्ट्रीय कानून की सर्वोच्चता को सुदृढ़ करना: राज्यों को क्षेत्रीय संप्रभुता और शांतिपूर्ण विवाद समाधान को बनाए रखना चाहिए, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा उत्पन्न हो रही है।
    • बहुपक्षीय संघर्ष-प्रबंधन तंत्रों को मजबूत करना: वैश्विक और क्षेत्रीय संस्थानों को महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का प्रबंधन करने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए, जिससे गठबंधन टूटने का जोखिम कम हो सके।
  • भारत के लिए
    • मुद्दे-आधारित साझेदारियों के माध्यम से रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना: भारत को कूटनीतिक स्वतंत्रता और रणनीतिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए, लचीले और गठबंधन-रहित सहयोग के माध्यम से संबंधों में संतुलन बनाए रखना चाहिए।
    • आर्कटिक में रचनात्मक भागीदारी बढ़ाना: आर्कटिक शासन मंचों में सक्रिय भागीदारी से भारत को व्यापार मार्गों, ऊर्जा और महत्त्वपूर्ण खनिजों में अपने दीर्घकालिक हितों की रक्षा करने में मदद मिलेगी।
    • वैश्विक शासन में सुधार का समर्थन करना: भारत अपनी कूटनीतिक क्षमता का उपयोग समावेशी और नियम-आधारित संस्थागत सुधारों का समर्थन करने के लिए कर सकता है, जिससे दबाव कम हो और सामूहिक सुरक्षा बढ़े।

निष्कर्ष

ग्रीनलैंड संकट और प्रस्तावित शांति बोर्ड, शक्ति-चालित वैश्विक राजनीति की ओर एक बदलाव को उजागर करते हैं, जो नाटो की एकजुटता और वर्ष 1945 के बाद की नियम-आधारित व्यवस्था की परीक्षा ले रहे हैं। दीर्घकालिक विश्वसनीयता अब एकता, विश्वास और संप्रभुता के सम्मान पर निर्भर करती है, जो हेडली बुल के इस विचार को रेखांकित करती है कि शक्ति को साझा नियमों और संस्थानों द्वारा संतुलित किया जाना चाहिए।

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