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संक्षेप में समाचार

Lokesh Pal January 23, 2026 03:19 21 0

पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971

मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा ने 21 जनवरी, 2026 को अपना राज्य दिवस मनाया, जो पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 के अंतर्गत उनके गठन का प्रतीक है।

पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 के बारे में

  • यह अधिनियम भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के पुनर्गठन हेतु प्रशासनिक दक्षता, जातीय आकांक्षाओं और क्षेत्रीय विकास को संबोधित करने के लिए अधिनियमित किया गया था।
  • राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का गठन (धारा 3–8)
    • मणिपुर और त्रिपुरा को केंद्रशासित प्रदेश से पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।
    • मेघालय को असम से अलग कर राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।
    • मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को केंद्रशासित प्रदेश के रूप में स्थापित किया गया (दोनों वर्ष 1987 में राज्य बने)।
  • न्यायिक पुनर्गठन (धारा 28): असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा के लिए एक साझा गुवाहाटी उच्च न्यायालय की स्थापना की गई।
    • मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा के लिए अलग-अलग उच्च न्यायालयों की स्थापना बाद में 2012 के संशोधन अधिनियम (जो वर्ष 2013 से प्रभावी हुआ) द्वारा संभव हुई।
  • स्वायत्त जिले (धारा 71): मेघालय में स्वायत्त जिला परिषदों के पुनर्गठन हेतु छठी अनुसूची में संशोधन किया गया।
  • संस्थागत समर्थन: इस अधिनियम के साथ ही क्षेत्रीय विकास, संपर्कता और सुरक्षा को बढ़ावा देने हेतु उत्तर-पूर्वी परिषद अधिनियम, 1971 भी पारित किया गया।

इस अधिनियम ने भारत के उत्तर-पूर्व में राजनीतिक स्थिरता, पहचान की मान्यता और संतुलित विकास के लिए संवैधानिक आधार प्रदान किया।

कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य ‘इको-सेंसिटिव जोन’ घोषित

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य कोइको-सेंसिटिव जोन’ (ESZ) घोषित करने संबंधी अधिसूचना जारी की है।

कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के बारे में

  • अवस्थिति: यह मुख्यतः राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित है तथा उदयपुर और पाली जिलों के कुछ हिस्सों में भी विस्तृत है।
    • ऐतिहासिक कुंभलगढ़ किले (यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल) को चारों ओर विस्तृत है।
  • भू-विशेषता: यह अभयारण्य अरावली पर्वतमाला में स्थित है और अरावली की चार उप-पर्वतमालाओं—कुंभलगढ़, सादड़ी, देसूरी और बोखाड़ा—को समाहित करता है।
  • बनास और लूणी नदी प्रणालियों के लिए जलग्रहण कार्यों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण।
  • पारिस्थितिकी तंत्र: खाथियार–गिर शुष्क पर्णपाती वन पारिस्थितिकी क्षेत्र  का भाग।
  • वन्यजीव
    • स्तनधारी: तेंदुआ, भेड़िया, सुस्त भालू, धारीदार लकड़बग्घा, सियार, वाइल्ड कैट, साँभर, नीलगाय, चिंकारा, भारतीय पैंगोलिन और ‘इंडियन हेयर’।
    • पक्षियों में पेंटेड फ्रैंकोलिन, ग्रे वाइल्डफाउल, व्हाइट ब्रेस्टेड किंगफिशर तथा अनेक अन्य स्थायी और प्रवासी पक्षी प्रजातियाँ शामिल हैं।
  • इतिहास: वर्ष 1971 में वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया।
  • संरक्षण स्थिति: हाल ही में अभयारण्य की सीमा से 1 किमी. तक के क्षेत्र को इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) घोषित किया गया है।

इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) के बारे में

  • परिभाषा: इको-सेंसिटिव जोन संरक्षित क्षेत्रों के आस-पास अधिसूचित बफर या संक्रमण क्षेत्र होते हैं।
    • संरक्षित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, टाइगर रिजर्व और जैवमंडल रिजर्व शामिल हैं।
  • उद्देश्य: ये संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र और मूल संरक्षण क्षेत्रों पर मानव गतिविधियों के नकारात्मक प्रभाव को कम करने हेतुशॉक एब्जॉर्बर” के रूप में कार्य करते हैं, साथ ही विनियमित सतत् विकास की अनुमति देते हैं।
  • कानूनी आधार: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा अधिसूचित।
    • यह अवधारणा राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना (2002–2016) से प्रेरित है, जिसमें संरक्षित क्षेत्र की सीमाओं से 10 किमी. के भीतर के क्षेत्रों को ESZ घोषित करने की सिफारिश की गई थी।
  • ESZ की चौड़ाई: ESZ की वास्तविक चौड़ाई स्थल-विशिष्ट होती है, जो पारिस्थितिकी संवेदनशीलता और राज्य सरकारों से परामर्श पर आधारित होती है।
    • यह 10 किमी. से कम या अधिक हो सकती है, परंतु मूल संरक्षित सीमा के चारों ओर 1 किमी. से कम नहीं होनी चाहिए।

ESZ में गतिविधियाँ

  • वर्ष 2011 के MoEFCC दिशा-निर्देशों और अधिसूचनाओं के अनुसार तीन श्रेणियों में वर्गीकृत:
    • निषिद्ध: वाणिज्यिक खनन, पत्थर खदानें, आरा मिलें, प्रदूषणकारी उद्योग (वायु/जल/मृदा/ध्वनि), बड़ी जलविद्युत परियोजनाएँ, वाणिज्यिक ईंधन लकड़ी का संग्रह/उपयोग।
    • विनियमित: पूर्व अनुमति आवश्यक गतिविधियाँ (जैसे पर्यटन/रिसॉर्ट, भवन/सड़क निर्माण, वृक्ष कटाई, कुछ कृषि प्रथाएँ आदि)।
    • अनुमत: संचालित पारंपरिक/ग्रामीण गतिविधियाँ, पर्यावरण-अनुकूल प्रथाएँ, संरक्षण के अनुकूल लघु-स्तरीय विकास।

भारत में  ‘एंट फ्लाइज’ (Ant flies) की दो नई दुर्लभ प्रजातियों की खोज

केरल और तमिलनाडु के शोधकर्ताओं ने एंट फ्लाइज’ (Ant flies) की दो पहले अज्ञात प्रजातियों मेटाडॉन घोरपाडेई (Metadon Ghorpadei) और मेटाडॉन रीमेरी (Metadon reemeri) की पहचान की है।

एंट फ्लाइज’ (Microdontinae) की प्रमुख विशेषताएँ 

  • वर्गीकरण: ये सर्फिडी’ (हॉवरफ्लाइज) कुल के अंतर्गत माइक्रोडोंटिनाई उपकुल से संबंधित हैं।
  • इन मक्खियों की जीवन-शैली अत्यंत विशिष्ट होने के कारण ये अत्यंत दुर्लभ हैं।
    • इनके लार्वा चींटी के घोंसलों के भीतर रहते हैं और चींटी के अंडों, लार्वा और प्यूपा से पोषण ग्रहण करते हैं।
  • वयस्क मक्खियाँ फूलों पर कम जाती हैं और प्रायः चींटी कॉलोनियों के आस-पास ही रहती हैं, जिससे इन्हें देखना कठिन हो जाता है।
  • पारिस्थितिक भूमिका:
    • ये खोजें शहरी हरित क्षेत्रों और संरक्षित जैव-विविधता हॉटस्पॉट्स दोनों के जैव-विविधता महत्व को रेखांकित करती हैं।

मेटाडॉन घोरपाडेई (Metadon Ghorpadei)

  • स्थान: नॉर्दर्न रिज फॉरेस्ट, दिल्ली।
    • यह सड़क, यातायात और आवासीय क्षेत्रों के बीच स्थित एक बाधित शहरी वन क्षेत्र है।
  • आवास: कँटीले झाड़ीदार वन के भीतर मध्यम घनत्व वाली वनस्पति वाले क्षेत्र में पाया गया।
  • नामकरण: प्रख्यात भारतीय डिप्टेरिस्ट डॉ. के. जी. घोरपड़े के सम्मान में इसका नाम मेटाडॉन घोरपाडेई रखा गया।
  • महत्त्व: यह शहरी वनों के छिपे हुए पारिस्थितिक मूल्य को प्रदर्शित करता है, जिन्हें प्रायः शहरों में केवल हरित आवरण तक सीमित संरक्षण दृष्टि के कारण अप्रभावी किया जाता है।
  • खतरे: शहरी विखंडन और मानव दबाव के कारण दिल्ली रिज (अरावली का विस्तार) अपने मूल क्षेत्रफल के लगभग 1% तक रह गया है।

मेटाडॉन रीमेरी (Metadon reemeri)

  • स्थान: सिरुवानी पहाड़ियाँ, पश्चिमी घाट, तमिलनाडु।
    • यह उच्च स्थानिकता (Endemism) वाला वैश्विक रूप से मान्यता प्राप्त जैव-विविधता हॉटस्पॉट है।
  • आवास: संरक्षित क्षेत्र, किंतु माइक्रोडोंटिनाई उपकुल जैसे कम अध्ययन किए गए कीट समूह अभी भी अपर्याप्त रूप से प्रलेखित हैं।
  • नामकरण: माइक्रोडोंटिनाई और हॉवरफ्लाइज के वर्गीकरण हेतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध विशेषज्ञ डॉ. एम. रीमर के सम्मान में इसका नाम ‘मेटाडॉन रीमेरी’ रखा गया।
  • महत्त्व: यह दर्शाता है कि संरक्षित क्षेत्रों में भी दुर्लभ प्रजातियों की खोज अब भी संभव है।

विली रिसर्च हीरोज पुरस्कार, 2025

भारतीय जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहरिया, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के पूर्व स्टाफ के सदस्य रहे हैं, ने ‘विली रिसर्च हीरोज पुरस्कार 2025’ (Wiley Research Heroes Prize) प्राप्त किया है।

वाइली रिसर्च हीरोज पुरस्कार के बारे में

  • पुरस्कार का स्वरूप: यह पुरस्कार उन शोधकर्ताओं को वैश्विक मान्यता प्रदान करता है, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि शोध कार्य समावेशी, नवाचारी तथा प्रभावशाली हो।
  • कुल पुरस्कारार्थी: विभिन्न श्रेणियों में वैश्विक स्तर पर पाँच शोधकर्ताओं का चयन किया जाता है।
  • पुरस्कार श्रेणियाँ
    • ओपन साइंस एडवोकेट पुरस्कार: यह पुरस्कार उन व्यक्तियों को सम्मानित करता है, जो शोध में पारदर्शिता, पुनरुत्पादकता तथा मुक्त अभिगम (ओपन एक्सेस) को बढ़ावा देते हैं।
    • इक्विटी एंड इन्क्लूजन इन रिसर्च पुरस्कार: यह पुरस्कार शोध को अधिक समावेशी, विविधतापूर्ण तथा न्यायसंगत बनाने के प्रयासों को मान्यता देता है।
    • करेज इन रिसर्च’ पुरस्कार: यह पुरस्कार उन व्यक्तियों को दिया जाता है, जिन्होंने शोध के लिए सिद्धांतगत साहस दिखाया या प्रतिकूल परिस्थितियों के उपरांत अनुसंधान कार्य किया।
    • रिसर्च कल्चर पुरस्कार: यह पुरस्कार सकारात्मक एवं सहायक शोध वातावरण के निर्माण तथा अंतर्विषयक सहयोग को प्रोत्साहित करने वालों को प्रदान किया जाता है।
    • इंपैक्ट बियॉन्ड एकेडेमिया पुरस्कार: यह पुरस्कार उन शोधकर्ताओं को दिया जाता है, जिनके कार्य का नीति-निर्माण, उद्योग अथवा समाज पर प्रत्यक्ष एवं ठोस प्रभाव पड़ा हो।

डॉ. चंद्रकांत लहरिया के बारे में

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के पूर्व स्टाफ सदस्य।
  • डॉ. लहरिया अब तक इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले पहले और एकमात्र भारतीय हैं।
  • उन्होंने इंपैक्ट बियॉन्ड एकेडेमिया” श्रेणी में यह पुरस्कार प्राप्त किया।
  • स्पष्ट नीतिगत प्रभाव वाले उत्कृष्ट शोध योगदान के लिए उनका चयन किया गया।
  • मुख्य शोध योगदान
    • टीकाकरण नीति: टीकाकरण रणनीतियों तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा वितरण पर अनुसंधान।
    • मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य: स्वास्थ्य परिणामों में सुधार हेतु सशर्त नकद अंतरण योजनाओं पर अध्ययन।
    • प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल: प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ करने पर साक्ष्य-आधारित शोध कार्य।

इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार

मोजांबिक की मानव अधिकार कार्यकर्ता एवं मानवतावादी ग्रासा माशेल को इंदिरा गांधी स्मारक ट्रस्ट की घोषणा के अनुसार इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार, 2025 के लिए चयनित किया गया है।

इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार के बारे में

  • अन्य नाम: इंदिरा गांधी शांति, निरस्त्रीकरण एवं विकास पुरस्कार।
  • स्थापना: यह पुरस्कार भारत सरकार द्वारा वर्ष 1985 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के असाधारण राष्ट्रीय एवं वैश्विक योगदानों की स्मृति में स्थापित किया गया।
  • चयन निकाय: पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन की अध्यक्षता वाली अंतरराष्ट्रीय जूरी द्वारा चयन।
  • पुरस्कार के घटक
    • आर्थिक पुरस्कार: इस पुरस्कार के अंतर्गत ₹10 मिलियन (₹1 करोड़) अथवा इसके समकक्ष विदेशी मुद्रा प्रदान की जाती है।
    • ट्रॉफी एवं प्रशस्ति-पत्र: पुरस्कार में विशेष रूप से डिजाइन की गई ट्रॉफी तथा योगदान को मान्यता देने वाला औपचारिक प्रशस्ति-पत्र सम्मिलित है।
  • ट्रॉफी का प्रतीकात्मक महत्त्व
    • यह ट्रॉफीडेड हेमेटाइट जैस्पर’ पत्थर द्वारा निर्मित है, वही पत्थर जिसका उपयोग नई दिल्ली स्थित शक्ति स्थल में इंदिरा गांधी की समाधि पर किया गया है।
  • पात्रता एवं पुरस्कार का स्वरूप
    • सार्वभौमिक पात्रता: यह पुरस्कार किसी भी व्यक्ति अथवा संगठन को राष्ट्रीयता, नस्ल या धर्म के भेद के बिना प्रदान किया जा सकता है।
    • आवृत्ति: उपयुक्त नामांकन तथा जूरी की संस्तुति के अधीन यह पुरस्कार प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता है।
  • नामांकन प्रक्रिया: पुरस्कार हेतु अनुशंसाएँ निम्नलिखित द्वारा प्रस्तुत की जा सकती हैं:
    • इंदिरा गांधी पुरस्कार के पूर्व प्राप्तकर्ता।
    • जूरी के पूर्व सदस्य।
    • भारतीय संसद के किसी भी सदन के सदस्य।
    • संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों की राष्ट्रीय संसदों के सदस्य।
    • शांति एवं अंतरराष्ट्रीय समझ को बढ़ावा देने वाले प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगठन।
    • जूरी द्वारा आमंत्रित या अनुमत व्यक्ति अथवा संगठन।

प्रमुख पूर्व पुरस्कार विजेता

  • मिखाइल गोर्बाचेव (1987): परमाणु निरस्त्रीकरण एवं शीतयुद्ध की समाप्ति में योगदान के लिए।
  • यूनिसेफ (1989): वैश्विक बाल कल्याण एवं मानवीय कार्यों के लिए।
  • डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन (1999): पादप आनुवंशिकी के क्षेत्र में तथा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में योगदान के लिए।
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (2014): विकास हेतु अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए।
  • प्रथम गैर-सरकारी संगठन (2021): शिक्षा एवं अधिगम परिणामों में योगदान के लिए।
  • इंडियन मेडिकल एसोसिएशन एवं ट्रेंड नर्सेज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (2022): कोविड-19 महामारी के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा हेतु।
  • मिशेल बाचेलेट (2024): चिली की पूर्व राष्ट्रपति एवं संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त।

ग्रासा माशेल के बारे में

  • राष्ट्रीयता: मोजांबिक।
  • भूमिका:
    • मोजांबिक की प्रथम महिला (राष्ट्रपति समोरा माशेल की पत्नी)।
    • दक्षिण अफ्रीका की प्रथम महिला (नेल्सन मंडेला की पत्नी)।
  • प्रतिष्ठा
    • एक प्रतिष्ठित अफ्रीकी राजनेत्री एवं मानवाधिकार समर्थक के रूप में व्यापक रूप से मान्य।
  • मुख्य योगदान
    • बच्चों एवं सशस्त्र संघर्ष पर संयुक्त राष्ट्र अध्ययन (1990 का दशक): सशस्त्र संघर्ष के बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव पर संयुक्त राष्ट्र के एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन का नेतृत्व किया।
    • महिला सशक्तीकरण, बाल विकास तथा सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले संस्थानों की स्थापना एवं नेतृत्व।

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