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सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का मिथक: आर्थिक स्वतंत्रता की वास्तविकता

Lokesh Pal January 23, 2026 05:15 18 0

सन्दर्भ:

भारत को चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में वर्णित किया जाता है, और इसके शेयर बाजार तीव्रता से बढ़ रहे हैं, जिससे तीव्र राष्ट्रीय समृद्धि की छवि निर्मित हुई है।

वास्तविक आर्थिक स्वतंत्रता को परिभाषित करना:

  • विकल्प की अवधारणा: नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के अनुसार, वास्तविक विकास आय से संबंधित नहीं बल्कि स्वतंत्रता से संबंधित है
    • इसमें बच्चों को अच्छे स्कूलों में भेजने या गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने जैसे विकल्प चुनाव करने की स्वतंत्रता शामिल है।
  • आर्थिक स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार के रूप में: यह राजनीतिक स्वतंत्रता (मतदान का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि) और सामाजिक स्वतंत्रता (अस्पृश्यता का उन्मूलन, लैंगिक समानता आदि) के समान है।
    • आर्थिक स्वतंत्रता में संपत्ति क्रय और विक्रय करने की स्वतंत्रता, उचित मजदूरी के माध्यम से अपने श्रम के परिणाम का लाभ प्राप्त करने की स्वतंत्रता और अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप के बिना व्यवसाय करने की स्वतंत्रता शामिल है।
    • उदाहरण: एक किसान आलू की खेती करता है, लेकिन सरकार द्वारा उसे मजबूर किया जाता है कि वह उन्हें केवल स्थानीय मंडी में एक निश्चित मूल्य पर विक्रय कर सके ; इस परिदृश्य में, उसकी उत्पादकता के बावजूद, उसके पास आर्थिक स्वतंत्रता का अभाव है।

सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का मिथक

  • बाजार लेनदेन बनाम खुशहाली: GDP केवल बाजार में क्रय विक्रय का मापन करता है, यह किसी निश्चित अवधि में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य से संबंधित है। इसका खुशहाली से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।
  • नकारात्मक घटनाओं से सकारात्मक GDP: उदाहरण: यातायात में अति व्यस्तता के कारण ईंधन के अधिक उपयोग और लेन-देन के माध्यम से GDP को बढ़ा सकता है, जबकि जीवन की गुणवत्ता को कम कर सकता है, और बीमारियों में वृद्धि समग्र स्वास्थ्य में गिरावट के बावजूद अस्पताल के व्यय और GDP को बढ़ा सकती है।
  • GDP कुछ आयामों की उपेक्षा करता है: GDP आय असमानता, पर्यावरणीय क्षति, शिक्षा की गुणवत्ता या समग्र राष्ट्रीय स्वास्थ्य स्तरों को ध्यान में रखने में विफल रहता है।
    • यह मानव स्वतंत्रता के स्थान पर पूर्णतः भौतिक वस्तुओं पर केंद्रित है।

भारत की वैश्विक स्थिति

  • हेरिटेज फाउंडेशन के आंकड़ों के अनुसार: 2025 के आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 176 देशों में से 128वें स्थान पर है।
  • श्रेणी: भारत को 100 में से 59 अंक प्राप्त हुए, जिससे देश को “अधिक गैर-स्वतंत्र” की श्रेणी में स्थान दिया गया है
    • भारत 2002 से इसी श्रेणी में अवरुद्ध है,इससे पहले वह “दमनकारी” श्रेणी में था।

“दो भारत” और असमानता:

  • भारत 1 (शीर्ष 10%): यह समूह उपभोक्ता अर्थव्यवस्था का “इंजन” है, जो सभी विवेकाधीन व्यय का 66% हिस्सा व्यय करता है – अर्थात फिल्मों या छुट्टियों जैसी विलासिता की चीजों पर व्यय किया गया धन, न कि भोजन और आश्रय जैसी बुनियादी जरूरतों पर
  • भारत 2 (सबसे निचले 90%): इस विशाल बहुमत के पास व्यय करने की कोई अतिरिक्त क्षमता नहीं है और वे प्रतिदिन बुनियादी आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए संघर्ष करते हैं।
    • धन के द्वीप: ” गेटेड सोसाइटी” या “धन के द्वीपों ” का उदय, जहां अमीर लोग मुख्य रूप से गरीबों से अलग रहने के लिए विलासिता और सुरक्षा के लिए भुगतान करते हैं।
    • K-आकार की आर्थिक सुधार: एक ऐसा आर्थिक सुधार जिसमें अमीर और अमीर होते जाते हैं और गरीब और गरीब होते जाते हैं। इससे असमानता बढ़ती है क्योंकि K-आकार के ऊपरी स्तर में वृद्धि होती है जबकि निचले स्तर में गिरावट आती है।

बाजार और नीतिगत विफलताएँ:

  • आवास और ऑटोमोबाइल: निर्माणकर्ता अब किफायती आवासों के निर्माण की उपेक्षा कर रहे हैं और 90 लाख रुपये से लेकर 1.5 करोड़ रुपये तक की मूल्य वाले विलासिता वाले घरों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
    • इसी तरह, कार निर्माता कंपनियां महंगी एसयूवी में नवाचार कर रही हैं, जबकि ऑल्टो या नैनो जैसी किफायती कारों की उपेक्षा कर रही हैं
  • स्थिर वेतन: प्रवेश स्तर के आईटी वेतन एक दशक से अधिक समय ( 2012-2026) तक अपरिवर्तित रहे हैं, जबकि जीवन यापन की लागत में अधिक वृद्धि हुई है।
  • “गरीबों का बाजार” लुप्त हो रहा है: व्यवसाय अपनी ऊर्जा और संसाधनों को शीर्ष 10% पर केंद्रित कर रहे हैं क्योंकि लाभ वहीं है, और प्रभावी रूप से निचले 90% की उपेक्षा की जा रही हैं।
    • एकाधिकारवादी प्रवृत्ति: बाज़ार प्रतिस्पर्धी जन बाज़ारों के स्थान पर सीमित विक्रेताओं और प्रीमियम समूह की ओर झुकने लगता है तो इस स्थिति में गरीबों के पास विकल्प नहीं रह जाता।

आगे की राह:

  • जीवन की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करें: नीति को GDP के आंकड़ों का अनुकरण करने के स्थान पर रोजगार सृजन और उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार को सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • वेतन सुधार: मुद्रास्फीति से जुड़े वेतन को लागू करने की आवश्यकता है ताकि लोगों की आय बढ़ती लागत के साथ संतुलन बनाए रख सके।
  • एकाधिकार तोड़ना: छोटे व्यवसायों के विकास और गरीबों की सेवा करने की अनुमति प्रदान करने के लिए बड़े व्यावसायिक समूहों के एकाधिकार को सीमित करना आवश्यक है।
  • सामाजिक सुरक्षा: असमानता को कम करने के लिए नीतिगत ध्यान सामाजिक सुरक्षा, बेहतर श्रम स्थितियों और गरीबों के सशक्तिकरण की ओर स्थानांतरित होना चाहिए।

निष्कर्ष:

आर्थिक स्वतंत्रता केवल GDP के आंकड़ों पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि समावेशी आय वृद्धि और संस्थागत निष्पक्षता पर भी निर्भर करती है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में वृद्धि, जनता की आर्थिक स्वतंत्रता की गारंटी नहीं हो सकती है। उपभोक्ता वर्ग (भारत 1) और जीवन निर्वाह वर्ग (भारत 2) के बीच बढ़ते अंतराल के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। वास्तविक समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत उपायों का सुझाव दीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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