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हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का ह्रास

Lokesh Pal January 27, 2026 03:49 53 0

संदर्भ

हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन से प्रेरित आपदाओं में चिंताजनक वृद्धि का सामना कर रहा है, जिस कारण वर्ष  2025 में 4,000 से अधिक मौतें हुई हैं।

  • चार धाम राजमार्ग जैसी परियोजनाओं का पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में निरंतर विस्तार, अस्थिर विकास के कारण हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश की आशंका को बढ़ा रहा है।

इकोसाइड (Ecocide) के बारे में  

  • अर्थ: इकोसाइड (Ecocide) वह स्थिति है, जिसमें जानबूझकर या लापरवाही से की गई मानवीय गतिविधियों के परिणामस्वरूप पारिस्थितिकी तंत्रों को बड़े पैमाने पर, व्यापक रूप से या लंबे समय तक गंभीर क्षति पहुँचती है।
    • इसमें पर्यावरण को इतना गंभीर नुकसान पहुँचाना शामिल है कि यह मानव और गैर-मानव जीवन के अस्तित्व, स्वास्थ्य को खतरे में डाल देता है।
  • अवधारणा की उत्पत्ति: पारिस्थितिकी विनाश शब्द वर्ष 1970 में जीवविज्ञानी आर्थर गैलस्टन द्वारा वियतनाम युद्ध के दौरान हुए पारिस्थितिकी विनाश के प्रत्युत्तर में गढ़ा गया था।
    • जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि और औद्योगिक पर्यावरणीय आपदाओं के कारण इस अवधारणा को वैश्विक स्तर पर पुनः महत्त्व प्राप्त हुआ।
  • प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय कानूनी परिभाषा: वर्ष 2021 में, एक स्वतंत्र विशेषज्ञ पैनल ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के रोम विधान में शामिल करने के लिए पारिस्थितिकी विनाश की एक कानूनी परिभाषा प्रस्तावित की।
    • पर्यावरण विनाश से तात्पर्य ऐसे गैरकानूनी या जानबूझकर किए गए कृत्यों से है, जिनके परिणामस्वरूप पर्यावरण को गंभीर, व्यापक अथवा दीर्घकालिक क्षति पहुँचने की संभावना के बारे में पूर्व जानकारी हो।
    • प्रस्ताव में पर्यावरण विनाश को नरसंहार, मानवता के विरुद्ध अपराध, युद्ध अपराध और आक्रामकता के अपराध के साथ पाँचवें अंतरराष्ट्रीय अपराध के रूप में मान्यता देने का प्रयास किया गया है।
  • आवश्यक घटक: पर्यावरण विनाश में बड़े भौगोलिक क्षेत्रों और पारिस्थितिकी तंत्रों को प्रभावित करने वाली पर्यावरणीय क्षति शामिल है।
    • इससे होने वाली क्षति दीर्घकालिक या अपरिवर्तनीय प्रकृति की है।
    • इस क्षति के परिणामस्वरूप पारिस्थितिकी तंत्र के कार्यों और मानव आजीविका में गंभीर व्यवधान उत्पन्न होता है।
    • यह विनाश प्रत्यक्ष रूप से मानवजनित कार्यों से उत्पन्न होता है, जिनमें राज्य, निगम या व्यक्ति शामिल हैं।
  • पर्यावरण विनाश के उदाहरण
    • बड़े पैमाने पर वनों की कटाई: बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से जैव विविधता की अपरिवर्तनीय हानि और जलवायु अस्थिरता हुई है।
      • अमेजन वर्षावन में वनों की कटाई एक ऐसे मोड़ तक पहुँच गई है, जो वैश्विक जलवायु के लिए गंभीर खतरा है।
    • बड़े पैमाने पर तेल रिसाव: बड़े पैमाने पर तेल रिसाव से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक क्षति और तटीय आजीविका का नुकसान होता है।
      • डीपवाटर होराइजन तेल रिसाव (मैक्सिको की खाड़ी) व्यापक पारिस्थितिकी क्षति का कारण बना, जिसके प्रभाव एक दशक से अधिक समय तक बने रहे।
    • औद्योगिक प्रदूषण: औद्योगिक प्रदूषण नदियों, मृदा और भूजल को दूषित करता है, जिसके सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम होते हैं।
      • भोपाल गैस त्रासदी (1984) औद्योगिक लापरवाही के कारण होने वाली दीर्घकालिक पर्यावरणीय और मानवीय क्षति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
    • खनन-प्रेरित पर्यावरणीय विनाश: बड़े पैमाने पर खनन कार्यों से संपूर्ण भू-दृश्य नष्ट हो जाते हैं और स्थानीय पारिस्थितिकी और सामाजिक व्यवस्थाएँ बाधित होती हैं।
      • दक्षिण अमेरिका के “लीथियम ट्रायंगल” में लीथियम खनन के कारण भूजल का स्तर घट गया है और पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ गया है।
    • सशस्त्र संघर्ष के दौरान पर्यावरणीय विनाश: सशस्त्र संघर्षों में अक्सर जानबूझकर या अनजाने में पर्यावरणीय विनाश शामिल होता है, जिसके दीर्घकालिक प्रभाव होते हैं।
      • वियतनाम युद्ध के दौरान एजेंट ऑरेंज के प्रयोग से निरंतर मृदा प्रदूषण और पारिस्थितिकी क्षति हुई।
        • एजेंट ऑरेंज एक रासायनिक खरपतवारनाशक और पर्णनाशक था जिसका प्रयोग अमेरिकी सेना ने वियतनाम युद्ध (1961-1971) के दौरान किया था।

मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) के बारे में

  • यह हिमालय की सबसे महत्त्वपूर्ण विवर्तनिक भ्रंश प्रणालियों में से एक है, जिसका निर्माण भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के बीच सतत टकराव के परिणामस्वरूप हुआ है।
  • MCT एक प्रमुख अंतरमहाद्वीपीय थ्रस्ट भ्रंश है, जो दो भागों को अलग करता है:-
    • उत्तर में उच्च हिमालयी क्रिस्टलीय (HHC) चट्टानें
    • दक्षिण में निम्न हिमालयी अनुक्रम (LHS) चट्टानें
  • MCT के अनुदिश, प्राचीन, ​​उच्च श्रेणी की कायांतरित चट्टानें नई, निम्न श्रेणी की चट्टानों के ऊपर आ गई हैं, जो संपीडन विवर्तनिकी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • यह भू-वैज्ञानिक रूप से सक्रिय है, और भू-वैज्ञानिक काल में इसके बार-बार सक्रिय होने के प्रमाण मिलते हैं।

हिमालयी संकट के बारे में

  • पर्यावरणीय अस्थिरता (गुणक कारक): हिमालय प्राकृतिक रूप से अस्थिर है, और जलवायु परिवर्तन इस मौजूदा जोखिम को बढ़ाने वाला गुणक कारक है।
    • भू-वैज्ञानिक संवेदनशीलता: नव निर्मित वलित पर्वत होने के कारण, यह क्षेत्र भूकंपीय क्षेत्र IV और V में स्थित है।
      • अस्थिर भू-संरचना और सक्रिय फॉल्ट लाइनें [जैसे- मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT)] इस भू-भाग को भूकंप से प्रेरित भूस्खलन के लिए अत्यधिक संवेदनशील बनाती हैं।
    • ग्लोबल वार्मिंग गैप: ऊँचाई वाले क्षेत्रों में तापमान वैश्विक औसत से लगभग 50% तेजी से बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।, जिससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOFs) जैसी जल-मौसम संबंधी आपदाएँ उत्पन्न हो रही हैं और वर्ष 2010 के बाद से बादल फटने की घटनाओं में लगभग 200% की वृद्धि हुई है।
    • पारिस्थितिकी तंत्र का क्षय: वनोन्मूलन (देवदार का नुकसान) और खनन के कारण जल निकासी में रुकावट ने प्राकृतिक पारिस्थितिकी “आधार” को विघटित कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप मृदा अपरदन, ढलान की अस्थिरता और भूस्खलन हो रहे हैं।
  • संरचनात्मक कुप्रथा (‘कारण’ कारक): क्षेत्रीय वहन क्षमता की अनदेखी करने वाले मानवीय हस्तक्षेपों से संकट और भी गंभीर हो जाता है।
    • इंजीनियरिंग विफलताएँ: मानकीकृत सड़क डिजाइन (DL-PS) ऊर्ध्वाधर पहाड़ी कटाई पर निर्भर करती हैं, जो प्राकृतिक विश्राम कोण का उल्लंघन करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रमुख गलियारों के साथ 800 से अधिक सक्रिय भूस्खलन क्षेत्र बन गए हैं।
      • DL-PS मानक आपदाओं के प्रति स्पष्ट रूप से संवेदनशील क्षेत्र में 12 मीटर की पक्की सतह अनिवार्य करता है।
    • अतिक्रमण और सुरंग निर्माण: जलविद्युत, सुरंग निर्माण और बाढ़ के मैदानों तथा नदी तल में शहरी विस्तार ने प्राकृतिक बफरिंग प्रणालियों को नष्ट कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2025 की धारली बाढ़ जैसी आपदाएँ घटित हुईं।
    • MCT उल्लंघन: बुनियादी ढाँचा मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) के उत्तर में विस्तारित हो गया है – एक खंडित, उच्च भूकंपीय जोखिम वाला क्षेत्र जहाँ पारंपरिक रूप से बड़े पैमाने पर निर्माण प्रतिबंधित था।
  • शासन और सामाजिक-आर्थिक दबाव: संस्थागत क्षमता और सामाजिक तैयारी भौतिक विकास की गति से पीछे हैं।
    • पर्यटन का दबाव: चार धाम तीर्थयात्रा पर आधारित व्यापक पर्यटन (चार धाम) वैज्ञानिक वहन क्षमता आकलन के बिना ही आगे बढ़ रहा है, जिससे संवेदनशील ढलानों पर, विशेषकर मानसून के दौरान, मौसमी दबाव बढ़ रहा है।
    • संस्थागत विखंडन: बहुस्तरीय शासन प्रणाली (जिला-राज्य-केंद्र) समन्वय की कमी, कमजोर वास्तविक समय निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी के प्रसार में देरी का कारण बन रही है।
    • सीमांतकरण: दूरदराज के पहाड़ी समुदायों को स्वास्थ्य सेवा और संपर्क की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जबकि अप्रभावी आपदा अभ्यास वास्तविक सामुदायिक लचीलापन विकसित करने में विफल रहे हैं।

भारतीय हिमालय क्षेत्र (IHR) के बारे में

  • भौगोलिक विस्तार: IHR भारत के 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों (UTs) में फैला हुआ है।
    • जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, असम और पश्चिम बंगाल।
    • यह 2,500 किलोमीटर से अधिक लंबाई में फैला हुआ है और भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 16% भाग कवर करता है।

  • जनसंख्या और विविधता: लगभग 5 करोड़ लोग।
    • लद्दाखियों, सिक्किम के भूटिया, तिब्बती बौद्ध और हिमाचल प्रदेश के गद्दी जैसी विविध नृजातीय समुदायों द्वारा बसाया हुआ, जिनमें से प्रत्येक की अपनी अनूठी संस्कृति, भाषा और परंपराएँ हैं।
    • यह क्षेत्र अपनी बहुलतावादी जनसांख्यिकीय, आर्थिक, पर्यावरणीय, सामाजिक और राजनीतिक प्रणालियों के लिए जाना जाता है।

भारत के लिए हिमालय का महत्त्व

  • जलवायु नियामक और मौसम नियंत्रक: हिमालय पर्वतमाला एक प्राकृतिक जलवायु अवरोधक के रूप में कार्य करती है, जो भारत के मौसम और ऋतुओं को आकार देती है।
    • यह नमी से भरी दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी पवनों को ऊपर उठने के लिए प्रेरित करती है, जिससे उत्तरी और मध्य भारत में वर्षा होती है।
    • इस अवरोधक के बिना, देश का अधिकांश भाग शुष्क और अर्द्ध-मरुस्थल होता। सर्दियों में, ये पर्वत मध्य एशिया से आने वाली ठंडी पवनों को रोकते हैं, जिससे भारतीय मैदान गर्म, रहने योग्य और कृषि के लिए अनुकूल बने रहते हैं।
  • भारत का “जल भंडार”: हिमालय भारत के मीठे पानी का मुख्य स्रोत है।
    • सिंधु, गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियाँ हिमालयी हिमनदों और हिमक्षेत्रों से निकलती हैं।
    • ये नदियाँ भारत की लगभग आधी आबादी के लिए पेयजल, कृषि, उद्योग और स्वच्छता की आपूर्ति करती हैं।
    • यहाँ की खड़ी ढलानें जलविद्युत उत्पादन की अपार क्षमता प्रदान करती हैं, जिससे यह क्षेत्र नवीकरणीय ऊर्जा के लिए महत्त्वपूर्ण बन जाता है।
  • कृषि एवं आर्थिक आधार: हिमालयी नदियाँ पोषक तत्त्वों से भरपूर जलोढ़ मृदा को मैदानी इलाकों तक ले जाती हैं, जिससे सिंधु-गंगा का उपजाऊ क्षेत्र का निर्माण होता है, जो भारत का प्रमुख खाद्य उत्पादक क्षेत्र है।
    • पहाड़ औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों और लकड़ी सहित वन संसाधन भी प्रदान करते हैं, जो ग्रामीण आजीविका का समर्थन करते हैं।
    • इसके अतिरिक्त, हिमालय पर्यटन और तीर्थयात्रा का एक प्रमुख केंद्र है, जो केदारनाथ, बद्रीनाथ, लेह और मनाली जैसे स्थानों की स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को सहारा देता है।
  • रक्षा एवं सामरिक महत्त्व: हिमालय भारत की प्राकृतिक उत्तरी ढाल के रूप में कार्य काम करता है।
    • इन क्षेत्रों की दुर्गम भू-भाग और ऊँचे पर्वतीय दर्रों के कारण बड़े पैमाने पर आक्रमण करना कठिन है।
    • लद्दाख और सियाचिन ग्लेशियर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर नियंत्रण राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा निगरानी और सैन्य लाभ के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, विशेष रूप से चीन और पाकिस्तान के साथ सीमाओं पर।
  • जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत: हिमालय वैश्विक जैव विविधता का एक प्रमुख केंद्र है, जहाँ हिम तेंदुआ, लाल पांडा और हिमालयन मोनल जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
    • सांस्कृतिक रूप से, इन्हें “देवभूमि” (देवताओं की भूमि) के रूप में पूजा जाता है और ये हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म की आध्यात्मिक परंपराओं का केंद्र हैं।
    • ये पर्वत पवित्र नदियों, तीर्थयात्रा मार्गों और प्राचीन परंपराओं संगम है, जो भारत की सभ्यता का आधार हैं।

भारत का ‘हिमालयन रेजिलियंस फ्रेमवर्क’

  • अग्रणी वैज्ञानिक प्रयास: भारत ने हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की निगरानी करने और आपदा पूर्वानुमान में सुधार लाने के लिए एक बहु-एजेंसी निगरानी प्रणाली विकसित की है।
    • विशेषीकृत अनुसंधान केंद्र: हिमांश अनुसंधान केंद्र (2016 में स्थापित) और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH), रुड़की में स्थित क्रायोस्फीयर और जलवायु परिवर्तन अध्ययन केंद्र (C4S) ग्लेशियरों और नदियों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के लिए जमीनी स्तर के आँकड़े उपलब्ध कराते हैं।
    • एशिया के जल स्तंभ की निगरानी: वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि ग्लेशियर अलग-अलग गति से सिकुड़ रहे हैं- सिंधु बेसिन में लगभग 12.7 मीटर प्रति वर्ष और ब्रह्मपुत्र बेसिन में लगभग 20.2 मीटर प्रति वर्ष।
      • यह जानकारी निचले इलाकों में रहने वाले लगभग 6 करोड़ लोगों की जल सुरक्षा योजना के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • एकीकृत निगरानी: ग्लेशियर निगरानी संबंधी संचालन समिति (2023) जल शक्ति मंत्रालय, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के बीच वास्तविक समय में डेटा साझाकरण सुनिश्चित करती है, जिससे कार्य करने की प्रक्रिया में तेजी आती है।
  • राष्ट्रीय जोखिम न्यूनीकरण और नीति एकीकरण: इन पहलों से हिमालयी शासन व्यवस्था आपदा के बाद की प्रतिक्रिया से हटकर आपदा निवारण की ओर अग्रसर होती है।
    • GLOF और भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण: राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण परियोजना (NLRMP) और राष्ट्रीय हिमनद झील विस्फोट बाढ़ जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम (NGRMP, 2025) का उद्देश्य जोखिम मानचित्रण, क्षेत्र निर्धारण और स्थान-विशिष्ट सुरक्षा संरचनाओं पर ध्यान केंद्रित करना है।
    • जलवायु-अनुकूल अवसंरचना: आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) के माध्यम से, भारत सड़कों, पुलों और सुरंगों को तीव्र वर्षा और बादल फटने जैसी दुर्लभ लेकिन चरम मौसम घटनाओं से सुरक्षित रखने के लिए उनका पुनर्निर्माण कर रहा है।
    • नीतिगत फ्रेमवर्क: राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के अंतर्गत राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण मिशन (NMSHE) 11 राज्य जलवायु परिवर्तन प्रकोष्ठों को क्षेत्र-विशिष्ट जलवायु अनुकूलन रणनीतियों को तैयार करने में सहायता प्रदान करता है।
  • समुदाय-केंद्रित और सीमा सुरक्षा: वर्तमान में हिमालयी क्षेत्र में स्थानीय समुदाय की रक्षा करना प्राथमिक आवश्यकता है।
    • स्थानीय प्राथमिक सहायता कर्मी: आपदा मित्र योजना के तहत एक लाख से अधिक स्थानीय स्वयंसेवकों को खोज, बचाव और राहत कार्यों के मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) में प्रशिक्षित किया गया है, जिससे आपदाओं के बाद के महत्त्वपूर्ण “गोल्डन ऑवर” के दौरान जीवन बचाने में मदद मिली है।
    • जीवंत ग्राम कार्यक्रम – चरण II (VVP-II): ₹6,839 करोड़ के परिव्यय के साथ वर्ष  2025 में शुरू की गई यह योजना, सर्व-मौसम सड़कों, डिजिटल कनेक्टिविटी और जलवायु-लचीली आजीविका के माध्यम से सीमावर्ती गाँवों को मजबूत बनाती है, जिससे प्रवासन कम होता है और सीमा सुरक्षा में सुधार होता है।
    • पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण: SECURE हिमालय (भारत सरकार-संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम साझेदारी) और भारत-स्विट्जरलैंड हिमालयी जलवायु अनुकूलन कार्यक्रम (IHCAP) जैसी परियोजनाएँ अल्पाइन घास के मैदानों को बहाल करने, जैव विविधता की रक्षा करने और सूखते पर्वतीय झरनों को पुनर्जीवित करने के लिए पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ती हैं।

संबद्ध वैश्विक पहल

  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेंडाई ढाँचा (2015-2030): जोखिम आकलन, लचीलापन निर्माण और प्रारंभिक चेतावनी का आह्वान करता है।
  • पेरिस समझौता (2015): जलवायु-जनित आपदाओं के प्रति अनुकूलन और लचीलेपन को प्रोत्साहित करता है।
  • आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI, 2019): जलवायु और आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना के लिए भारत के नेतृत्व वाली वैश्विक साझेदारी।
  • आपदा प्रबंधन और आपातकालीन प्रतिक्रिया के लिए अंतरिक्ष-आधारित सूचना हेतु संयुक्त राष्ट्र मंच (UN-SPIDER): आपदा प्रबंधन और आपातकालीन प्रतिक्रिया के लिए अंतरिक्ष-आधारित सूचना प्रदान करता है।

हिमालयी आपदा की तैयारी और उससे उबरने में प्रणालीगत कमियाँ

  • सूचना और कार्रवाई के बीच का अंतर: वैज्ञानिक आँकड़ों और जमीनी स्तर पर लोगों की सुरक्षा के बीच एक स्पष्ट अंतर है।
    • निष्क्रिय निगरानी: राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र (NRSC) और भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) जैसी एजेंसियों के पास मजबूत उपग्रह मानचित्रण प्रणालियाँ हैं, लेकिन ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOFs) और अस्थिर पर्वतीय ढलानों की निगरानी वास्तविक समय में नहीं की जाती है।
      • यह स्थिर डेटा तेजी से बदलती आपदाओं के साथ सामंजस्य नहीं स्थापित कर पाता है।
    • अप्रभावी संचार: वर्ष 2025 के मानसून के दौरान, बड़े पैमाने पर लघु संदेश सेवा (SMS) अलर्ट जारी किए गए, लेकिन कई अलर्ट जीवन बचाने में विफल रहे।
      • अलर्ट में खतरे की चेतावनी तो दी गई, लेकिन यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि कहाँ से निकलना है, किन मार्गों का उपयोग करना है, या किन मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) का पालन करना है।
  • नियामक व्यवस्था में कमजोरी और “अति आत्मविश्वास”: पहाड़ों की प्राकृतिक सीमाओं के साथ काम करने के बजाय, अक्सर उन पर विकास थोपा जाता है।
    • पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) से बचना: बड़े बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को अनिवार्य पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) से बचने के लिए छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दिया जाता है।
      • इससे हिमालयी क्षेत्र को हो रहे संयुक्त पर्यावरणीय नुकसान को छिपाया जाता है।
    • भू-गर्भिक जानकारी का अभाव: इंजीनियर अक्सर आक्रामक तरीके से सड़क बनाने हेतु पहाड़ी की कटाई के बाद क्षतिग्रस्त ढलानों को स्थिर करने के लिए जाल, बोल्ट और स्प्रे किए गए कंक्रीट (शॉटक्रेट) का उपयोग करते हैं।
      • यह इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि हिमालय युवा और संवेदनशील पर्वत हैं, जहाँ इस तरह के कठोर इंजीनियरिंग समाधान अक्सर विफल हो जाते हैं।
  • वहनीय क्षमता’ संकट: हिमालय क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों ने इसकी प्राकृतिक सीमाओं को पार कर लिया है।
    • अनियंत्रित दबाव: तीर्थयात्रियों या वाहनों की संख्या पर कोई वैज्ञानिक रूप से निर्धारित सीमा नहीं है। व्यस्त मौसमों के दौरान, सड़कें, शहर और आपातकालीन सेवाएँ अपनी क्षमता से कहीं अधिक दबाव में आ जाती हैं।
    • अतिक्रमण: नदी के बाढ़ क्षेत्रों और भूकंप संभावित क्षेत्रों में निरंतर निर्माण से नुकसान बढ़ गया है। यह वर्ष 2024-2025 की बाढ़ के दौरान इमारतों के ढहने की उच्च दर में स्पष्ट रूप से देखा गया था।
  • दूरदर्शिता की कमी वाले पुनर्निर्माण मॉडल: आपदा के बाद की कार्रवाइयाँ अक्सर अगली आपदा के लिए परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं।
    • स्थिरता की बजाय गति को प्राथमिकता: बाढ़ या भूस्खलन के बाद, अधिकारी सड़क संपर्क को शीघ्रता से बहाल करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इस प्रक्रिया में, उचित भू-वैज्ञानिक जाँचों को नजरअंदाज कर दिया जाता है और सड़कें उसी अस्थिर मलबे पर पुनर्निर्मित की जाती हैं, जो पहले ढह गया था।
    • सामाजिक-आर्थिक विलंब: मुआवजे, पुनर्वास और आजीविका सहायता में लंबे समय तक विलंब से पुनर्प्राप्ति धीमी हो जाती है, जिससे दूरस्थ हिमालयी समुदाय बार-बार आपदाओं और दीर्घकालिक असुरक्षा के शिकार होते रहते हैं।

आगे की राह

  • नई नीतिगत रूपरेखा की आवश्यकता: वर्तमान स्थिति शासन व्यवस्था में व्यापक विफलता को दर्शाती है, जिसके कारण हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSHE) के दिशा-निर्देशों की ओर अग्रसर होना आवश्यक हो जाता है।
    • जोखिम बढ़ाने वाले कारकों को कम करना: जलवायु परिवर्तन अनियमित वर्षा और हिमनदों के पिघलने की तीव्रता को बढ़ाता है; बुनियादी ढाँचे को इस “जल स्तर में वृद्धि” का सामना करने के लिए डिजाइन किया जाना चाहिए।
    • वैज्ञानिक जवाबदेही: सूचनाओं के अभाव में किया गया इंजीनियरिंग कार्य (जैसे नुकसान होने के बाद अस्थिर ढलानों को स्विस बोल्ट से ठीक करना) को पूर्व-भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों से बदलने की तत्काल आवश्यकता है।
    • भागीरथी पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र का संरक्षण: बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और प्राचीन वृक्षों का स्थानांतरण पारिस्थितिकी रूप से दोषपूर्ण है; जल सुरक्षा और बर्फ पिघलने से पोषित धाराओं में ऑक्सीजन के स्तर के लिए बफर क्षेत्रों का संरक्षण आवश्यक है।
  • शासन और नियामक प्रणाली में परिवर्तन
    • एकीकृत हिमालयी शासन: वर्तमान खंडित, राज्य-वार दृष्टिकोण को प्रतिस्थापित करने और समान नीतियों, मानकों तथा समन्वय को सुनिश्चित करने के लिए एक हिमालयी प्राधिकरण का गठन करें – जो सभी हिमालयी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को शामिल करने वाला एक अंतर-राज्यीय संवैधानिक निकाय हो।
    • क्षेत्र-विशिष्ट प्रभाव आकलन: सामान्य पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) को पर्वतीय संवेदनशीलता वाले मानकों से प्रतिस्थापित करें, जिसमें सभी प्रमुख परियोजनाओं, विशेष रूप से ₹50 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं के लिए अनिवार्य भूकंपीय जोखिम जाँच और ढलान स्थिरता लेखापरीक्षा शामिल हो।
    • वहनीयता प्रवर्तन: भीड़भाड़, बुनियादी ढाँचे पर दबाव और आपदा जोखिम को रोकने के लिए वैज्ञानिक दिशा-निर्देशों के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और वाहनों की दैनिक सीमा कानूनी रूप से निर्धारित करें।
  • अवसंरचना और इंजीनियरिंग सुधार
    • पहाड़-अनुकूल डिजाइन: आक्रामक सड़क चौड़ीकरण मॉडल को पहाड़-अनुकूल सड़क डिजाइनों से बदलें, जो पहाड़ी कटाई को कम करें और प्राकृतिक ढलानों की रक्षा करें।
    • कम निर्माण, समझदारी से निर्माण” दृष्टिकोण: नए निर्माण के बजाय मौजूदा सड़कों, पुलों और सुरंगों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करें। सभी नए बुनियादी ढाँचे को चरम जलवायु घटनाओं का सामना करने के लिए डिजाइन किया जाना चाहिए।
    • मलबे से मुक्ति नीति: जीपीएस ट्रैकिंग और निगरानी प्रणालियों का उपयोग करके निर्माण अपशिष्ट (मलबे) पर सख्त नियंत्रण लागू करें, यह सुनिश्चित करते हुए कि इसे नदियों में न डाला जाए, जो वर्तमान में बाढ़ और नदी के उफान की समस्या को और बढ़ा देता है।
    • जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढाँचा: सभी हिमालयी परियोजनाओं में आपदा प्रतिरोध को एक मुख्य नियम बनाएँ, न कि बाद में जोड़ा जाने वाला विचार।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और सामुदायिक सुरक्षा
    • एकीकृत डेटा प्रणाली: जिला अधिकारियों और ग्राम प्रधानों के लिए वास्तविक समय में आपदा संबंधी जानकारी प्रदान करने वाला एक हिमालयी डेटा ग्रिड बनाएँ, जिसमें उपग्रह डेटा, मौसम पूर्वानुमान और जमीनी सेंसरों का संयोजन हो।
    • जन-केंद्रित चेतावनी: SMS चेतावनियों से आगे बढ़कर स्थानीय भाषा में वॉइस कॉल, सायरन और घाटी-विशिष्ट निकासी मार्गदर्शन प्रदान करें, ताकि चेतावनियाँ केवल सूचनात्मक न होकर कार्रवाई योग्य बन सकें।
    • जल सुरक्षा के लिए वसंत ऋतुओं का पुनरुद्धार: सूखे पहाड़ी झरनों को पुनर्जीवित करने के लिए वसंत ऋतु पुनरुद्धार कार्यक्रमों का विस्तार करें, जिससे पेयजल की उपलब्धता, मृदा की नमी और वनाग्नि की रोकथाम सुनिश्चित हो सके।
  • प्रकृति आधारित और पारिस्थितिकी तंत्र समाधान
    • प्राकृतिक ढलान संरक्षण: मिट्टी को प्राकृतिक रूप से बाँधे रखने और ढलानों को स्थिर करने वाले गहरी जड़ों वाले देशी वृक्षों (जैसे ओक और देवदार) को बढ़ावा दें, न कि व्यावसायिक वृक्षारोपण प्रजातियों को, जो पहाड़ियों को कमजोर करती हैं।
    • वन और नदी बफर क्षेत्र: जल प्रवाह, ऑक्सीजन स्तर और जैव विविधता को सुरक्षित रखने के लिए, पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों, नदी तटों और वन बफर क्षेत्रों को स्थानांतरित करने के बजाय उनका संरक्षण करें।
    • सतत् पर्यटन मॉडल: अति पर्यटन से हटकर सामान्य पर्यावरण-पर्यटन की ओर बढ़ना, जहाँ पर्यटन से होने वाली आय सीधे वन संरक्षण, वसंत ऋतुओं के पुनरुद्धार और स्थानीय आजीविका में सहायक हो।

निष्कर्ष

हिमालयी विकास की आधारशिला लचीलापन होना चाहिए। जैसा कि सेंडाई फ्रेमवर्क हमें याद दिलाता है, “आपदाएँ प्राकृतिक नहीं होतीं, वे समाज में अंतर्निहित जोखिमों का परिणाम होती हैं।” SDG-11 (सतत् शहर और समुदाय) और SDG-13 (जलवायु कार्रवाई) के अनुरूप, भविष्य के पर्यावरणीय मॉडल को प्रकृति पर नियंत्रण से सह-अस्तित्व की ओर और परियोजना-आधारित विकास से पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित शासन की ओर स्थानांतरित होना चाहिए।

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