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ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी

Lokesh Pal February 02, 2026 02:30 10 0

संदर्भ

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) के लिए स्टेम सेल थेरेपी को नैदानिक उपचार के रूप में प्रदान नहीं किया जा सकता।

पृष्ठभूमि

  • यह निर्णय उन याचिकाओं के संदर्भ में आया, जिनमें निजी क्लीनिकों द्वारा ASD के लिए स्टेम सेल थेरेपी के व्यापक प्रचार और उपयोग को उजागर किया गया था।
  • क्लीनिकों द्वारा प्रायोगिक थेरेपी को “उपचार” या “देखभाल” के रूप में प्रचारित किया जा रहा था, जिससे झूठी आशाएँ उत्पन्न हो रही थीं।
  • वित्तीय शोषण: परिवारों को इन अप्रमाणित हस्तक्षेपों के पीछे भारी आर्थिक व्यय वहन करना पड़ता था।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

  • नैदानिक उपयोग निषिद्ध: न्यायालय ने स्पष्ट रूप से निर्णय दिया कि ASD के लिए स्टेम सेल “थेरेपी” को नियमित नैदानिक उपचार के रूप में प्रदान नहीं किया जा सकता है।
  • वैज्ञानिक साक्ष्य का अभाव
    • न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि ASD के लिए स्टेम सेल थेरेपी की प्रभावशीलता और सुरक्षा, दोनों के संबंध में “स्थापित वैज्ञानिक साक्ष्यों का अभाव” है।
    • अनिश्चित वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर स्टेम सेल थेरेपी का उपयोग, चिकित्सकों द्वारा रोगियों के प्रति देय “उचित देखभाल के मानक” को पूरा नहीं करता।
  • सूचित सहमति मान्य नहीं: न्यायालय ने कहा कि पर्याप्त वैज्ञानिक आँकड़ों के अभाव में वैध सूचित सहमति संभव नहीं है।
    • सूचित सहमति का अर्थ है कि किसी उपचार के लिए दी गई सहमति तब ही वैध मानी जाएगी, जब वह ऐसे व्यक्ति द्वारा दी गई हो जो निर्णय लेने में सक्षम हो, और उसे उपचार से संबंधित सभी आवश्यक जानकारी स्पष्ट रूप से बताई गई हो।
      • इसमें उपचार की प्रकृति, प्रक्रिया, उद्देश्य, संभावित लाभ, जोखिम, उपलब्ध विकल्प तथा उपचार को आगे न बढ़ाने पर होने वाले परिणाम शामिल होते हैं।
  • स्टेम सेल थेरेपी की माँग का कोई अधिकार नहीं
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि माता-पिता, अभिभावक या देखभालकर्ता ASD से पीड़ित बच्चों के लिए स्टेम सेल थेरेपी को नैदानिक सेवा के रूप में माँग नहीं सकते।
    • रोगी की स्वायत्तता असुरक्षित या अप्रमाणित चिकित्सीय हस्तक्षेपों का अधिकार उत्पन्न नहीं करती।
  • नियामक प्राधिकरण: सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को स्टेम सेल अनुसंधान की देशव्यापी निगरानी के लिए एक समर्पित नियामक प्राधिकरण गठित करने का निर्देश दिया।

स्टेम सेल थेरेपी

  • स्टेम सेल थेरेपी पुनर्योजी चिकित्सा का एक रूप है, जिसका उद्देश्य क्षतिग्रस्त कोशिकाओं और ऊतकों की मरम्मत या प्रतिस्थापन करना है।
  • यह मुख्यतः सूजन को कम करने और प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने के माध्यम से कार्य करती है, जिससे विभिन्न स्थितियों में उपचार में सहायता मिल सकती है।
  • स्टेम सेल थेरेपी के अनुप्रयोग
    • पुनर्योजी चिकित्सा: स्टेम सेल हृदय की मांसपेशियों, उपास्थि या तंत्रिका कोशिकाओं जैसे क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत या प्रतिस्थापन में सहायक हो सकते हैं।
    • दीर्घकालिक रोग: मधुमेह, पार्किंसंस रोग, अल्जाइमर रोग और स्पाइनल कॉर्ड चोट जैसी स्थितियों के लिए स्टेम सेल-आधारित उपचारों पर अनुसंधान किया जा रहा है।
    • प्रतिरक्षा विकार और कैंसर देखभाल: स्टेम सेल का उपयोग प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को संशोधित या सुदृढ़ करने के लिए किया जा सकता है, जिसमें स्वप्रतिरक्षी रोगों और कुछ कैंसरों के लिए चिकित्सीय रणनीतियाँ शामिल हैं।
    • ऑर्थोपेडिक्स: ऑर्थोपेडिक चोटों और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी अपक्षयी स्थितियों के लिए स्टेम सेल थेरेपी का अध्ययन किया जा रहा है।

  • स्टेम सेल आदिम (अविशिष्ट) कोशिकाएँ होती हैं, जो विभाजित होकर शरीर में विभिन्न प्रकार की विशिष्ट कोशिकाओं में विकसित हो सकती हैं।
  • मुख्य विशेषता: उपयुक्त परिस्थितियों में स्टेम सेल निम्नलिखित कार्य कर सकती हैं:
    • स्व-पुनर्नवीकरण (अधिक स्टेम सेल बनाना), तथा
    • रक्त कोशिकाओं, तंत्रिका कोशिकाओं, अस्थि कोशिकाओं, मांसपेशी कोशिकाओं आदि जैसी विशिष्ट कोशिकाओं में विभेदन कर सकती हैं।

भारत में स्टेम सेल थेरेपी की नियामक स्थिति

  • स्टेम सेल अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय दिशा-निर्देश, 2017
    • जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किए गए।
    • हेमेटोलॉजिकल विकारों के लिए हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल प्रत्यारोपण (HSCT) को के लावा, स्टेम सेल थेरेपी के लिए कोई स्वीकृत संकेत नहीं हैं।
    • अन्य सभी स्टेम सेल थेरेपी को अन्वेषणात्मक (Investigational) के रूप में वर्गीकृत किया गया है और इन्हें केवल आवश्यक नियामक अनुमोदन प्राप्त करने के बाद नैदानिक परीक्षणों के रूप में ही किया जा सकता है।
    • स्वीकृत नैदानिक परीक्षणों के बाहर स्टेम सेल का उपयोग अनैतिक और अवैध माना जाता है।

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) क्या है?

  • स्थिति की प्रकृति: ASD एक न्यूरो-विकासात्मक विकार है, जो व्यक्ति के संप्रेषण, व्यवहार और सामाजिक अंतःक्रिया को प्रभावित करता है।
  • स्पेक्ट्रम स्वरूप: ऑटिज्म एक स्पेक्ट्रम पर विद्यमान होता है, अर्थात् इसके लक्षण और उनकी तीव्रता व्यक्तियों में व्यापक रूप से भिन्न होती है।
    • ASD से ग्रस्त व्यक्तियों में बौद्धिक क्षमता अत्यधिक हानि से लेकर औसत से अधिक या असाधारण क्षमताओं तक हो सकती है।
  • कारण: ASD के सटीक कारण पूर्णतः ज्ञात नहीं हैं, किंतु अनुसंधान से संकेत मिलता है कि आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारकों का संयोजन इसकी संभावना को बढ़ाता है।
  • प्रारंभिक लक्षण और संकेत
    • आरंभ की आयु: अधिकांश बच्चों में तीन वर्ष की आयु से पूर्व ऑटिज्म के संकेत दिखाई देने लगते हैं।
    • संप्रेषण संकेतक: वाणी या भाषा विकास में विलंब, सीमित नेत्र संपर्क और चेहरे के भावों में कमी।
    • सामाजिक अंतःक्रिया में कठिनाई: सामाजिक संकेतों को समझने और दूसरों की भावनाओं को पहचानने में कठिनाई।
    • व्यवहार पैटर्न: दोहरावपूर्ण व्यवहार और दिनचर्या के प्रति अत्यधिक लगाव सामान्य है।
    • संवेदी संवेदनशीलता: कुछ ध्वनियाँ, प्रकाश या वातावरण तीव्र प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर सकते हैं।
    • शैक्षिक चुनौतियाँ: विद्यालयी वातावरण के अनुरूप ढलने में कठिनाई देखी जा सकती है।
  • उपचार और प्रबंधन
    • ऑटिज्म का कोई स्थायी उपचार नहीं है; तथापि, प्रारंभिक और साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेपों के माध्यम से इसके लक्षणों का प्रभावी प्रबंधन किया जा सकता है।
    • वाक्-चिकित्सा: संप्रेषण और भाषा कौशल में सुधार पर केंद्रित।
    • व्यावसायिक चिकित्सा: कौशल और दैनिक जीवन की क्षमताओं के विकास में सहायक।
    • व्यवहारिक चिकित्सा: सामाजिक अंतःक्रिया, व्यवहार नियंत्रण और आत्मनिर्भरता में सुधार का लक्ष्य।
  • वैश्विक और राष्ट्रीय पहलें
    • वैश्विक ढाँचा: विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD) और सतत् विकास लक्ष्य (SDGs) ऑटिज्म सहित दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों, समावेशन और गरिमा का समर्थन करते हैं।
    • विश्व स्वास्थ्य संगठन (2014): “ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के प्रबंधन के लिए व्यापक और समन्वित प्रयास” शीर्षक से एक प्रस्ताव अपनाया गया, जिसे 60 से अधिक देशों का समर्थन प्राप्त था।
    • संयुक्त राष्ट्र महासभा: जागरूकता, स्वीकृति और समावेशन को बढ़ावा देने के लिए 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस घोषित किया गया।
    • भारत: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ने मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं की सूची को 7 से बढ़ाकर 21 किया और उसमें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है।

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