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भारत की बजट यात्रा: विकास के 75 वर्ष

Lokesh Pal February 02, 2026 05:00 8 0

संदर्भ:

2026-27 का केंद्रीय बजट भारत की आर्थिक यात्रा में एक विशेष उपलब्धि है, जो कर्तव्य-आधारित दर्शन और विनिर्माण में रणनीतिक आत्मनिर्भरता की ओर परिवर्तन का प्रतीक है।

बजट अवलोकन और ऐतिहासिक संदर्भ:

  • बजटीय विस्तार की पृष्ठभूमि: 2026 का बजट महत्त्वपूर्ण विकास की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया गया था।
    • 1947 में, आर. के. शनमुखम चेट्टी द्वारा प्रस्तुत भारत का पहला बजट केवल ₹197 करोड़ का था। 2026-27 का बजट बढ़कर ₹53.5 लाख करोड़ का हो गया है, जो 75 वर्षों में 27,000 गुना वृद्धि को दर्शाता है।
  • वित्तीय नेतृत्व में निरंतरता: विशेष रूप से, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लगातार 9वाँ बजट पेश करके एक रिकॉर्ड बनाया।

  • कर्तव्य भवन में प्रशासनिक बदलाव: यह कर्तव्य भवन, वित्त मंत्रालय के नए भवन में तैयार किया गया पहला बजट भी है, जिसका उद्घाटन 2025 में हुआ था।
  • मूल दर्शन: बजट का मूल दर्शन तीन ‘कर्तव्यों’ (Duties) के इर्द-गिर्द बनाया गया है:
    • पहला कर्तव्य (कर्तव्य 1): आर्थिक विकास और उत्पादकता वृद्धि।
    • दूसरा कर्तव्य (कर्तव्य 2): नागरिकों की आकांक्षाओं को पूर्ण करना (मध्यम वर्ग के आवास/कारें और गरीबों की बुनियादी आवश्यकताएँ)।
    • तीसरा कर्तव्य (कर्तव्य 3): समावेशी विकास (सबका साथ सबका विकास), यह सुनिश्चित करना कि विकास प्रत्येक परिवार, समुदाय और क्षेत्र तक पहुँचे।

बजटी संबंधी प्रमुख अवधारणाएँ:

  • बजट अनुमान (BE) बनाम संशोधित अनुमान (RE): BE आगामी वित्तीय वर्ष (जैसे, अप्रैल 2026-मार्च 2027) के लिए सरकार की अनुमानित वित्तीय योजना का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि RE वास्तविक राजस्व तथा व्यय प्रवृत्तियों के आलोक में विगत वर्ष के अनुमानों में किए गए वास्तविकता-आधारित समायोजन को दर्शाता है।
  • राजस्व प्राप्तियाँ (Revenue Receipts): ये सरकार की वे आय हैं, जो पुनर्भुगतान देनदारियाँ सृजित नहीं करती हैं, जिसमें कर राजस्व (जैसे- GST और आयकर) और गैर-कर राजस्व (PSU लाभांश, उपयोगकर्ता शुल्क, फीस और दंड सहित) शामिल हैं।

  • पूँजीगत प्राप्तियाँ (Capital Receipts): इनमें वे अंतर्वाह शामिल हैं, जो या तो देनदारियाँ/देयता सृजित करते हैं या परिसंपत्तियों को कम करते हैं, जैसे- उधार, विनिवेश प्राप्तियाँ, और पूर्व दिए गए ऋणों की प्राप्ति।
  • पूँजीगत व्यय (Capex): Capex से तात्पर्य उस व्यय से है, जिसके परिणामस्वरूप सड़कों, रेलवे और अस्पतालों जैसी उत्पादक परिसंपत्तियों का निर्माण होता है, और इसका एक सुदृढ़ गुणक प्रभाव (multiplier effect) होता है, जहाँ सार्वजनिक निवेश का ₹1 आर्थिक उत्पादन में ₹3 तक उत्पन्न कर सकता है।
  • राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit): राजकोषीय घाटा कुल सरकारी व्यय और गैर-ऋण प्राप्तियों के बीच का अंतर है, जिसे उधार के माध्यम से वित्तपोषित किया जाता है। 2026-27 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य GDP का 4.3% है।
  • राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003:
    • 1990 के दशक का राजकोषीय तनाव: उच्च राजकोषीय घाटे और 1991 के भुगतान संतुलन संकट ने भारत की संवेदनशीलता और राजकोषीय अनुशासन की अनुपस्थिति को उजागर किया।
    • FRBM अधिनियम, 2003: 3% राजकोषीय घाटे, 40% ऋण-जीडीपी अनुपात को लक्षित करने तथा राजस्व घाटे को समाप्त करके राजकोषीय विवेक को संस्थागत बनाने के लिए लागू किया गया।
    • GFC-पूर्व समेकन (2007–08): एक सफल राजकोषीय सुधार ने वैश्विक वित्तीय संकट के चलते घाटे को 2.7% तक कम कर दिया था।
    • COVID-19 प्रभाव (2020–21): असाधारण महामारी व्यय के कारण राजकोषीय घाटा ऐतिहासिक रूप से बढ़कर 9.2% हो गया, जिसने अस्थायी रूप से FRBM सीमाओं को दरकिनार कर दिया।
  • एन. के. सिंह समिति (2016):
    • राजकोषीय घाटा लक्ष्य: मध्यम अवधि की व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए 2023 तक राजकोषीय घाटे को GDP के 2.5% तक कम करने की सिफारिश की गई।
    • ऋण-जीडीपी अनुपात फ्रेमवर्क: नियम-आधारित प्रणाली के भीतर ऋण स्थिरता को बनाए रखने के लिए केंद्र के लिए 40% और राज्यों के लिए 20% की सीमा प्रस्तावित की गई।
    • एस्केप क्लॉज: राष्ट्रीय सुरक्षा खतरों या गंभीर आर्थिक झटकों जैसी असाधारण परिस्थितियों के दौरान GDP के 0.5% तक के अस्थायी विचलन की अनुमति दी गई।

कोविड पश्चात किए गए राजकोषीय सुधार:

  • राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 21 (कोविड-19 समय) में 9.2% से लगातार घटकर वित्त वर्ष 22 में 6.7%, वित्त वर्ष 23 में 6.4% और वित्त वर्ष 24 में 5.6% पर आ गया, जिसमें वित्त वर्ष 25 (4.8% लक्ष्य), वित्त वर्ष 26 (4.4% RE) तथा वित्त वर्ष 27 (4.3% BE) में और अधिक सुधार का अनुमान है, जिसका लक्ष्य वित्त वर्ष 2027–28 तक 3.5% एवं अंततः 3% के FRBM लक्ष्य तक पहुँचना है।

ऋण-जीडीपी अनुपात और सरकारी उधार:

  • ऋण-जीडीपी अनुपात: वित्त वर्ष 26–27: 55.6%; वित्त वर्ष 25–26: 56.1%; FRBM लक्ष्य: 40%
  • बाजार उधार: सकल: ₹17.2 लाख करोड़; शुद्ध (कुल): ₹11.7 लाख करोड़ (सकल – ऋण पुनर्भुगतान = शुद्ध/निवल)।
  • सरकारी उधार क्यों आवश्यक है: निजी क्षेत्र के ऋण पर क्राउडिंग-आउट प्रभाव; ब्याज दरों पर ऊपर की ओर दबाव; आने वाली पीढ़ियों पर भविष्य संबंधी बोझ।

युवा शक्ति-चालित बजट: सरकार का ‘संकल्प’ (Sankalp)

  • पहला कर्तव्य: उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि कर तथा अस्थिर वैश्विक गतिशीलता के प्रति लचीलापन अपनाकर आर्थिक विकास को गति देना एवं उसे बनाए रखना।
  • दूसरा कर्तव्य: क्षमता निर्माण और उन्हें भारत की समृद्धि के पथ पर मजबूत भागीदार बनाकर, भारतीयों की आकांक्षाओं को पूर्ण करना।
  • तीसरा कर्तव्य: सबका साथ, सबका विकास का लक्ष्य – प्रत्येक परिवार, समुदाय, क्षेत्र और लोगों के लिए संसाधनों, सुविधाओं एवं अवसरों तक पहुँच सुनिश्चित करना।
  • सहायक स्तंभ: एक निरंतर, अनुकूलन योग्य और भविष्योन्मुखी दृष्टिकोण; एक मजबूत और लचीला वित्तीय क्षेत्र; संरचनात्मक सुधारों की गति को बनाए रखना; बचत वृद्धि और कुशल पूँजी आवंटन; एआई अनुप्रयोगों सहित अत्याधुनिक तकनीकें; और बेहतर शासन के लिए बल गुणक।

पहला कर्तव्य (कर्तव्य 1): 7 विनिर्माण क्षेत्रों पर रणनीतिक ध्यान

  • बायो-फार्मा शक्ति (Bio-Pharma Shakti): पारंपरिक रासायनिक दवाओं के विपरीत, बायो-फार्मा दवाएँ जीवित जीवों (जैसे- इंसुलिन, कैंसर की दवाएँ, जीन थेरेपी) से प्राप्त होती हैं।
    • लक्ष्य: भारत की वैश्विक बाजार हिस्सेदारी को वर्तमान 2-3% से बढ़ाना।
    • कार्रवाई: 7 मौजूदा NIPER (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च) को अपग्रेड करना तथा 3 नए संस्थानों की स्थापना।
    • शक्ति प्रभाव: 1,000+ क्लिनिकल ट्रायल साइटों तक विस्तार वैश्विक फार्मा को आकर्षित करता है, तेजी से दवा अनुमोदन सक्षम बनाता है, तथा मरीजों को शीघ्र पहुँच प्रदान करता है और आयात निर्भरता कम करता है।
    • वर्तमान चुनौतियाँ: उच्च अनुसंधान एवं विकास (R&D) लागत ($1-2 बिलियन प्रति दवा), कुशल कार्यबल की कमी, कमजोर क्लिनिकल ट्रायल बुनियादी ढाँचा और जटिल विनियामक प्रक्रियाएँ।
    • कोविड-19: mRNA टीके (फाइजर, मॉडर्ना) बायोफार्मा उत्पाद थे। भारत शुरू में उनका उत्पादन नहीं कर सका। कोवैक्सिन और कोविशील्ड ने पारंपरिक प्लेटफॉर्म का उपयोग किया। बायोफार्मा क्षमता के साथ, अधिक तीव्र प्रतिक्रिया संभव हो सकती थी।
    • नीतिगत प्रासंगिकता: मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, PLI फार्मा के साथ संरेखण, चीन पर API निर्भरता में कमी तथा राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन।
  • सेमीकंडक्टर मिशन 2.0: सेमीकंडक्टर आधुनिक तकनीक के आधार स्तंभ हैं, जिन पर वर्तमान में ताइवान और दक्षिण कोरिया का प्रभुत्व है।
    • मिशन 1.0 के परिणाम: ₹1.6 लाख करोड़ के निवेश के साथ 10 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिसमें गुजरात में टाटा और माइक्रोन के प्लांट शामिल हैं।
    • मिशन 2.0 का फोकस: उन्नत क्षमताओं की ओर बढ़ना, जैसे- भारत के भीतर विनिर्माण उपकरण/मशीनरी का उत्पादन तथा डिजाइन पेटेंट सुरक्षित करना।
    • इलेक्ट्रॉनिक्स: PCB और प्रतिरोधकों जैसे घटकों के लिए ₹400 करोड़ आवंटित।
  • दुर्लभ पृथ्वी गलियारे (Rare Earth Corridors): दुर्लभ पृथ्वी तत्त्व (17 तत्व, जिनमें स्कैंडियम शामिल है) EV, पवन टरबाइन और मिसाइलों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। चीन वर्तमान में वैश्विक प्रसंस्करण के 90% भाग को नियंत्रित करता है।
    • गलियारा: खनन से लेकर विनिर्माण तक पूरी मूल्य श्रृंखला (value chain) को प्रबंधित करने के लिए ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में स्थापित।
    • लक्ष्य: वार्षिक रूप से 6,000 मीट्रिक टन स्थायी चुम्बकों का उत्पादन करना।
  • चैलेंज रूट के माध्यम से केमिकल पार्क: भारत छठा सबसे बड़ा रसायन उत्पादक राष्ट्र है, लेकिन वैश्विक बाजार में इसकी हिस्सेदारी केवल 3-4% है।
    • नवाचार: तीन समर्पित केमिकल पार्क ‘चैलेंज रूट’ के माध्यम से निर्मित किए जाएँगे, जहाँ राज्य सर्वोत्तम बुनियादी ढाँचे की पेशकश करके वित्तपोषण के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगे।
    • प्लग-एंड-प्ले मॉडल: राज्य तैयार बुनियादी ढाँचा (भूमि, बिजली, पानी और मंजूरी) प्रदान करते हैं, जिससे कंपनियाँ शीघ्र उत्पादन शुरू कर सकें और निर्माण अवधि 5 वर्षो से घटकर 1 से 2 वर्ष रह जाए।
    • चैलेंज रूट मॉडल: प्रस्ताव की गुणवत्ता के साथ फंडिंग को जोड़कर प्रतिस्पर्धी संघवाद को बढ़ावा देता है, जैसा कि नीति आयोग ने सिफारिश की है।
    • वैश्विक मानक: सफल रासायनिक समूहों में जर्मनी का केमिकल ट्रायंगल, चीन का जियांग्सू केमिकल पार्क, सिंगापुर का जुरोंग द्वीप और भारत का दहेज PCPIR शामिल हैं।
  • पूँजीगत वस्तुएँ और कंटेनर: पूँजीगत वस्तुएँ वे मशीनें हैं जो अन्य वस्तुओं का उत्पादन करती हैं; भारत की उच्च आयात निर्भरता विनिर्माण निरंतरता के लिए एक रणनीतिक जोखिम है।
    • हाई-टेक टूल रूम: दो CPSE-नेतृत्व वाली सुविधाएँ CNC और 3D प्रिंटिंग का उपयोग करके सटीक घटकों, डाई और मोल्ड का निर्माण करेंगी, जिससे जर्मनी और जापान से आयात पर निर्भरता कम होगी।
    • CIE योजना: निर्माण और बुनियादी ढाँचा उपकरणों (जैसे बुलडोजर और एक्सकेवेटर) के स्वदेशीकरण पर ध्यान केंद्रित करती है, जिनमें से 70% से अधिक वर्तमान में आयात किए जाते हैं, जो PM गति शक्ति का समर्थन करते हैं।
    • कंटेनर विनिर्माण: चीन के 96% वैश्विक प्रभुत्व पर निर्भरता कम करने, रसद लागत कम करने और आपूर्ति-श्रृंखला लचीलेपन को मजबूत करने के लिए पांच वर्षों में ₹10,000 करोड़ आवंटित।
    • समग्र लाभ: कम रसद लागत, रणनीतिक स्वायत्तता, रोजगार सृजन, इस्पात की माँग में वृद्धि, और PM गति शक्ति और राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचा पाइपलाइन (NIP) को समर्थन।
  • वस्त्र क्षेत्र का विस्तार: वस्त्र उद्योग कृषि के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है, जो 10 करोड़ से अधिक आजीविका का समर्थन करता है।
    • नेशनल फाइबर स्कीम: मानव निर्मित फाइबर को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करती है, जिसकी अब वैश्विक कपड़ा बाजार में लगभग 60% हिस्सेदारी है।
    • वैश्विक विरोधाभास: 5वाँ सबसे बड़ा वस्त्र निर्यातक होने के बावजूद, वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी केवल 4% है, जो चीन (35%+) और बांग्लादेश (7%) से बहुत पीछे है।
    • बजट-2026 की प्रतिक्रिया: प्रतिस्पर्धात्मकता और रोजगार बढ़ाने के लिए 4 पहलों — नेशनल फाइबर स्कीम, टेक्सटाइल एक्सपेंशन स्कीम, मेगा टेक्सटाइल पार्क और ग्राम स्वराज पहल— के माध्यम से एक व्यापक टेक्सटाइल विकास।
    • चैलेंज मोड में मेगा टेक्सटाइल पार्क (PM MITRA): तकनीकी वस्त्रों के विकास के साथ चैलेंज मोड के माध्यम से विस्तार।
    • तकनीकी वस्त्र: प्रदर्शन-आधारित, गैर-फैशन वस्त्र उत्पाद, जिनका उपयोग बुनियादी ढाँचे (जियोटेक), कृषि (एग्रोटेक), स्वास्थ्य सेवा (मेडीटेक) और रक्षा (प्रोटेक) में किया जाता है।
    • बाजार क्षमता: भारतीय तकनीकी वस्त्र बाजार को 2030 तक ₹2 लाख करोड़ से बढ़ाकर ₹3 लाख करोड़ करने का लक्ष्य है।
  • महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल:
    • उद्देश्य: भारत की सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करते हुए पूरे भारत में करोड़ों बुनकरों और शिल्पकारों का समर्थन करना; खादी, हथकरघा तथा हस्तशिल्प को मजबूत करना।
    • कारण: ऐतिहासिक हथकरघा और हस्तशिल्प उत्पादों की मजबूत वैश्विक माँग है, लेकिन आधुनिक बाजार तक पर्याप्त पहुँच में कमी है।
    • GI-टैग वाले उत्पाद (प्रीमियम क्षमता): पश्मीना (कश्मीर), चंदेरी (MP), पोचमपल्ली (तेलंगाना), बनारसी (UP), कांजीवरम (TN)।
    • रणनीति: अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए भारतीय हथकरघा की ब्रांडिंग तथा कारीगरों को डिजिटल और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के साथ जोड़ना।
    • पहल का लक्ष्य: वैश्विक बाजार लिंक, इंडिया हैंडलूम ब्रांडिंग, आधुनिक डिजाइन संवेदनाओं को पारंपरिक कौशल के साथ मिलाने वाला प्रशिक्षण, और ई-कॉमर्स के माध्यम से सीधे उपभोक्ता को बिक्री।

भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा:

  • प्रारंभिक प्रयास (1980 के दशक): पुरानी तकनीक और निरंतर निवेश की कमी के कारण SCL मोहाली की पहल विफल रही।
  • नीतिगत सुधार (ISM 1.0, 2021): फैब, OSAT और चिप डिजाइन पारितंत्र के लिए ₹76,000 करोड़ आवंटित।
  • पारितंत्र विस्तार (ISM 2.0, 2026): उन्नत क्षमताओं, फुल-स्टैक सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र और ₹40,000 करोड़ की घटक योजना पर बल।
  • ISM 1.0 की उपलब्धियाँ (2026 तक):
    • टाटा-PSMC फैब, धोलेरा (गुजरात): $10 बिलियन का निवेश; परीक्षण उत्पादन फरवरी 2026 के लिए निर्धारित।
    • माइक्रोन ATMP, साणंद (गुजरात): $2.75 बिलियन का निवेश; वाणिज्यिक उत्पादन फरवरी 2026 तक अपेक्षित।
    • CG पावर–रेनेसास (गुजरात): पावर सेमीकंडक्टर बनाने पर केंद्रित सुविधा।
  • 2026 तक परिणाम: ₹1.6 लाख करोड़ से अधिक के निवेश के साथ 10 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई।

ISM (भारत सेमीकंडक्टर मिशन) 2.0 – प्रमुख नई विशेषताएँ

  • उपकरण और सामग्री: आयात पर निर्भरता कम करने के लिए लिथोग्राफी मशीनों सहित फैब उपकरणों के घरेलू विनिर्माण पर ध्यान केंद्रित करना।
  • फुल-स्टैक भारतीय IP: अनुबंध विनिर्माण से आगे बढ़कर स्वदेशी चिप डिजाइन और बौद्धिक संपदा के स्वामित्व को बढ़ावा देना।
  • आपूर्ति श्रृंखला विकास: लचीलापन सुनिश्चित करने के लिए सेमीकंडक्टर फैब के लिए आवश्यक महत्त्वपूर्ण रसायनों, गैसों और सामग्रियों की स्थानीय सोर्सिंग।
  • अनुसंधान और प्रशिक्षण: कुशल जनशक्ति बनाने के लिए मजबूत उद्योग-अकादमिक सहयोग के साथ IIT और NIT में सेमीकंडक्टर पाठ्यक्रम शुरू करना।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना: चिप्स से परे व्यापक इलेक्ट्रॉनिक्स पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए PCB, कैपेसिटर और प्रतिरोधकों के लिए ₹40,000 करोड़ का आवंटन।

दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (REE) के बारे में:

  • दुर्लभ पृथ्वी तत्व (REEs): 17 तत्वों का एक समूह, जिसमें स्कैंडियम, येट्रियम और 15 लैंथेनाइड्स शामिल हैं; भूगर्भीय रूप से सामान्य हैं लेकिन आर्थिक रूप से व्यवहार्य सांद्रता में कम ही पाए जाते हैं।
  • रणनीतिक अनुप्रयोग: स्थायी चुम्बकों (EV, पवन टरबाइन), बैटरी (हाइब्रिड वाहन), स्क्रीन (इलेक्ट्रॉनिक्स) और रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए आवश्यक।
  • समकालीन प्रासंगिकता: हरित ऊर्जा संक्रमण और आधुनिक तकनीक दुर्लभ पृथ्वी तत्वों पर गंभीर रूप से निर्भर हैं।

चीन की समस्या: महत्त्वपूर्ण एकाधिकार

  • चीन का प्रभुत्व: वैश्विक REE खनन के 60-70% और वैश्विक प्रसंस्करण के 90% से अधिक को नियंत्रित करता है, जिससे मूल्य श्रृंखला में लगभग एकाधिकार बन जाता है।
  • भू-राजनीतिक लाभ: 2010 (चीन-जापान विवाद) में निर्यात रोक ने जापान के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को बाधित कर दिया था, और 2019 के अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के दौरान, निर्यात की धमकियों ने अमेरिकी सेमीकंडक्टर क्षेत्र में चिंता उत्पन्न कर दी थी।
  • रणनीतिक जोखिम: एक ही देश पर भारी निर्भरता आपूर्ति श्रृंखलाओं को भू-राजनीतिक दबाव के उपकरण में बदल देती है।
  • भारत की स्थिति: भारत के पास 7.23 मिलियन टन REO भंडार (वैश्विक स्तर पर छठा सबसे बड़ा) है, जो ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के तटों के साथ मोनाजाइट रेत में केंद्रित है।

भारत की REE चुनौतियाँ और बजट समाधान:

  • वर्तमान चुनौतियाँ: भारत कच्चे REE अयस्कों का निर्यात करता है, प्रसंस्करण क्षमता की कमी है, 85-90% दुर्लभ-पृथ्वी चुम्बकों का आयात करता है, और न्यूनतम घरेलू मूल्यवर्धन कर पाता है।
  • बजट-2026 हस्तक्षेप: खनन से विनिर्माण तक एंड-टू-एंड मूल्य श्रृंखला स्थापित करने के लिए ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में दुर्लभ पृथ्वी गलियारों का निर्माण।
  • सहायक उपाय: ₹7,280 करोड़ की स्थायी चुम्बक योजना और ओडिशा में OSCOM जैसी सुविधाओं के माध्यम से IREL (इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड) की विस्तारित भूमिका।
  • रणनीतिक महत्त्व: EV, पवन ऊर्जा और रक्षा प्लेटफार्मों के लिए महत्त्वपूर्ण इनपुट REE को रणनीतिक खनिजों के रूप में रेखांकित करते हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1. केंद्रीय बजट 2026-27 तीन ‘कर्तव्यों’ को स्पष्ट करता है—आर्थिक विकास को गति देना, क्षमता निर्माण के माध्यम से लोगों की आकांक्षाओं को पूर्ण करना, तथा संसाधनों तक समान पहुँच सुनिश्चित करना। समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए, कि ये तीन कर्तव्य भारत के बजटीय दृष्टिकोण में विकास-केंद्रितता से समावेशी और लचीले आर्थिक विकास की ओर परिवर्तन को किस प्रकार दर्शाते हैं। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न 2. केंद्रीय बजट 2026 ने वित्त वर्ष 27 के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को घटाकर 4.3% कर दिया है। वैश्विक अनिश्चितता और घरेलू विकासात्मक आवश्यकताओं के संदर्भ में, भारत में व्यापक आर्थिक स्थिरता और सतत विकास सुनिश्चित करने में राजकोषीय घाटा प्रबंधन के महत्त्व का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न 3. केंद्रीय बजट 2026-27 सात रणनीतिक क्षेत्रों में विनिर्माण को बढ़ाने का प्रस्ताव करता है। परीक्षण कीजिए, कि यह रणनीति आयात निर्भरता को कम करने तथा भारत के औद्योगिक आधार को मजबूत करने का प्रयास कैसे करती है, एवं वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्राप्त करने में प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

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