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‘रैट-होल माइनिंग’ संबंधी दुर्घटना

Lokesh Pal February 07, 2026 03:29 6 0

संदर्भ

हाल ही में मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले में अवैध रूप से संचालित एक रैट-होल’ कोयला खदान में हुए विस्फोट में 18 खनिकों की मृत्यु हो गई, जिससे खनन नियमन में लगातार बनी हुई विफलताएँ उजागर हुईं।

दुर्घटना की प्रमुख विशेषताएँ

  • यह विस्फोट प्रतिबंधित रैट-होल’ खदान में हुआ, जो वन क्षेत्र में अवैध रूप से संचालित की जा रही थी। पीड़ितों को जलने के कारण गंभीर चोटें आईं तथा जहरीली गैस के कारण दम घुटने की स्थिति उत्पन्न हुई।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल, राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल तथा राज्य के बचाव दलों को तैनात किया गया। दोषियों के विरुद्ध खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
  • यह त्रासदी पूर्व में हुई घातक घटनाओं की याद दिलाती है, जबकि वर्ष 2014 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा ‘रैट-होल माइनिंग’ पर प्रतिबंध लगाया गया था और वर्ष 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रतिबंध की पुष्टि भी की थी।

रैट-होल माइनिंग’ क्या है?

  • रैट-होल माइनिंग’ कोयला निष्कर्षण की एक प्राचीन और श्रम-प्रधान पद्धति है, जिसमें अत्यंत संकीर्ण क्षैतिज या ऊर्ध्वाधर सुरंगें निर्मित की जाती हैं। ये सुरंगें प्रायः केवल 3–4 फीट ऊँची होती हैं, जहाँ श्रमिक अत्यंत सीमित स्थान में रेंगते हुए कोयले का निष्कर्षण करते हैं।
  • रैट-होल माइनिंग’ की प्रक्रिया
    • स्थल की पहचान: छोटे समूह सीमित भू-वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर कोयला-युक्त पर्वतीय ढलानों की पहचान करते हैं, जहाँ प्रायः अस्थिर और अत्यधिक जोखिमपूर्ण स्थान चुने जाते हैं।
    • सुरंग की खुदाई: अत्यंत संकीर्ण ऊर्ध्वाधर या क्षैतिज सुरंगें हाथ से खोदी जाती हैं, जिनकी चौड़ाई लगभग 3–4 फीट होती है। यह कार्य साधारण औजारों के माध्यम से किया जाता है और किसी भी प्रकार का संरचनात्मक सहारा नहीं प्राप्त होता।
    • हाथ से कोयला निष्कर्षण: खनिक संकीर्ण भूमिगत सुरंगों में रेंगते हुए कोयले का उत्खनन करते हैं तथा उसे इन मार्गों से हाथों द्वारा बाहर तक पहुँचाते हैं।
  • पर्यावरणीय प्रभाव
    • वनों की कटाई और मृदा अपरदन: वनस्पतियाँ समाप्त होने से पहाड़ी ढलान अस्थिर हो जाते हैं, जिससे भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ती हैं और नदियों में अपशिष्ट का निक्षेप होता है।
    • जल एवं मृदा प्रदूषण: खदानों से निकलने वाला अम्लीय जल सतही और भूजल को प्रदूषित करता है, मृदा की उर्वरता घटती है तथा कृषि को नुकसान पहुँचाता है।
    • जैव विविधता का ह्रास: पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में खनन से प्राकृतिक आवास नष्ट होते हैं और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र बाधित होता है।
  • सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ
    • घातक कार्य परिस्थितियाँ: बिना संरचनात्मक सहारे की संकीर्ण सुरंगें धंसने तथा जलभराव के गंभीर जोखिम से युक्त होती हैं। साथ ही, अपर्याप्त वेंटिलेशन के परिणामस्वरूप विषैली गैसों का संचय एवं ऑक्सीजन स्तर में कमी उत्पन्न होती है, जिससे श्वासावरोध के कारण मृत्यु की घटनाएँ बार-बार घटित होती हैं।
      • वर्ष 2018 में पूर्वी जयंतिया हिल्स की एक अवैध खदान में 15 खनिकों की डूबकर मृत्यु हुई। इसी प्रकार वर्ष 2021 और 2025 में भी ऐसी घटनाएँ सामने आईं, जब पास की नदियों या भूमिगत जलस्रोतों का जल सुरंगों में भर गया।
    • व्यावसायिक रोग: कोयले की धूल के लंबे समय तक संपर्क में रहने से श्वसन संबंधी बीमारियाँ होती हैं, जैसे- न्यूमोकोनियोसिस (ब्लैक लंग रोग)
    • समुदाय के स्वास्थ्य पर प्रभाव: प्रदूषित वायु और जल आस-पास की आबादी को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं, जिससे रोगों का भार बढ़ता है।
  • सामाजिक प्रभाव
    • श्रम शोषण: इस प्रथा में अत्यंत कम पारिश्रमिक पर कार्य करने वाले श्रमिकों पर निर्भरता होती है और कई मामलों में बाल श्रम का भी उपयोग किया जाता है।
    • आजीविका की असुरक्षा: पर्यावरणीय क्षरण कृषि और पारंपरिक आजीविकाओं को कमजोर करता है, जिससे स्थानीय समुदाय गरीबी के दुष्चक्र में फँस जाते हैं।
  • कानूनी स्थिति: बार-बार होने वाली घातक घटनाओं के कारण रैट-होल माइनिंग’ पर वर्ष 2014 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया।
    • वर्ष 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रतिबंध की पुष्टि की और इसे खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत अवैध घोषित किया।
  • भारत में वर्तमान स्थिति
    • रैट-होल माइनिंग’ की घटनाएँ मुख्यतः मेघालय में देखी जाती हैं, विशेषकर पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले में।
    • प्रतिबंध के बावजूद असम के डिमा हसाओ जिले के कुछ क्षेत्रों में भी इसकी गतिविधियाँ देखी गई हैं।

बार-बार दुर्घटनाएँ होने के कारण

  • कमजोर प्रवर्तन और प्रशासनिक खामियाँ: अस्पष्ट भूमि स्वामित्व और सीमित राज्य निगरानी के कारण अवैध खदानें बिना रोक-टोक के संचालित होती हैं।
  • आर्थिक कठिनाइयाँ और कोयले की माँग: गरीबी, वैकल्पिक आजीविका का अभाव और निरंतर कोयले की माँग असुरक्षित खनन प्रथाओं को जारी रखने में योगदान देती है।
  • सुरक्षा मानकों का अभाव: असुरक्षित सुरंगें, खराब वेंटिलेशन और विस्फोटकों का अनियंत्रित उपयोग सुरंगों के धँसने और दम घुटने की घटनाओं को बार-बार उत्पन्न करता है।

बार-बार होने वाली रैट-होल माइनिंग’ त्रासदियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि जीवन और पर्यावरण की रक्षा के लिए सख्त प्रवर्तन, वैकल्पिक आजीविका के अवसर और पारिस्थितिकी जवाबदेही की त्वरित आवश्यकता है।

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