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‘हॉप-ऑन, हॉप-ऑफ’ — जलवायु शासन की वर्तमान स्थिति

Lokesh Pal February 07, 2026 05:15 21 0

संदर्भ:

तीन दशकों के बाद भी, वैश्विक जलवायु शासन केवल प्रक्रियागत सहमति तक सीमित है और प्रवर्तनीय कार्रवाई में फंस गया है; COP-30 ने जलवायु महत्वाकांक्षा और राजनीतिक क्रियान्वयन के बीच बढ़ती खाई को उजागर किया।

वैश्विक जलवायु शासन की संरचनात्मक विफलताएँ

  • सहमति का जाल: UNFCCC के तहत सहमति-आधारित निर्णय प्रक्रिया किसी भी एक पक्ष को प्रभावी वीटो शक्ति प्रदान करती है, जिससे महत्वाकांक्षा कमजोर पड़ जाती है। 193 में से यदि एक भी पक्ष असहमत हो, तो समझौता नहीं हो पाता।
  • वाक्-प्रचार बनाम वास्तविकता: समझौतों और घोषणापत्रों में महत्वाकांक्षी प्रस्तावनाएँ और लक्ष्य तो होते हैं, पर ज़मीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई का अभाव दिखता है।
  • राष्ट्रीय हित की प्राथमिकता: राज्य सामूहिक जलवायु कार्रवाई की तुलना में घरेलू आर्थिक और राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देते हैं।

आर्थिक और सामाजिक बाधाएँ

  • कॉरपोरेट प्रभाव: नियामक अनिश्चितता से कंपनियों को लाभ होता है और वे अल्पकालिक मुनाफ़ा बनाए रखने के लिए कड़े जलवायु मानकों के विरुद्ध लॉबी करती हैं।
  • सीमित जन-प्राथमिकता: नागरिक तत्काल आजीविका संबंधी चिंताओं को प्राथमिकता देते हैं और प्रायः आपदाओं के बाद ही जलवायु जोखिमों से जुड़ते हैं।
  • राजनीतिक प्रोत्साहन: कम चुनावी दबाव के कारण सरकारें दीर्घकालिक जलवायु सुधारों के बजाय अल्पकालिक कल्याणकारी उपायों को तरजीह देते हैं।

विज्ञान और राजनीति

  • नीति में देरी: “अधिक शोध की आवश्यकता” का आह्वान अक्सर कार्रवाई टालने के लिए किया जाता है।
  • विज्ञान बाधा नहीं है: जलवायु विज्ञान ने लंबे समय से कारण-परिणाम, जोखिम और प्रवृत्तियाँ स्थापित कर दी हैं। जो जारी है वह “अनिश्चितता की राजनीति” है, जहाँ वैज्ञानिक सूक्ष्मताओं का उपयोग निष्क्रियता को सही ठहराने के लिए किया जाता है।
  • बढ़ते जोखिम: वैश्विक तापमान के शुरुआती 2030 के दशक तक 1.5°C सीमा के करीब पहुँचने का अनुमान है।
  • उत्सर्जन में वृद्धि: UNEP उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट 2024 दर्शाती है कि उत्सर्जन घटने के बजाय लगातार बढ़ रहे हैं।

निष्क्रियता के स्तंभ

  • उपशमन: राज्यों से केवल उत्सर्जन घटाने का आग्रह किया जाता है, जबकि कोई प्रवर्तन तंत्र मौजूद नहीं है।
    • जीवाश्म ईंधन को “चरणबद्ध समाप्त” करने की भाषा अक्सर तेल उत्पादक देशों के दबाव में कमजोर कर दी जाती है।
  • जलवायु वित्त अंतर: विकासशील देशों को प्रति वर्ष 2.4–3 ट्रिलियन डॉलर की आवश्यकता है, जबकि वर्त्तमान प्रवाह लगभग 400 अरब डॉलर का है और इसकी कोई बाध्यकारी समय-सीमाएँ नहीं हैं।
  • अनुकूलन वित्त: हालाँकि नेता अनुकूलन वित्त को तीन गुना करने का वादा करते हैं, परंतु वे आधार वर्ष निर्धारित करने से इंकार करते हैं, जिससे यह प्रतिबद्धता अस्पष्ट और निगरानी के लिए कठिन हो जाती है।
  • हानि और क्षति: कोष कार्यशील तो है, लेकिन वास्तविक आवश्यकताओं की तुलना में इसकी पूंजी अत्यंत अपर्याप्त है।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: ढाँचे मौजूद हैं, लेकिन विकासशील देशों में वित्तपोषण और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन का अभाव है।
  • क्षमता निर्माण: विकसित देश आवश्यक कौशल और तकनीकी सहायता प्रदान करने में लगातार टालमटोल कर रहे हैं।
  • न्यायसंगत संक्रमण: आजीविका संरक्षण तंत्रों की अनुपस्थिति जीवाश्म-ईंधन-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के संक्रमण को बाधित करती है।

निष्कर्ष

समकालीन वैश्विक राजनीति यथार्थवाद से संचालित होता है, जिसमें राज्य सामूहिक कार्रवाई की तुलना में संकीर्ण स्वहित को प्राथमिकता देते हैं। साझा वैश्विक जिम्मेदारी की दिशा में बदलाव के अभाव में, जलवायु शासन अपरिवर्तनीय क्षति की ओर चला जाता है, जिसके बाद केवल पश्चाताप शेष रह जाएगा।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: UNFCCC के अंतर्गत दशकों की वार्त्ताओं के बावजूद वैश्विक उत्सर्जन लगातार बढ़ता जा रहा है और 1.5°C का लक्ष्य अधिकाधिक अप्राप्य होता जा रहा है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय जलवायु शासन संरचना की संरचनात्मक सीमाओं का विश्लेषण कीजिए तथा यह आकलन कीजिए कि सहमति-आधारित निर्णय प्रक्रिया ठोस जलवायु कार्रवाई को आगे बढ़ाने में क्यों विफल रही है।

(15 अंक, 250 शब्द)

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