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सोशल मीडिया प्रतिबंध – बच्चों को सुरक्षित करने में किस सीमा तक सहायक

Lokesh Pal February 09, 2026 05:15 7 0

संदर्भ:

गाजियाबाद में हाल ही में हुई एक घटना, जिसमें मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध के बाद तीन नाबालिग बहनों ने आत्महत्या कर ली, ने डिजिटल उपभोग से जुड़ी अत्यधिक मनोवैज्ञानिक निर्भरता को उजागर किया है।

सोशल मीडिया-प्रेरित हानि:

  • संघर्ष की प्रकृति: यह घटना गंभीर स्क्रीन एडिक्शन (लत) को दर्शाती है, जो सोशल मीडिया के माध्यम से सुलभ आभासी विदेशी मनोरंजन सामग्री (दक्षिण कोरियाई के-ड्रामा) द्वारा बढ़ गई थी, जिससे घरेलू संघर्ष उत्पन्न हुआ।
  • सार्वजनिक आक्रोश: इस त्रासदी ने एक राष्ट्रीय चर्चा प्रारंभ कर दी है, जिसमें कई लोग नाबालिगों को “डिजिटल संकट” के रूप में वर्णित सामग्री से बचाने के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की माँग कर रहे हैं।

बाल और किशोर मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव:

  • मनोवैज्ञानिक संकट: अनुभवजन्य शोध किशोरों में सोशल मीडिया के उपयोग को चिंता, अवसाद और आत्महानि की प्रवृत्तियों से जोड़ते हैं।
  • शारीरिक छवि और आत्म-मूल्य: इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म “हीन भावना” को बढ़ावा देते हैं, विशेष रूप से लड़कियों के बीच, जो अपनी तुलना ‘परफेक्ट’ लेकिन अक्सर अवास्तविक छवियों से करती हैं।
  • संकट की वैश्विक प्रकृति: यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय है, जिसमें कई सरकारें विनियामक हस्तक्षेपों की खोज कर रही हैं, जो एक स्थानीय विचलन की बजाय एक व्यापक शासन चुनौती का संकेत देता है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ और ‘नैतिक आतंक’ का जोखिम:

  • ऑस्ट्रेलिया का प्रतिबंध: 2024 में, ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के लोगों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून पारित किया, जिसमें आयु का सत्यापन करने में विफल रहने वाली कंपनियों पर $50 मिलियन तक का जुर्माना लगाया गया है।
  • स्पेन का दृष्टिकोण: स्पेन के प्रधानमंत्री ने बच्चों को “डिजिटल वाइल्ड वेस्ट” से बचाने की वकालत की है।
  • नैतिक आतंक (Moral Panic) का तर्क: जब समाज जटिल प्रणालीगत समस्याओं का समाधान करने में विफल रहता है, तो वे अक्सर एक उदाहरण चुनते हैं, जिससे नैतिक आतंक पैदा होता है और नीति निर्माता सरलीकृत समाधानों की ओर बढ़ते हैं।

नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध की सीमाएँ:

  • तकनीकी हेरफेर: तकनीक-प्रेमी नाबालिग वीपीएन (VPN) का उपयोग करके राष्ट्रीय प्रतिबंधों को दरकिनार कर सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय प्रतिबंध अप्रभावी हो जाते हैं।
  • जोखिम युक्त डिजिटल स्थानों की ओर झुकाव: निषेध बच्चों को अनियमित ऑनलाइन वातावरण की ओर धकेल सकता है, जिससे विकास, कट्टरपंथ और दुर्व्यवहार का जोखिम बढ़ जाता है।
  • निगरानी संबंधी चिंताएँ: अनिवार्य पहचान सत्यापन के माध्यम से आयु प्रतिबंध लागू करना गोपनीयता, डेटा दुरुपयोग और सामूहिक निगरानी के संबंध में गंभीर चिंताएँ उत्पन्न करता है।

प्रतिबंधात्मक नीतियों के लैंगिक और लोकतांत्रिक निहितार्थ:

  • डिजिटल लैंगिक अंतराल: इंटरनेट पहुँच में मौजूदा असमानताएँ और बढ़ सकती हैं, जिसमें प्रतिबंधात्मक मानदंड असंगत रूप से लड़कियों की डिजिटल स्वायत्तता को सीमित कर सकते हैं।
  • हाशिए पर पड़े समुदायों पर प्रभाव: सोशल मीडिया ग्रामीण युवाओं, यौन अल्पसंख्यकों और सामाजिक रूप से अलग-थलग समूहों के लिए अभिव्यक्ति, समर्थन तथा दृश्यता के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्थान के रूप में कार्य करता है।
  • नीति निर्माण में लोकतांत्रिक अभाव: नीति निर्माण प्रक्रियाओं से बच्चों और किशोरों को बाहर करना, एक ‘टॉप-डाउन’ शासन दृष्टिकोण को दर्शाता है जो वैधता एवं प्रभावशीलता को कमजोर करता है।

प्रतिबंध से परे प्रस्तावित समाधान:

  • आईटी अधिनियम, 2000 का लाभ उठाना: प्रतिबंधों की बजाय, सरकार को उन तकनीकी कंपनियों (जैसे- यूट्यूब, स्नैपचैट और इंस्टाग्राम) पर भारी जुर्माना लगाने के लिए मौजूदा कानूनों का उपयोग करना चाहिए, जो नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहती हैं।
  • स्वतंत्र विनियामक: मंत्रालय के नेतृत्व वाली निगरानी की तुलना में एक स्वतंत्र, विशेषज्ञ विनियामक बेहतर है, क्योंकि यह गति, विशेषज्ञता एवं जवाबदेही को सुनिश्चित करता है।
  • अनुदैर्ध्य शोध: भारत को यह समझने के लिए अपने स्वयं के दीर्घकालिक शोध को वित्तपोषित करने की आवश्यकता है, कि जाति, वर्ग और क्षेत्र सोशल मीडिया के प्रभाव को किस प्रकार आकार देते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि नीतियाँ भावना की बजाय डेटा पर आधारित हों।

नए उपाय – एआई (AI) और मानसिक स्वास्थ्य:

  • एआई चैटबॉट जोखिम: सोशल मीडिया और एआई चैटबॉट्स दोनों में विनियमन सुसंगत होना चाहिए।
    • बच्चे तेजी से एआई से मानसिक स्वास्थ्य सलाह माँग रहे हैं, जो आत्म-हानि को प्रोत्साहित या नाबालिगों के साथ यौन वार्ता में शामिल होने के लिए जाना जाता है।
  • संज्ञानात्मक विकास संबंधी चिंताएँ: एआई उपकरणों पर अत्यधिक निर्भरता आलोचनात्मक चिंतन, भावनात्मक लचीलापन और संज्ञानात्मक प्रयासों को कमजोर कर सकती है।

निष्कर्ष

नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध प्रतीकात्मक आश्वासन तो देता है, लेकिन संरचनात्मक कारणों की अनदेखी करता है। एक प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए तकनीकी निषेध की नहीं बल्कि विनियमन, डिजिटल शिक्षा, प्लेटफॉर्म जवाबदेही, बाल भागीदारी और साक्ष्य-आधारित शासन की आवश्यकता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध सुरक्षा का भ्रम तो पैदा कर सकता है, लेकिन यह मौजूदा सामाजिक असमानताओं को गहरा तथा बाल अधिकारों को कमजोर कर सकता है। इस संदर्भ में, किशोर मानसिक स्वास्थ्य पर अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग के प्रभाव पर चर्चा कीजिए, और जाँच कीजिए कि भारत में निषेध-आधारित दृष्टिकोण अनुपयुक्त हैं, क्यों ?

(250 शब्द, 15 अंक)

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