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म्याँमार के सैन्य-नियोजित चुनाव, भारत की रणनीतिक दुविधा

Lokesh Pal February 09, 2026 05:30 7 0

संदर्भ:

2021 के सैन्य तख्तापलट के पाँच वर्षों बाद, म्याँमार ने 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में कई चरणों में चुनाव आयोजित किए।

राजनीतिक संकट की पृष्ठभूमि:

  • 2021 का तख्तापलट: 1 फरवरी, 2021 को म्याँमार की सेना ने लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को बेदखल कर सत्ता पर आधिपत्य कर लिया।
  • नेताओं का कारावास: नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की और नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) के कई नेताओं को कारावास में डाल दिया गया।
  • निर्मित वैधता: तीन चरणों में आयोजित इन चुनावों को वास्तविक लोकतांत्रिक सहमति की बजाय कृत्रिम रूप से राजनीतिक वैधता प्रस्तुत करने के प्रयास के रूप में वर्णित किया गया है।
  • सीमित भागीदारी: मतदान 330 में से केवल 265 कस्बों में हुआ। मतदान काफी हद तक शहरी वार्डों तक ही सीमित था, क्योंकि अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र प्रतिरोध के प्रभाव में रहे।
    • सीमित टाउनशिप और नियंत्रित राजनीतिक भागीदारी ने सेना के राजनीतिक विंग, यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) की जीत सुनिश्चित की।
  • घटता मतदान: मतदान का प्रतिशत गिरकर 55% हो गया (पिछले चुनावों में यह 70% था)।
  • प्रतिबंधित विपक्ष: नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD), अराकान नेशनल पार्टी और शान नेशनलिटीज लीग फॉर डेमोक्रेसी जैसे प्रमुख दलों को भंग कर दिया गया।

गृहयुद्ध की वास्तविकता और ‘खंडित संप्रभुता’:

  • मानवीय क्षति: चल रहे गृहयुद्ध के परिणामस्वरूप लगभग 8,000 मौतें (नागरिकों और पत्रकारों सहित) और 113,000 घर नष्ट हो गए हैं।
  • प्रतिरोध आंदोलन: पीपुल्स डिफेंस फोर्सेस (PDF) और विभिन्न जातीय सेनाएँ सैन्य शासन के खिलाफ खड़ी हो गई हैं।
  • नियंत्रण का नुकसान: प्रतिरोध समूह अब लगभग 91 कस्बों को नियंत्रित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप ‘खंडित संप्रभुता’ की स्थिति पैदा हो गई है, जिसमें सैन्य सरकार प्रभावी रूप से केवल प्रमुख शहरों और राजधानी पर शासन करती है।

भारत की रणनीतिक दुविधा – सिद्धांत बनाम व्यवहारवाद

  • लोकतांत्रिक दुविधा: विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में, भारत लोकतांत्रिक परिवर्तन का समर्थन करने के लिए दबाव महसूस करता है, फिर भी वह जुंटा (सैन्य शासन) को अलग-थलग करना बर्दाश्त नहीं कर सकता।
    • म्याँमार एक रणनीतिक पड़ोसी और दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार है, जो भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के लिए महत्त्वपूर्ण है।
  • चीन का कारक: सैन्य सरकार को दूर करने से म्याँमार चीन के और समीप जा सकता है, जिसके साथ उसके पहले से ही करीबी संबंध हैं।
  • आंतरिक सुरक्षा: भारत उत्तर-पूर्व में उग्रवाद को नियंत्रित करने में सहयोग के लिए म्याँमार की सेना पर निर्भर है। यदि संबंध बिगड़ते हैं, तो भारतीय उग्रवादियों को जुंटा के समर्थन से म्याँमार में सुरक्षित पनाह मिल सकती है।
  • शरणार्थी संकट: भारत म्याँमार के साथ 1,643 किमी की सीमा साझा करता है। वर्तमान में 90,000 से अधिक शरणार्थी मिजोरम और मणिपुर जैसे राज्यों में प्रवेश कर चुके हैं।
    • तनावपूर्ण संसाधन: राष्ट्रीय शरणार्थी नीति के अभाव ने पूरा बोझ राज्य सरकारों पर डाल दिया है, जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों में जातीय तनाव बढ़ गया है।
  • बाधित परियोजनाएँ: मौजूदा सुरक्षा अस्थिरता के कारण कालादान मल्टी-मॉडल प्रोजेक्ट और भारत-म्याँमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी प्रमुख कनेक्टिविटी पहल ठप पड़ी हैं।

अंतरराष्ट्रीय अपराध और साइबर गुलामी

  • अराजकता: केंद्रीय प्राधिकरण के कमजोर होने ने म्याँमार को नशीले पदार्थों की तस्करी और ऑनलाइन घोटालों का केंद्र बना दिया है।
  • स्कैम सेंटर: म्याँमार डिजिटल गिरफ्तारी और मानव तस्करी के लिए एक वैश्विक स्कैम सेंटर बन गया है।
  • भारतीय पीड़ित: 2022 से अब तक 2,000 से अधिक भारतीयों को साइबर दासता से बचाया गया है, जो मानव तस्करी का एक नया रूप है, जहाँ व्यक्तियों को ऑनलाइन घोटाले करने के लिए बाध्य किया जाता है।

भारत की रचनात्मक जुड़ाव की नीति:

  • संतुलित कूटनीति: भारत ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें चुनावी परिणामों को आधिकारिक रूप से खारिज किए बिना लोकतांत्रिक परिवर्तन के लिए समर्थन व्यक्त किया गया है।
  • उच्च स्तरीय संवाद: अगस्त 2025 में, प्रधानमंत्री मोदी ने द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा करने के लिए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में सीनियर जनरल मिन आंग हलिंग से मुलाकात की और समावेशी चुनाव कराने का आग्रह किया।
  • मानवीय सहायता: ‘ऑपरेशन ब्रह्मा’ 2025 के विनाशकारी भूकंप के बाद म्याँमार को भूकंप राहत तथा फील्ड अस्पताल प्रदान करने की भारत की एक महत्त्वपूर्ण पहल थी।

निष्कर्ष

भारत को रचनात्मक, बहु-मार्गी संबंधों को अपनाना चाहिए, जिसमें शासन के साथ सीमित वार्ता को संतुलित करते हुए दीर्घकालिक हितों की रक्षा हेतु प्रतिरोध समूहों के साथ भी संपर्क बनाए रखना चाहिए।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: म्याँमार के प्रति भारत की नीति लोकतांत्रिक सिद्धांतों और रणनीतिक व्यवहारवाद के मध्य दुविधा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। म्याँमार में हाल ही में हुए सैन्य-नियोजित चुनावों के आलोक में, भारत की आंतरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाओं के समक्ष विद्यमान चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। भारत को इस संकट से किस प्रकार निपटना चाहिए?

(250 शब्द, 15 अंक)

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