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आकाश ही कोई सीमा नहीं: भारत को अंतिम सीमा की रक्षा करनी होगी

Lokesh Pal February 10, 2026 05:00 6 0

संदर्भ:

बाह्य अंतरिक्ष के तीव्र सैन्यीकरण और बढ़ती शक्ति प्रतिस्पर्धा ने अंतरिक्ष को शांतिपूर्ण अन्वेषण के क्षेत्र से बदलकर राष्ट्रीय सुरक्षा के एक महत्वपूर्ण मोर्चे में परिवर्तित कर दिया है।

वास्तविकता में बदलाव

  • प्राचीन दृष्टिकोण: अंतरिक्ष को अन्वेषण (नील आर्मस्ट्रॉन्ग) और इसरो के “शांतिपूर्ण मिशनों” के दृष्टिकोण से देखा जाता था।
  • 2026 की वास्तविकता: अंतरिक्ष अब केवल विज्ञान कथा नहीं रहा; यह एक भू-राजनीतिक वास्तविकता और आधुनिक युद्ध का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

नई अंतरिक्ष वास्तविकता – तीन ‘C’

  • संकुलित/भीड़भाड़युक्त: उपग्रह प्रक्षेपण में तीव्र वृद्धि के कारण कक्षीय अंतरिक्ष अत्यधिक भीड़भाड़ वाला हो गया है।
  • विवादित: प्रमुख वैश्विक शक्तियाँ अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित करने के लिए सक्रिय रूप से प्रयासरत हैं।
  • प्रतिस्पर्धात्मक: अंतरिक्ष क्षमताओं में श्रेष्ठता प्राप्त करने के लिए राष्ट्रों के बीच एक रणनीतिक दौड़ जारी है।

भारत के लिए भू-राजनीतिक अनिवार्यता

  • भू-राजनीतिक दबाव: भारत की स्थिति दो शत्रुतापूर्ण पड़ोसी/परमाणु-सशस्त्र प्रतिद्वंद्वियों — चीन और पाकिस्तान — के बीच है, जिनकी सीमाएँ सक्रिय और सैन्यीकृत हैं। ऐसे में अंतरिक्ष-आधारित क्षमताएँ प्रतिरोध (डिटरेंस) और निगरानी के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
  • रणनीतिक प्रतिरोध और सैन्य संतुलन: अंतरिक्ष-आधारित रक्षा प्रणालियों को सुदृढ़ करना आवश्यक है ताकि विरोधी देशों को असमान या निर्णायक बढ़त हासिल करने से रोका जा सके। साथ ही एक सशक्त और परिचालन रूप से सक्षम भारतीय अंतरिक्ष बल (ISF) समय की अनिवार्य आवश्यकता है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा का विस्तार: 21वीं सदी में अंतरिक्ष संपत्तियों पर नियंत्रण और उनकी सुरक्षा, संप्रभुता की रक्षा तथा समग्र राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य बन गई है।

द्वि-अक्षीय रूपरेखा – अंतरिक्ष और राष्ट्रीय सुरक्षा

अक्ष आयाम प्रमुख तत्व व्याख्या / महत्व
अक्ष 1: रक्षा के लिए अंतरिक्ष बल गुणक निगरानी सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) उपग्रह बादलों और अंधकार के बीच भी शत्रु की गतिविधियों का पता लगा सकते हैं, जिससे सीमा निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली मजबूत होती है।
संचार अंतरिक्ष-आधारित संचार प्रणाली दूरस्थ सीमा क्षेत्रों में तैनात सैनिकों और कमांड केंद्रों के बीच निरंतर संपर्क बनाए रखती है, जिससे वास्तविक समय में युद्धक्षेत्र समन्वय संभव होता है।
नेविगेशन (Navigation) उपग्रह नेविगेशन मिसाइलों की सटीकता और लक्ष्यभेदन क्षमता बढ़ाता है, जिससे संपार्श्विक क्षति (Collateral Damage) कम होती है और संचालन दक्षता में वृद्धि होती है।
अक्ष 2: अंतरिक्ष की रक्षा महत्वपूर्ण परिसंपत्तियों की सुरक्षा गैर-सैन्य खतरे कक्षीय मलबा (Orbital Debris) टकराव और संभावित केसलर सिंड्रोम (उपग्रहों की श्रृंखलाबद्ध विनाश) का जोखिम उत्पन्न करता है; सौर विकिरण भी उपग्रहों के कार्य को प्रभावित कर सकता है।
सैन्य – गैर-सांकेतिक खतरे इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, GPS स्पूफिंग और ग्राउंड स्टेशनों पर साइबर हमले बिना भौतिक विनाश के उपग्रह सेवाओं को बाधित या नियंत्रित कर सकते हैं।
सैन्य – सांकेतिक खतरे भूमि से दागी गई मिसाइलें, उपग्रह टकराव या रोबोटिक कैप्चर सिस्टम उपग्रहों को भौतिक रूप से नष्ट या निष्क्रिय कर सकते हैं।
परमाणु खतरे अंतरिक्ष में परमाणु विस्फोट से उत्पन्न विद्युतचुंबकीय स्पंद (EMP) निकटवर्ती उपग्रहों के इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार अवसंरचना को क्षति पहुँचा सकता है।

वैश्विक प्रतिक्रियाएँ और भारत की स्थिति

  • अमेरिका: एक स्वतंत्र सैन्य शाखा के रूप में समर्पित स्पेस फोर्स की स्थापना की है।
  • चीन: PLA एयरोस्पेस फोर्स का गठन किया, जिसके तहत अंतरिक्ष, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं का एकीकरण किया गया है।
  • इज़राइल और फ्रांस: इज़राइल ने अंतरिक्ष में अवरोधन (Interception) क्षमता का प्रदर्शन किया है, जबकि फ्रांस ने अंतरिक्ष-आधारित सैन्य प्रणालियाँ विकसित करने की अपनी मंशा घोषित की है।
  • भारत: भारत के पास मिशन शक्ति के तहत एंटी-सैटेलाइट (ASAT) क्षमता है, एक सशक्त ISRO पारिस्थितिकी तंत्र है, और IndSpaceEx जैसे अभ्यास आयोजित किए हैं, किंतु इसका दृष्टिकोण अभी भी खंडित बना हुआ है।

भारत की वर्तमान रणनीति में विद्यमान कमियाँ

  • प्रयासों की पुनरावृत्ति: जिम्मेदारियाँ रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी, भारतीय वायु सेना और इसरो के बीच विभाजित हैं।
  • जवाबदेही की कमी: अनेक हितधारकों के कारण कमान और स्वामित्व स्पष्ट नहीं है।
  • संचालन गति: अंतरिक्ष युद्ध में लगभग त्वरित निर्णय-निर्माण की आवश्यकता होती है, जिसे खंडित प्रणाली प्रभावी रूप से प्रदान नहीं कर सकती।

एक समर्पित अंतरिक्ष बल

  • प्रस्ताव: एक समर्पित भारतीय अंतरिक्ष बल की स्थापना का प्रस्ताव है, जिसे या तो एक स्वतंत्र सेवा के रूप में या वायु सेना के भीतर एक सशक्तीकृत कमान के रूप में गठित किया जा सकता है।
  • मुख्य लाभ:
    • केंद्रीकृत योजना: एकीकृत कमान और समन्वित निर्णय-निर्माण।
    • विशेषज्ञ कर्मी: प्रशिक्षित अंतरिक्ष युद्ध विशेषज्ञों का विकास।
    • सार्वजनिक–निजी समन्वय: इसरो की क्षमताओं और निजी क्षेत्र के नवाचार के बेहतर एकीकरण की सुविधा।
    • त्वरित खरीद प्रक्रिया: महत्त्वपूर्ण अंतरिक्ष अवसंरचना और प्रौद्योगिकी की सुव्यवस्थित अधिग्रहण प्रक्रिया।

आगे की राह

  • संवैधानिक और कानूनी आधार: भारतीय अंतरिक्ष बल की स्थापना संसद के अधिनियम द्वारा की जानी चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक वैधता और संवैधानिक समर्थन सुनिश्चित हो सके।
  • संचालनात्मक अधिकार और बजटीय आश्वासन: एक वैधानिक ढाँचा स्पष्ट जनादेश, संलग्नता के नियम (Rules of Engagement) और अंतरिक्ष अभियानों के लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण सुनिश्चित करेगा।
  • निरंतरता और रणनीतिक संकेत: संसद द्वारा स्थापना विभिन्न सरकारों के बीच संस्थागत स्थिरता सुनिश्चित करती है और यह संकेत देती है कि भारत अंतरिक्ष को राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र के रूप में गंभीरता से लेता है।

निष्कर्ष

ऐसे युग में, जब युद्ध पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर तय किए जा सकते हैं, संसद के जनादेश के माध्यम से एक समर्पित भारतीय अंतरिक्ष बल का संस्थानीकरण संप्रभुता, निवारण/प्रतिरोधक क्षमता, और रणनीतिक स्वायत्तता की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारत के संदर्भ में रक्षा के लिए अंतरिक्ष’ (Space for Defence) और अंतरिक्ष की रक्षा’ (Defence of Space) की द्वैध चुनौती पर चर्चा कीजिए। उभरते हुए काउंटर-स्पेस(Counter-Space) खतरों ने भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा गणना को किस प्रकार प्रभावित किया है?

(15 अंक, 250 शब्द)

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