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बंधुआ मज़दूरी की समाप्ति के 50 वर्ष बाद भी उसका साया कायम

Lokesh Pal February 11, 2026 05:00 6 0

संदर्भ

भारत में बंधुआ मज़दूरी को कानूनी रूप से समाप्त हुए 50 वर्ष बीत चुके हैं, फिर भी यह प्रथा विभिन्न रूपों में आज भी जारी है। जिसकी जड़ें आर्थिक मजबूरी और तंत्रगत विफलताओं में गहराई से निहित हैं।

ऐतिहासिक और कानूनी परिप्रेक्ष्य

  • 1976 का उन्मूलन अधिनियम: बंधुआ मज़दूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम 9 फरवरी 1976 को आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के 20-सूत्रीय कार्यक्रम के तहत लागू किया गया था, जिसमें बंधुआ मज़दूरी के उन्मूलन को स्पष्ट रूप से प्राथमिकता दी गई थी।
  • संवैधानिक आधार: यह अधिनियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23(1) को लागू करने के लिए निर्मित किया गया था, जो मानव तस्करी और बेगार (बिना भुगतान के जबरन श्रम) पर प्रतिबंध लगाता है।
  • ऋण-बंधन की अवधारणा: बंधुआ मज़दूरी आमतौर पर ऋण-बंधन से जुड़ी होती है, जिसमें मज़दूर नियोक्ता से ऋण लेता है और ऊँची ब्याज दरों के कारण बिना वेतन या बहुत कम मजदूरी पर काम करने के लिए मजबूर हो जाता है, जिससे उसकी आवाजाही की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है।

बंधुआ मज़दूरी की वर्तमान स्थिति

  • उद्योगों में व्यापकता: बंधुआ मज़दूरी केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है; यह ईंट भट्ठों, गन्ना बागानों, रेशम उद्योग तथा चाय और कॉफी बागानों में भी प्रचलित है।
  • सरकारी सबकॉन्ट्रैक्टिंग: बंधुआ मज़दूरी अक्सर सरकारी वित्तपोषित परियोजनाओं में सबकॉन्ट्रैक्टिंग की श्रृंखला के माध्यम से विद्यमान है।
    • बड़ी कंपनियाँ छोटे ठेकेदारों को काम देती हैं, जो आगे काम को सबकॉन्ट्रैक्टिंग को दे देते हैं। इससे निगरानी की समस्या उत्पन्न हो जाती है जिससे श्रृंखला के निचले स्तर पर काम करने वाले मज़दूरों का शोषण होता है।
  • सिनेमा में प्रतिबिंब: तकनीक भले ही बदल गई है, लेकिन मजदूर की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है।
    • अंकुर (1974) से होमबाउंड (2025) तक, सिनेमा दिखाता है कि सत्ता का रूप भले ही सामंतवाद से बाज़ार पूंजीवाद में बदल गया हो, परंतु हाशिए पर मौजूद मज़दूरों का संरचनात्मक शोषण अभी भी जारी है।

प्रमुख चुनौतियाँ जिन्हें संबोधित करने की आवश्यकता है

  • जाति-आधारित शोषण: बेगार जैसी प्रथाएँ पारंपरिक शोषण प्रणालियों का हिस्सा हैं।
    • कर्नाटक में ‘बिट्टी चाकरी(Bitti Chakri)’ जैसी व्यवस्था आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यमान है, जो गहरे जाति-आधारित शोषण को दर्शाती है।
  • न्यायिक पक्षपात: न्यायिक पक्षपात स्वयं न्याय में बाधा बन सकता है।
    • उदाहरण: जब अदालतें बंधुआ मज़दूरी के मामलों को “कानून का दुरुपयोग” बताती हैं, तो इससे शोषण की गंभीरता कम आँकी जाती है और पीड़ितों को संवैधानिक उपचार मांगने से हतोत्साहित किया जाता है।
  • श्रम कानूनों का कमजोर होना: व्यापार सुगमता बढ़ाने के उद्देश्य से किए गए हालिया श्रम कानून संशोधनों में श्रम निरीक्षकों की जगह श्रम सुविधा प्रदाताओं को लाया गया है।
    • इससे सख्त निगरानी और नियोक्ताओं के लिए आपराधिक दंड का भय कम हुआ है, जिससे शोषण बढ़ सकता है।
  • तकनीक की बहिष्कारी प्रकृति: आधार का उद्देश्य मनरेगा या राशन जैसी सरकारी लाभ योजनाओं में धोखाधड़ी को रोकना था, लेकिन इसका अप्रत्याशित प्रभाव शारीरिक श्रमिकों पर पड़ा है।
    • ईंट उठाने जैसे शारीरिक श्रम से घिसी हुई उंगलियों वाले श्रमिक अक्सर बायोमेट्रिक स्कैन में विफल हो जाते हैं, जिससे उनकी मजदूरी रोकी जाती है और वे प्रणाली से बाहर हो जाते हैं।
    • मज़दूरों को उनके बैंक खातों में न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रणालीगत तंत्र मौजूद नहीं है।
  • जीविका योग्य वेतन की आवश्यकता: बंधुआ मज़दूरी का मूल कारण जीवन-यापन योग्य वेतन का अभाव है।
    • यदि श्रमिकों को अपना गुज़ारा करने के लिए पर्याप्त वेतन दिया जाए, तो उन्हें उच्च-ब्याज वाले ऋण लेने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा, जो उन्हें बंधन की स्थिति की ओर ले जाता है।

आगे की राह

  • पारदर्शिता के लिए ब्लॉकचेन: सरकार से लेकर मज़दूर तक वेतन की पारदर्शी और छेड़छाड़-रहित निगरानी के लिए ब्लॉकचेन-आधारित, एंड-टू-एंड वेतन ट्रैकिंग प्रणाली अपनाई जानी चाहिए, जिससे ठेकेदार स्तर पर होने वाली हेराफेरी और धन की चोरी समाप्त हो सके।

निष्कर्ष

सामाजिक परिवर्तन और संवेदनशील शासन के बिना केवल कानूनी सुधार बंधुआ मज़दूरी के साये को समाप्त नहीं कर सकता।

  • अधिकार-आधारित शासन, तकनीकी पारदर्शिता और सामाजिक चेतना में बदलाव के माध्यम से, मजदूरों की अदृश्य “घिसी हुई उंगलियाँ” अंततः वह सम्मान और न्याय प्राप्त कर सकती हैं, जिसके वे हकदार हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: अनुच्छेद 23 के अंतर्गत संवैधानिक सुरक्षा तथा बंधुआ मज़दूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के लागू होने के बावजूद भारत में बंधुआ मज़दूरी आज भी जारी है। इसके निरंतर बने रहने के कारणों पर चर्चा कीजिए तथा इस समस्या के समाधान हेतु संस्थागत सुधारों का सुझाव दीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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