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AI-जनित सामग्री की अनिवार्य लेबलिंग

Lokesh Pal February 12, 2026 03:31 6 0

संदर्भ

केंद्रीय सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2026 के अंतर्गत संशोधनों को अधिसूचित किया है, जिसके तहत ‘’फोटो-रियलिस्टिक’’ (Photorealistic) AI-जनित सामग्री की प्रमुख लेबलिंग और अवैध सामग्री को हटाने की समय-सीमा को कम किया गया है।

  • ये संशोधन सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 का हिस्सा हैं, जिन्हें आईटी अधिनियम, 2000 के तहत निर्मित हैं।

प्रमुख संशोधन

  • AI सामग्री की अनिवार्य लेबलिंग: ‘फोटो-रियलिस्टिक’ AI-जनित सामग्री पर स्पष्ट और प्रमुख लेबल लगाना अनिवार्य होगा, ताकि उपयोगकर्ताओं को यह जानकारी मिल सके कि यह कृत्रिम रूप से बनाई गई है।
  • मेटाडाटा एंबेडिंग: मध्यस्थ प्लेटफॉर्म को सामग्री की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए स्थायी स्रोत-चिह्न (Provenance Markers) और विशिष्ट पहचानकर्ता एंबेड करने होंगे।
    • प्लेटफॉर्म को लेबल या एंबेडेड मेटाडाटा को हटाने या दबाने की अनुमति नहीं होगी।
  • प्रतिबंधित AI सामग्री की श्रेणियाँ
    • यौन शोषण से संबंधित सामग्री: कृत्रिम बाल यौन शोषण सामग्री और बिना सहमति के अंतरंग चित्रों पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
    • प्रतिरूपण और धोखाधड़ी: पहचान की चोरी, झूठे इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख, या धोखे से संबंधित AI सामग्री प्रतिबंधित होगी।
    • सुरक्षा-संवेदनशील सामग्री: हथियारों, विस्फोटकों, या अवैध गतिविधियों से संबंधित फेक मीडिया प्रतिबंधित होगा।
    • मानहानि संबंधी डीपफेक: व्यक्तियों या घटनाओं को भ्रामक तरीके से झूठा दर्शाने वाली सामग्री पर रोक होगी।
  • हटाने की समय-सीमा में कमी
    • न्यायालय द्वारा अवैध घोषित सामग्री: न्यायालय या सरकारी प्राधिकरण द्वारा अवैध घोषित सामग्री को तीन घंटे के भीतर हटाना होगा।
    • संवेदनशील सामग्री: डीपफेक और बिना सहमति की सामग्री को दो घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य होगा।
    • शिकायत निवारण सुधार: शिकायत की स्वीकृति की समय-सीमा 15 दिनों से घटाकर 7 दिन कर दी गई है।
    • यह पहले की 24–36 घंटे की अवधि की तुलना में अत्यधिक कमी को दर्शाता है।
  • उपयोगकर्ता प्रकटीकरण आवश्यकता: जब सामग्री AI-जनित हो, तो प्लेटफॉर्म को उपयोगकर्ताओं से प्रकटीकरण माँगना होगा। प्रकटीकरण के अभाव में, प्लेटफॉर्म को सामग्री पर लेबल लगाना होगा या बिना सहमति वाले डीपफेक मामलों में उसे हटाना होगा।
    • प्लेटफॉर्म को ऐसे घोषणाओं की प्रामाणिकता सत्यापित करने के लिए तकनीकी प्रणालियाँ प्रयोग करनी होंगी।
  • परिभाषा: कृत्रिम सामग्री में ऑडियो, विजुअल, या ऑडियो-विजुअल जानकारी शामिल है, जो कृत्रिम या एल्गोरिदमिक रूप से निर्मित, उत्पन्न, संशोधित, या परिवर्तित की गई हो, और जो वास्तविक व्यक्तियों या वास्तविक विश्व की घटनाओं से अप्रभावित प्रतीत होती हो।
  • ‘लेबलिंग’ संबंधी आवश्यकताएँ
    • प्रमुख प्रकटीकरण अनिवार्यता: AI-जनित छवियों पर स्पष्ट और प्रमुख लेबल होना चाहिए।
    • प्लेटफॉर्म के लिए लचीलापन: ड्राफ्ट संस्करण के विपरीत, जिसमें छवि के 10 प्रतिशत भाग में लेबल दर्शाना आवश्यक था, अंतिम नियम कार्यान्वयन में अधिक लचीलापन प्रदान करते हैं।
  • ‘सेफ हार्बर’ सिद्धांत और प्लेटफॉर्म दायित्व

‘सेफ हार्बर’ सिद्धांत

  • ‘सेफ हार्बर’ एक कानूनी सिद्धांत है, जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को ‘थर्ड पार्टी’ उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई अवैध सामग्री के लिए दायित्व से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के अंतर्गत, यदि मध्यस्थ उचित परिश्रम करते हैं, तो उन्हें उपयोगकर्ता-जनित सामग्री के लिए दायित्व से संरक्षण प्राप्त होता है।

    • अनुपालन न करने पर संरक्षण की हानि: यदि कोई प्लेटफॉर्म जानबूझकर नियमों का उल्लंघन करने वाली कृत्रिम सामग्री को अनुमति देता है, बढ़ावा देता है या उसके विरुद्ध कार्रवाई करने में विफल रहता है, तो वह ‘सेफ हार्बर’ संरक्षण खो सकता है।
    • उचित परिश्रम का दायित्व: अनुपालन न करना, IT नियमों के अंतर्गत उचित परिश्रम का पालन न करने के रूप में माना जा सकता है।
  • प्रशासनिक परिवर्तन
    • राज्य-स्तरीय अधिकारी: अक्टूबर 2025 के एक पूर्व संशोधन में प्रत्येक राज्य को हटाने के आदेशों के लिए केवल एक अधिकारी नामित करने तक सीमित किया गया था।
    • प्रशासनिक संशोधन: अब राज्यों को कई अधिकारियों को नामित करने की अनुमति दी गई है, जिससे बड़े राज्यों की प्रशासनिक आवश्यकताओं को संबोधित किया जा सके।
  • कार्यान्वयन
    • संशोधित नियम 20 फरवरी, 2026 से लागू होंगे।

संशोधन का महत्त्व

  • डीपफेक और फेक न्यूज के विरुद्ध होना: ये नियम बिना सहमति वाले डीपफेक, फेक न्यूज, और कृत्रिम मीडिया संबंधी हस्तक्षेपित पर बढ़ती चिंताओं को संबोधित करने का लक्ष्य रखते हैं।
  • डीपफेक और AI-हानि विनियमन: ये संशोधन डीपफेक और AI-प्रेरित फेक न्यूज के विरुद्ध अब तक का भारत का सबसे मजबूत कानूनी ढाँचा प्रस्तुत करते हैं।
  • प्लेटफॉर्म जवाबदेही: सख्त लेबलिंग, मेटाडाटा एंबेडिंग, और तीव्रतापूर्ण  हटाने की समय-सीमा मध्यस्थ की जिम्मेदारी को बढ़ाती है।
  • साइबर शासन आधुनिकीकरण: यह ‘सेफ हार्बर’ संरक्षण को संतुलित रखते हुए उभरते AI जोखिमों के अनुरूप भारत के डिजिटल विनियमन को संरेखित करता है।

डीपफेक प्रौद्योगिकी के बारे में

डीपफेक डिजिटल सामग्री का एक रूप है, जिसे AI मॉडल, विशेष रूप से जनरेटिव एडवर्सेरियल नेटवर्क (GANs) और डीप न्यूरल नेटवर्क के माध्यम से उत्पन्न या परिवर्तित किया जाता है, जो वास्तविक रूप से ‘फेस स्वैप’, आवाज की नकल, होंठों की गति में परिवर्तन या संपूर्ण मानव सञ्चालन का निर्माण कर सकता है।

संवैधानिक और कानूनी ढाँचा 

  • स्वतंत्रता बनाम प्रतिबंध: डीपफेक का विनियमन अनुच्छेद-19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद-19(2) के अंतर्गत युक्तियुक्त प्रतिबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए।
  • वैधानिक प्रावधान
    • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A सरकार को विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत हानिकारक ऑनलाइन सामग्री को अवरुद्ध करने का अधिकार देती है।
    • धारा 79 मध्यस्थ को सेफ हार्बर सिद्धांत के अंतर्गत, उचित परिश्रम और समय पर सामग्री हटाने की शर्त पर, प्रतिरक्षा प्रदान करती है।
    • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 व्यक्तिगत डेटा के उपयोग के लिए सहमति को अनिवार्य बनाता है, जिससे बिना सहमति वाले डीपफेक दंडनीय हो जाते हैं।
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 डीपफेक से जुड़े प्रतिरूपण, मानहानि, गलत सूचना, और संगठित साइबर अपराधों को दंडित करती है।
  • न्यायिक संरक्षण: न्यायालयों ने डिजिटल विनियमन में आनुपातिकता, प्रक्रियात्मक निष्पक्षता, और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा पर बल दिया है।

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