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जैव-आधारित रसायन और एंजाइम

Lokesh Pal February 17, 2026 02:43 7 0

संदर्भ 

भारत जैव-प्रौद्योगिकी विभाग की बायोE3 नीति के अंतर्गत जैव-आधारित रसायनों और एंजाइमों को प्राथमिकता दे रहा है।

संबंधित तथ्य

  • भारत का एंजाइम बाजार समेकित प्रकृति का है, जिसमें शीर्ष कंपनियाँ 75% से अधिक बाजार हिस्सेदारी रखती हैं।
  • नोवोजाइम्स इंडिया, ड्यूपॉन्ट, डीएसएम, एडवांस एंजाइम टेक्नोलॉजीज, बीएएसएफ एसई, और अल्ट्रेज एंजाइम्स प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियाँ भारतीय बाजार की प्रमुख हितधारक हैं।

एंजाइम्स के बारे में

  • एंजाइम जैविक उत्प्रेरक होते हैं, जो रासायनिक अभिक्रियाओं को अत्यंत कुशल और विशिष्ट तरीके से तीव्र करते हैं।
  • अनुप्रयोग: डिटर्जेंट, खाद्य प्रसंस्करण, फार्मास्यूटिकल्स, वस्त्र, पल्प एवं पेपर, जैव-विनिर्माण।

मुख्य विशेषताएँ

  • ऊर्जा दक्ष: हल्के तापमान और दाब में कार्य करते हैं, जिससे ऊर्जा की खपत कम होती है।
  • पर्यावरण-अनुकूल: जैव-अपघटनीय होते हैं और हरित रसायन विज्ञान के सिद्धांतों का समर्थन करते हैं।
  • उन्नत उत्पाद गुणवत्ता: अवांछित उप-उत्पादों को कम करते हैं और सटीकता बढ़ाते हैं।
  • जैव-अर्थव्यवस्था का समर्थन: नवीकरणीय बायोमास को मूल्यवर्द्धित उत्पादों में परिवर्तित करने में सहायता करते हैं।
  • अनुकूलन योग्य: विशिष्ट औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए जैव-प्रौद्योगिकी के माध्यम से इन्हें अभिकल्पित किया जा सकता है।

जैव-आधारित रसायनों के बारे में

  • ये औद्योगिक रसायन गन्ना, मक्का, स्टार्च, या बायोमास अवशेष जैसे जैविक कच्चे माल  का उपयोग एवं किण्वन या एंजाइमेटिक प्रक्रियाओं के माध्यम से उत्पादित किए जाते हैं।
  • उदाहरण के लिए
    • कार्बनिक अम्ल (जैसे लैक्टिक अम्ल),
    • जैव-एल्कोहल,
    • विलायक, सर्फेक्टेंट, और
    • प्लास्टिक, सौंदर्य प्रसाधन और फार्मास्यूटिकल्स में उपयोग होने वाले मध्यवर्ती उत्पाद।

भारत को ऐसे रसायनों की आवश्यकता क्यों है?

  • मजबूत कृषि आधार: भारत का विशाल कृषि क्षेत्र प्रचुर मात्रा में बायोमास और फसल अवशेष उपलब्ध कराता है, जो जैव-आधारित रसायनों और एंजाइमों के लिए कच्चे माल के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं।
  • किण्वन प्रौद्योगिकियों में विशेषज्ञता: भारत के पास अपने सुदृढ़ फार्मास्यूटिकल और वैक्सीन उद्योगों के कारण किण्वन प्रक्रियाओं में व्यापक अनुभव है, जो जैव-विनिर्माण में तकनीकी बढ़त प्रदान करता है।
  • विनिर्माण क्षमता में वृद्धि: विस्तारित औद्योगिक और विनिर्माण क्षेत्र जैव-आधारित रसायनों और एंजाइमों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए आवश्यक अवसंरचना प्रदान करता है।
  • आयात निर्भरता में कमी: जैव-आधारित विकल्पों को बढ़ावा देने से आयातित पेट्रोकेमिकल्स पर निर्भरता कम हो सकती है। उदाहरण के लिए, भारत ने वर्ष 2023 में लगभग 479.8 मिलियन डॉलर मूल्य का एसिटिक एसिड आयात किया, जो घरेलू उत्पादन की संभावनाओं को दर्शाता है।
  • आर्थिक और रणनीतिक लाभ: इस क्षेत्र के विस्तार से कृषि उत्पादों के लिए नए बाजार बन सकते हैं, किसानों की आय बढ़ सकती है, सतत् उद्योग को समर्थन मिल सकता है और भारत को पर्यावरण-अनुकूल औद्योगिक इनपुट का वैश्विक आपूर्तिकर्ता बनाया जा सकता है।

जैव-आधारित रसायन क्षेत्र के विकास में चुनौतियाँ

  • लागत प्रतिस्पर्द्धात्मकता: जैव-आधारित रसायन प्रायः पेट्रोकेमिकल विकल्पों की तुलना में अधिक महँगे होते हैं, विशेष रूप से बड़े पैमाने पर उत्पादन के प्रारंभिक चरणों में।
    • यह अस्थायी लागत हानि एक प्रमुख प्रवेश बाधा उत्पन्न करती है और निजी निवेश को हतोत्साहित करती है।
  • कच्चे माल और अवसंरचना की सीमाएँ: बायोमास कच्चे माल की विश्वसनीय उपलब्धता और पर्याप्त सहायक अवसंरचना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • असंगत आपूर्ति शृंखलाएँ और सीमित प्रसंस्करण सुविधाएँ बड़े पैमाने पर उत्पादन में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।
  • बाजार की चुनौतियाँ: अपनाने की प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि जैव-आधारित रसायन विनिर्माण प्रणालियों में मौजूदा पेट्रोकेमिकल इनपुट का आसानी से स्थान ले सकते हैं या नहीं।
    • मूल्य समान होने पर भी, प्रौद्योगिकीय और आपूर्ति-शृंखला समायोजनों के कारण डाउनस्ट्रीम उद्योग परिवर्तन करने में संकोच कर सकते हैं।

जैव-आधारित रसायनों और एंजाइमों के लिए वैश्विक नीतिगत समर्थन

  • यूरोपीय संघ (EU): EU बायोइकोनॉमी रणनीति और कार्य योजना चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था ढाँचे के अंतर्गत जैव-आधारित रसायनों का समर्थन करती है। यह औद्योगिक परिवर्तन को जलवायु लक्ष्यों, अपशिष्ट में कमी और सतत् विकास के साथ संरेखित करती है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका (यू.एस.): यूएसडीए बायोप्रेफर्ड प्रोग्राम प्रमाणित जैव-आधारित उत्पादों, जिनमें रसायन और एंजाइम शामिल हैं, को संघीय खरीद में प्राथमिकता प्रदान करता है, जिससे उत्पादकों के लिए प्रारंभिक और स्थिर बाजार बनाने में सहायता मिलती है।
  • चीन: चीन की जैव-अर्थव्यवस्था विकास योजनाएँ उच्च-मूल्य वाले जैव-आधारित रसायनों और एंजाइम प्रौद्योगिकियों को नवाचार तथा औद्योगिक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने के लिए रणनीतिक क्षेत्रों के रूप में प्राथमिकता देती हैं।
  • जापान: जापान एमईटीआई और एनएआरओ के माध्यम से प्राथमिकता परियोजनाओं को वित्तपोषित करता है, जो जैव-आधारित रासायनिक अनुसंधान को विनिर्माण तत्परता के साथ जोड़ती हैं, जिससे व्यावसायीकरण तथा औद्योगिक स्तर के उत्पादन में तेजी आती है।

आगे की राह

  • साझा जैव-विनिर्माण अवसंरचना: बायोE3 जैसी पहलों के अंतर्गत बायोफाउंड्री, पायलट प्लांट और प्रदर्शन सुविधाओं का विकास पूँजीगत जोखिमों को कम कर सकता है और निजी कंपनियों के लिए विस्तार को समर्थन दे सकता है।
  • मानक और नीतिगत समर्थन: स्पष्ट मानक, प्रमाणन तंत्र और सरकारी खरीद नीतियाँ सुनिश्चित माँग उत्पन्न कर सकती हैं, निवेशकों का विश्वास मजबूत कर सकती हैं और बाजार अपनाने की प्रक्रिया को तेज कर सकती हैं।

बायोE3 (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव-प्रौद्योगिकी)

बायोE3 नीति के बारे में

  • विषय: जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए नीति 6 प्रमुख विषयों पर केंद्रित होगी।
    • जैव-आधारित रसायन और एंजाइम,
    • कार्यात्मक खाद्य पदार्थ और स्मार्ट प्रोटीन,
    • प्रिसीजन बायोथेरेप्यूटिक,
    • जलवायु-सहिष्णु कृषि,
    • कार्बन कैप्चर और उसका उपयोग,
    • भविष्य के समुद्री और अंतरिक्ष अनुसंधान।
  • विशेषताएँ
    • नवाचार को बढ़ावा: यह विषयगत क्षेत्रों में अनुसंधान एवं विकास और उद्यमिता को नवाचार-आधारित समर्थन प्रदान करेगी।
    • यह बायोमैन्युफैक्चरिंग एवं बायो-AI हब और बायोफाउंड्री की स्थापना के माध्यम से प्रौद्योगिकी विकास और व्यावसायीकरण को तीव्र करेगी।
    • पुनर्योजी जैव-अर्थव्यवस्था आधारित विकास मॉडलों को प्राथमिकता देना।
    • रोजगार सृजन: यह नीति भारत के कुशल कार्यबल के विस्तार को सुगम बनाएगी और रोजगार सृजन में वृद्धि प्रदान करेगी।
  • लाभ
    • चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था: यह नीति ‘नेट जीरो’ कार्बन अर्थव्यवस्था और प्रोजेक्ट लाइफ (‘लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट’) जैसी पहलों को मजबूत करेगी और भारत को तीव्र हरित विकास के मार्ग पर आगे बढ़ाएगी।
    • विकसित भारत के लक्ष्य को बढ़ावा: यह एक ऐसे भविष्य को साकार करेगी, जो सतत्, नवाचारी और वैश्विक चुनौतियों के प्रति उत्तरदायी हो, तथा विकसित भारत के लिए जैव-दृष्टि प्रस्तुत करेगी।
    • यह नीति एक लचीला जैव-विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करेगी, जो जैव-आधारित उत्पादों के विकास हेतु अत्याधुनिक नवाचारों को गति प्रदान करेगा।

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