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भारत के संघवाद को संरचनात्मक पुनर्संतुलन की आवश्यकता

Lokesh Pal February 17, 2026 05:15 8 0

संदर्भ

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का तर्क है कि भारत का संघवाद वर्त्तमान में अस्वस्थ है तथा केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ते असंतुलन को दूर करने के लिए संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

  • विभाजन के बाद का वातावरण: 1947 से 1950 के बीच, संविधान का मसौदा विभाजन की उथल-पुथल और 500 से अधिक रियासतों को एकीकृत करने की आवश्यकता के बीच निर्मित किया गया।
  • अपकेंद्रित शक्तियों का भय: देश के विघटन की आशंका को रोकने के लिए संविधान निर्माताओं ने 1935 के भारत शासन अधिनियम से प्रेरणा ली और एक केंद्रीकृत झुकाव वाला ढाँचा निर्मित किया, जिसमें केंद्र को सशक्त और राज्यों को अपेक्षाकृत कमजोर रखा गया।
  • अर्ध-संघवाद (Quasi-Federalism): इसने विद्वानों जैसे के. सी. व्हीयर को भारत को “अर्ध-संघीय” (Quasi-Federal) कहने के लिए प्रेरित किया, जिसका अर्थ है कि संरचना संघीय है लेकिन इसकी आत्मा एकात्मक (unitary) है।
  • के. संथानम का दृष्टिकोण: उन्होंने कहा कि वास्तविक संघवाद के लिए शक्तियों का सकारात्मक और नकारात्मक सीमांकन आवश्यक है। संघ को अपनी सीमा से बाहर अतिक्रमण नहीं करना चाहिए।
  • सहायकता का सिद्धांत (Principle of Subsidiarity): सत्ता का प्रयोग जनता के निकटतम स्तर पर होना अधिक प्रभावी होता है, जिससे जवाबदेही और स्थानीय आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशीलता सुनिश्चित होती है।

संघवाद के तीन चरण

  • एक-दलीय प्रभुत्व (1950–60 का दशक): कांग्रेस शासन के दौरान दिल्ली में “हाई-कमांड संस्कृति” विकसित हुई, जहाँ मुख्यमंत्रियों को स्वायत्त नेता के बजाय अधीनस्थ के रूप में देखा गया।
  • गठबंधन युग (1990 का दशक): गठबंधनों के उदय ने संघवाद को संतुलित किया और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ किया।
  • वर्तमान परिदृश्य (2026): राज्य अब राजनीतिक और भाषाई रूप से परिपक्व हैं, फिर भी केंद्र नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं है और 1940 के दशक की आपातकालीन परिस्थितियों जैसी प्रवृत्तियों को बनाए हुए है।

राज्य स्वायत्तता पर आधुनिक अतिक्रमण

  • विधायी अतिक्रमण: यद्यपि सातवीं अनुसूची में शक्तियों का विभाजन किया गया है, केंद्र अक्सर समवर्ती सूची का उपयोग कर राज्यों के विषयों में हस्तक्षेप करता है।
    • उदाहरण: वर्ष 2020 का कृषि कानून, जबकि कृषि राज्य सूची का विषय है।
  • वित्तीय नियंत्रण: वित्त आयोग अक्सर अनुदानों के साथ कठोर शर्तें जोड़ता है, जिससे राज्यों को ऐसी “केंद्रीय प्रायोजित योजनाएँ (CSS)” लागू करनी पड़ती हैं जो स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं होती है।
  • नौकरशाही अधीनता: संघीय नौकरशाह अक्सर ऐसे अधीनस्थ नियम और अधिसूचनाएँ जारी करते हैं जो राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित कानूनों को निष्प्रभावी कर देते हैं।
  • स्वायत्तता का क्षरण: जीएसटी और “वन नेशन, वन इलेक्शन” जैसी नीतियाँ राज्यों की स्वायत्तता को और कमजोर करती हैं।

संघीय बहस का पुनर्परिभाषण

  • शून्य-योग खेल का मिथक: मजबूत राज्य, केंद्र को कमजोर नहीं करते; सहयोगात्मक साझेदारी राष्ट्रीय एकता और शासन-परिणामों को सुदृढ़ करती है।
  • विविधता के लिए विकेंद्रीकरण आवश्यक: एकसमान राष्ट्रीय नीतियाँ विभिन्न क्षेत्रीय वास्तविकताओं—जैसे पंजाब की कृषि अर्थव्यवस्था और केरल की तटीय आजीविकाएँ—को समान रूप से संबोधित नहीं कर सकतीं।
  • नवाचार की प्रयोगशाला के रूप में राज्य: कई राष्ट्रीय कार्यक्रम राज्यों की पहलों से उत्पन्न हुए, जैसे तमिलनाडु की मध्याह्न भोजन योजना, केरल का सार्वजनिक स्वास्थ्य मॉडल और महाराष्ट्र की रोजगार गारंटी योजना।
  • क्षमता संबंधी तर्क की त्रुटि: अपर्याप्त तकनीकी क्षमता के दावे इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि दक्षता जिम्मेदारी के माध्यम से विकसित होती है। कई राज्यों की अर्थव्यवस्था संप्रभु देशों के समान है।
  • अत्यधिक केंद्रीकरण का जोखिम: एकरूपता या दक्षता के नाम पर केंद्र का अत्यधिक हस्तक्षेप धीरे-धीरे राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर करता है और संघीय संतुलन की भावना को प्रभावित करता है।

संघवाद पर न्यायिक दृष्टिकोण

  • एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ: सर्वोच्च न्यायालय ने संघवाद को संविधान की मूल संरचना का अंग घोषित किया और स्पष्ट किया कि राज्य अपने निर्धारित क्षेत्र में सर्वोच्च हैं; वे केंद्र की परिधि नहीं, बल्कि साझेदार हैं।
  • मूल संरचना सिद्धांत: संघवाद प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि भारत की विविधता में निहित एक संवैधानिक सिद्धांत है।

असंतुलन पर संस्थागत प्रतिक्रियाएँ

  • राजामन्नार समिति (1969–71): संघ-राज्य संबंधों की पहली व्यवस्थित राज्य-स्तरीय समीक्षा, जिसने अधिक स्वायत्तता की वकालत की।
  • सरकारिया आयोग (1983–88): सहयोगात्मक संघवाद और अनुच्छेद 356 के संयमित उपयोग की सिफारिश की।
  • पुंछी आयोग (2007–10): शक्तियों के स्पष्ट विभाजन और अंतर-सरकारी तंत्रों की संस्थागत मजबूती की आवश्यकता की वकालत की।
  • न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ समिति (अप्रैल 2025): अप्रैल 2025 में गठित इस समिति को संघवाद को सुदृढ़ करने के लिए राज्यपालों की भूमिका, भाषा नीति, परिसीमन और जीएसटी की समीक्षा करने का कार्य सौंपा गया।

आगे की राह

  • संघ के उचित आकार का निर्धारण: केंद्र के कार्यक्षेत्र को रक्षा, मुद्रा और विदेश नीति जैसे मुख्य राष्ट्रीय दायित्वों तक सीमित करने और परिचालन संबंधी विषयों को राज्यों को सौंपने की आवश्यकता है।
  • वित्तीय संतुलन की पुनर्स्थापना: केंद्र को बिना शर्त कर-वितरण बढ़ाना चाहिए, केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं का युक्तिकरण करना चाहिए और राज्यों को क्षेत्रीय कार्यक्रमों की रूपरेखा व वित्तपोषण में अधिक स्वतंत्रता प्रदान करनी चाहिए।
  • संवैधानिक नैतिकता को सुदृढ़ करना: कार्यपालिका और विधायिका की प्रक्रिया को एस. आर. बोम्मई (1994) में प्रतिपादित संघवाद की भावना के अनुरूप बनाना चाहिए, जहाँ राज्यों को समान संवैधानिक भागीदार माना गया है।

निष्कर्ष

भारत की एकता सुनिश्चित होने के साथ, वास्तविक सहयोगात्मक संघवाद के लिए एक केंद्रित संघ और सशक्त राज्य आवश्यक हैं।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: विभाजन के बाद की आशंकाओं से निर्मित भारत की अर्ध-संघीय (Quasi-Federal) संरचना को अब संरचनात्मक पुनर्संतुलन की आवश्यकता है। समकालीन भारत में केंद्र–राज्य संबंधों के पुनर्समायोजन की आवश्यकता का परीक्षण कीजिए।

 (10 अंक, 150 शब्द)

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