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महिलाओं के नेतृत्व वाली विकेंद्रित नवीकरणीय ऊर्जा

Lokesh Pal February 18, 2026 03:13 6 0

संदर्भ

भारत भले ही वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रख रहा हो, लेकिन असली कमी गुणवत्तापूर्ण विद्युत आपूर्ति और ग्रामीण क्षेत्रों में लैंगिक समानता में है।  केवल विद्युत कनेक्शन प्रदान करने से आगे बढ़कर महिलाओं के नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRI) की ओर होना चाहिए।

संबंधित तथ्य 

  • महिला-नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा ग्रामीण महिलाओं को केवल ऊर्जा उपभोक्ता नहीं, बल्कि ऊर्जा उद्यमी और निर्णय-निर्माता के रूप में सशक्त बना सकती है।

महिला-नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRE) के बारे में

  • विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRE) एक परिवर्तनकारी स्वामित्व मॉडल को दर्शाती है, जिसमें छोटे स्तर की ऊर्जा प्रणालियाँ (जैसे- सौर मिनी-ग्रिड, सौर-चालित जल पंप और सौर ड्रायर) महिलाओं के सामूहिक समूहों, विशेषकर स्वयं सहायता समूहों द्वारा संचालित तथा स्वामित्व में होती हैं।
  • मॉडल: केंद्रीयकृत बड़े ऊर्जा पार्कों के विपरीत, DRE प्रणालियाँ, ऊर्जा उपयोग के स्थान के निकट स्थापित की जाती हैं।
    • यह मॉडल महिलाओं को प्रमुख डिजाइनर, स्वामी और संचालक के रूप में स्थापित करता है, जिससे ऊर्जा अवसंरचना घरेलू गरिमा और आर्थिक उत्पादकता, दोनों की आवश्यकताओं को पूरा करती है।
  • ढाँचा: यह व्यवस्था समाज–सरकार–बाजार के त्रिस्तरीय ढाँचे पर कार्य करती है, जहाँ सामुदायिक विश्वास (समाज) को सरकारी नीतिगत समर्थन (सरकार) और निजी क्षेत्र की दक्षता (बाजार) का सहारा मिलता है।

विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRE) के बारे में

  • विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRE) पारंपरिक बड़े विद्युत संयंत्र आधारित मॉडल का एक वैकल्पिक दृष्टिकोण है। इसमें विशाल केंद्रीय ग्रिड पर निर्भर रहने के बजाय, ऊर्जा का उत्पादन वहीं किया जाता है, जहाँ उसकी वास्तविक आवश्यकता होती है।

DRE मॉडल के छह मुख्य स्तंभ

  • स्थानीयकृत ऊर्जा उत्पादन: पारंपरिक ग्रिड प्रणाली के विपरीत, जिसमें विद्युत सैकड़ों किलोमीटर दूर से प्रसारित की जाती है, विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियाँ स्थल-विशिष्ट होती हैं।
    • ये सूर्य के प्रकाश, पवन या कृषि अपशिष्ट जैसे स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर एक घर, एक स्कूल या कुछ दुकानों के छोटे समूह को ऊर्जा प्रदान करती हैं।
    • इससे लंबी दूरी की विद्युत लाइनों में होने वाली प्रसारण और वितरण हानियाँ समाप्त हो जाती हैं।
  • मॉड्यूलर और विस्तारयोग्य डिजाइन: विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा कोई एक ही समाधान सबके लिए वाली व्यवस्था नहीं है।
    • यह अत्यंत लचीली होती है— कोई गाँव सौर लालटेन या एकल रूफटॉप सोलर पैनल से शुरुआत कर सकता है और धीरे-धीरे उसे ऐसे माइक्रो-ग्रिड में विकसित कर सकता है, जो सिंचाई पंपों या लघु उद्योगों को ऊर्जा प्रदान करे।
    • इससे समुदाय की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं के अनुसार क्रमिक निवेश करना संभव हो जाता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा और लचीलापन: क्योंकि विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा राष्ट्रीय ग्रिड से स्वतंत्र रूप से संचालित होती है, इसलिए यह बड़े पैमाने पर होने वाले विद्युत कटौती या लोड शेडिंग के प्रति कम संवेदनशील होती है।
    • आपदा-प्रवण या दूरस्थ क्षेत्रों—जैसे वन क्षेत्र या पहाड़ी इलाकों—में DRE एक भरोसेमंद वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में कार्य करती है, महत्त्वपूर्ण सेवाएँ मुख्य ग्रिड के विफल होने पर भी चालू रहती हैं।
  • उत्पादक उपयोग के लिए उत्प्रेरक: DRE केवल बुनियादी रोशनी तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक महत्त्व नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादक उपयोग में निहित है।
    • आटा चक्की, रेशम कातने की मशीनें या सौर ड्रायर जैसी उपकरणों को ऊर्जा देकर, DRE किसी ग्रामीण परिवार को केवल विद्युत उपभोक्ता से एक उत्पादक आर्थिक इकाई में बदल देती है, जिससे स्थानीय आय में सीधे वृद्धि होती है।
  • लोकतांत्रिक स्वामित्व: पारंपरिक ऊर्जा प्रणालियाँ अक्सर बड़े कॉरपोरेट या राज्य के नियंत्रण में होती हैं। DRE इस शक्ति को सीधे समुदाय के हाथों में सौंप देती है।
    • यह महिला-नेतृत्व वाले मॉडलों को सक्षम बनाती है, जहाँ स्थानीय स्वयं सहायता समूह या सहकारी संस्थाएँ ऊर्जा परिसंपत्तियों का स्वामित्व और प्रबंधन करती हैं। इससे आय स्थानीय अर्थव्यवस्था में ही बनी रहती है, न कि किसी केंद्रीय उपयोगिता तक पहुँचती है।
  • पर्यावरणीय और स्वास्थ्य लाभ: DRE एक स्वच्छ तकनीकी समाधान है, जो डीजल जनरेटर और केरोसिन लैंप का स्थान लेता है। इससे घरों के भीतर होने वाले वायु प्रदूषण में भारी कमी आती है, जो ग्रामीण महिलाओं और बच्चों में श्वसन रोगों का एक प्रमुख कारण है।
    • जीवाश्म ईंधन चरण को छोड़कर, DRE विकासशील क्षेत्रों को सीधे सतत् और कम-कार्बन भविष्य की ओर बढ़ने में मदद करती है।

वर्तमान परिदृश्य- विद्युत ग्रिड से आगे

प्रधानमंत्री सहज विद्युत हर घर योजना (सौभाग्य) ने लगभग हर घर तक भौतिक विद्युत कनेक्शन तो पहुँचा दिया, लेकिन विद्युत आपूर्ति की गुणवत्ता—जैसे नियमितता, पर्याप्त वोल्टेज और विश्वसनीयता—अब भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है।

  • विश्वसनीयता की कमी: ग्रामीण क्षेत्रों में अनियमित विद्युत आपूर्ति और वोल्टेज में उतार-चढ़ाव के कारण “कागजी विद्युतीकरण” की स्थिति बन जाती है, जहाँ स्वास्थ्य केंद्र जीवनरक्षक टीकों को सुरक्षित रखने में असमर्थ रहते हैं और स्कूलों के पास भरोसेमंद डिजिटल उपकरण नहीं होते हैं।
  • ऊर्जा असमानता: एक बल्ब जलाने और रसोई को चलाने के बीच गहरी असमानता है। आज भी लाखों महिलाएँ खाना पकाने के लिए खतरनाक जैव-ईंधन पर निर्भर हैं, क्योंकि केंद्रीय ग्रिड अक्सर उनकी ऊष्मीय ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाता है।

तुलनात्मक विश्लेषण — ग्रामीण भारत के लिए ऊर्जा मॉडल

विशेषता केंद्रीयकृत ग्रिड मॉडल महिला-नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा (DRE)
प्राथमिक लक्ष्य
  • बड़े पैमाने पर उत्पादन और राष्ट्रीय सुरक्षा: औद्योगिक और शहरी माँग को पूरा करने के लिए विशाल विद्युत संयंत्रों पर केंद्रित।
  • स्थानीय सशक्तीकरण: ग्रामीण आजीविका और घरेलू गरिमा के लिए विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध कराने पर केंद्रित।
प्रबंधन व शासन
  • ऊपर से नीचे की संरचना: राज्य की वितरण कंपनियों या बड़े कॉरपोरेट द्वारा प्रबंधित; निर्णय उपभोक्ता से दूर लिए जाते हैं।
  • नीचे से ऊपर की संरचना: स्वयं सहायता समूहों या ग्राम स्तरीय सामूहिक संस्थाओं द्वारा संचालित; शासन व्यवस्था समुदाय-आधारित और उत्तरदायी।
आपूर्ति की विश्वसनीयता
  • अनियमित आपूर्ति: प्रसारण–वितरण हानियों, वोल्टेज उतार-चढ़ाव और बार-बार विद्युत कटौती के प्रति अत्यधिक संवेदनशील।
  • उच्च विश्वसनीयता: ऊर्जा का उत्पादन उपयोग स्थल पर होने से आवश्यक सेवाओं और उपकरणों के लिए 24×7 स्थिर विद्युत सुनिश्चित।
लैंगिक भूमिका
  • निष्क्रिय उपभोक्ता: महिलाओं को केवल “लाभार्थी” के रूप में देखा जाता है; ऊर्जा अवसंरचना या मूल्य निर्धारण पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता।
  • सक्रिय स्वामित्व: महिलाएँ ऊर्जा परिसंपत्तियों की कानूनी स्वामी, संचालक और निर्णयकर्ता होती हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था का नियंत्रण उनके हाथ में रहता है।
आर्थिक प्रभाव
  • मानकीकरण पर जोर: उत्पादक गतिविधियों (पिसाई, शीतलीकरण, सिलाई) की बजाय केवल रोशनी उपलब्ध कराने पर ध्यान।
  • उत्पादक उपयोग पर केंद्रित: श्रम-साध्य कार्यों के यंत्रीकरण हेतु विशेष रूप से डिजाइन, जिससे घरेलू आय और स्थानीय उद्यमिता में वृद्धि।
तकनीकी रखरखाव
  • शहर-केंद्रित व्यवस्था: शहरी क्षेत्रों के पुरुष तकनीशियनों पर निर्भरता; ग्रामीण प्रणालियों के खराब होने पर लंबे समय तक सेवा बाधित रहती है।
  • स्थानीय कौशल विकास: “ऊर्जा सखी” या “सोलर दीदी” जैसे स्थानीय महिला कैडर का निर्माण, जो तुरंत मरम्मत और रखरखाव सँभाल सके।
पूँजी संरचना
  • सार्वजनिक/कॉरपोरेट ऋण: ट्रांसमिशन लाइनों जैसी बड़ी अवसंरचनाओं के लिए भारी और उच्च ब्याज वाले पूँजी निवेश की आवश्यकता होती है।
  • सूक्ष्म-वित्त और हरित ऋण: स्वयं सहायता समूहों की बचत और समर्पित हरित ऋण के माध्यम से समुदाय-स्वामित्व वाली परिसंपत्तियाँ तैयार करना।
सामाजिक परिणाम
  • सेवा प्रदाय: सफलता का आकलन केवल पहुँचाए गए कनेक्शनों (तारों) की संख्या से किया जाता है।
  • ऊर्जा संप्रभुता: सफलता का आकलन महिलाओं की एजेंसी, सुरक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता में वृद्धि से किया जाता है।

महिला-नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा की आवश्यकता क्यों है?

एनर्जी पाॅवर्टी एक लैंगिक बोझ है और स्थानीयकृत नवीकरणीय समाधान इसके कई महत्त्वपूर्ण आयामों को संबोधित करते हैं:

  • स्वास्थ्य और पोषण: जैव-ईंधन आधारित चूल्हों के स्थान पर स्वच्छ ऊर्जा अपनाने से घर के भीतर वायु प्रदूषण में भारी कमी आती है, जिससे हर वर्ष होने वाली लगभग दो लाख असमय मौतों को रोका जा सकता है।
  • गरीबी में कमी: ग्रामीण भारत में महिलाएँ औसतन प्रतिदिन 3–4 घंटे ईंधन लकड़ी एकत्र करने में लगाती हैं। विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा आधारित स्वचालन इस समय को मुक्त कर शिक्षा, उद्यमिता या विश्राम के लिए अवसर देता है।
  • सुरक्षा और स्वायत्तता: उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भरोसेमंद सौर स्ट्रीट लाइटिंग से शाम के समय सामुदायिक बैठकों और बाजारों में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी है, जिससे स्थानीय शासन में उनकी भागीदारी और आत्मविश्वास सुदृढ़ हुआ है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादक उपयोग: विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा ग्रामीण महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों को श्रम-साध्य कार्यों जैसे दूध को ठंडा करना या अनाज पिसाई—का यंत्रीकरण करने में सक्षम बनाती है, जो विश्वसनीय विद्युत के बिना पहले संभव नहीं थे।

भारत द्वारा उठाई गई प्रमुख पहलें

  • लखपति दीदी योजना: यह एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य 3 करोड़ “लखपति दीदियों” (ऐसी स्वयं सहायता समूह सदस्य, जिनकी वार्षिक आय ₹1 लाख या उससे अधिक हो) का निर्माण करना है। इसके अंतर्गत खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्र और अन्य आजीविका गतिविधियों में विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों को जोड़ा जा रहा है।
  • प्रधानमंत्री सूर्य घर (मुफ्त बिजली योजना) : इसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक 10,000 “सौर गाँव” स्थापित करना है। यह पहल छतों पर सौर ऊर्जा को बढ़ावा देती है और स्थानीय स्तर पर महिला-नेतृत्व वाले ऊर्जा प्रबंधन को प्रोत्साहित करती है।
  • प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम): यह योजना कृषि क्षेत्र को डीजल पर निर्भरता से मुक्त करने पर केंद्रित है। इसके तहत सौर पंप उपलब्ध कराए जाते हैं और महिला-नेतृत्व वाले जल उपयोगकर्ता समूहों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।
  • मिशन शक्ति: यह पहल लैंगिक बजटिंग के माध्यम से महिलाओं की आजीविका को स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ती है। वर्ष 2025–26 में रिकॉर्ड आवंटन के साथ, स्वच्छ ऊर्जा आधारित महिला उद्यमों को वित्तीय समर्थन प्रदान किया जा रहा है।

जिन प्रमुख चुनौतियों का समाधान आवश्यक है

संभावनाओं के बावजूद, वर्ष 2025–26 तक कुछ संरचनात्मक ‘अवरोध बिंदु’ बने हुए हैं:

  • उच्च पूँजीगत लागत: प्रारंभिक स्थापना लागत बहुत अधिक होती है। उदाहरण के लिए, सौर-चालित बल्क मिल्क चिलर की कीमत ₹25 लाख तक हो सकती है, जो बिना जमानत के गाँव स्तर के स्वयं सहायता समूहों की पहुँच से अक्सर बाहर होती है।
  • तकनीकी “रखरखाव अंतर”: झारखंड के दूरस्थ जिलों से आई हालिया रिपोर्टों के अनुसार, कई सौर प्रतिष्ठान इसलिए बंद पड़े हैं क्योंकि निकटतम तकनीशियन दूर के शहरों में रहने वाले पुरुष हैं। स्थानीय स्तर पर मरम्मत और रखरखाव के लिए महिला तकनीकी कैडर का अभाव एक बड़ी समस्या बना हुआ है।
  • पितृसत्तात्मक भूमि मानदंड: कृषि जनगणना के अनुसार, भारत में महिलाओं के पास केवल 13.9 प्रतिशत भूमि स्वामित्व है। भूमि अधिकारों की यह कमी सौर सिंचाई पंप जैसी परिसंपत्तियों के लिए औपचारिक बैंक ऋण प्राप्त करने में एक अत्यंत कठिन बाधा बन जाती है।

  • बाजार सूचना में असमानता: हिमाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में छोटे पैमाने के फल प्रसंस्करण उद्यम अब भी महँगे डीजल जनरेटर का उपयोग करते हैं, क्योंकि उन्हें सौर ड्रायर के लिए उपलब्ध सरकारी सब्सिडी और योजनाओं की पर्याप्त जानकारी नहीं होती है।

केस स्टडी

  • छत्तीसगढ़ (अंजोर विजन 2047): यह राज्य स्तरीय रोडमैप नवीकरणीय ऊर्जा को अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाने का लक्ष्य रखता है। इसके तहत 50,000 हरित रोजगार सृजित करने और बिहान मिशन (राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन) के माध्यम से महिलाओं को ऊर्जा उद्यमी के रूप में प्रशिक्षित करने की परिकल्पना की गई है।
  • ओडिशा (सौर रेशम कताई): केओंझार जैसे जिलों में सौर-चालित मशीनों ने हाथ से की जाने वाली कठिन “जाँघ-कताई” की जगह ले ली है। इससे बुनकर महिलाओं की मासिक आय लगभग ₹1,500 से बढ़कर ₹6,000 से अधिक हो गई है।
  • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (सोल परियोजना): सौर ऊर्जा लैंप परियोजना के अंतर्गत बिहार में “सोलर दीदी” का एक प्रशिक्षित समूह तैयार किया गया है, जो सौर लैंप का संयोजन, वितरण और रखरखाव करता है। इस पहल ने स्थानीय स्तर पर टिकाऊ सेवा मॉडल और आजीविका के अवसर सृजित किए हैं।

आगे की राह 

  • परिसंपत्ति स्वामित्व अनिवार्यता: नीतियों को उज्ज्वला योजना के आधार पर इस प्रकार बनाया जाना चाहिए कि ऊर्जा परिसंपत्तियों का प्राथमिक या संयुक्त स्वामित्व महिलाओं के नाम हो, ताकि तकनीक पर उनका कानूनी नियंत्रण सुनिश्चित किया जा सके।
  • “ऊर्जा सखी” कैडर का निर्माण: अंतिम छोर तक रखरखाव सुनिश्चित करने के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित आधारित व्यावसायिक प्रशिक्षण का विस्तार करते हुए स्थानीय महिला तकनीशियनों का एक सशक्त कार्यबल तैयार किया जाए।
  • वित्तीय नवाचार: महिला-नेतृत्व वाले स्वच्छ-तकनीक स्टार्ट-अप्स के लिए ऋण जोखिम कम करने हेतु प्रथम-हानि डिफॉल्ट गारंटी और समर्पित हरित ऋण सुविधाएँ लागू की जानी चाहिए।
  • पंचायत सशक्तीकरण: पंचायती राज संस्थानों को अपने स्वयं के स्रोत से होने वाले राजस्व का उपयोग करते हुए स्वयं सहायता समूहों के साथ साझेदारी में गाँव स्तर पर “ऊर्जा-एक-सेवा” मॉडल लागू करने में सक्षम बनाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष 

भारत का नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करने का सफर केवल मेगा-पार्कों के आधार पर पूरा नहीं किया जा सकता है। एक न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण के लिए आवश्यक है कि हाशिये पर खड़ी महिलाएँ ऊर्जा मूल्य शृंखला के केंद्र में लाई जाएँ। महिला-नेतृत्व वाली विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा को व्यापक रूप से अपनाकर, भारत एक साथ एनर्जी पाॅवर्टी, जलवायु परिवर्तन और लैंगिक असमानता—इस त्रि-संकट—का समाधान कर सकता है।

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