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नया विश्व अव्यवस्था: नियमों से शक्ति की ओर

Lokesh Pal February 18, 2026 05:15 12 0

संदर्भ:

रूस–यूक्रेन युद्ध और अमेरिका–चीन प्रतिद्वंद्विता के तेज होने के बीच, 1945 के बाद स्थापित संयुक्त राष्ट्र आधारित विश्व व्यवस्था कमजोर होती दिखाई दे रही है।

  • वैश्विक राजनीति नियम-आधारित बहुपक्षवाद से शक्ति-केंद्रित एकपक्षीयता की ओर बढ़ रही है।

ऐतिहासिक आधार: शक्ति पर नियमों की प्रधानता

  • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की दृष्टि: द्वितीय विश्व युद्ध के विनाश और जापान पर परमाणु बमबारी के बाद, विभिन्न राष्ट्रों ने सैन फ्रांसिस्को में एक नियम-आधारित व्यवस्था स्थापित करने का निर्णय लिया, ताकि वैश्विक संघर्ष की पुनरावृत्ति को रोकी जा सके।
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर: संयुक्त राष्ट्र की स्थापना इस उद्देश्य से की गई कि शक्ति पर कानून का नियंत्रण हो, न कि कानून पर शक्ति का।
    • इसे सामूहिक सुरक्षा, संप्रभु समानता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान को संस्थागत रूप देने के लिए निर्मित किया गया था।
  • ट्रूमैन सिद्धांत: अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने कहा था कि शक्तिशाली राष्ट्रों को भी स्वयं को “हमेशा अपनी इच्छा अनुसार कार्य करने की छूट” से वंचित रखना चाहिए, जिससे यह सिद्धांत स्थापित हुआ कि सभी राष्ट्र, आकार की परवाह किए बिना, कानून के तहत समान संप्रभुता का पालन करें।

वर्त्तमान विघटन: पाखंड से उदासीनता तक

  • मानकों का क्षरण: अमेरिका (जैसे वेनेज़ुएला में हस्तक्षेप) और रूस (यूक्रेन पर आक्रमण) जैसी बड़ी शक्तियों द्वारा किए गए कार्य संप्रभुता और गैर-आक्रमण सिद्धांतों के प्रति कमजोर प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
  • औचित्य से उदासीनता तक: पहले, नियमों के उल्लंघन को लोकतंत्र या सुरक्षा के नाम पर सही ठहराया जाता था।
    • हालाँकि, अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के प्रति खुली अवहेलना बढ़ रही है, जो मानकात्मक संयम में कमी का संकेत देती है।
  • संकेतात्मक नियम: अंतरराष्ट्रीय मानदंडों को अब शक्तिशाली राष्ट्र बाध्यकारी दायित्वों के बजाय लचीले या वैकल्पिक नियमों की तरह देखने लगे हैं।

वैश्विक परिणाम और “वैक्यूम”:

  • मानकों का कमजोर होना: जब अमेरिका जैसी बड़ी शक्तियाँ अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन को कमजोर करती हैं, तो अन्य राज्य—जिनमें चीन (ताइवान) और रूस (यूक्रेन) शामिल हैं क्षेत्रीय या रणनीतिक दावे को अधिक आक्रामक रूप से आगे बढ़ा सकते हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर संप्रभुता के मानक कमजोर होते हैं।
  • छोटे युद्धों का प्रसार: रोकथाम की क्षमता में कमी और वैश्विक सुरक्षा ढाँचे के कमजोर होने से स्थानीय स्तर पर संघर्ष बढ़ने का खतरा है।
  • चीनी कारक: जैसे-जैसे अमेरिका अपनी वैश्विक नेतृत्व भूमिका से पीछे हट रहा है, अंतरराष्ट्रीय शासन में एक रणनीतिक शून्यता उभर रही है।
    • चीन इस खाली जगह को तेजी से भर रहा है, अपने हितों के अनुसार नियमों और संस्थानों को आकार दे रहा है, जिससे वैश्विक शासन में विखंडन को बढ़ावा मिल रहा है।

बहुपक्षवाद की विफलता

  • एकपक्षीयता बनाम सामूहिक समस्याएँ: महामारी, जलवायु परिवर्तन और साइबर खतरे जैसी अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के लिए सहयोग आवश्यक है, फिर भी राज्य सामूहिक समाधानों के बजाय एकपक्षीय कार्रवाई को अधिक प्राथमिकता देने लगे हैं।
  • संरक्षक ही शिकारी: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के स्थायी सदस्य, जिन्हें शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, अक्सर स्वयं ही संघर्षों में शामिल रहते हैं, जिससे गतिविधियों में स्थगन और विश्वसनीयता में कमी आती है।
  • प्रणालियों का शस्त्रीकरण: व्यापार, प्रतिबंध और मानवाधिकार तंत्र को अब अधिकतर तटस्थ मानकों के बजाय भू-राजनीतिक प्रभाव के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

“अंतराल/इंटररेग्नम” (Interregnum): एक खतरनाक मध्य मार्ग

  • कमजोर प्रणाली: वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनी हुई है, लेकिन इसमें एकजुटता और अधिकार की कमी है।
    • भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका जैसे मध्यम शक्ति वाले देश अब भी संयुक्त राष्ट्र का समर्थन करते हैं, ताकि उन्हें मानक-आधारित सुरक्षा प्राप्त हो सके।
  • एंटोनियो ग्राम्शी का ‘इंटररेग्नम’ सिद्धांत: समकालीन विश्व एक संक्रमण काल को दर्शाता है, जहाँ पुरानी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कमजोर हो रही है, जबकि एक नई स्थिर और सुसंगत व्यवस्था अभी स्पष्ट रूप से उभर नहीं पाई है। जो अस्थिरता और प्रणालीगत अनिश्चितता को जन्म देती है।

निष्कर्ष

वास्तविक खतरा मानकों के क्रमिक क्षरण में निहित है, जहाँ शक्ति कानून पर हावी हो जाती है और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नींव कमजोर पड़ जाती है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: 1945 के बाद स्थापित नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अस्तित्व संकट का सामना कर रही है, जो ‘शक्ति पर कानून’ से बदलकर ‘शक्ति ही अधिकार है’ की ओर बढ़ रही है। इस ‘नई विश्व अव्यवस्था’ में योगदान देने वाले कारकों का विश्लेषण करें और भारत जैसी मध्य शक्तियों के रणनीतिक हितों पर इसके प्रभाव की चर्चा करें।

 (250 शब्द, 15 अंक)

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