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Lokesh Pal
February 26, 2026 05:00
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नौ-न्यायाधीशों की पीठ सबरीमला निर्णय से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों की समीक्षा करेगी, विशेषकर अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं (ERP) सिद्धांत की सीमा और उसका समानता के अधिकार के साथ संतुलन।
| पहलू | ERP परीक्षण | एंटी-एक्सक्लूज़न परीक्षण |
| मुख्य प्रश्न | क्या यह प्रथा धर्म के लिए आवश्यक (अभिन्न) है? | क्या यह प्रथा ऐसा बहिष्कार उत्पन्न करती है जो समानता और गरिमा का उल्लंघन करता है? |
| केंद्र बिंदु | धार्मिक केंद्रीयता और आवश्यक धार्मिकता | समान व्यवहार और व्यक्तिगत गरिमा का संरक्षण |
| न्यायालय की भूमिका | न्यायाधीश धर्मशास्त्री की भूमिका में — यह तय करते हैं कि क्या धार्मिक रूप से आवश्यक है | न्यायालय धार्मिक स्वायत्तता का सम्मान करते हैं; केवल बहिष्कार की स्थिति में हस्तक्षेप करते हैं |
| गरिमा के प्रति दृष्टिकोण | यदि कोई आवश्यक प्रथा गरिमा का उल्लंघन करे तो स्पष्ट समाधान नहीं | गरिमा संवैधानिक परीक्षण का केंद्रीय सिद्धांत है |
| धर्मनिरपेक्षता पर प्रभाव | धर्मनिरपेक्षता से टकराव — न्यायालय धार्मिक क्षेत्र में प्रवेश करते हैं | धर्मनिरपेक्षता की रक्षा — धार्मिक व्याख्या की आवश्यकता नहीं |
अंतिम समाधान धार्मिक स्वायत्तता की रक्षा और समानता तथा व्यक्तिगत गरिमा के संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने के बीच एक सामंजस्यपूर्ण संतुलन स्थापित करने में निहित है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:प्रश्न: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’ (ERP) परीक्षण पर निर्भरता ने उसे कई बार धार्मिक-व्याख्याकार (Theological) भूमिका निभाने के लिए बाध्य किया है। यह हमारे संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना को कमजोर करता है। प्रस्तावित ‘एंटी-एक्सक्लूज़न’ परीक्षण के संदर्भ में इस कथन की समालोचनात्मक समीक्षा कीजिए। नया ढाँचा किस प्रकार सामुदायिक आस्था और व्यक्तिगत गरिमा के बीच बेहतर संतुलन स्थापित कर सकता है? (15 अंक, 250 शब्द) |
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