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भारत में सुरक्षित बोतलबंद पानी के मिथक का विश्लेषण

Lokesh Pal February 26, 2026 05:30 7 0

संदर्भ

भारत में बोतलबंद पानी को अक्सर नगरपालिका की आपूर्ति की तुलना में साफ-सुथरा विकल्प माना जाता है, लेकिन इसके साथ गंभीर छिपे हुए स्वास्थ्य और पर्यावरणीय जोखिम जुड़े होते हैं।

सार्वजनिक धारणा में बदलाव

  • सार्वजनिक विश्वास से निजी निर्भरता की ओर: नगर पालिका के नल के पानी में घटते विश्वास के कारण सार्वजनिक और संस्थागत स्थानों में बोतलबंद पानी पर निर्भरता बढ़ गई है।
  • पूर्ण शुद्धता की धारणा: सीलबंद प्लास्टिक पैकेजिंग स्वच्छता और 100% सुरक्षा का मनोवैज्ञानिक विश्वास उत्पन्न करती है, जिसे ब्रांडिंग और प्रमाणन लेबल और मजबूत करते हैं।
  • छिपी हुई स्वास्थ्य चिंताएँ: यद्यपि बोतलबंद पानी सामान्यतः सूक्ष्मजीवों से मुक्त होता है, फिर भी इसमें माइक्रोप्लास्टिक, नैनोप्लास्टिक और रिसे हुए रसायन हो सकते हैं, विशेषकर उच्च तापमान के संपर्क में आने पर।

माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक से संबंधित छिपा हुआ खतरा

  • माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति: माइक्रोप्लास्टिक वे प्लास्टिक कण हैं जिनका आकार 5 मिमी से कम होता है और जो बोतलबंद पानी में पाए जाते हैं।
    • नागपुर में किए गए एक अध्ययन में चयनित ब्रांडों के नमूनों में प्रति लीटर 72–212 कण पाए गए।
    • मुंबई और तटीय आंध्र प्रदेश के अध्ययनों में परीक्षण किए गए सभी नमूनों में प्रदूषण पाया गया।
  • नैनोप्लास्टिक का उभरता खतरा: नैनोप्लास्टिक और भी छोटे कण होते हैं, जिन्हें सामान्य परीक्षण तकनीकों से पहचानना और भी कठिन होता है।
    • ये जैविक अवरोधों को पार कर सकते हैं, रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं और संभावित रूप से महत्वपूर्ण अंगों में जमा हो सकते हैं।
  • स्वास्थ्य पर प्रभाव: प्लास्टिक कण विषैला प्रदूषक और भारी धातुओं के वाहक के रूप में कार्य कर सकते हैं।
    • संभावित दीर्घकालिक जोखिमों में सूजन, कोशिकीय क्षति और अंतःस्रावी प्रणाली का विघटन शामिल हैं।

रासायनिक रिसाव (Chemical Leaching)

  • रिसाव की प्रक्रिया: प्लास्टिक की बोतलें रिसाव के माध्यम से जल को प्रदूषित कर सकती हैं, जिसमें रासायनिक योजक धीरे-धीरे प्लास्टिक से संग्रहित जल में स्थानांतरित हो जाते हैं।
  • हानिकारक पदार्थ: एंटिमनी, फ्थैलेट्स और अन्य प्लास्टिसाइज़र जैसे यौगिक समय के साथ जल में प्रवेश कर सकते हैं।
  • उच्च तापमान और सूर्यप्रकाश का प्रभाव: भारत में परिवहन और सड़क किनारे भंडारण के दौरान उच्च तापमान और पराबैंगनी (UV) विकिरण के संपर्क में आने से इन रासायनिक पदार्थों का उत्सर्जन तेज़ हो जाता है।
  • विनियामक अंतर: वर्त्तमान सुरक्षा मानक मुख्यतः व्यक्तिगत रासायनों के अल्पकालिक संपर्क का मूल्यांकन करते हैं, लेकिन वास्तविक भंडारण परिस्थितियों में संचयी और दीर्घकालिक संपर्क को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखते।

विनियामक और पर्यावरणीय संबंधी चिंताएँ

  • परीक्षण में कमी: यद्यपि बोतलबंद पानी का नियमन भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा किया जाता है, फिर भी वर्त्तमान मानकों में माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक की अनिवार्य जाँच शामिल नहीं है।
  • कमजोर प्रवर्तन: हजारों छोटे बोतलबंदी इकाइयाँ सीमित निगरानी में संचालित होती हैं, जो पहले से ही तनावग्रस्त भूजल संसाधनों का दोहन करती हैं।
  • पर्यावरणीय प्रतिपुष्टि चक्र: एकल-उपयोग प्लास्टिक बोतलों पर अत्यधिक निर्भरता प्लास्टिक प्रदूषण को बढ़ावा देती है। यह प्लास्टिक विभाजित होकर माइक्रोप्लास्टिक का निर्माण करते है और पुनः जल स्रोतों में मिलकर प्रदूषण को निरंतर बनाए रखता है।

आगे की राह

  • उपयोग-स्थल (Point-of-Use) निस्पंदन: घरेलू नल-आधारित जल शोधन प्रणालियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि प्रदूषकों के संपर्क को कम किया जा सके।
  • बेहतर भंडारण प्रथाएँ: प्लास्टिक बोतलों को लंबे समय तक उच्च तापमान और सीधे सूर्यप्रकाश के संपर्क में आने से रोकने के लिए प्रभावी मानकों को लागू किया जाना चाहिए।
  • नगर निगम के जल आपूर्ति को पुनर्जीवित करना: सरकार को सार्वजनिक उपयुक्तताओं में जनता का विश्वास बहाल करने के लिए नगर निगम की जल आपूर्ति को विश्वसनीय और स्वच्छ बनाने पर काम करना चाहिए।

निष्कर्ष

बोतलबंद पानी आपदाओं के दौरान और सुरक्षित जल आपूर्ति की कमी वाले क्षेत्रों में आवश्यक बना रहता है। इसलिए, इसका नियमित उपयोग कम करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारत में बोतलबंद पानी पर बढ़ती निर्भरता सार्वजनिक जल शासन में गहरी प्रणालीगत समस्याओं को दर्शाती है। विवेचना कीजिए।

 (10 अंक, 150 शब्द)

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