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पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष

Lokesh Pal March 02, 2026 03:34 6 0

संदर्भ

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मध्य वर्षों बाद सबसे भीषण झड़पें हुईं, जिससे महीनों से चले आ रहे तनाव और सीमा पर झड़पों ने खुले संघर्ष का रूप ले लिया है।

पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष की पृष्ठभूमि

  • ऐतिहासिक तनाव: विवाद दशकों पुराने हैं, विशेष रूप से विवादित डूरंड रेखा को लेकर, जिसे अफगानिस्तान ने कभी भी औपचारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता नहीं दी है।
  • वर्ष 2021 के बाद परिवर्तन: अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद, पाकिस्तान के साथ संबंध शुरू में सुधरे, लेकिन जल्द ही बिगड़ गए।
  • आतंकवादी शरणस्थल के आरोप: पाकिस्तान काबुल पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के नेताओं और पाकिस्तान के अंदर हमले करने वाले अन्य विद्रोहियों को शरण देने का आरोप लगाता है।
  • अफगान सरकार का आरोप: अफगान अधिकारी इन दावों का खंडन करते हैं और इसके बजाय पाकिस्तान पर तालिबान विरोधी आतंकवादी समूहों का समर्थन करने का आरोप लगाते हैं।
  • सीमा पर लगातार झड़पें: सीमा पर अक्सर झड़पें, तोपखाने की गोलीबारी और हवाई हमले होते रहते हैं, जो अक्सर आतंकवादी हमलों से भड़क उठते हैं।
  • असफल युद्धविराम: क्षेत्रीय देशों द्वारा मध्यस्थता द्वारा किए गए कई युद्धविराम प्रयास लगातार हिंसा और अविश्वास के कारण विफल हो गए हैं।

डूरंड रेखा विवाद

  • डूरंड रेखा 2,640 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है, जो पाकिस्तान (अविभाजित भारत का हिस्सा) और अफगानिस्तान को अलग करती है, जिसे वर्ष 1893 में खींचा गया था।
  • वर्तमान में, भारत और अफगानिस्तान के बीच की सीमा पीओके (PoK) में अवस्थित है, जो ऐतिहासिक डूरंड रेखा का एक हिस्सा है (विशेष रूप से वाखान कॉरिडोर में)। यह लगभग 106 किलोमीटर लंबी है।
  • औपनिवेशिक उत्पत्ति: इसे मॉर्टिमर डूरंड ने अफगानिस्तान और ब्रिटिश भारत के बीच एक रणनीतिक सीमा के रूप में सीमांकित किया था।
  • मुख्य विवाद: अफगानिस्तान ने इसे कभी भी आधिकारिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता नहीं दी है, यह तर्क देते हुए कि इसने पश्तून जनजातियों को विभाजित किया है।
  • नृजातीय आयाम: यह रेखा दोनों देशों में रहने वाली पश्तून आबादी को विभाजित करती है, जिससे सीमा पार आवागमन की माँग और ऐतिहासिक रूप से ‘पश्तूनिस्तान’ की माँग को बल मिलता है।
  • पाकिस्तान का रुख: पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और विरासत में मिली संधियों के तहत एक वैध और स्थापित अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है।
  • सुरक्षा संबंधी निहितार्थ: यहाँ का दुर्गम भू-भाग और वैधता को लेकर विवाद इसे उग्रवादी घुसपैठ, तस्करी और सीमा संघर्षों का केंद्र बनाते हैं।

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के बारे में

  • उत्पत्ति: तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) का गठन वर्ष 2007 में इस्लामी उग्रवादी गुटों के एक छत्र संगठन के रूप में हुआ था, जो मुख्य रूप से पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर सक्रिय हैं।
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य नेशन-स्टेट प्रणाली को समाप्त करना और पाकिस्तान में इस्लामी कानून की अपनी व्याख्या लागू करना है।
  • संचालन क्षेत्र: मुख्य रूप से कबायली और सीमावर्ती क्षेत्रों में सक्रिय; स्वात घाटी जैसे क्षेत्रों में ऐतिहासिक रूप से मजबूत।
  • अफगानिस्तान से संबंध: पाकिस्तान का आरोप है कि TTP का नेतृत्व और लड़ाके अफगानिस्तान में स्थित ठिकानों से कार्य करते हैं; अफगान अधिकारी इससे इनकार करते हैं।
  • अफगान-तालिबान संबंध: विदेशी ताकतों से लड़ने में ऐतिहासिक रूप से सहयोगी रहे हैं, लेकिन संगठनात्मक रूप से अलग हैं।
  • वर्तमान स्थिति: 2010 के दशक के मध्य में पाकिस्तानी सैन्य अभियानों ने इसे कमजोर कर दिया था, इसके बावजूद हाल के वर्षों में यह समूह फिर से सक्रिय हो गया है और इसके हमले बढ़ गए हैं।

पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष पर भारत का रणनीतिक परिप्रेक्ष्य

  • क्षेत्रीय स्थिरता संबंधी चिंता: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच अस्थिरता व्यापक दक्षिण एशियाई सुरक्षा के लिए खतरा है, जिसका भारत के रणनीतिक परिवेश पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
  • आतंकवाद और सुरक्षा जोखिम: भारत को चिंता है कि बढ़ते संघर्ष से चरमपंथी समूह मजबूत हो सकते हैं, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा हो सकती है और सीमा पार आतंकवाद का खतरा बढ़ सकता है।
  • पाकिस्तान पर रणनीतिक प्रभाव: पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर तनाव से भारत की पश्चिमी सीमा  पर अधिकता से सैन्य एकाग्रता कम हो सकती है, जिससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ेगा।
  • संपर्क और व्यापारिक हित: अफगानिस्तान के रास्ते मध्य एशिया से भारत की दीर्घकालिक संपर्क परियोजनाएँ, जैसे कि ईरान के चाबहार बंदरगाह के माध्यम से, अफगानिस्तान में स्थिरता पर निर्भर करती हैं।
  • शरणार्थी और मानवीय चिंताएँ: तनाव बढ़ने से शरणार्थियों का प्रवाह और मानवीय संकट उत्पन्न हो सकता है, जिस पर भारत, क्षेत्रीय जोखिमों के कारण नजर रखता है।
  • भू-राजनीतिक संतुलन: भारत एक स्थिर अफगानिस्तान चाहता है, जो किसी एक बाहरी शक्ति के प्रभुत्व में न हो और भारत विरोधी आतंकी समूहों के लिए सुरक्षित पनाहगाह न बने।

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