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संघर्ष और अस्थिरता के बीच महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा

Lokesh Pal March 06, 2026 05:30 45 0

संदर्भ

जब विश्व अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च 2026) को “अधिकार, न्याय, कार्रवाई: सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए Rights, Justice, Action: For All Women and Girls” विषय के साथ मना रहा है, संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती असुरक्षा और वैश्विक प्रतिबद्धताओं तथा वास्तविक सुरक्षा के बीच का अंतर चिंता का विषय बना हुआ है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • श्रम आंदोलनों से उत्पत्ति: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत वर्ष 1908 में न्यूयॉर्क की महिला श्रमिकों की हड़ताल से संबंधित है, जिसमें महिलाओं ने बेहतर वेतन, कम कार्य समय और राजनीतिक अधिकारों, जिसमें मताधिकार शामिल था, की माँग की थी, जो लिंग समानता के शुरुआती संघर्ष का प्रतीक है।
  • संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता: वर्ष 1977 में संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को मान्यता प्रदान की। इसके बाद यह महिलाओं की उपलब्धियों का उत्सव मनाने और लैंगिक समानता के लिए वैश्विक मंच बन गया।

संघर्षों का महिलाओं पर असमान प्रभाव

  • आर्थिक दोहरा बोझ: पितृसत्तात्मक समाजों में जब युद्ध या आर्थिक संकट के कारण पुरुषों का रोजगार खत्म हो जाता है, तो महिलाओं को रोजगार की तलाश करनी पड़ती है, साथ ही उन्हें घरेलू जिम्मेदारियाँ भी निभानी पड़ती हैं। जिससे उनके ऊपर कार्य का असमान बोझ बढ़ जाता है।
  • युद्ध का हथियार के रूप में यौन हिंसा: सशस्त्र संघर्षों में अक्सर महिलाओं के विरुद्ध व्यवस्थित यौन हिंसा शामिल होती है, जिसका उद्देश्य समुदायों को आतंकित और अपमानित करना होता है, जैसा कि वर्ष 1994 के रवांडा नरसंहार के दौरान देखा गया, जहाँ व्यापक “नरसंहारजन्य बलात्कार” को युद्ध की रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया गया।
  • मानसिक स्वास्थ्य संकट: हिंसा, विस्थापन और आघात के संपर्क में आने से अक्सर दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न होते हैं, जैसे कि पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD), अवसाद और चिंता, जिनके लिए निरंतर पुनर्वास और समर्थन की आवश्यकता होती है।

संस्थागत प्रतिक्रिया और जमीनी वास्तविकता

  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 1325: यह 31 अक्टूबर 2000 को पारित किया गया था, जिसका उद्देश्य संघर्ष के दौरान महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना और उन्हें शांति निर्माण, संघर्ष समाधान और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रियाओं में शामिल करना था।
  • संघर्ष के संपर्क में बढ़ोत्तरी: वर्त्तमान में लगभग 676 मिलियन महिलाएँ सक्रिय संघर्ष क्षेत्रों से 50 किमी के अंदर निवास करती हैं, जो वैश्विक स्तर पर महिलाओं को होने वाली बढ़ती संवेदनशीलता को दर्शाता है।
  • नागरिक हताहतों में वृद्धि: पिछले दो वर्षों में महिलाओं और बच्चों में नागरिक हताहतों की संख्या चार गुना बढ़ गई है।

शांति निर्माण प्रक्रियाओं से महिलाओं का बहिष्कार

  • अल्पप्रतिनिधित्व: संघर्षों से सबसे अधिक प्रभावित होने के बावजूद, महिलाएँ अधिकांशतः वार्ताओं से बाहर रहती हैं।
    • वर्ष 2024 में, दस में से नौ शांति प्रक्रियाओं में कोई महिला वार्ताकार नहीं थी, जो निर्णय लेने में बड़े लिंग अंतर को दर्शाता है।
  • शांति समझौतों की स्थायित्व: शोध दर्शाता है कि जब महिलाएँ वार्ता और सुलह प्रक्रियाओं में सार्थक भागीदारी करती हैं, तो शांति समझौते अधिक स्थायी और लंबे समय तक प्रभावी रहते हैं।
    • उदाहरण: वर्ष 2003 के लाइबेरियाई गृह युद्ध के दौरान, लेयमाह ग्लोवी (Leymah Gbowee) के नेतृत्व में “शांति के लिए जन आंदोलन” ने समुदायों के महिलाओं को संगठित किया ताकि वे नेताओं पर वार्ता के लिए दबाव डाल सकें, जिससे अंततः संघर्ष समाप्त हुआ और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त हुआ।

आगे की राह

  • महिलाओं को हितधारक बनाना: शांति वार्ताओं और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण में महिलाओं की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
  • समग्र समर्थन: संघर्ष क्षेत्रों में भोजन, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, आजीविका और मानसिक-सामाजिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
  • कार्य-उन्मुख दृष्टिकोण: वैश्विक संस्थाओं को नारेबाजी से आगे बढ़कर वास्तविक और जवाबदेह हस्तक्षेपों को जमीन पर लागू करना चाहिए।

निष्कर्ष

संघर्ष क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, मानवीय सहायता और सशक्तिकरण सुनिश्चित करना संपूर्ण विश्व की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसलिए 2026 का विषय “अधिकार, न्याय, कार्रवाई” केवल प्रतीकात्मक न रहकर वास्तविक परिवर्तन का आह्वान होना चाहिए।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: वैश्विक स्तर पर होने वाले सशस्त्र संघर्ष महिलाओं और बालिकाओं को असमान रूप से प्रभावित करते हैं, जिससे उनकी हिंसा, विस्थापन और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है। सशस्त्र संघर्षों का महिलाओं पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा कीजिए। साथ ही, शांति निर्माण और संघर्ष समाधान प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी के महत्व का भी परीक्षण कीजिए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

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