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ऋण वसूली न्यायाधिकरण

Lokesh Pal February 06, 2024 04:40 203 0

संदर्भ

हाल ही में संसद में दी गई एक सूचना के अनुसार, 24 जनवरी, 2024 तक ऋण वसूली न्यायाधिकरणों (Debts Recovery Tribunals-DRTs) के समक्ष लगभग 2.15 लाख मामले लंबित हैं।

संबंधित तथ्य

  • आवेदन:
    • DRTs में आवेदन, वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण एवं पुनर्निर्माण तथा प्रतिभूति हित प्रवर्तन अधिनियम (सरफेसी अधिनियम), 2002 की धारा 17 के तहत किए जाते हैं।

सरफेसी अधिनियम, 2002

  • सरफेसी अधिनियम, वित्तीय संस्थानों को भिन्न-भिन्न तरीकों से संपत्ति की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में मदद करता है।
  • इस अधिनियम को अलग-अलग प्रक्रियाओं और तंत्रों के माध्यम से गैर-निष्पादनकारी संपत्ति (NPA) संबंधी समस्या को हल करने के लिए तैयार किया गया है।
  • सरकार ने DRTs को पुनः जीवंत करने और नए दिवालियापन कानून के तहत परिसंपत्ति पुनर्निर्माण की प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए ‘एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों’ (Asset Reconstruction Companies-ARCs) को सशक्त बनाने हेतु अगस्त 2016 में सरफेसी अधिनियम में संशोधन भी किया है।
  • ऋण वसूली और दिवालियापन अधिनियम (आरडीबी अधिनियम), 1993 की धारा 19 के तहत भी आवेदन प्राप्त किए जाते हैं।
  • निपटान सीमा
  • ऋण वसूली और दिवालियापन (आरडीबी) अधिनियम के अनुसार, मामलों को शीघ्रता से निपटाया जाना चाहिए और कार्यवाही को अधिकतम दो सुनवाई में पूरा करने और आवेदन प्राप्त होने की तारीख से 180 दिनों के भीतर आवेदन का अंतिम निपटान करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए।

ऋण वसूली न्यायाधिकरण

  • परिचय
      • भारत में ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) प्रणाली को गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) के बढ़ते मुद्दे और ऋण वसूली से संबंधित विवादों को हल करने के लिए एक समर्पित तंत्र की आवश्यकता की प्रतिक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
      • बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के ‘शोध्य ऋण वसूली अधिनियम, 1993 (RDDBFI अधिनियम) के अंतर्गत DRTs की स्थापना हुई।
  • संरचना
      • DRT वित्त मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करते हैं।
      • उनकी संरचना न्यायालय के समान होती है।
      • प्रत्येक DRT का नेतृत्व एक पीठासीन अधिकारी करता है ।
      • पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति 5 वर्ष की अवधि या 62 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, के लिए की जाएगी।
      • पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।
  • उद्देश्य
      • इन न्यायाधिकरणों की स्थापना बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा ऋणों की वसूली से संबंधित मामलों के निर्णयों के लिए सिविल न्यायालयों को त्वरित एवं अधिक कुशल विकल्प प्रदान करने के लिए की गई थी।
  • अपीलीय न्यायाधिकरण
      • इसका अपील अधिकरण ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) है।
  • DRTs की स्थिति
      • भारत में DRTs अर्द्ध-न्यायिक निकाय हैं, जिनके पास ऋणों की वसूली से संबंधित मामलों पर विशिष्ट अधिकारिता होती है।
  • अधिकार
      • उनके पास बकाया वसूली के लिए बैंकों, वित्तीय संस्थाओं और अन्य संस्थाओं द्वारा दायर मामलों की सुनवाई का अधिकार होता है।
  • अधिकार-क्षेत्र
    • DRTs उन मामलों को सँभालते हैं जहाँ ऋण की राशि एक निर्दिष्ट सीमा से अधिक हो जाती है और उनके निर्णय सिविल न्यायालयों की डिक्री के रूप में लागू होते हैं।
    • किसी भी सिविल न्यायालय को DRTs द्वारा निपटाए गए किसी भी मामले के संबंध में किसी भी मुकदमे या कार्यवाही पर विचार करने की अधिकारिता नहीं होगी।

DRT की अधिकारिता वित्तीय दावों की एक विस्तृत शृंखला तक फैली हुई है, जिसमें बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिए गए ऋण, अग्रिम एवं वित्तीय सहायता शामिल हैं।

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