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मानसिक विकार: आईआईटी जोधपुर अध्ययन

Lokesh Pal February 12, 2024 05:06 122 0

संदर्भ

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) जोधपुर के द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार,  भारतीयों में  मानसिक स्वास्थ्य संबंधी रोगों के व्यापक प्रसार के बावजूद इसकी कम रिपोर्टिंग (Under) की जाती है।

संबंधित तथ्य 

  • वर्ष 2017-2018 के राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (NSS) में पाया गया कि भारत में बहुत कम लोगों ने मानसिक बीमारियाँ ( 1% से भी कम) होने की बात स्वीकार की है।
  • यह NIMHANS के वर्ष 2017 के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) के विपरीत है जिसमें अनुमान लगाया गया था कि लगभग 150 मिलियन भारतीयों  (कुल जनसंख्या का लगभग 15%) को मानसिक स्वास्थ्य उपचार की आवश्यकता है।

सर्वेक्षण के मुख्य निष्कर्ष:

  • जेब से खर्च: अस्पताल में भर्ती होने और बाह्य रोगी देखभाल दोनों के लिए जेब से होने वाला औसत खर्च सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में निजी क्षेत्र में काफी अधिक था।

  • मानसिक बीमारी पर गरीबी का प्रभाव: देखभाल और उपचार की खराब पहुँच से उत्पन्न गरीबी एवं विकलांगता मानसिक बीमारी वाले व्यक्तियों के साथ-साथ उनके परिवारों के जीवन की गुणवत्ता को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है।
  • निजी क्षेत्र की भूमिका: निजी क्षेत्र मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के एक प्रमुख प्रदाता के रूप में उभरा है जिसका बाह्य रोगी देखभाल (Outpatient Care) में 66.1% और आंतरिक रोगी देखभाल में 59.2% योगदान है।
  • मध्यम आयु वर्ग के व्यक्तियों पर बोझ: इस आयु वर्ग में मानसिक बीमारी के कारण विकलांगता उनकी उत्पादकता को प्रभावित करती है जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उनके योगदान को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।
  • कम शिक्षा और नौकरियाँ: सर्वेक्षण के अनुसार, कम शिक्षा और कम नौकरियों वाले गरीब घरों के लोगों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ होने की अधिक संभावना थी।

भारत में मानसिक विकारों की कम स्व-रिपोर्टिंग दरों के निहितार्थ:

  • गलत परिदृश्य: वास्तविक प्रसार को कम करके आँकने से आवश्यक संसाधन और समर्थन की पहुँच की कमी का सामना करना पड़ता है।
  • देखभाल में बाधाएँ: मानसिक बीमारी के लक्षणों और उपलब्ध उपचार विकल्पों के बारे में जागरूकता की कमी व्यक्तियों को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता को स्वीकार करने में बाधा उत्पन्न कर सकती है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: मानसिक बीमारी से व्यक्तियों के जोखिम भरे व्यवहार में शामिल होने या खुद को या दूसरों को नुकसान पहुँचाने की संभावना बढ़ सकती है।
  • क्षमता पर प्रभाव: मानसिक विकार से जुड़ी नकारात्मक सोच या कलंक की भावना के परिणामस्वरूप संबंधित व्यक्ति को भेदभाव और सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है, जिससे व्यक्तियों की समग्र विकास और समाज में सक्रिय रूप से भाग लेने की उनकी क्षमता प्रभावित हो सकती है।

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