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हाल ही में भारत ने इंडिया AI इंपैक्ट शिखर सम्मेलन 2026 में भारत-प्रथम कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्षमताओं को उन्नत करने हेतु तीन सॉवरन AI मॉडल (Sovereign AI Models) प्रस्तुत किए।
18 फरवरी 2026, 1946 के शाही नौसेना विद्रोह की 80वीं वर्षगाँठ है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम चरण के दौरान एक महत्त्वपूर्ण औपनिवेशिक-विरोधी विद्रोह था।

वर्ष 1946 का शाही नौसेना विद्रोह अपनी अल्पावधि के उपरांत उग्र औपनिवेशिक-विरोधी एकजुटता तथा भारत की स्वतंत्रता को तीव्र करने में उसकी भूमिका का एक सशक्त स्मरण बना हुआ है।
18वीं लोकसभा के कार्यकाल के लगभग दो वर्ष बीत जाने के बाद भी आचार समिति का गठन नहीं किया गया है।
इंडिया AI इंपैक्ट समिट 2026 में, भारत ने रेखांकित किया कि AI-संचालित डेटा सेंटर, आधुनिक ग्रिड पर बड़े, जटिल और गतिशील ‘लोड’ के रूप में उभर रहे हैं, जो भारत की विद्युत प्रणाली को महत्त्वपूर्ण रूप से पुनर्गठित कर सकते हैं।
भारत में डेटा केंद्रों की तीव्र वृद्धि एक ओर चुनौती है तो दूसरी ओर अवसर भी प्रस्तुत करती है। यदि यह वृद्धि अव्यवस्थित रहे, तो इससे ग्रिड अस्थिरता, टैरिफ भार और अवसंरचनात्मक अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
एनविडिया कॉरपोरेशन (Nvidia Corporation), जिसने वर्ष 1999 में प्रथम ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) विकसित किया था, वर्तमान में वैश्विक डिजिटल तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अर्थव्यवस्था के प्रमुख प्रेरक तत्त्व के रूप में पुनः चर्चा के केंद्र में है।
प्रधानमंत्री ने वर्ष 2026 के इंडिया AI इंपैक्ट शिखर सम्मेलन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए भारत के व्यापक “मानव विजन” का अनावरण किया।

केंद्रीय बजट 2026-27 में, जेंडर बजट विवरण (GBS) रिकॉर्ड ₹5.01 लाख करोड़ (पिछले वर्ष की तुलना में 11.55% की वृद्धि) तक पहुँच गया, जिससे कुल व्यय का हिस्सा बढ़कर 9.37% (8.86% से) हो गया, 53 मंत्रालयों और पाँच केंद्रशासित प्रदेशों ने आवंटन की रिपोर्ट की, जो नारी शक्ति के प्रति प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है।




रिकॉर्ड तोड़ आँकड़े एक ओर नीति के प्रति सुदृढ़ प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं, वहीं इन नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के मार्ग में अब भी कई संरचनात्मक चुनौतियाँ बनी हुई हैं:
₹5.01 लाख करोड़ का आवंटन एक साहसिक मील का पत्थर है, फिर भी सफलता काल्पनिक परिव्यय से मूर्त परिणामों की ओर बढ़ने पर निर्भर करती है। जैसा कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कहा, “मैं किसी समुदाय की प्रगति को महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति की डिग्री से मापता हूँ।” वास्तविक विकास के लिए शहरी-ग्रामीण विभाजन को पाटने और “समय की गरीबी” की संरचनात्मक बाधाओं को समाप्त करने की आवश्यकता है।
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