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स्टार्ट-अप इंडिया का एक दशक

Lokesh Pal January 19, 2026 04:30 75 0

संदर्भ

16 जनवरी, 2026 को स्टार्ट-अप इंडिया पहल की 10वीं वर्षगाँठ (राष्ट्रीय स्टार्टअप दिवस) मनाई जाएगी।

राष्ट्रीय स्टार्ट-अप दिवस के बारे में

  • राष्ट्रीय स्टार्ट-अप दिवस की घोषणा: भारत भर के उद्यमियों और नवोन्मेषकों को राष्ट्रीय मान्यता प्रदान करने के लिए वर्ष 2022 में 16 जनवरी को आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय स्टार्ट-अप दिवस के रूप में नामित किया गया था।
  • दसवीं वर्षगाँठ: वर्ष 2026 में इस पहल के एक दशक पूरे होने का समारोह मनाया जाएगा, जो नीतिगत निरंतरता और भारत के स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र की बढ़ती परिपक्वता को दर्शाता है।

स्टार्ट-अप्स के बारे में

  • अर्थ: स्टार्ट-अप एक नवस्थापित, नवाचार-आधारित व्यवसाय है, जिसे किसी विशिष्ट समस्या का समाधान करने के लिए एक मापनीय उत्पाद या सेवा के साथ बनाया जाता है, जिसमें तीव्र वृद्धि की क्षमता निहित होती है।
  • भारत में स्टार्ट-अप: भारतीय नियामक संदर्भ में, स्टार्ट-अप एक ऐसी इकाई है, जो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, पार्टनरशिप फर्म या लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (LLP) के रूप में पंजीकृत होती है।
    • उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) द्वारा मान्यता प्राप्त करने के लिए, इकाई को निम्नलिखित शर्तें पूर्ण करनी होती हैं:
      • कंपनी की स्थापना की तिथि से दस वर्ष के भीतर होनी चाहिए।
      • किसी भी पूर्व वित्तीय वर्ष में कंपनी का वार्षिक कारोबार ₹100 करोड़ से अधिक नहीं होना चाहिए।
      • कंपनी का ध्यान उत्पादों या सेवाओं के नवाचार, विकास या सुधार पर केंद्रित होना चाहिए अथवा रोजगार सृजन की उच्च क्षमता वाला एक स्केलेबल बिजनेस मॉडल होना चाहिए।
  • स्टार्ट-अप के उदाहरण
    • स्टार्ट-अप: फ्लिपकार्ट, पेटीएम, ओला, जोमैटो (ये सभी भारत में स्टार्ट-अप के रूप में शुरू हुए थे)।
    • वैश्विक यूनिकॉर्न: एयरबीएनबी, उबर, स्पेसएक्स।
    • क्षेत्र: फिनटेक, हेल्थटेक, एग्रीटेक, एडटेक, स्वच्छ ऊर्जा।

  • मुख्य विशेषताएँ
    • नवस्थापित: स्टार्ट-अप आमतौर पर विकास के शुरुआती चरण में होते हैं।
    • नवाचार-उन्मुख: वे समस्याओं को नए तरीकों से हल करने और अनूठे उत्पाद या सेवाएँ प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
    • विस्तार शमता: तेजी से बढ़ने के लिए डिजाइन किए गए, अक्सर बड़े बाजारों को लक्षित करते हैं।
  • वित्तपोषण के स्रोत: स्टार्ट-अप आमतौर पर विभिन्न वित्तपोषण स्रोतों पर निर्भर करते हैं, जैसे:
    • स्वयं द्वारा वित्तपोषित उद्यम (बूटस्ट्रैपिंग)
    • प्रारंभिक चरण के निवेशक (एंजल निवेशक)
    • कंपनियों द्वारा प्रदान की गई पूँजी (वेंचर कैपिटल)
    • बैंक ऋण या क्रेडिट
    • उद्यमिता को समर्थन देने वाली सरकारी योजनाएँ
    • ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से क्राउडफंडिंग।

  • स्टार्ट-अप क्यों महत्त्वपूर्ण हैं: स्टार्ट-अप रोजगार सृजन, नवाचार को बढ़ावा देने, प्रतिस्पर्द्धा वृद्धि, नई तकनीकों को अपनाने को प्रोत्साहित करने और देश की समग्र आर्थिक वृद्धि में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    • वे उद्यमिता की संस्कृति को भी बढ़ावा देते हैं और पारंपरिक उद्योगों में नए दृष्टिकोण के समन्वय और स्थापना पर बल देते हैं।

स्टार्ट-अप मूल्यांकन से संबंधित शर्तें

  • यूनिकॉर्न: एक स्टार्ट-अप जिसका मूल्य 1 बिलियन डॉलर से अधिक है। यह शब्द एलीन ली द्वारा वर्ष 2013 में गढ़ा गया था।
  • डेकाकॉर्न: एक स्टार्ट-अप जिसका मूल्य 10 बिलियन डॉलर से अधिक है।
  • हेक्टोकॉर्न: अत्यंत दुर्लभ स्टार्ट-अप, जिनका मूल्य 100 बिलियन डॉलर से अधिक है।
  • मिनकॉर्न: एक स्टार्ट-अप, जिसका मूल्य 1 बिलियन डॉलर से कम है।
  • सूनिकॉर्न: तेजी से बढ़ने वाले स्टार्ट-अप, जिनमें 1 बिलियन डॉलर के मूल्य तक पहुंचने की क्षमता है।

स्टार्ट-अप इंडिया पहल के बारे में

  • स्टार्ट-अप इंडिया वर्ष 2016 में नवाचार और उद्यमिता के लिए एक समावेशी पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई एक प्रमुख पहल है।
  • नोडल मंत्रालय: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) द्वारा संचालित।
  • उद्देश्य: स्टार्ट-अप्स पर नियामक बोझ को कम करना, जिससे वे अपने मुख्य व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित कर सकें और अनुपालन लागत को कम रख सकें।

स्टार्ट-अप इंडिया के तहत स्टार्ट-अप्स को मिलने वाले लाभ

  • स्व-प्रमाणीकरण: स्टार्ट-अप एक सरल ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से 6 श्रम कानूनों और 3 पर्यावरण कानूनों के अनुपालन का स्व-प्रमाणीकरण कर सकते हैं।
  • श्रम कानून
    • निगमन की तिथि से 5 वर्षों तक कोई निरीक्षण नहीं होगा।
    • निरीक्षण केवल तभी होगा, जब कोई विश्वसनीय, लिखित शिकायत प्राप्त हो और वरिष्ठ अधिकारी द्वारा अनुमोदित हो।
  • पर्यावरण कानून
    • CPCB द्वारा परिभाषित कम प्रदूषण वाले उद्योग’ (जिन्हें श्वेत श्रेणी‘ कहा जाता है) में आने वाले स्टार्ट-अप अनुपालन का स्व-प्रमाणन कर सकते हैं।
    • ऐसे मामलों में केवल आकस्मिक जाँच ही की जा सकती है।
  • कर छूट: आयकर अधिनियम की धारा 80-IAC के तहत पात्र स्टार्ट-अप अपने प्रथम दस वर्षों के भीतर तीन वर्ष की आयकर छूट का दावा कर सकते हैं।

स्टार्ट-अप इंडिया की प्रमुख विशेषताएँ

  • स्टार्ट-अप के सभी चरणों में सहायता: यह स्टार्ट-अप आइडिया जनरेशन, इनक्यूबेशन, बाजार में प्रवेश और स्केल-अप तक संपूर्ण जीवन चक्र में सहायता प्रदान करता है, जिससे प्रारंभिक चरण के जोखिम तथा विकास संबंधी बाधाएँ कम होती हैं।

  • विकेंद्रीकृत और समावेशी उद्यमिता: यह स्टार्ट-अप प्रथम श्रेणी के शहरों से परे द्वितीय, तृतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यमिता को बढ़ावा देता है, जिससे समावेशी नवाचार तथा संतुलित क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित होता है।
  • राज्य रैंकिंग फ्रेमवर्क के माध्यम से प्रतिस्पर्द्धी संघवाद: राज्यों का स्टार्ट-अप रैंकिंग फ्रेमवर्क (SRF) नीतिगत समर्थन, संस्थागत क्षमता और पारिस्थितिकी तंत्र की परिपक्वता के आधार पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का मूल्यांकन करता है, जिससे अंतर-राज्यीय प्रतिस्पर्द्धा और नीतिगत नवाचार में बढोतरी होती है।
  • क्षेत्रीय फोकस और पारिस्थितिकी तंत्र क्षमता निर्माण: यह स्टार्टअप इंडिया हब के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी, कृषि प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा और डीप-टेक जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को लक्षित सहायता प्रदान करता है, साथ ही मेंटरशिप, प्रशिक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र कनेक्टिविटी भी प्रदान करता है।

स्टार्ट-अप इंडिया के अंतर्गत प्रमुख योजनाएँ

  • स्टार्ट-अप्स के लिए फंड ऑफ फंड्स (FFS): इसका प्रबंधन भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) द्वारा किया जाता है और इसका कोष ₹10,000 करोड़ है।
    • वर्ष 2026 की शुरुआत तक, इसने 140 से अधिक वैकल्पिक निवेश फंडों (AIFs) में पूँजी निवेश किया है, जिन्होंने सामूहिक रूप से 1,370 से अधिक स्टार्ट-अप्स में ₹25,500 करोड़ से अधिक का निवेश किया है।
  • स्टार्ट-अप इंडिया सीड फंड स्कीम (SISFS): ₹945 करोड़ के कोष के साथ, यह योजना प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट (PoC), प्रोटोटाइपिंग और मार्केट एंट्री के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
    • 215 से अधिक इनक्यूबेटरों को इन फंडों को प्रारंभिक चरण के उद्यमों तक पहुँचाने की मंजूरी दी गई है।
  • स्टार्ट-अप्स के लिए क्रेडिट गारंटी योजना (CGSS): बिना गिरवी के ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई इस योजना के तहत नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी (NCGTC) लिमिटेड के माध्यम से 800 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 330 से अधिक ऋणों की गारंटी दी गई है।
  • MAARG पोर्टल: मेंटरशिप, एडवाइजरी, असिस्टेंस, रेजिलिएंस और विकास कार्यक्रम उद्यमियों को अनुभवी सलाहकारों से जोड़ता है, ताकि उन्हें रणनीतिक मार्गदर्शन और मजबूती प्रदान की जा सके।
  • स्टार्टअप इंडिया इन्वेस्टर कनेक्ट पोर्टल: SIDBI के सहयोग से विकसित एक डिजिटल प्लेटफॉर्म, जो उद्यमियों को एक ही आवेदन के माध्यम से कई वेंचर कैपिटल (VC) फंड तक पहुँचने की सुविधा देता है।

स्टार्ट-अप इंडिया के अंतर्गत प्रमुख उपलब्धियाँ (2016-2026)

  • स्टार्ट-अप इकोसिस्टम का तीव्र विस्तार: दिसंबर 2025 तक भारत में 2 लाख से अधिक DPIIT-मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप हो चुके हैं, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े स्टार्ट-अप इकोसिस्टम में सम्मिलित हो गया है।
  • यूनिकॉर्न स्टार्ट-अप्स का उदय: यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स की संख्या वर्ष 2014 में 4 से बढ़कर वर्ष 2026 तक 120 से अधिक हो गई है, जिनका कुल मूल्यांकन 350 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है।
  • उद्यमिता का विकेंद्रीकरण और लोकतांत्रीकरण: DPIIT-मान्यता प्राप्त लगभग 50% स्टार्टअप, टियर-II और टियर-III शहरों से हैं, जो विकेंद्रीकृत, क्षेत्रीय रूप से संतुलित और समावेशी उद्यमिता की ओर एक परिवर्तन का संकेत देता है।
  • सामाजिक समावेशन और लैंगिक समानता: DPIIT-मान्यता प्राप्त 45% से अधिक स्टार्ट-अप्स में न्यूनतम एक महिला निदेशक या भागीदार है, जो महिला-नेतृत्व वाली उद्यमिता, सामाजिक समानता और समावेशी आर्थिक भागीदारी में हुई प्रगति को उजागर करता है।
  • नवाचार और बौद्धिक संपदा (IP) पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाना: राष्ट्रीय नवाचार विकास एवं संवर्द्धन पहल (NIDHI) जैसे नवाचार कार्यक्रमों ने 1,100 से अधिक बौद्धिक संपदा संपत्तियाँ सृजित की हैं।
    • इसने 12,000 से अधिक स्टार्ट-अप्स को सहयोग प्रदान किया है, जिससे भारत के अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) आधार को मजबूती मिली है।

भारत में स्टार्टअप्स को समर्थन देने वाली अन्य सरकारी योजनाएँ

  • अटल इनोवेशन मिशन (AIM) 2.0 – नीति आयोग, AIM 2.0: पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए प्रायोगिक पहलों पर केंद्रित है।
    • अटल टिंकरिंग लैब्स (ATLs): 733 जिलों में 10,000 से अधिक प्रयोगशालाएँ 1.1 करोड़ छात्रों को रोजगार प्रदान कर रही हैं।
    • भाषा समावेशी नवाचार कार्यक्रम (LIPI): 22 अनुसूचित भाषाओं में गैर-अंग्रेजी भाषी लोगों के लिए बाधाओं को कम करने के लिए 30 स्थानीय भाषा नवाचार केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं।
  • MeitY स्टार्ट-अप हब (MSH): TIDE 2.0 (उद्यमियों का प्रौद्योगिकी अंतर्ग्रहण और विकास) के माध्यम से सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तथा ब्लॉकचेन जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करते हुए 6,148 से अधिक स्टार्ट-अप और 517 इनक्यूबेटरों को सहायता प्रदान करता है।
  • NIDHI (राष्ट्रीय नवाचार विकास और संवर्धन पहल): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का एक व्यापक कार्यक्रम, जिसने 1,30,000 से अधिक रोजगार सृजित किए हैं और NIDHI-PRAYAS (युवा एवं महत्त्वाकांक्षी प्रौद्योगिकी उद्यमियों को प्रोत्साहन और त्वरण) के माध्यम से विचार से लेकर प्रोटोटाइप तक की प्रक्रिया में सहायता प्रदान करता है।
  • जमीनी स्तर और ग्रामीण कार्यक्रम
    • SVEP (स्टार्टअप ग्राम उद्यमिता कार्यक्रम): यह दीनदयाल अंत्योदय योजना (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) के अंतर्गत एक उप-योजना है, जिसने 3.74 लाख उद्यमों को सहायता प्रदान की है।
    • ASPIRE (नवाचार, ग्रामीण उद्योग और उद्यमिता प्रोत्साहन योजना): यह आजीविका व्यवसाय इनक्यूबेटर (LBI) के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा देती है।
    • PMEGP (प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम): यह खादी एवं ग्राम उद्योग आयोग (KVIC) के माध्यम से कार्यान्वित एक ऋण-आधारित सब्सिडी योजना है।
  • उद्यमिता पर राष्ट्रीय अभियान (जनवरी 2026 में लॉन्च):  DAY-NRLM (दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन) के तहत एक नई पहल जिसका शीर्षक है ‘हर घर उद्यम, हर गाँव समृद्ध।”
    • उद्देश्य: उद्यम प्रोत्साहन पर 50,000 सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों (CRP) को प्रशिक्षित करना।
    • प्रभाव: इसका उद्देश्य 50 लाख स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के सदस्यों को उद्यमिता विकास कार्यक्रम (EDP) का प्रशिक्षण प्रदान करना है, ताकि 3 करोड़ “लखपति दीदियों” (1 लाख रुपये से अधिक वार्षिक आय वाली महिलाएं) को सक्षम बनाया जा सके।

भारत में स्टार्ट-अप इकोसिस्टम के सामने चुनौतियाँ

  • वित्तपोषण और वित्तीय पहुँच: स्टार्ट-अप्स को पर्याप्त प्रारंभिक चरण का वित्तपोषण और वेंचर कैपिटल प्राप्त करने में लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, खासकर वित्तपोषण में मंदी या वैश्विक बाजार में परिवर्तन के दौरान।
    • उदाहरण: भारत में तकनीकी स्टार्ट-अप इक्विटी फंडिंग 2025 में घटकर 10.5 बिलियन डॉलर रह गई, जो वर्ष 2024 की तुलना में 17% की वार्षिक गिरावट है और वर्ष 2023 में जुटाए गए 11 बिलियन डॉलर से 4% कम है।
  • नियामक जटिलता और अनुपालन: भारत में स्टार्ट-अप्स जटिल नियामक ढाँचों से जूझ रहे हैं, विशेष रूप से बदलते कर कानूनों (जैसे- GST) और श्रम संहिताओं से।
    • उदाहरण: Navi और जुपिटर जैसे फिनटेक स्टार्ट-अप्स को RBI के अनुपालन में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, और टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म अस्पष्ट डेटा सुरक्षा नियमों से जूझ रहे हैं।
  • बुनियादी ढाँचा और प्रतिभा की कमी: हालाँकि प्रमुख शहरों में बेहतर बुनियादी ढाँचा उपलब्ध है, लेकिन टियर-II और टियर-III शहरों में अभी भी कनेक्टिविटी की समस्या है और सह-कार्य स्थलों और कुशल प्रतिभा की कमी है।
    • उदाहरण: ग्रामीण क्षेत्रों में क्रोपिन (CropIn) और देहात (DeHaat) जैसी कृषि-तकनीक स्टार्ट-अप कंपनियों को खराब इंटरनेट कनेक्टिविटी का सामना करना पड़ता है, और AI/ML स्टार्ट-अप कंपनियाँ प्रतिभा के लिए वैश्विक तकनीकी दिग्गजों से प्रतिस्पर्द्धा करती हैं।
  • बाजार पहुंच और प्रतिस्पर्धा: स्टार्टअप कंपनियों को स्थापित कॉरपोरेट कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है, जिनके पास अधिक वित्तीय शक्ति और बाजार में दबदबा होता है।
    • बड़ी कंपनियों द्वारा अपनाई जाने वाली मूल्य प्रतिस्पर्धा की रणनीति और रियायती सेवाएं अक्सर स्टार्टअप कंपनियों के लिए बाजार में टिके रहना मुश्किल बना देती हैं।
  • बौद्धिक संपदा और कानूनी बाधाएँ: पेटेंट और ट्रेडमार्क दाखिल करने में लगने वाली उच्च लागत और देरी के कारण स्टार्ट-अप्स को बौद्धिक संपदा संरक्षण प्राप्त करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
    • उदाहरण: स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में बायोटेक स्टार्ट-अप्स को पेटेंट अनुमोदन में देरी का सामना करना पड़ता है, जिससे समय पर उत्पादों का व्यावसायीकरण करने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है।
  • डीप-टेक व्यावसायीकरण: डीप-टेक स्टार्ट-अप्स को उत्पाद विकास के लिए लंबी अवधि का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए दीर्घकालिक स्थिर पूँजी की आवश्यकता होती है।
    • उदाहरण: स्काईरूट एयरोस्पेस और अग्निकुल कॉस्मॉस जैसे स्पेस-टेक स्टार्ट-अप्स को लंबी समय सीमा और उच्च प्रारंभिक लागत का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए अधिक प्रभावी निवेशकों की आवश्यकता होती है।
  • अन्य
    • ग्रामीण-शहरी विभाजन: ग्रामीण स्टार्ट-अप डिजिटल साक्षरता की कमी और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे जैसी चुनौतियों का सामना करते हैं।
    • प्रतिभा प्रतिधारण: बड़े संगठनों और अंतरराष्ट्रीय अवसरों से प्रतिेस्पर्द्धा के कारण स्टार्ट-अप प्रतिभा प्रतिधारण के लिए संघर्ष करते हैं।
    • लिंगभेद: वित्तपोषण में लिंगभेद और सांस्कृतिक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति महिलाओं और गैर-महानगरीय क्षेत्रों के व्यक्तियों की भागीदारी को सीमित करती रहती है।
      • सक्रिय स्टार्ट-अप में से केवल लगभग 7.5% का नेतृत्व महिला संस्थापकों द्वारा किया जाता है, और इन उद्यमों के लिए जुटाई गई पूँजी में गिरावट देखी गई है।

आगे की राह

  • वित्तीय सहायता और वित्तीय सहायता प्रणालियों को सुदृढ़ीकरण
    • घरेलू निवेश बढ़ाना: विदेशी पूँजी पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू वेंचर कैपिटल, एंजेल इन्वेस्टमेंट और क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म का विस्तार करना।
    • क्षेत्रीय फोकस: विकास को विकेंद्रीकृत करने के लिए टियर-II/टियर-III और ग्रामीण स्टार्ट-अप्स के लिए राज्य-नेतृत्व वाले फंड और प्रोत्साहन योजनाएँ बनाना।
      • राज्य निजी वेंचर कैपिटल निवेश को बढ़ावा देने और स्थानीय स्टार्ट-अप्स को समर्थन देने के लिए सक्रिय रूप से अपने स्वयं के फंड-ऑफ-फंड्स (जैसे, तमिलनाडु का ₹100 करोड़ का सह-निर्माण फंड) बना रहे हैं – एक ऐसा मॉडल जिसे टियर-II/III इकोसिस्टम के लिए भी अपनाया जा सकता है।
  • व्यापार करने में सुगमता के लिए विनियामक सुधार
    • अनुपालन को सरल बनाना: स्टार्ट-अप्स पर प्रशासनिक बोझ कम करने के लिए कराधान नीतियों, विशेष रूप से GST और श्रम कानूनों को सुव्यवस्थित करना।
    • लचीला बौद्धिक संपदा ढाँचा तैयार करना: पेटेंट सब्सिडी प्रदान करना और बौद्धिक संपदा अधिकार पंजीकरण के लिए आवश्यक समय को कम करना ताकि नवाचारों का तेजी से व्यावसायीकरण हो सके, विशेष रूप से डीप-टेक और बायोटेक स्टार्ट-अप्स के लिए।
  • बुनियादी ढाँचे और डिजिटल कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना
    • को-वर्किंग स्पेस’ विकसित करना: टियर-II और टियर-III के शहरों में इनक्यूबेटर और को-वर्किंग स्पेस में निवेश करना, ताकि छोटे क्षेत्रों में स्टार्ट-अप्स के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे का मजबूत किया जा सके साथ ही परिचालन लागत में भी कमी आएगी।
      • बिहार आइडिया फेस्टिवल पोर्टल जैसी सरकारी और राज्य स्तरीय पहलों के माध्यम से विभिन्न जिलों से 10,000 से अधिक स्टार्ट-अप विचारों को प्रोत्साहित किया जाता है, मूलभूत स्तर पर नवाचार को बढ़ावा दिया जाता है और ग्रामीण क्षेत्रों की कनेक्टिविटी को पारिस्थितिकी तंत्र में विस्तारित किया जाता है।
    • डिजिटल कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना: कृषि-तकनीक और टेलीमेडिसिन जैसे क्षेत्रों में स्टार्ट-अप्स के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीण तथा कम विकसित क्षेत्रों में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी एवं डिजिटल बुनियादी ढाँचे में सुधार करना।
  • प्रतिभा विकास और स्थायित्व प्रोत्साहन
    • उद्योग-शैक्षणिक साझेदारी विकसित करना: AI, ब्लॉकचेन और डेटा साइंस जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों में प्रतिभाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालयों तथा उद्योगों के बीच सहयोग को मजबूत करना।
    • कर्मचारियों के स्थायित्व हेतु प्रोत्साहन: स्टार्ट-अप्स में कुशल पेशेवरों को बनाए रखने के लिए कर्मचारी स्टॉक विकल्प (ESO), प्रशिक्षण कार्यक्रम और व्यावसायिक विकास के अवसर प्रदान करना।
  • समावेशी उद्यमिता को बढ़ावा देना
    • महिला उद्यमियों को समर्थन देना: स्टैंड-अप इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया हब जैसे कार्यक्रमों का विस्तार करना, ताकि महिला नेतृत्व वाले स्टार्ट-अप्स को मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता प्रदान की जा सके तथा उद्यमिता जगत में लैंगिक असमानता को कम किया जा सके।
  • डीप-टेक नवाचार और व्यावसायीकरण को बढ़ावा देना
    • दीर्घकालिक स्थिर पूँजी संवर्द्धन: दीर्घकालिक निधियों को अंतरिक्ष, रक्षा, जैव प्रौद्योगिकी और स्वच्छ ऊर्जा जैसे गहन प्रौद्योगिकी क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित करना, जिनका विकास चक्र लंबा होता है।
    • गहन प्रौद्योगिकी रिएक्टर का उपयोग करना: गहन प्रौद्योगिकी रिएक्टर को एक अनुसंधान प्रयोगशाला के रूप में स्थापित करना, ताकि उन नवाचारों के व्यावसायीकरण में सहायता मिल सके, जिनमें महत्त्वपूर्ण निवेश और लंबी विकास अवधि की आवश्यकता होती है।
  • वैश्विक एकीकरण और बाजार पहुँच को मजबूत बनाना
    • निर्यात की तैयारी को बढ़ावा देना: भारतीय स्टार्ट-अप्स को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुँच प्रदान करके, उन्हें वैश्विक निवेशकों और ग्राहकों से जोड़कर निर्यात सहायता प्रदान करना।
    • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देना: प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सीमा पार सहयोग को प्रोत्साहित करना, जिससे स्टार्ट-अप्स वैश्विक मूल्य शृंखलाओं का लाभ उठा सकें और भारत के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में नवाचार को गति दे सकें।
    • अंतरराष्ट्रीय नवाचार सहयोग: अंतरराष्ट्रीय नवाचार सहयोग कार्यक्रम जैसी पहलों के माध्यम से भारत के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाकर वैश्विक संबंधों को मजबूत करना, सीमा पार साझेदारी, वैश्विक बाजार एकीकरण और प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष

एक दशक बाद, भारत का स्टार्ट-अप इकोसिस्टम न केवल व्यापक है, बल्कि जनसांख्यिकीय लाभ, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और सुधार एजेंडा पर आधारित संरचनात्मक परिवर्तन को भी दर्शाता है। आज स्टार्ट-अप प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में व्याप्त हैं, जो नवाचार, रोजगार सृजन और वैश्विक बाजार एकीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं।

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