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द्विध्रुवीय विशेषताओं वाला एक बहुध्रुवीय विश्व

Lokesh Pal January 02, 2026 05:33 18 0

संदर्भ

शीतयुद्ध के बाद की एकध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब चीन के आर्थिक-तकनीकी उत्थान और यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की बढ़ती आक्रामकता के कारण कमजोर पड़ रही है तथा अमेरिका–चीन रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता के निकट बहुध्रुवीय स्वरूप ग्रहण कर रही है।

वर्तमान स्थिति के बारे में

  • तीन महाशक्तियों का उदय: समकालीन वैश्विक व्यवस्था तीन प्रमुख शक्तियों संयुक्त राज्य अमेरिका, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) और रूस  द्वारा आकारित है।
    • स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (SIPRI, 2024) के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन वैश्विक स्तर पर शीर्ष दो सैन्य व्ययकर्ता बने हुए हैं (क्रमशः लगभग 997 बिलियन डॉलर और 314 बिलियन डॉलर)
    • पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) के तीव्र विस्तार सहित चीन का रक्षा आधुनिकीकरण, क्षेत्रीय से वैश्विक रणनीतिक शक्ति के रूप में उसके परिवर्तन को रेखांकित करता है।
    • वहीं दूसरी ओर, रूस, परमाणु क्षमता, विशाल भौगोलिक क्षेत्र और रणनीतिक संसाधनों के लाभ के माध्यम से अपनी प्रासंगिकता बनाए रखता है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका का रणनीतिक पुनर्गठन: वर्ष 2025 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) में, अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्द्ध में अपनी प्रधानता की पुष्टि करते हुए यूरोप से पीछे हटने का संकेत दिया है।
    • इस दस्तावेज में मुनरो सिद्धांत (ऐतिहासिक रूप से 19वीं सदी का एक सिद्धांत, जो अमेरिका महाद्वीप में अमेरिकी प्रभुत्व का दावा करता है) को पुनर्जीवित किया गया है और अब इसे लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में बाहरी क्षेत्रीय प्रभाव (विशेष रूप से चीनी प्रभाव) को रोकने के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
    • यह वर्ष 2025 के अंत में कैरेबियाई क्षेत्र में दशकों में हुई सबसे बड़ी अमेरिकी नौसैनिक तैनाती से स्पष्ट है, जिसका उद्देश्य अपने प्रभाव क्षेत्र के निकट चीनी और रूसी रणनीतिक प्रगति को रोकना है।
    • साथ ही, अमेरिका ने नाटो सहयोगियों के साथ साझा करने पर जोर दिया है, जिससे लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा अपेक्षाओं में बदलाव आया है।
  • अमेरिका-चीन प्रणालीगत प्रतिद्वंद्विता: चीन की तीव्र आर्थिक प्रगति ने उसे अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 66% के स्तर तक पहुँचा दिया है (विश्व बैंक का अनुमान)।
    • चीन ने अपनी आर्थिक शक्ति को तकनीकी और सैन्य शक्ति में परिवर्तित किया है, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष क्षमताएं और दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकियाँ शामिल हैं।
    • विश्व बैंक में मतदान हिस्सेदारी में वृद्धि और एशियाई विकास बैंक परियोजनाओं में नेतृत्व जैसी वैश्विक संस्थाओं में चीन का प्रभाव वैश्विक शासन के क्रमिक पुनर्गठन को दर्शाता है।
    • चीन केबेल्ट एंड रोड’ इनीशिएटिव (BRI) ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में आर्थिक तथा राजनयिक संबंधों को भी मजबूत किया है, जिससे चीन अवसंरचना वित्तपोषण और ‘सॉफ्ट पॉवर ’ विस्तार के एक प्रमुख चालक के रूप में स्थापित हो गया है।
  • रूस एक गतिशील महाशक्ति के रूप में: अमेरिका और चीन के बीच स्थित रूस की अद्वितीय स्थिति से उसकी रणनीतिक उपयोगिता का पता चलता है।
    • आर्थिक सीमाओं के बावजूद, उसके पास महत्त्वपूर्ण परमाणु प्रतिरोध, ऊर्जा निर्यात और भू-रणनीतिक प्रभाव है।
    • यूक्रेन में उसकी कार्रवाइयों, नाटो विस्तार के विरोध तथा पश्चिमी प्रतिबंधों में आए परिवर्तनों ने रूस को कुछ क्षेत्रों में चीन के अधिक निकट ला दिया है, हालाँकि वह एक कनिष्ठ साझेदार के रूप में अपनी  भूमिका को लेकर अब भी सतर्क बना हुआ है।
    • रूस की ऊर्जा आपूर्ति, विशेष रूप से यूरोप में, राजनयिक समीकरणों को प्रभावित करती रहती है, जिसका उदाहरण प्रतिबंधों के बावजूद रूसी गैस पर यूरोपीय निर्भरता को लेकर बार-बार होने वाली बहसें हैं।
  • व्यवहार में गतिशील बहुध्रुवीयता: शीतयुद्ध के कठोर वैचारिक गुटों के विपरीत, समकालीन वैश्विक गठबंधन और मुद्दों पर आधारित हैं।
    • रणनीतिक सहयोग न केवल राज्य अभिकर्ताओं बल्कि गैर-राज्य अभिकर्ताओं, प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्मों और निजी पूंजी प्रवाह द्वारा भी आकार लेता है।
    • उदाहरण के लिए, अमेरिका और चीन की बड़ी तकनीकी कंपनियाँ अब डिजिटल शासन मानकों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, जिससे यह प्रभावित हो रहा है कि डेटा गोपनीयता, AI नैतिकता और साइबर सुरक्षा से संबंधित मानदंड वैश्विक स्तर पर कैसे निर्धारित किए जाते हैं।

वैश्विक शक्ति संरचनाओं का विकास: द्विध्रुवीयता से खंडित बहुध्रुवीयता की ओर

कालक्रम मुख्य विशेषताएँ प्रमुख शक्तियाँ वैश्विक प्रणाली
1945–1991 शीतयुद्ध का दौर, जिसमें दो प्रतिद्वंद्वी शक्तियों का वर्चस्व था। संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ रूस विचारधारा से प्रेरित संघर्ष, सैन्य गतिरोध, प्रतिस्पर्द्धी गठबंधन
1991–2008 एकध्रुवीय विश्व, जिसमें एक प्रमुख शक्ति का नेतृत्व था। संयुक्त राज्य अमेरिका और नाटो वैश्विक आर्थिक एकीकरण, बाजार आधारित विकास, पश्चिमी प्रभाव
2008–2020 बहुध्रुवीय का उदय, सत्ता कई देशों में विकेंद्रीकृत। चीन, भारत, रूस राष्ट्रीय आर्थिक हित, क्षेत्रीय प्रभाव, पश्चिमी मानदंडों के लिए चुनौती
2020– अब तक  खंडित परस्पर निर्भरता, जटिल वैश्विक संबंध। ब्रिक्स+, यूरोपीय संघ, क्षेत्रीय समूह प्रौद्योगिकी-संचालित, AI-केंद्रित, बहुकेंद्रीय व्यवस्था, बदलती आपूर्ति शृंखलाएँ, रणनीतिक प्रतिद्वंद्विताएँ।

समकालीन बहुध्रुवीय व्यवस्था में संरचनात्मक चुनौतियाँ

  • रणनीतिक अस्थिरता: प्रमुख शक्तियों के व्यवहार के लिए स्थापित मानदंडों का अभाव गलत अनुमान और तनाव बढ़ने का जोखिम बढ़ाता है।
    • ताइवान जलडमरूमध्य जैसे तनावग्रस्त क्षेत्र, जहाँ ताइवान के पास चीनी सैन्य अभ्यासों के साथ-साथ अमेरिकी नौसैनिक आवाजाही भी बढ़ी है, इस अस्थिरता को दर्शाते हैं।
    • इसी तरह, यूक्रेन युद्ध और दक्षिण चीन सागर में तनाव उन विवादों को प्रदर्शित करते हैं जहां महाशक्तियों की प्रतिस्पर्द्धा स्थानीय संघर्षों से टकराती है।
  • गठबंधन की निश्चितता का क्षरण: जिम्मेदारी साझा करने पर अमेरिका के बढ़ते जोर ने पारंपरिक गठबंधनों को अस्थिर कर दिया है।
    • नाटो के भीतर, रक्षा व्यय और सैन्य तैनाती पर बहस सदस्यों के बीच खतरे की अलग-अलग धारणाओं को दर्शाती है।
    • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे साझेदार स्पष्ट प्रतिबद्धताओं की मांग कर रहे हैं क्योंकि अमेरिका क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को संतुलित कर रहा है।
  • परस्पर निर्भरता का शस्त्रीकरण: आर्थिक जुड़ाव का लाभ रणनीतिक लाभ के लिए उठाया जा रहा है।
    • रूस पर प्रतिबंधों ने वित्तीय विखंडन को और तीव्र कर दिया है, जबकि चीन के सेमीकंडक्टर क्षेत्र पर तकनीकी प्रतिबंध तकनीकी वर्चस्व की प्रतिस्पर्द्धा का संकेत देते हैं।
    • अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी है कि इस प्रकार का विखंडन वैश्विक आर्थिक विकास को अत्यधिक धीमा कर सकता है।
  • बहुपक्षीय संस्थानों का कमजोर होना: विश्व व्यापार संगठन (WTO) के विवाद-निपटान तंत्र और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के बीच गतिरोध अंतर-राज्यीय तनाव, जलवायु चुनौतियों और विकास असमानताओं के प्रबंधन में वैश्विक शासन की घटती प्रभावशीलता को उजागर करते हैं।
  • मध्य स्तरीय शक्तियों पर दबाव: जापान, जर्मनी, ब्राजील और भारत जैसे देशों पर प्रतिस्पर्धी शक्ति केंद्रों के साथ संतुलन साधते हुए तालमेल बिठाने की अपेक्षाएँ लगातार बढ़ रही हैं।
    • यह दबाव प्रायः नीतिगत लचीलेपन को कम करता है और उनकी स्वतंत्र रणनीतिक दिशाओं को बनाए रखने की क्षमता को चुनौती देता है।

भारत पर वर्तमान स्थिति का प्रभाव

  • विस्तारित लेकिन सीमित रणनीतिक क्षेत्र: बहुध्रुवीयता के तहत, भारत को व्यापक राजनयिक जुड़ाव के अवसर प्राप्त हैं।
    • हालाँकि, अमेरिका-चीन की बढ़ती प्रतिद्वंद्विता स्वायत्तता को सीमित करती है, विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा के कारण भारत की रणनीतिक स्थिति प्रभावित होती है।
  • चीन से संबंधित सुरक्षा चुनौतियाँ: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारत-चीन के बीच लगातार तनाव और एशिया में प्रभाव के लिए अमेरिका-चीन की व्यापक प्रतिस्पर्द्धा के कारण भारत का सुरक्षा संजाल जटिल हो गया है।
  • जटिल रूस समीकरण: रूस के साथ भारत के दीर्घकालिक रक्षा और ऊर्जा संबंध रूस के चीन के साथ घनिष्ठ सुरक्षा गठबंधन के कारण रणनीतिक रूप से जटिल होते जा रहे हैं।
    • फिर भी, यूक्रेन संघर्ष के बाद भी रक्षा आपूर्ति और महत्त्वपूर्ण मशीनरी जैसे क्षेत्रों में द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि हुई है।
  • आर्थिक अवसर और कमजोरियाँ: भारत द्वाराचीन+1″ रणनीति अपनाने से इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और नवीकरणीय घटकों में विविधीकरण हुआ है, जिससे आपूर्ति शृंखला के जोखिम कुछ हद तक कम हुए हैं।
    • उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं (PLI) जैसी पहलों ने घरेलू विनिर्माण प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाया है। फिर भी, वैश्विक अस्थिरता निर्यात माँग को प्रभावित करती रहती है।
    • ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: भारत की G20 अध्यक्षता (2023) के दौरान समान टीकाकरण पहुँच, जलवायु वित्त और समावेशी पुनर्प्राप्ति ढाँचे जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया, जिससे विकासशील देशों के लिए एक महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में इसकी भूमिका मजबूत हुई।

बहुध्रुवीयता के बारे में

  • परिभाषा: द्विध्रुवीय (दो महाशक्तियाँ) या एकध्रुवीय (एकल महाशक्ति) व्यवस्थाओं के विपरीत, तीन या दो से अधिक महाशक्तियों वाली प्रणाली।
  • शक्ति सीमा: कोई भी एक देश अपनी श्रेष्ठ सैन्य या आर्थिक शक्ति को पूर्ण प्रभुत्व में परिवर्तित नहीं कर सकता।
  • आधुनिक उदाहरण: अमेरिकी टैरिफ का विरोध करने वाले देश।
    • कई शक्तियों (अमेरिका, चीन, रूस) के साथ संबंध बनाए रखने वाले देश, बिना किसी का पक्ष लिए।
  • विद्वतापूर्ण बहस: शीतयुद्ध के बाद की व्यवस्था को द्विध्रुवीय या बहुध्रुवीय के रूप में आँका जा रहा है, जिसके वैश्विक स्थिरता पर निहितार्थ हैं।

सामरिक स्वायत्तता के बारे में

  • परिभाषा: सामरिक स्वायत्तता से तात्पर्य किसी राष्ट्र की विदेश और रक्षा नीति में संप्रभु निर्णय लेने की क्षमता से है, जो गठबंधनों, बाह्य दबावों या प्रमुख शक्तियों पर निर्भरता से बाधित न हो।
  • अलगाववाद नहीं: इसका अर्थ तटस्थता या अलगाव नहीं है, बल्कि लचीलापन, स्वतंत्रता और भारत की अपनी शर्तों पर कई साझेदारों के साथ जुड़ाव है।
  • भारत में सामरिक स्वायत्तता का ऐतिहासिक आधार
    • औपनिवेशिक अधीनता: औपनिवेशिक अनुभव ने स्वतंत्रता और स्वायत्तता को भारत के वैश्विक दृष्टिकोण का केंद्र बना दिया।
    • शीतयुद्ध काल: जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में, भारत ने अमेरिका-सोवियत प्रतिद्वंद्विता में उलझने से बचने के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का नेतृत्व किया।
    • वर्ष 1991 के बाद का युग: आर्थिक सुधारों और सोवियत संघ के पतन के बाद, भारत ने बहु-संरेखण की ओर रुख किया और अमेरिका, रूस तथा अन्य शक्तियों के साथ व्यावहारिक रूप से जुड़ाव स्थापित किया।
    • वर्तमान युग: मौजूदा सरकार ने स्वायत्तता को बहु-संरेखण” के रूप में पुनर्परिभाषित किया है और बाध्यकारी गठबंधनों के बिना क्वाड, ब्रिक्स, जी20 तथा ग्लोबल साउथ नेतृत्व जैसी विविध साझेदारियों में सक्रिय रूप से संलग्न है।

महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता के बीच भारत की बहु-संरेखण रणनीति

  • सामरिक स्वायत्तता मूल सिद्धांत के रूप में: नेहरूवादी गुटनिरपेक्षता पर आधारित और समकालीन वास्तविकताओं के अनुरूप, सामरिक स्वायत्तता भारतीय विदेश नीति का केंद्र बिंदु बनी हुई है। यह कठोर गुटीय गठबंधनों का विरोध करते हुए हितों के आधार पर विविध साझेदारों के साथ जुड़ाव बनाए रखती है।
  • बहु-संरेखण कूटनीति: क्वाड में भारत की भागीदारी समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और आपूर्ति शृंखलाओं पर सहयोग को बढ़ावा देती है, जबकि ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में इसकी भूमिका यूरेशिया और वैश्विक दक्षिण में जुड़ाव को बनाए रखती है।
  • विविध सामरिक साझेदारियाँ: भारत ने जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्राँस और आसियान देशों के साथ रक्षा तथा आर्थिक संबंधों को मजबूत किया है, जो अनन्य प्रतिबद्धताओं के बिना पश्चिमी साझेदारों एवं क्षेत्रीय समूहों के बीच संतुलन को रेखांकित करता है।
  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में जुड़ाव: भारत एक स्वतंत्र, खुले, समावेशी और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र का समर्थन करता है, जो बहिष्कारी गुटों का विरोध करते हुए समान विचारधारा वाले लोकतंत्रों के साथ अंतर-संचालनीयता को बढ़ावा देता है।
  • आर्थिक लचीलापन पहल: PLI योजनाओं, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स सुधारों के माध्यम से, भारत का लक्ष्य लचीली वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकृत होना है, जो किसी एक शक्ति पर कम निर्भर हों।
  • बहुपक्षीय सुधार का समर्थन: भारत लगातार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों का समर्थन करता है, यह तर्क देते हुए कि प्रतिनिधित्व में समकालीन भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए, न कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के पदानुक्रम को।

तुलनात्मक ढाँचा: समकालीन विश्व राजनीति में बहुध्रुवीयता, द्विध्रुवीयता और रणनीतिक स्वायत्तता

आयाम बहुध्रुवीयता द्विध्रुवीयता रणनीतिक स्वायत्तता
मूल अर्थ सत्ता कई प्रमुख राज्यों में वितरित है। सत्ता दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों के बीच केंद्रित। कठोर गठबंधन के बिना स्वतंत्र विदेश नीति।
प्रमुख भागीदार अमेरिका, चीन, रूस, यूरोपीय संघ, अन्य। अमेरिका और चीन। भारत, ब्राजील जैसी शक्तियाँ।
स्थिरता परिवर्तनशील और प्रायः अस्थिर। अपेक्षाकृत स्थिर लेकिन ध्रुवीकृत। यह लचीलेपन और संकट प्रबंधन को बढ़ाता है।
गठबंधन का स्वरूप आपस में जुड़े हुए, मुद्दों पर आधारित साझेदारियाँ। कठोर गठबंधन चुनिंदा, हित-प्रेरित साझेदारियाँ।
वर्तमान उदाहरण खंडित वैश्विक शासन व्यवस्था। USA–चीन प्रतिद्वंद्विता भारत क्वाड में, BRICS, SCO
भारत के लिए निहितार्थ सहभागिता के विकल्पों का विस्तार करता है। पक्ष चुनने का दबाव बढ़ जाता है। नीतिगत स्वतंत्रता को बनाए रखता है।

आगे की राह 

  • बहुपक्षवाद को पुनर्जीवित करना: संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन (WTO) में सुधार करके व्यापक प्रतिनिधित्व, प्रक्रियात्मक प्रभावशीलता और साइबर खतरों, महामारियों तथा जलवायु परिवर्तन जैसी 21वीं सदी की चुनौतियों के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना।
  • उभरते वैश्विक मंचों का लाभ उठाना: भारत द्वारा समर्थित ग्रुप ऑफ ट्वेंटी (G20) और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) जैसे मंच समावेशी शासन, सतत् विकास और जलवायु वित्तीय ढाँचे को आकार दे सकते हैं।
  • नियमों के माध्यम से प्रतिस्पर्द्धा का प्रबंधन: रणनीतिक टकराव को कम करने के लिए साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), अंतरिक्ष शासन, समुद्री आचरण और आर्थिक दबाव के लिए वैश्विक मानदंड तथा सहकारी ढाँचे विकसित करना।
  • मध्यम स्तरीय शक्तियों को सशक्त बनाना: द्विध्रुवीय दबावों को कम करने और वैकल्पिक शासन संबंधी सुझाव प्रदान करने के लिए मध्यम शक्तियों के बीच सामूहिक पहलों को प्रोत्साहित करना।
  • भारत की नेतृत्व भूमिका: भारत विकासात्मक लक्ष्यों को प्रणालीगत सुधारों के साथ संरेखित करके महामारी के बाद आर्थिक सुधार, जलवायु कार्रवाई एजेंडा और समावेशी प्रौद्योगिकी शासन का मार्गदर्शन कर सकता है।

निष्कर्ष

उभरती हुई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था संरचना की दृष्टि से बहुध्रुवीय, किंतु व्यवहार में द्विध्रुवीय होती जा रही है, जिसे महाशक्तियों की तीव्र प्रतिस्पर्धा और निरंतर बदलते गठबंधन आकार दे रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में भारत के लिए रणनीतिक अनिवार्यता यह है कि वह सामरिक स्वायत्तता को न केवल बनाए रखे, बल्कि उसे प्रभावी रूप से क्रियान्वित भी करे; विविध साझेदारियों को सुदृढ़ करे; तथा पश्चिम और वैश्विक दक्षिण के मध्य एक सेतु के रूप में अपनी स्थिति का उपयोग करते हुए अनिश्चितता को प्रभाव और स्थिरता में रूपांतरित करे।

अभ्यास प्रश्न 

वैश्विक व्यवस्था अमेरिका के नेतृत्व वाली एकध्रुवीयता से एक गतिशील बहुध्रुवीय प्रणाली की ओर अग्रसर है। पश्चिमी गोलार्द्ध की ओर अमेरिका का झुकाव और यूरोप पर इसके प्रभाव क्षेत्र में कमी में आए इस बदलाव पर चर्चा कीजिए और भारत जैसी मध्यम शक्तियों के लिए इसके निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए।

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