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एग्री-फोटोवोल्टाइक्स (एग्रीपीवी)

Lokesh Pal March 24, 2026 05:46 17 0

संदर्भ

केंद्रीय बजट 2026–27 ने पीएम-कुसुम के आवंटन को ₹5,000 करोड़ तक बढ़ा दिया, जो कृषि के सोलराइजेशन पर नए सिरे से ध्यान का संकेत देता है, साथ ही पीएम-कुसुम 2.0 के तहत एग्री-एग्रीवोल्टैक्स (एग्रीपीवी) को शामिल करने की योजना भी है।

संबंधित तथ्य

  • वैश्विक स्तर पर: वैश्विक एग्रीपीवी बाजार के वर्ष 2024 से 2031 के मध्य 8.3% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ने की संभावना है, जो वर्ष 2024 में ₹37,588 करोड़ (US$ 4.34 बिलियन) से बढ़कर वर्ष 2031 तक ₹65,910 करोड़ (US$ 7.61 बिलियन) हो जाएगा।
    • उत्तरी अमेरिका, संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में, वर्ष 2024 में 34.3% हिस्सेदारी के साथ प्रमुख बाजार बना हुआ है, जिसे कैलिफोर्निया और न्यूयॉर्क जैसे राज्यों में मजबूत प्रोत्साहनों तथा अग्रणी एग्रीपीवी परियोजनाओं का समर्थन प्राप्त है।
  • भारत: देशभर में लगभग 50 पायलट एग्रीपीवी प्रतिष्ठान हैं, जिनमें विभिन्न पैनलों में फसल संयोजनों और आर्थिक व्यवहार्यता का मूल्यांकन किया जा रहा है।

एग्री-एग्रीवोल्टैक्स (एग्रीपीवी) के बारे में

  • एग्रीपीवी (एग्रीवोल्टैक्स) एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें सौर पैनल और कृषि एक ही भूमि पर सह-अस्तित्व सबंध दर्शाते हैं।
  • यह उपयुक्त ऊँचाई या अंतराल पर पैनल स्थापित करके एक साथ विद्युत उत्पादन और कृषि कार्य की अनुमति देता है।
  • उद्देश्य: भूमि उपयोग दक्षता को अधिकतम करना, किसानों की आय का समर्थन करना और खाद्य उत्पादन से समझौता किए बिना सतत् ऊर्जा संक्रमण को सक्षम बनाना।

एग्रीपीवी पायलट परियोजनाएँ

  • उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश में सफल एग्रीपीवी पायलट परियोजनाएँ देखी गई हैं, जैसे नोएडा में 10-किलोवाट (KW) का एमिटी यूनिवर्सिटी प्लांट (2017), जो मक्का, आलू और सरसों जैसी फसलों का समर्थन करता है।
  • महाराष्ट्र: महाराष्ट्र में, राज्य विद्युत वितरण कंपनी ने सौरीकरण के लिए 2,730 सबस्टेशनों की पहचान की है, जिससे एग्रीपीवी के माध्यम से 13.65 GW सौर क्षमता जोड़ने की संभावना है।

एग्रीपीवी में फसल चयन

  • एग्रीपीवी प्रणालियों में फसल चयन महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सौर पैनलों के नीचे सूर्यप्रकाश की उपलब्धता भिन्न होती है।
    • छायादार फसलें जैसे हल्दी, अदरक, और पत्तेदार सब्जियाँ पैनलों के नीचे अच्छी वृद्धि और विकास प्राप्त करती हैं।
    • अधिक सूर्यप्रकाश की आवश्यकता वाली फसलें पंक्तियों के मध्य उपस्थित स्थानों में उगाई जाती हैं।
    • फसल की उपयुक्तता, क्षेत्र के अनुसार भिन्न होती है; उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में टमाटर, प्याज, लहसुन, और तुलसी उपयुक्त हैं।
    • कर्नाटक और महाराष्ट्र में, रागी, ज्वार, अंगूर, और बैंगन जैसी फसलें एग्रीपीवी प्रणालियों के लिए उपयुक्त हैं।

एग्रीपीवी प्रणालियों के प्रकार

  • ऊँचाई-आधारित प्रणालियाँ: सौर पैनल फसलों के ऊपर लगाए जाते हैं, जिससे उस खेत के  नीचे कृषि कार्य सम्पादित किए जा सकें।
  • पंक्ति-आधारित प्रणालियाँ: छायांकन के प्रभाव को कम करने के लिए पैनलों को फसल की पंक्तियों के बीच रखा जाता है।
  • ऊर्ध्वाधर प्रणालियाँ: सीधी खड़ी, प्रायः द्विपक्षीय पैनल दोनों ओर से सूर्यप्रकाश ग्रहण करते हैं।
  • ग्रीनहाउस-एकीकृत प्रणालियाँ: नियंत्रित वातावरण वाली कृषि के लिए ग्रीनहाउस रूफ या दीवारों पर पैनल स्थापित किए जाते हैं।

चुनौतियाँ

  • नीतिगत अंतराल और अनुभवजन्य सत्यापन की आवश्यकता: हाल की नीतिगत चर्चाओं में एग्रीपीवी का उल्लेख बढ़ा है, लेकिन बड़े पैमाने पर इसका विस्तार अभी तक शुरू नहीं हुआ है।
    • नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों दोनों को विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में अधिक अनुभवजन्य साक्ष्य की आवश्यकता है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि कौन-से विन्यास, फसल मैट्रिक्स, और वित्तीय ढाँचे सबसे उपयुक्त हैं।
  • मानकीकरण का अभाव: भूमि वर्गीकरण, ग्रिड कनेक्टिविटी और टैरिफ नियामक स्पष्टता पर निर्भर करते हैं और डिजाइन मानकों की कमी निवेशकों की अनिश्चितता को बढ़ाती है।
  • उच्च पूँजी लागत: उच्च संरचनाओं के कारण एग्रीपीवी प्रणालियाँ, पारंपरिक सौर प्रणालियों की तुलना में 25–40% अधिक महँगी होती हैं।
    • डिजाइन के आधार पर लागत ₹5 लाख से ₹25 लाख प्रति एकड़ तक हो सकती है।
  • सीमित तकनीकी जागरूकता: किसानों में प्रायः एग्रीपीवी प्रणालियों को अपनाने के लिए जागरूकता और तकनीकी जानकारी की कमी होती है, जैसा कि राजस्थान और गुजरात में प्रारंभिक चरण में देखा गया है।

लाभ

  • सहायक सेवाएँ: एग्रीपीवी सहायक सेवाओं को भी ऊर्जा प्रदान कर सकता है, जिनमें कोल्ड स्टोरेज, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयाँ, और भूसा काटने की मशीनें शामिल हैं, जिससे बेहतर ऊर्जा दक्षता के साथ ग्रामीण मूल्य शृंखलाएँ सुदृढ़ होती हैं।
  • पर्यावरणीय सह-लाभ: एग्रीपीवी पर्यावरणीय सह-लाभ भी प्रदान करता है।
    • उदाहरण के लिए: कुछ कृषि-जलवायु परिस्थितियों में, आंशिक छायांकन वाष्पोत्सर्जन को कम कर सकता है, वाष्पीकरण और पौधों के वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से वायुमंडल में जल की संयुक्त हानि तथा मृदा अधिक नमी बनाए रखती है, जिससे समग्र जल उपयोग दक्षता बढ़ती है।
  • जलवायु संरक्षण और ग्रामीण आर्थिक विकास: सौर पैनल, फसलों को अत्यधिक गर्मी, वर्षा, और ओलावृष्टि से भी बचा सकते हैं।
    • कृषि में डीजल की आवश्यकता को कम करके, ऐसी प्रणालियाँ ग्रामीण उद्यमिता और स्थानीय आर्थिक विकास का समर्थन भी कर सकती हैं।
  • भूमि उपयोग के अनुकूलन के लिए एग्रीपीवी: भारत में सौर विस्तार, बृहद् भूमि आवश्यकताओं के कारण कृषि के साथ भूमि उपयोग संघर्ष को बढ़ाता है।
    • एग्रीपीवी (एग्रीवोल्टैक्स) एक ही भूमि पर एक साथ खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन को सक्षम बनाकर इसे हल करता है, जिससे दक्षता और स्थिरता में सुधार होता है।
  • आर्थिक लाभ: कृषि-निर्भर अर्थव्यवस्था में, एग्रीपीवी (एग्रीवोल्टैक्स) किसानों को स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन करते हुए आय के स्रोतों में विविधता लाने में सक्षम बनाता है।
    • वे बिजली बेचकर, भूमि पट्टे पर देकर, या राजस्व साझा करके आय अर्जित कर सकते हैं, बिना फसल उत्पादन को बाधित किए।

आगे की राह

  • विस्तार के लिए नीतिगत समर्थन: मजबूत नीतिगत समर्थन एग्रीपीवी को पायलट परियोजनाओं से आगे बढ़ाने में सहायता कर सकता है।
  • संस्थागत और वित्तीय उपाय: पीएम-कुसुम 2.0 के तहत शामिल करना और व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण के साथ एक प्रस्तावित राष्ट्रीय एग्रीपीवी मिशन व्यवहार्यता में सुधार कर सकते हैं और जोखिम को कम कर सकते हैं।
  • प्रशासनिक और क्षमता निर्माण उपाय: द्वैध-उपयोग की मान्यता, अनुमोदनों को सरल बनाना, क्लस्टर की पहचान और कृषक प्रशिक्षण अपनाने की प्रक्रिया को तीव्र कर सकते हैं।

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