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मानवता के लिए AI

Lokesh Pal February 27, 2026 04:17 13 0

संदर्भ

वर्ष 2026 का नई दिल्ली शिखर सम्मेलन कृत्रिम बुद्धिमत्ता की क्षमताओं पर बहस से हटकर इसके स्वरूप को परिभाषित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक है। यूनेस्को-भारत साझेदारी के तहत, फोकस ‘कार्यवाही’ से हटकर ‘प्रभाव’ पर केंद्रित हो गया है और यह जोर दिया गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रगति सार्थक होने के लिए पूरी तरह से मानव-केंद्रित होनी चाहिए।

यूनेस्को-भारत साझेदारी के बारे में

यूनेस्को और भारत के बीच सहयोग एक वैश्विक मानक प्राधिकरण तथा एक उभरती हुई डिजिटल महाशक्ति के बीच एक अद्वितीय सामंजस्य का प्रतिनिधित्व करता है।

  • वैश्विक चेतना: शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति को समाहित करने वाले अपने अधिदेश के साथ, यूनेस्को विश्व के नैतिक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है, जो नैतिक AI पर प्रथम वैश्विक ढाँचे को क्रियान्वित करने योग्य राष्ट्रीय नीतियों में परिवर्तित करता है।
  • प्रगति के सूत्र: वर्ष 2026 शिखर सम्मेलन ने वैश्विक AI आवश्यकताओं को तीन सूत्रों (लोग, ग्रह (पृथ्वी) और प्रगति) में सफलतापूर्वक समाहित किया।
    • ‘ग्लोबल साउथ’ में पहले वैश्विक AI शिखर सम्मेलन की मेजबानी करके, भारत ने जोखिम कम करने (ब्लेचली दृष्टिकोण) से हटकर समान अवसर को अधिकतम करने (दिल्ली दृष्टिकोण) की ओर प्रभावी रूप से ध्यान केंद्रित किया है।
    • साथ ही, भारत वैश्विक मित्र के रूप में अपनी भूमिका को सुदृढ़ करता है, जो ‘ग्लोबल नार्थ’ के तकनीकी मानकों और ‘ग्लोबल साउथ’ की सामाजिक-आर्थिक आकांक्षाओं के बीच के अंतर को पाटता है।
  • बहुपक्षीय नेतृत्व: यह साझेदारी इस बात पर जोर देती है कि AI का संचालन एकतरफा नहीं हो सकता है; एक खंडित डिजिटल बनने से रोकने के लिए इसमें 194 सदस्य देशों की सहमति आवश्यक है।

प्रमुख नैतिक परिणाम

शिखर सम्मेलन सैद्धांतिक वक्तव्य से आगे बढ़कर तीन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में ठोस, व्यावहारिक, नैतिक हस्तक्षेप स्थापित करने पर केंद्रित रहा है:-

  • न्यायिक अखंडता और विधि का शासन: यह देखते हुए कि 44% न्यायिक पेशेवर पहले से ही औपचारिक मार्गदर्शन के बिना AI का उपयोग कर रहे हैं, परिणामतः इस शिखर सम्मेलन में ‘न्यायाधीशों के लिए AI के मूलभूत तथ्य’ दिशा-निर्देश जारी किया गया।
    • इसका उद्देश्य ‘ब्लैक-बॉक्स जस्टिस’ को रोकना है, यह सुनिश्चित करना है कि एल्गोरिदम उपकरण मानवीय तर्क के अधीन रहें और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन न करें या कानूनी निर्णय में प्रणालीगत पूर्वाग्रह न लाएँ।
  • पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा नैतिकता: अत्याधुनिक AI मॉडल को प्रशिक्षित करने में वर्तमान में हजारों घरों की वार्षिक विद्युत की खपत होती है।
    • इस शिखर सम्मेलन ने ऊर्जा खपत में 90% की कमी लाने वाले हल्के AI मॉडल को बढ़ावा देने के लिए ‘रेजिलियंट AI चैलेंज’ शुरू किया। यह अंतर-पीढ़ीगत समानता के सिद्धांत के अनुरूप है, यह सुनिश्चित करते हुए कि वर्तमान में डिजिटल प्रगति भविष्य की पारिस्थितिकी सुरक्षा से समझौता न करे।
  • ‘ह्यूमिनिटी इन द लूप’ (HITL): इस शिखर सम्मेलन ने मूल्यों पर आधारित एक ऐसे डिजाइन की वकालत की, जहाँ मानवीय निगरानी AI जीवन चक्र का एक अनिवार्य घटक हो।
    • मानवीय सक्रियता को प्राथमिकता देकर, यह ढाँचा सुनिश्चित करता है कि AI व्यक्तिगत स्वायत्तता को नष्ट करने वाली एक स्वायत्त शक्ति के बजाय सामाजिक कल्याण और सूचना अखंडता के लिए एक उपकरण बना रहे।

नैतिक दर्शन: ‘मानवता के लिए AI’ का आधार

‘दिल्ली दृष्टिकोण’ को विभिन्न दार्शनिक परिप्रेक्ष्यों से समझा जा सकता है, ताकि इसके मानव-केंद्रित स्वरूप को उचित ठहराया जा सके:

  • कर्तव्यपरायणता/कर्तव्यशास्त्र (Doontology): मानव (MANAV) ढाँचे में AI को आधार बनाने से पता चलता है कि कुछ मानवाधिकार (निजता, गरिमा और स्वायत्तता) ‘श्रेणीबद्ध अनिवार्यताएँ’ हैं।
    • इमैनुअल कांट ​​के शब्दों में, AI को एक साधन (मानव कल्याण) के रूप में माना जाना चाहिए, न कि स्वयं में एक लक्ष्य के रूप में।
  • सद्गुण नैतिकता (अरस्तू का दृष्टिकोण): शिखर सम्मेलन का AI के ‘चरित्र को परिभाषित करने’ पर ध्यान केंद्रित करना अरस्तू के व्यावहारिक ज्ञान (फ्रोनिसिस) को प्रतिबिंबित करता है।
    • नैतिकता को आचार संहिता (FIA: निष्पक्षता, समावेशिता, जवाबदेही) में समाहित करके, अनिवार्य रूप से AI को डिजाइन के माध्यम से ‘सद्गुणपूर्ण कार्य’ करना सिखा रहे हैं।
  • उबंटू और वसुधैव कुटुंबकम्: शिखर सम्मेलन पश्चिमी व्यक्तिवाद को पूर्वी सामूहिकतावाद से जोड़ता है।
    • भारत की ‘विश्व बंधुत्व’ (वैश्विक मित्र) के रूप में भूमिका एक महानगरीय नैतिक कर्तव्य को दर्शाती है, जो यह सुनिश्चित करने के लिए है कि तकनीकी प्रगति ग्लोबल साउथ को ‘प्राकृतिक अवस्था’ (होब्सियन) में न छोड़े, बल्कि उन्हें एक वैश्विक ‘सामाजिक अनुबंध’ में लाए।

नैतिक सिद्धांत: कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दुविधाओं का समाधान

यह शिखर सम्मेलन आधुनिक ढाँचों का उपयोग करते हुए पारंपरिक नैतिक संघर्षों पर चर्चा करता है:-

  • उपयोगितावाद बनाम अल्पसंख्यक अधिकार: जहाँ एक ओर बिग डेटा का उद्देश्य ‘अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम लाभ’ है, वहीं यूनेस्को का भाषायी समावेशन (भाषिणी) पर ध्यान केंद्रित करना ‘बहुसंख्यक के अत्याचार’ को रोकता है।
    • यह सुनिश्चित करता है कि अल्पसंख्यक भाषाओं और संस्कृतियों को ‘अंग्रेजी भाषा के महत्त्व’ के कारण हाशिए पर न स्थानांतरित कर दिया जाए।
  • अंतरपीढ़ीगत समानता: ‘रेजिलियंट AI चैलेंज’ (90% ऊर्जा कटौती) ट्रस्टीशिप मॉडल का प्रत्यक्ष अनुप्रयोग है।
    • यह मॉडल इस बात पर बल देता है कि वर्तमान पीढ़ी का भावी पीढ़ियों के प्रति नैतिक दायित्व है कि वे प्रसंस्करण शक्ति के लिए पृथ्वी के ‘कार्बन बजट’ को समाप्त न करें।
  • जॉन रॉल्स का ‘अज्ञानता का पर्दा’ (वेल ऑफ इग्नोरेंस): AI स्टैक के लोकतंत्रीकरण के लिए दिल्ली दृष्टिकोण जॉन रॉल्स के अंतर सिद्धांत के अनुरूप है।
    • यह तर्क देता है कि असमानताएँ (डिजिटल विभाजन) तभी उचित हैं, जब वे समाज के सबसे कम सुविधा प्राप्त सदस्यों के लिए क्षतिपूर्ति लाभ प्रदान करती हों।

यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) के बारे में

  • यूनेस्को संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है।
  • उद्देश्य: इसका मिशन शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और संचार के क्षेत्र में वैश्विक सहयोग के माध्यम से शांति तथा सुरक्षा का निर्माण करना है।
  • स्थापना: वर्ष 1945
  • मुख्यालय: पेरिस, फ्राँस
  • प्रमुख सम्मेलन
    • विश्व धरोहर सम्मेलन (1972)
    • अमूर्त सांस्कृतिक विरासत संरक्षण सम्मेलन (2003)
    • सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की विविधता के संरक्षण एवं संवर्द्धन पर सम्मेलन (2005)।
  • प्रमुख कार्यक्रम: विश्व धरोहर स्थल, मानव और जीवमंडल (MAB), वैश्विक भू-पार्क, विश्व की स्मृति।
    • वैश्विक शिक्षा नेतृत्वकर्ता: यूनेस्को समावेशी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करते हुए ‘शिक्षा 2030’ एजेंडा (SDG 4) का नेतृत्व करता है। वर्ष 2026 में, डिजिटल परिवर्तन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, यह सुनिश्चित करते हुए कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और प्रौद्योगिकी शिक्षकों और छात्रों को सशक्त बनाएँ, न कि उनका स्थान लें।
    • अग्रणी प्रौद्योगिकी की नैतिकता: यूनेस्को ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता के लिए पहला वैश्विक मानक स्थापित किया। यह सदस्य देशों के साथ मिलकर ऐसे कानूनी ढाँचे बनाने पर कार्य कर रहा है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास में पूर्वाग्रह को रोकें और मानवाधिकारों की रक्षा करें।
    • पृथ्वी (ग्रह) के लिए विज्ञान: मानव और जीवमंडल (MAB) और अंतर-सरकारी महासागरीय आयोग के माध्यम से, यूनेस्को वैश्विक जलवायु निगरानी, ​​सुनामी चेतावनी प्रणालियों और जल संसाधनों के सतत् प्रबंधन का समन्वय करता है।

महत्व: वैश्विक AI व्यवस्था को पुनर्परिभाषित करना

इंडिया-AI इंपैक्ट समिट 2026 ने वैश्विक चर्चा को ‘अस्तित्वगत सुरक्षा’ से ‘न्यायसंगत उपयोगिता’ की ओर मोड़ दिया, जो तीन रणनीतिक बदलावों को दर्शाता है:

  • लोकतांत्रिक प्रसार बनाम डिजिटल उपनिवेशवाद: ‘कम पदचिह्न, अधिक प्रभाव’ के दर्शन का समर्थन करके, शिखर सम्मेलन ने खरबों मापदंडों वाले मॉडलों के एकाधिकार को चुनौती दी।
    • परिवर्तन: यह संप्रभु AI और मितव्ययी नवाचार को प्राथमिकता देता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि ऊर्जा और कंप्यूटिंग संसाधनों की कमी वाले राष्ट्र सिलिकॉन वैली के लिए मात्र ‘डेटा उपनिवेश’ बनकर न रह जाएं।
    • प्रभाव: यह ‘दिल्ली दृष्टिकोण’ AI स्टैक का लोकतंत्रीकरण करता है, जिससे ग्लोबल साउथ के देशों को ऐसे स्वदेशी मॉडल विकसित करने की अनुमति मिलती है जो सांस्कृतिक रूप से प्रतिनिधि और आर्थिक रूप से व्यवहार्य हों।
  • तकनीकी-कानूनी शासन के माध्यम से रणनीतिक विश्वास निर्माण: डीपफेक और एल्गोरिथम पूर्वाग्रह के युग में, शिखर सम्मेलन स्वैच्छिक ‘आचार संहिता’ से आगे बढ़कर एक मजबूत तकनीकी-कानूनी ढाँचे की ओर बढ़ा।
    • ढाँचा: निष्पक्षता, समावेशिता और जवाबदेही (FIA) को AI मॉडल की मूल संहिता में एकीकृत करके, शासन प्रतिक्रियात्मक होने के बजाय सक्रिय हो जाता है।
    • परिणाम: इससे राज्य और नागरिकों के बीच सामाजिक अनुबंध मजबूत होता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि सार्वजनिक सेवा वितरण (डिजिटल भुगतान से लेकर न्यायिक सहायता तक) पारदर्शी और ‘सुरक्षात्मक डिजाइन’ के अनुरूप बना रहे।
  • ‘कार्रवाई से प्रभाव’ को क्रियान्वित करना (फ़्रांस-भारत का बदलाव): फ्रांसीसी राष्ट्रपति के अनुसार, शिखर सम्मेलन (2026) ने पेरिस शिखर सम्मेलन (2025) के ‘कार्रवाई’ चरण से सफलतापूर्वक एक मापने योग्य ‘प्रभाव’ चरण की ओर आगे बढ़ा है।
    • कार्बन-नैतिकता संबंध: नैतिकता अब केवल पूर्वाग्रह तक सीमित नहीं है; यह अब मॉडल के कार्बन फुटप्रिंट में समाहित है।
    • नया मानक: ‘रेज़िलिएंट AI चैलेंज’ के माध्यम से, शिखर सम्मेलन ने यह स्थापित किया कि किसी मॉडल की सफलता को उसकी ऊर्जा दक्षता (प्लैनेट सूत्र) और कृषि और स्वास्थ्य के क्षेत्र में वास्तविक दुनिया की समस्याओं को हल करने की क्षमता (पीपल सूत्र) से मापा जाता है, न कि केवल उसकी प्रसंस्करण क्षमता से।

जिन चुनौतियों का समाधान करना आवश्यक है

  • संस्थागत ‘दिशानिर्देश अंतराल’ और संस्थागत तत्परता: अपनाने की उच्च दर (44%) के बावजूद, न्यायिक पेशेवरों में से 91% के पास औपचारिक प्रशिक्षण का अभाव है।
    • इससे एक संस्थागत शून्यता उत्पन्न होती है जहाँ प्रौद्योगिकी ‘कानून के शासन’ से आगे निकल जाती है। एक मानक ढाँचे के बिना AI को तैनात करना वैधता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है और ‘ब्लैक-बॉक्स जस्टिस’ का जोखिम उत्पन्न करता है, जहाँ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा आवश्यक पारदर्शिता के बिना निर्णय लिए जाते हैं।
  • नैतिक स्वायत्तता और विवेकाधीन अखंडता का संकट: लोक अधिकारी निर्णय लेने का अधिकार एल्गोरिदम को सौंपते जा रहे हैं, जिससे विवेकाधीनता का अभाव उत्पन्न हो रहा है।
    • प्रशासनिक नैतिकता के अनुसार, कोई भी अधिकारी अपनी नैतिक स्वायत्तता का त्याग नहीं कर सकता है।
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर अत्यधिक निर्भरता स्वचालन पूर्वाग्रह को जन्म देती है, जहाँ मानव हस्तक्षेप केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है, जिससे व्यक्तिगत स्वायत्तता और व्यक्तिगत जवाबदेही के संवैधानिक मूल्यों का क्षरण होता है।
  • न्यासी कर्तव्य और ‘सुरक्षित डिजाइन’ शासन: स्वैच्छिक नैतिकता से वैधानिक लेखापरीक्षा और नैतिक प्रभाव आकलन (EIA) की ओर संक्रमण को दर्शाता है।
    • सार्वजनिक डेटा के न्यासी के रूप में, राष्ट्र का ‘तकनीकी-कानूनी’ अखंडता सुनिश्चित करने का न्यासी दायित्व है। निष्पक्षता, समावेशिता और जवाबदेही (FIA) को संहिता में एकीकृत करके, प्रशासक वस्तुनिष्ठता तथा गैर-पक्षपात के सिविल सेवा मूल्यों को बनाए रखते हैं और सार्वजनिक सेवा में प्रकट होने से पहले ही ‘छिपे हुए पूर्वाग्रहों’ को रोकते हैं।
  • वैश्विक समानता और ‘कंप्यूट डिवाइड’: ‘लाइटवेट एआई’ के लिए जोर दिए जाने के बावजूद, उच्च-स्तरीय हार्डवेयर का केंद्रीकरण निजी और ‘ग्लोबल नार्थ’ के नियंत्रण में है। 
    • यह वितरणात्मक न्याय (रॉल्स की नैतिकता) का उल्लंघन दर्शाता है। नैतिक सुरक्षा उपायों पर आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा से प्रेरित एक खंडित वैश्विक नियामक परिदृश्य, वैश्विक बंधुत्व को खतरे में डालता है और ‘डिजिटल उपनिवेशवाद’ का जोखिम उत्पन्न करता है, जहाँ ग्लोबल साउथ एक संप्रभु नवप्रवर्तक के बजाय एक डेटा प्रदाता बना रहता है।

वैश्विक कार्रवाइयाँ: वैश्विक मानक संरचना का गठन

इंडिया AI इंपैक्ट समिट, 2026 का आयोजन उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए एक वैश्विक “सुरक्षा प्रणाली” बनाने के लिए एक दशक से चल रहे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की परिणति है।

  • यूनेस्को की कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता पर अनुशंसा (2021): यह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए मूलभूत नैतिक दिशा-निर्देशक का कार्य करती है।
    • यह पहला वैश्विक मानक-निर्धारण उपकरण था, जिसे 193 सदस्य देशों ने अपनाया, जिसने तकनीकी सुरक्षा से आगे बढ़कर मानवाधिकारों, लैंगिक समानता और पर्यावरण संरक्षण को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास के अविवादित स्तंभों के रूप में महत्त्व दिया।
  • ब्लेचली घोषणा (2023): यू.के. AI सुरक्षा शिखर सम्मेलन के रूप में परिणित यह घोषणा, ‘फ्रंटियर AI’ (अत्यधिक सक्षम, सामान्य-उद्देश्यीय मॉडल) द्वारा उत्पन्न अस्तित्वगत और विनाशकारी जोखिमों पर पहली उच्च-स्तरीय अंतर्राष्ट्रीय सहमति का प्रतिनिधित्व करती है।
    • इसने उन्नत प्रणालियों की ‘अप्रत्याशित’ क्षमताओं की निगरानी के लिए बहुपक्षीय वैज्ञानिक सहयोग की एक मिसाल कायम की।
  • यूरोपीय संघ का AI अधिनियम (2024): विश्व के पहले व्यापक, कानूनी रूप से बाध्यकारी क्षैतिज ढाँचे के रूप में, इस कानून ने जोखिम-आधारित नियामक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता को ‘अस्वीकार्य,’ ‘उच्च,’ और ‘सीमित’ जोखिम श्रेणियों में वर्गीकृत करके, यह एल्गोरिदम के अत्यधिक उपयोग से मानवीय गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए एक वैश्विक मानक स्थापित करता है।
  • G20 नई दिल्ली नेताओं की घोषणा (2023): भारत की अध्यक्षता में, इस घोषणा ने ‘नवाचार-समर्थक, सुरक्षा-समर्थक’ दृष्टिकोण की ओर विमर्श को मोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • इसने सफलतापूर्वक जिम्मेदार कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन की वकालत की, जो डिजिटल विभाजन को पाटता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता वैश्विक असमानता को बढ़ाने के उपकरण के बजाय सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) के लिए उत्प्रेरक के रूप में कार्य करे।

भारत की पहल: डिजिटल उपभोग से तकनीकी संप्रभुता तक

भारत पश्चिमी प्रौद्योगिकी का मात्र उपभोक्ता होने से आगे बढ़कर ‘संप्रभु AI’ का अग्रणी देश बन गया है, जो समावेशी और विस्तार योग्य समाधानों पर ध्यान केंद्रित करता है।

  • इंडियाAI मिशन: यह AI कंप्यूटिंग शक्ति के लोकतंत्रीकरण के लिए डिजाइन की गई एक बहुस्तरीय प्रमुख पहल है।
    • राष्ट्रीय AI कंप्यूटिंग ग्रिड की स्थापना करके, भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि स्टार्ट-अप और शोधकर्ताओं को स्वदेशी मॉडल बनाने के लिए आवश्यक विशाल कंप्यूटिंग शक्ति तक पहुँच प्राप्त हो, जिससे विदेशी स्वामित्व वाले बुनियादी ढाँचे पर निर्भरता कम हो सके।
  • भाषिणी (राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन): ‘सामाजिक समावेशन के लिए AI’ का एक उत्कृष्ट उदाहरण, भाषिणी कई भारतीय भाषाओं में वास्तविक समय अनुवाद प्रदान करने के लिए AI का उपयोग करता है।
    • इसका उद्देश्य डिजिटल सेवाओं में ‘अंग्रेजी भाषा के विशेषाधिकार’ को समाप्त करना है, यह सुनिश्चित करना है कि इंटरनेट और AI के लाभ ग्रामीण आबादी के अंतिम छोर तक उनकी मातृभाषा में पहुँचे।
  • AIRAWAT (AI रिसर्च, एनालिटिक्स एंड नॉलेज डिसेमिनेशन प्लेटफॉर्म): यह विशेषीकृत AI सुपरकंप्यूटिंग क्लाउड, उच्च गति प्रसंस्करण की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में भारत का जवाब है।
    • इस अवसंरचना को अकादमिक और औद्योगिक अनुसंधान के साथ एकीकृत करके, भारत का लक्ष्य सटीक कृषि, मौसम पूर्वानुमान और औषधि खोज जैसे उच्च प्रभाव वाले क्षेत्रों में अग्रणी बनना है।
  • डिजिटल इंडिया अधिनियम (DIA): दशकों पुराने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 के स्थान पर लाया गया डिजिटल इंडिया अधिनियम (DIA) एक दूरदर्शी विधायी सुधार है।
    • यह ओपन इंटरनेट की ‘सुरक्षा और विश्वास’ पर केंद्रित है और एल्गोरिदम जवाबदेही, डेटा गोपनीयता और डीपफेक तथा गलत सूचना जैसे AI-जनित नुकसानों को कम करने के लिए कड़े नियम लागू करता है।
  • GPAI (ग्लोबल पार्टनरशिप ऑन AI) नेतृत्व: एक संस्थापक सदस्य और पूर्व अध्यक्ष के रूप में, भारत ने लगातार ‘AI के लोकतंत्रीकरण’ का समर्थन किया है, यह तर्क देते हुए कि AI के ‘बुनियादी घटकों’ (डेटा, कंप्यूटिंग और एल्गोरिदम) को पूरी मानवता के लाभ के लिए डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) के रूप में माना जाना चाहिए।

आगे की राह 

‘कार्य’ और ‘प्रभाव’ के बीच के अंतर को पाटने के लिए, निम्नलिखित चार-सूत्री रणनीति की सिफारिश की जाती है:-

  • मानव (MANAV) ढाँचे को संस्थागत रूप देना: भारत का MANAV (नैतिक, जवाबदेह, राष्ट्रीय संप्रभुता, सुलभ, मान्य) दृष्टिकोण राष्ट्रीय AI नीतियों का आधार होना चाहिए। यह सुनिश्चित करता है कि AI एक ‘स्वायत्त शक्ति’ नहीं बल्कि मानवीय आकांक्षाओं के लिए एक ‘शक्ति गुणक’ है।
  • ‘सात चक्रों’ को क्रियान्वित करना: वैश्विक सहयोग को अस्पष्ट संधियों से हटकर वर्ष 2026 घोषणा में परिभाषित सात विशिष्ट स्तंभों की ओर बढ़ना चाहिए।
    • AI संसाधनों का लोकतंत्रीकरण: किफायती कंप्यूटिंग पहुँच सुनिश्चित करना।
    • आर्थिक विकास और सामाजिक हित: लघु एवं मध्यम उद्यमों और कृषि पर ध्यान केंद्रित करना।
    • सुरक्षित और विश्वसनीय AI: बेंचमार्क के लिए ‘ट्रस्टेड AI कॉमन्स’ का कार्यान्वयन।
    • विज्ञान के लिए AI: AI संस्थानों के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के माध्यम से अनुसंधान का एकत्रीकरण।
    • सामाजिक सशक्तीकरण के लिए पहुँच: डिजिटल समावेशन के लिए बहुभाषी मॉडल।
    • मानव पूँजी विकास: सार्वजनिक अधिकारियों के लिए व्यापक कौशल विकास और ‘AI साक्षरता’।
    • लचीला और कुशल AI: कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए ‘ग्रीन AI’ को प्राथमिकता देना।
  • वैधानिक लेखापरीक्षाओं की ओर संक्रमण: स्वैच्छिक नैतिकता से आगे बढ़ना। उच्च जोखिम वाले AI अनुप्रयोगों (स्वास्थ्य सेवा या कानून में) को यूनेस्को द्वारा शुरू किए गए नैतिक प्रभाव आकलन (EIA) से गुजरना होगा, जिससे ‘मानवता को शामिल करना’ एक कानूनी अनिवार्यता बन जाए, न कि केवल एक डिजाइन विकल्प।
  • ‘डिजिटल कॉमन्स’ को मजबूत करना: AI के लोकतांत्रिक प्रसार के लिए चार्टर का समर्थन करके, राष्ट्र ‘डिजिटल उपनिवेशवाद’ को रोक सकते हैं और यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि ग्लोबल साउथ ‘डेटा प्रदाता’ से ‘नवाचार निर्माता’ की ओर अग्रसर हो।

निष्कर्ष 

इंडिया AI इंपैक्ट समिट, 2026 इस दर्शन को बल देता है कि भले ही AI 21वीं सदी का सबसे शक्तिशाली इंजन हो, नैतिकता ही इसका मार्गदर्शक सिद्धांत होनी चाहिए। जैसे-जैसे दुनिया आगे बढ़ रही है, AI की सफलता का मापन उसके एल्गोरिदम की जटिलता से नहीं, बल्कि उसकी लचीलता, स्थिरता और मानवीय गरिमा के साथ सामंजस्य से होगा।

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