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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी घोषित किया

Lokesh Pal December 22, 2025 02:06 84 0

संदर्भ 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सहमति से साथ रहने वाले वयस्कों के लिव-इन रिलेशनशिप में राज्य संरक्षण के अधिकार की पुष्टि की है और कहा है कि अविवाहित स्थिति उन्हें मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं करती।

मामले की पृष्ठभूमि

  • लिव-इन रिलेशनशिप’ में रह रही महिलाओं द्वारा 12 याचिकाएँ दायर की गईं, जिनमें जीवन को खतरे की आशंका जताई गई।
  • याचिकाकर्ताओं का दावा था कि स्थानीय पुलिस ने संरक्षण हेतु की गई उनकी पूर्व अपीलों पर ध्यान नहीं दिया।
  • सभी मामलों को एक साथ संगठित कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सुनवाई प्रारंभ की।
  • यह निर्णय अप्रैल 2023 में उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ के उस आदेश से भिन्न है, जिसमें एक ‘लिव-इन’ युगल को संरक्षण देने से इनकार किया गया था।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का प्रमुख निर्णय एवं निर्देश

न्यायालय की मुख्य टिप्पणियाँ

  • लिव-इन रिलेशनशिप अवैध नहीं हैं और विवाह के बिना संबंध बनाना भी अपराध नहीं है।
  • राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है कि वह वैवाहिक स्थिति से परे, प्रत्येक नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करे।
    • उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि संवैधानिक अधिकार सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं।
  • वर्तमान आदेश में स्पष्ट किया गया कि अप्रैल 2023 का पूर्व निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टिकोण के अनुरूप नहीं था और तथ्य भी भिन्न थे।
  • न्यायालय ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 का संदर्भ दिया, जो पत्नी” शब्द का प्रयोग किए बिना घरेलू संबंधों में महिलाओं को संरक्षण प्रदान करता है।
  • यह स्वीकार किया गया कि भारत में ‘लिव-इन’ रिलेशनशिप नैतिक बहस का विषय हैं, परंतु व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है।
    • सहमति-आधारित व्यक्तिगत निर्णयों का न्यायालय द्वारा पुनर्मूल्यांकन अथवा तृतीय पक्षों द्वारा हस्तक्षेप अनुचित माना गया है, क्योंकि ऐसे निर्णय स्वायत्त व्यक्तिगत चयन और निजता के दायरे में आते हैं।

भारत में  ‘लिव-इन’ रिलेशनशिप की विधिक स्थिति

  • संवैधानिक अधिकार: अपनी पसंद के साथी के साथ संबंध रखने का अधिकार अनुच्छेद-21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के अंतर्गत संरक्षित है।
  • न्यायिक दृष्टिकोण: सर्वोच्च न्यायालय ने निरंतर माना है कि ‘लिव-इन’ रिलेशनशिप अवैध या अपराध नहीं हैं, भले ही सामाजिक रूप से अस्वीकार्य हों।
  • मुख्य संरक्षण: घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 “विवाह के स्वरूप वाले संबंध” में महिलाओं को संरक्षण प्रदान करता है।

प्रदत्त अधिकार (कुछ शर्तों के साथ)

  • भरण-पोषण: यदि संबंध निर्धारित वैधानिक मानकों को पूरा करता है, तो महिला, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 अथवा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत निर्वाह-भत्ता/आर्थिक सहायता का दावा प्रस्तुत कर सकती है।
  • संरक्षण एवं निवास: महिला संरक्षण आदेश माँग सकती है और उसे साझा गृह से बेदखल नहीं किया जा सकता।
  • बच्चों की स्थिति: बच्चे वैध माने जाते हैं और उन्हें माता-पिता की संपत्ति में उत्तराधिकार अधिकार प्राप्त होते हैं।
  • पुलिस संरक्षण: न्यायालय धमकी या उत्पीड़न की स्थिति में पुलिस संरक्षण का आदेश दे सकता है।

विधिक सीमाएँ

  • उत्तराधिकार: वसीयत के बिना, साथी एक-दूसरे की संपत्ति के स्वतः उत्तराधिकारी नहीं होते।
  • संपत्ति विभाजन: संबंध के दौरान अर्जित संपत्ति पर अधिकार स्वतः नहीं होता, यह योगदान के प्रमाण पर निर्भर करता है।
  • सामाजिक लाभ: सामान्यतः विवाह से जुड़े लाभ, जैसे-पारिवारिक पेंशन या कर लाभ, लिव-इन’ युगल को उपलब्ध नहीं होते हैं।

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