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दल-बदल विरोधी कानून

Lokesh Pal February 09, 2026 03:18 14 0

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय ने तेलंगाना विधानसभा के अध्यक्ष को बीआरएस विधायकों के विरुद्ध लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए अंतिम अवसर प्रदान किया है, जिन पर सत्तारूढ़ कांग्रेस में शामिल होने के बाद दलबदल का आरोप है।

मामले की पृष्ठभूमि

  • दलबदल याचिकाएँ: तेलंगाना में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के बाद दलबदल के आरोपों का सामना कर रहे 10 भारत राष्ट्र समिति (BRS) विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाएँ दायर की गई थीं।
  • अंतिम दो विधायकों के विरुद्ध याचिकाएँ अभी लंबित हैं, जबकि अन्य मामलों में निर्णय लिया जा चुका है।

स्पीकर की भूमिका पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ

  • संवैधानिक प्रतिरक्षा नहीं: न्यायालय ने दोहराया कि दसवीं अनुसूची के अंतर्गत न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करते समय स्पीकर को कोई संवैधानिक प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं होती है।
  • विलंबकारी रणनीति के विरुद्ध: न्यायालय ने बल दिया कि अध्यक्ष अयोग्यता संबंधी याचिकाओं को सदन के कार्यकाल की समाप्ति तक स्वाभाविक रूप से समाप्त होने तक लंबित नहीं रख सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश

  • अंतिम समय-सीमा: न्यायालय ने शेष दो विधायकों के विरुद्ध याचिकाओं पर “निश्चित रूप से निर्णय” लेने हेतु अध्यक्ष को तीन सप्ताह का समय दिया।
  • अवमानना संबंधी चेतावनी: न्यायालय ने चेतावनी दी कि समय-सीमा से आगे की देरी को अवमानना माना जाएगा, क्योंकि अध्यक्ष दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अर्द्ध-न्यायिक न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करते हैं।

दलबदल विरोधी कानून को बार-बार पार्टी बदलने से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए लाया गया था, जिसे वर्ष 1967 की “आया राम गया राम” घटना से लोकप्रियता मिली, जब एक विधायक ने कुछ ही सप्ताहों में तीन बार पार्टी बदली थी।

दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) के प्रमुख प्रावधान

  • संवैधानिक आधार: दलबदल विरोधी कानून, वर्ष 1985 के 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया, अनुच्छेद-102(2) और 191(2) के माध्यम से संचालित होता है तथा दलबदल के आधार पर विधायकों की अयोग्यता का प्रावधान करता है।
  • अयोग्यता के आधार: किसी राजनीतिक दल से संबंधित विधायक अयोग्य हो, यदि वह:
    • स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।
    • बिना पूर्व अनुमति सदन में पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है।
    • पार्टी की अनुमति का अपवाद: यदि सदस्य ने पार्टी से पूर्व अनुमति ली हो, या पार्टी 15 दिनों के भीतर उसके मतदान अथवा अनुपस्थिति को स्वीकार कर ले, तो वह अयोग्य नहीं होगा।
    • नामित सदस्य: यदि कोई नामित सदस्य सदन में स्थान ग्रहण करने की तिथि से छह माह के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्य होगा।
    • स्वतंत्र सदस्य: यदि कोई स्वतंत्र सदस्य निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्य होगा।

विभाजन संबंधी प्रावधान की समाप्ति: विधानमंडल दल के एक-तिहाई सदस्यों द्वारा विभाजन की स्थिति में अयोग्यता से छूट देने वाले प्रावधान को 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा समाप्त कर दिया गया, क्योंकि इसका व्यापक दुरुपयोग हो रहा था।

  • अयोग्यता संबंधी अपवाद 
    • विलय आधारित छूट: जब मूल राजनीतिक दल के कम-से-कम दो-तिहाई विधायक किसी अन्य दल में विलय पर सहमत हों, तो उन्हें अयोग्यता से छूट प्राप्त होगी।
    • पीठासीन अधिकारी: किसी सदस्य को अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा, यदि:
      • वह अध्यक्ष/सभापति चुने जाने के बाद अपनी पार्टी से त्याग-पत्र देता है।
      • पद छोड़ने के बाद वह पुनः अपनी पार्टी में शामिल हो सकता है।
  • निर्णायक प्राधिकारी: दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता से संबंधित सभी मामलों का निर्णय अध्यक्ष या सभापति द्वारा किया जाता है।
    • वे दलबदल विरोधी कानून के अंतर्गत अर्द्ध-न्यायिक न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करते हैं।
  • निश्चित समय-सीमा का अभाव: कानून में निर्णय के लिए कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है, जिससे अनेक मामलों में विलंब होता है।
  • दलबदल मामलों की प्रक्रिया
    • आरंभ: दलबदल का मामला तभी शुरू किया जा सकता है, जब सदन के किसी सदस्य द्वारा शिकायत की जाए।
    • स्पष्टीकरण का अवसर: आरोपी सदस्य को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना अनिवार्य है।
  • व्हिप की भूमिका
    • व्हिप पार्टी सदस्यों की उपस्थिति और मतदान संबंधी अनुशासन को सुनिश्चित करता है।
    • व्हिप की अवहेलना कर पार्टी के विरुद्ध मतदान करने पर दलबदल कानून के अंतर्गत कार्रवाई हो सकती है।

दलबदल संबंधी मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण

  • किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू (1992): सर्वोच्च न्यायालय ने दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा तथा स्पष्ट किया कि इसके अंतर्गत अध्यक्ष के निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे।
  • रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994): न्यायालय ने कहा कि किसी विधायक के आचरण और व्यवहार के आधार पर, बिना औपचारिक त्याग-पत्र दिए भी, उसे स्वेच्छा से पार्टी सदस्यता छोड़ने वाला माना जा सकता है।
  • नबाम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष (2016): न्यायालय ने निर्णय दिया कि जब अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव लंबित हो, तब वह दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय नहीं दे सकता।
  • केइशाम मेघाचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष (2020): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि दलबदल संबंधी मामलों का निर्णय उचित समय-सीमा के भीतर किया जाना चाहिए।

दलबदल विरोधी कानून पर समितियों की सिफारिशें

  • दिनेश गोस्वामी समिति (1990)
    • अयोग्यता को केवल स्वैच्छिक दल-त्याग या विश्वास/अविश्वास प्रस्ताव के दौरान व्हिप उल्लंघन तक सीमित किया जाए।
    • दलबदल से संबंधित मामलों का निर्णय अध्यक्ष के बजाय निर्वाचन आयोग की सलाह पर राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा किया जाए।
  • संविधान के कार्यकरण की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग (2002)
    • दलबदलुओं को शेष कार्यकाल के लिए किसी भी सार्वजनिक पद या वेतनभोगी राजनीतिक पद से वंचित किया जाए।
    • यदि किसी दलबदलू के मत से सरकार गिरती है, तो उस मत को अमान्य माना जाए।

PWOnlyIAS विशेष

न्यायालय की अवमानना

  • संविधान न्यायालय की अवमानना” को परिभाषित नहीं करता है; इसे अवमानना न्यायालय अधिनियम, 1971 के अंतर्गत परिभाषित किया गया है, जो अवमानना को दीवानी और आपराधिक श्रेणियों में वर्गीकृत करता है।
  • सिविल अवमानना का अर्थ है किसी न्यायालय के निर्णय, आदेश, रिट या निर्देश की जानबूझकर अवहेलना करना या न्यायालय को दी गई किसी प्रतिज्ञा का जानबूझकर उल्लंघन करना।
  • आपराधिक अवमानना में ऐसे कृत्य या प्रकाशन शामिल होते हैं, जो किसी न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं या उसके अधिकार को कम करते हैं, न्यायिक कार्यवाहियों में हस्तक्षेप करते हैं, अथवा न्याय के प्रशासन में बाधा उत्पन्न करते हैं।

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