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रैगिंग विरोधी तंत्र

Lokesh Pal August 30, 2025 03:11 13 0

संदर्भ

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के अध्यक्ष ने मौजूदा कानूनों और नियमों के बावजूद उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग के जारी रहने पर चिंता व्यक्त की और मजबूत निगरानी तंत्र की माँग की है।

NHRC द्वारा उठाई गईं चिंताएँ

  • रैगिंग का जारी रहना: वर्ष 2001 के सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों, R. K. राघवन समिति की रिपोर्ट और वर्ष 2009 के UGC विनियमों के बावजूद यह जारी है।
  • प्रवर्तन में त्रुटियाँ: कम संवेदनशीलता, पीड़ितों की सुरक्षा में कमी और अप्रभावी शिकायत निवारण प्रमुख चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

NHRC द्वारा प्रस्तावित प्रमुख सिफारिशें और उपाय

  • हेल्पलाइन का प्रदर्शन: सभी संस्थागत वेबसाइटों पर UGC की 24×7 एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन का अनिवार्य प्रदर्शन।
  • पुलिस की भागीदारी एवं प्रतिनिधित्व: पुलिस को घटनाओं की तत्काल सूचना देना, एंटी-रैगिंग समितियों में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग/अल्पसंख्यक सदस्यों को शामिल करना।
  • निगरानी तंत्र: नियमित ऑडिट, औचक निरीक्षण, CCTV निगरानी और परिसर में पुलिस का नियमित दौरा।
  • मानसिक स्वास्थ्य सहायता: प्रशिक्षित पेशेवरों के साथ स्वास्थ्य और समावेशन केंद्र स्थापित करना।
  • रिपोर्टिंग और जवाबदेही: संस्थानों को साक्ष्यों के साथ वार्षिक एंटी-रैगिंग रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जिला प्रशासन की स्वीकृति के बिना शिकायतों को बंद नहीं किया जा सकता।
  • व्यवहार परिवर्तन: छात्रों की मानसिकता बदलने और रैगिंग को हतोत्साहित करने के लिए रिचर्ड थेलर की ‘नज तकनीक’ (Nudge technique) का उपयोग करना।
  • गुमनाम शिकायतें: गोपनीय रिपोर्टिंग को प्रोत्साहित करना ‘रैगिंग-मुक्त परिसरों’ को सर्वोत्तम अभ्यास के रूप में मान्यता देंना।
  • अभिभावकों की भागीदारी: जवाबदेही के लिए शिकायत मामलों में अभिभावकों को सूचित करना और उन्हें शामिल करना।
  • संस्थागत सहयोग: जागरूकता और प्रवर्तन के लिए NHRC, NALSA और UGC के बीच समन्वय को मजबूत करना।

रैगिंग की परिभाषा: (सर्वोच्च न्यायालय द्वारा, विश्व जागृति मिशन बनाम केंद्र सरकार, 2001)

  • रैगिंग को किसी भी ऐसे कृत्य के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो:
    • अव्यवस्थित आचरण: इसमें ऐसे मौखिक अथवा लिखित शब्द तथा व्यवहार सम्मिलित हैं, जो किसी नवप्रवेशी विद्यार्थी/कनिष्ठ के प्रति उपेक्षा, अशिष्टता अथवा चिढ़ाने की प्रवृत्ति प्रदर्शित करते हैं।
    • परेशानी, कठिनाई या मनोवैज्ञानिक नुकसान का कारण बनते है।
    • भय उत्पन्न करना: जूनियर में भय या आशंका की भावना उत्पन्न करते  हो।
    • जबरन कार्य: छात्रों को उनकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करने के लिए मजबूर किया जाता हो, जिससे उन्हें शर्मिंदगी या परेशानी का सामना करना पड़ता है।
    • कल्याण पर प्रभाव: छात्रों के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • कारण: दूसरों को पीड़ा देकर सुख प्राप्त करना या सीनियर द्वारा जूनियर पर श्रेष्ठता जताना।
  • सर्वोच्च न्यायालय का अवलोकन: रैगिंग देश भर के ‘शैक्षणिक संस्थानों में व्याप्त एक अभिशाप’ है।

भारत में रैगिंग के विरुद्ध समितियाँ और कानूनी ढाँचा

  1. सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश (वर्ष 2001- विश्व जागृति मिशन बनाम केंद्र सरकार, 2001 मामला)
    • संस्थानों को रैगिंग रोकने और शिकायतों का आंतरिक रूप से समाधान करने के लिए प्रॉक्टोरल समितियाँ स्थापित करनी चाहिए।
    • यदि रैगिंग अनियंत्रित हो जाती है या संज्ञेय अपराध बन जाती है, तो इसकी सूचना पुलिस को दी जानी चाहिए।
  2. राघवन समिति की सिफारिशें (वर्ष 2007)
    • मार्गदर्शन प्रकोष्ठ: प्रत्येक संस्थान को एक प्रकोष्ठ बनाना चाहिए जहाँ सीनियर छात्र नए छात्रों के लिए मार्गदर्शक के रूप में कार्य करें।
    • जागरूकता अभियान: रैगिंग के प्रति शून्य सहिष्णुता को बढ़ावा देने वाले राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के विज्ञापन जारी करें।
    • मानवाधिकार शिक्षा: NCERT और SCERT रैगिंग विरोधी जागरूकता को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाएँ।
    • कानून: रैगिंग के विरुद्ध एक सख्त कानून, जिसमें अपराधी पर ही स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी भी शामिल हो।
  3. UGC दिशा-निर्देश (वर्ष 2009)
    • “उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग के खतरे को रोकने संबंधी विनियम” के अंतर्गत अपनाया गया।
    • परिभाषा: रैगिंग के 9 रूपों (छेड़छाड़, शारीरिक/मानसिक क्षति, जबरन आर्थिक वसूली, अश्लील कृत्य, आदि) को सूचीबद्ध करता है।
    • संस्थागत उपाय
      1. रैगिंग के विरुद्ध छात्रों से अनिवार्य रूप से वचनबद्धता।
      2. संस्थानों को रैगिंग विरोधी समितियाँ (संकाय, वार्डन, छात्र सलाहकार, सीनियर छात्र) गठित करनी होंगी।
      3. प्रवेश के दौरान नए और सीनियर छात्रों के लिए संयुक्त जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे।
      4. दोषी पाए जाने पर, समिति के सदस्यों को 24 घंटे के भीतर FIR दर्ज करनी होगी।
      5. सबूत पेश करने का भार पीड़ित पर नहीं, बल्कि अपराधी पर होता है।
  4. रैगिंग पर वैधानिक प्रावधान
    • तमिलनाडु (वर्ष 1997): रैगिंग निषेध अधिनियम, 1997 के माध्यम से रैगिंग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला पहला राज्य।
      1. रैगिंग को अव्यवस्थित आचरण (मौखिक, लिखित या शारीरिक) के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसके कारण छात्रों को परेशान किया जाता है या उनके साथ अशिष्ट व्यवहार किया जाता है।
    • भारतीय दंड संहिता (IPC)
      1. धारा 339: धारा 339, जिसे गलत तरीके से रोकना (सदोष अवरोध) भी कहते हैं, एक व्यक्ति को स्वेच्छा से बाधित करके किसी भी दिशा में बढ़ने से रोकने से संबंधित है, जहाँ उस व्यक्ति को आगे बढ़ने का अधिकार है।
      2. धारा 340: गलत तरीके से रोक लगाने को परिभाषित करती है, किसी व्यक्ति को कुछ सीमाओं के भीतर रोकना, स्वतंत्र आवाजाही को रोकना।
    • नियामक ढाँचा: AICTE और भारतीय चिकित्सा परिषद (MCI) ने अपने-अपने अधिनियमों के तहत अलग-अलग रैगिंग विरोधी विनियम जारी किए हैं।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के बारे में

  • अधिदेश: NHRC संविधान द्वारा गारंटीकृत या अंतरराष्ट्रीय अनुबंधों में सन्निहित व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और सम्मान से संबंधित अधिकारों के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए जिम्मेदार है।
  • स्थापना: भारत द्वारा वर्ष 1993 में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम लागू किए जाने के बाद NHRC अस्तित्व में आया।
  • संरचना
    • अध्यक्ष: भारत के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश।
    • 5 पूर्णकालिक सदस्य: एक सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश (वर्तमान/सेवानिवृत्त), एक उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश (वर्तमान/सेवानिवृत्त), और मानवाधिकार विशेषज्ञता वाले तीन सदस्य (जिसमे कम-से-कम एक महिला)।
    • 7 पदेन सदस्य: विभिन्न राष्ट्रीय आयोगों के अध्यक्ष।
  • नियुक्ति: भारत के राष्ट्रपति द्वारा एक समिति की सिफारिश पर की जाती है, जिसमें शामिल होते हैं: प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री, लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता, राज्यसभा के उपसभापति
  • शक्तियाँ: CPC, 1908 के तहत एक सिविल न्यायलय की तरह कार्य करता है, जिसके पास निम्नलिखित शक्तियाँ हैं:
    • शपथ पर गवाहों को बुलाना और उनकी जाँच करना
    • दस्तावेजों की मांग और प्रस्तुति का आदेश देना
    • शपथपत्रों पर साक्ष्य स्वीकार करना
    • न्यायलय/कार्यालयों से सार्वजनिक अभिलेखों की माँग करना
    • गवाह/दस्तावेजों की जाँच के लिए कमीशन जारी करना
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कार्य: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सम्पूर्ण भारत में मानवाधिकारों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने के उद्देश्य से विभिन्न कार्य सौंपे गए हैं। कुछ प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं:
    • पूछताछ: लोक सेवकों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन या लापरवाही की जाँच (स्वतः संज्ञान, याचिकाओं या न्यायालय के आदेशों के आधार पर)।
    • न्यायिक हस्तक्षेप: मानवाधिकार मुद्दों से जुड़े न्यायालयीन मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है।
    • जेल का दौरा: कारागारों/हिरासत केंद्रों का निरीक्षण कर वहाँ की जीवन स्थितियों की समीक्षा करता है और सुधार के सुझाव् देता है।
    • कानूनी सुरक्षा उपाय: मानवाधिकारों के लिए संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा की समीक्षा करता है और सुधारों का सुझाव देता है।

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