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भारत में जैव अर्थव्यवस्था

Lokesh Pal August 29, 2025 02:23 6 0

संदर्भ

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री ने युवाओं के लिए बायोई3 (BioE3) चैलेंज और देश के पहले राष्ट्रीय बायोफाउंड्री नेटवर्क का शुभारंभ करके बायोई3 (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी) नीति के एक वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाया।

संबंधित तथ्य

  • भारत की जैव अर्थव्यवस्था का विकास: भारत की जैव अर्थव्यवस्था वर्ष 2014 में 10 बिलियन डॉलर से बढ़कर वर्ष 2024 में 165.7 बिलियन डॉलर हो गई है, और वर्ष 2030 तक इसे 300 बिलियन डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य है।

जैव अर्थव्यवस्था क्या है?

  • संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (Food and Agriculture Organisation- FAO) के अनुसार, जैव अर्थव्यवस्था “जैविक संसाधनों का उत्पादन, उपयोग और संरक्षण’ है, जिसमें संबंधित ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार शामिल हैं, ताकि सभी आर्थिक क्षेत्रों को सूचना, उत्पाद, प्रक्रियाएँ और सेवाएँ प्रदान की जा सकें, जिसका उद्देश्य एक स्थायी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना है।”

भारत की जैव अर्थव्यवस्था के क्षेत्र

  • औद्योगिक जैव प्रौद्योगिकी: वर्ष 2024 में जैव अर्थव्यवस्था के मूल्य का लगभग 50%।
    • प्रमुख क्षेत्र:
      • जैव ईंधन: गन्ना, मक्का और अन्य फसलों के किण्वन के माध्यम से एथेनॉल उत्पादन।
      • जैवप्लास्टिक: पेट्रोलियम-आधारित प्लास्टिक के विकल्प के रूप में जैव-निम्नीकरणीय प्लास्टिक का विकास।
      • जैव-आधारित रसायन और एंजाइम (Bio-based Chemicals and Enzymes): पारंपरिक रसायनों का सतत् विकल्प, जैव-व्युत्पन्न विकल्पों से प्रतिस्थापन।
  • फार्मास्यूटिकल्स और स्वास्थ्य सेवा: जैव अर्थव्यवस्था के कुल मूल्य का लगभग 35% हिस्सा।
    • प्रमुख क्षेत्र
      • वैक्सीन: प्रमुख योगदानकर्ता, भारत वैक्सीन उत्पादन में वैश्विक अग्रणी है।
      • जैव-चिकित्सा: जैव संसाधनों से प्राप्त औषधियों और उपचारों का विकास।
      • निदान और चिकित्सा: रोग निवारण और उपचार के लिए नवीन जैव-प्रौद्योगिकी समाधान।
  • कृषि जैव प्रौद्योगिकी: कृषि जैव प्रौद्योगिकी महत्त्वपूर्ण है, लेकिन नियामक बाधाओं, विशेषकर आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलों से संबंधित प्रतिबंधों के कारण, इसका उपयोग सीमित है।
    • प्रमुख क्षेत्र
      • फसल सुधार: उच्च उपज, सूखा-प्रतिरोधी और कीट-प्रतिरोधी फसलों के विकास के लिए जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग।
      • जैव उर्वरक और जैव कीटनाशक (Biofertilizers and Biopesticides): रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के स्थायी विकल्प।
      • परिशुद्ध कृषि (Precision Agriculture): बेहतर उपज पूर्वानुमान और संसाधन प्रबंधन के लिए जैव सूचना विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का लाभ उठाना।
  • अनुसंधान, जैव सूचना विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी: वर्ष 2024 में सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र, जिसने अनुसंधान एवं विकास तथा तकनीकी नवाचारों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।।
    • प्रमुख क्षेत्र
      • जैव प्रौद्योगिकी संबंधी सॉफ्टवेयर का विकास: डेटा विश्लेषण और औषधि खोज के लिए प्लेटफॉर्म।
      • नैदानिक ​​परीक्षण और औषधि अनुसंधान: अनुसंधान प्रक्रियाओं में तेजी लाने के लिए जैव सूचना विज्ञान का उपयोग।
      • संश्लेषित जीव विज्ञान: वांछित लक्षणों वाले आनुवंशिक रूप से अभियांत्रिकी सूक्ष्मजीवों का विकास।
  • पर्यावरण जैव प्रौद्योगिकी: बढ़ते वैश्विक महत्त्व का उभरता हुआ क्षेत्र।
    • प्रमुख क्षेत्र
      • अपशिष्ट प्रबंधन और जैव-उपचार: औद्योगिक अपशिष्ट और पर्यावरण प्रदूषकों के उपचार हेतु सूक्ष्मजीवों का उपयोग।
      • जलवायु-प्रतिरोधी प्रौद्योगिकियाँ: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए जैव-आधारित समाधान।
  • समुद्री एवं अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी: विशिष्ट लेकिन उच्च विकास क्षमता वाला क्षेत्र।
    • प्रमुख क्षेत्र
      • समुद्री जैव प्रौद्योगिकी (Marine Biotechnology): फार्मास्यूटिकल्स, जैव ईंधन और जैव सामग्री के लिए समुद्री जैव संसाधनों की खोज।

      • अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी: अंतरिक्ष में जीवन को बनाए रखने और नवीन अंतरिक्ष सामग्रियों के विकास के लिए जैव प्रौद्योगिकी समाधानों का अनुप्रयोग।
  • जैव-निर्माण और जैव-आधारित वस्त्र: भविष्य में उच्च संभावना वाला उभरता हुआ क्षेत्र।
    • प्रमुख क्षेत्र
      • जैव-निर्मित वस्त्र: पारंपरिक वस्त्रों के स्थायी विकल्प।
      • जैव-निर्माण प्लेटफॉर्म: जैव-आधारित रसायनों और सामग्रियों का उत्पादन।

प्रमुख वैज्ञानिक सफलताएँ

  • जीनोम इंडिया परियोजना (Genome India Project)
    • 99 विविध समुदायों के 10,074 भारतीयों का संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण पूरा किया।
    • पहला भारतीय जनसंख्या के लिए संदर्भ जीनोम तैयार किया, जिससे भारत की आनुवंशिक विविधता के अनुरूप व्यक्तिगत चिकित्सा संभव हुई।
    • नेतृत्व: जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology- DBT) द्वारा, जिसमें 20 राष्ट्रीय संस्थान सहयोग कर रहे हैं।
  • कैंसर के लिए स्वदेशी CAR-T सेल थेरेपी (Indigenous CAR-T Cell Therapy for Cancer)
    • B-सेल नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के लिए भारत की पहली स्वदेशी CAR-T सेल थेरेपी, क्वॉर्टेमी का शुभारंभ।
      • इम्यूनल थेरेप्यूटिक्स (Immunel Therapeutics) द्वारा विकसित, इसकी कीमत ₹35-50 लाख (वैश्विक लागत लगभग ₹3-4 करोड़) है।
  • नैफिथ्रोमाइसिन (Nafithromycin) – AMR के विरुद्ध भारत का पहला स्वदेशी एंटीबायोटिक
    • विकसितकर्ता संस्थान: वॉकहार्ट (Wockhardt) द्वारा, BIRAC के सहयोग से।
    • लक्ष्य: दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया के कारण होने वाला सामुदायिक-अधिग्रहित जीवाणु निमोनिया (Community Acquired Bacterial Pneumonia- CABP)।
    • प्रभावकारिता: एजिथ्रोमाइसिन (Azithromycin) की तुलना में 10 गुना अधिक प्रभावी, उच्च नैदानिक उपचार दर के साथ।
  • उन्नत टीके
    • न्यूमोशील्ड (Pneumo Shield) 14 (एबॉट [Abbott]): बच्चों के लिए 14-वैलेंट न्यूमोकोकल कंजुगेट वैक्सीन, जो मौजूदा टीकों की तुलना में अधिक स्ट्रेन को कवर करती है।
    • हिलचोल (HILLCHOL) (भारत बायोटेक): एकल-खुराक वाली हैजा की ओरल वैक्सीन।
    • कैडिफ्लू टेट्रा (Cadiflu Tetra) (कैडिला [Cadila]): नैनोपार्टिकल तकनीक का उपयोग करके ‘क्वाड्रीलेटरल इन्फ्लूएंजा वैक्सीन’ का निर्माण।
  • एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (Ethanol Blending Program)
    • उपलब्धि: वर्ष 2024 तक 15% एथेनॉल मिश्रण (2025 तक 20%) प्राप्त किया जाएगा।
      • जीवाश्म ईंधन के आयात में कमी; भारत अब 16.2 बिलियन लीटर बायोएथेनॉल उत्पादन क्षमता (गन्ने और कृषि अपशिष्ट से) के साथ विश्व स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा एथेनॉल उत्पादक है।
  • जैव-सशक्त फसलें और जलवायु-अनुकूल कृषि
    • Bt कपास का प्रभुत्व: जैव-कृषि क्षेत्र का 76% हिस्सा ($10.3 बिलियन) है।
    • जैव-उर्वरक/जैव-कीटनाशक: बाजार बढ़कर $1.6 बिलियन (2024) हो गया, जिससे रसायनों का उपयोग कम हुआ।
    • डेयरी फार्मिंग के लिए स्वदेशी IVF माध्यम: इंडिया इम्यूनोलॉजिकल्स द्वारा विकसित ‘षष्ठी (Shashthi)’ IVF की लागत में 33% की कमी लाकर पशुधन उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि करता है।
  • AI-संचालित जैव प्रौद्योगिकी नवाचार
    • बायो-रेड की ddSEQ किट: कैंसर/प्रतिरक्षा विज्ञान अनुसंधान के लिए एकल-कोशिका RNA अनुक्रमण को सक्षम बनाती है।
    • न्यूबर्ग डायग्नोस्टिक्स का जिनी: रोग जोखिम पूर्वानुमान के लिए जीनोमिक्स प्लेटफॉर्म।
    • बायो-AI  हब: बायोई3 नीति के तहत एआई को जैव-निर्माण के साथ एकीकृत करने के लिए प्रस्तावित।
  • समुद्री एवं अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी (Marine and Space Biotechnology)
    • समुद्री जैव-पूर्वेक्षण (Marine Bioprospecting): समुद्री शैवाल की खेती और रोगाणुरोधी यौगिकों पर ध्यान केंद्रित।
    • अंतरिक्ष अनुसंधान: DBT-BIRAC जैव-विनिर्माण पर सूक्ष्म-गुरुत्व के प्रभावों का अध्ययन कर रहा है।
  • ड्रोन-आधारित स्वास्थ्य सेवा वितरण (Drone-Based Healthcare Delivery)
    • स्काई एयर मोबिलिटी और कैरिटास हॉस्पिटल: केरल में ड्रोन चिकित्सा आपूर्ति नेटवर्क शुरू किया गया, जिससे वितरण समय घंटों से घटकर 5-7 मिनट रह गया।
  • वैश्विक सहयोग (Global Collaborations)
    • वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन (Global Biofuel Alliance- GBA): सतत् ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए भारत, अमेरिका और ब्राजील के नेतृत्व में।
    • Ind-CEPI मिशन: महामारियों के लिए टीके विकसित करना (उदाहरण के लिए, भारत बायोटेक का चिकनगुनिया टीका चरण 2/3 परीक्षणों में)।

भारत में जैव अर्थव्यवस्था की आवश्यकता क्यों है?

  • सतत आर्थिक विकास: जैव-अर्थव्यवस्था औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए नवीकरणीय जैविक संसाधनों (पौधे, पशु, सूक्ष्मजीव) का लाभ उठाती है, जिससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती है।
    • यह पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम करते हुए आर्थिक विकास के लिए एक स्थायी विकल्प प्रदान करती है।
  • जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना: एथेनॉल और बायोडीजल जैसे जैव ईंधन पेट्रोलियम-आधारित ईंधन के विकल्प प्रदान करते हैं।
    • जैव ईंधन को बढ़ावा देने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बल मिलता है और कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिलती है।
  • नवाचार और अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा: जैव प्रौद्योगिकी, जैव सूचना विज्ञान और संश्लेषित जीव विज्ञान में प्रगति औषधि विकास, निदान और सतत् औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए नए मार्ग खोलती है।
  • रोजगार सृजन और कौशल विकास: जैव अर्थव्यवस्था के तीव्र विकास से लाखों रोजगार सृजित होने की संभावना है, विशेष रूप से जैव प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स और जैव-विनिर्माण के क्षेत्र में।
    • वर्ष 2030 तक, इसमें 35 मिलियन लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है, जिससे अत्याधुनिक क्षेत्रों में कौशल विकास को बढ़ावा मिलेगा।
  • कृषि उत्पादकता में वृद्धि: जैव प्रौद्योगिकी आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलों, जैव उर्वरकों और परिशुद्ध कृषि के माध्यम से कृषि में क्रांति ला सकती है।
    • ये नवाचार फसल की पैदावार में सुधार करते हैं, कीटनाशकों के उपयोग को कम करते हैं और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
  • पर्यावरण संरक्षण और अपशिष्ट प्रबंधन: जैव-आधारित समाधान अपशिष्ट प्रबंधन, जैव उपचार और प्रदूषण को कम करने में मदद कर सकते हैं।
    • जैव संसाधनों का उपयोग ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करके जलवायु लचीलेपन में योगदान देता है।
  • भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को मजबूत करना (Strengthening India’s Global Competitiveness): जैव-विनिर्माण और जैव-आधारित अनुसंधान के लिए भारत को एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने से जैव प्रौद्योगिकी और संबद्ध क्षेत्रों में इसकी वैश्विक स्थिति में वृद्धि होगी।

जैव अर्थव्यवस्था से संबंधित पहल (Initiatives Related to Bioeconomy)

  • BioE3 नीति (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी) – 2024
    • इसका उद्देश्य भारत को जैव-विनिर्माण के लिए एक वैश्विक केंद्र और जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान एवं विकास के एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
  • राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन (National Biopharma Mission- NBM): वर्ष 2017 में ₹1,500 करोड़ के बजट के साथ शुरू किया गया।
    • उद्देश्य: स्वदेशी बायोफार्मास्युटिकल्स के विकास में तेजी लाना और आयात पर भारत की निर्भरता कम करना।
  • जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (Biotechnology Industry Research Assistance Council – BIRAC): जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology- DBT) के तहत वर्ष 2012 में स्थापित, इसका उद्देश्य जैव प्रौद्योगिकी स्टार्ट-अप्स को वित्तपोषण, मार्गदर्शन और इनक्यूबेशन सहायता प्रदान करना है।
  • जैव प्रौद्योगिकी पार्क और इनक्यूबेटर योजना: पूरे भारत में अत्याधुनिक जैव प्रौद्योगिकी अवसंरचना और इनक्यूबेशन केंद्र स्थापित करती है।
  • जैव डिजाइन कार्यक्रम: नवाचार के माध्यम से स्वदेशी चिकित्सा प्रौद्योगिकियों और उपकरणों के विकास पर केंद्रित है।
  • अपशिष्ट से धन मिशन (PM-STIAC के अंतर्गत): इसका उद्देश्य अपशिष्ट को मूल्यवान संसाधनों में बदलने के लिए जैव प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना है।
  • डीप सी मिशन (Deep Ocean Mission- DOM): इसमें गहरे समुद्र के पारिस्थितिकी तंत्रों से जैव संसाधनों की खोज के लिए समुद्री जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित घटक शामिल हैं।

भारत में जैव अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ

  • नियामक अनिश्चितता और नीतिगत बाधाएँ: स्पष्ट और सुसंगत नीतियों का अभाव, विशेष रूप से आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलों के अनुमोदन में।
    • उदाहरण: लाभों के बावजूद, केवल BT कपास की ही व्यावसायिक खेती की जाती है, जबकि GM सरसों और बैंगन को लंबे समय तक नियामक देरी का सामना करना पड़ता है।
  • आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलों की सीमित स्वीकृति: जनधारणा और पर्यावरणीय चिंताओं के कारण जीएम फसलों को अपनाने में अनिच्छा।
    • तिलहन उत्पादकता बढ़ाने के लिए विकसित GM सरसों, आनुवंशिक अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (Genetic Engineering Appraisal Committee- GEAC) द्वारा मंजूरी मिलने के बावजूद अंतिम नियामक अनुमोदन का इंतजार कर रही है।
  • अपर्याप्त निधि और अनुसंधान एवं विकास निवेश: जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और नवाचार के लिए, विशेष रूप से उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में, अपर्याप्त निधि।
    • सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.7% अनुसंधान एवं विकास पर खर्च किया जाता है और जैव-अर्थव्यवस्था से संबंधित नवाचारों पर सीमित ध्यान दिया जाता है।
  • अवसंरचना और क्षमता संबंधी बाधाएँ: पर्याप्त जैव-विनिर्माण अवसंरचना और उच्च-स्तरीय अनुसंधान सुविधाओं का अभाव।
    • केवल पाँच राज्य – महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, गुजरात और आंध्र प्रदेश – जैव अर्थव्यवस्था उत्पादन में 67% से अधिक का योगदान करते हैं।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और व्यावसायीकरण अंतराल: प्रयोगशाला स्तर के अनुसंधान को व्यावसायिक दृष्टि से व्यवहार्य जैव-आधारित उत्पादों में रूपांतरित करना एक प्रमुख चुनौती है।
    • कई जैव-आधारित नवाचार, विशेष रूप से जैव ईंधन और जैव-प्लास्टिक में, विस्तार संबंधी प्रोत्साहनों के अभाव के कारण अभी भी प्रायोगिक चरण में हैं।
  • जैव-आधारित समाधानों के बारे में कम जागरूकता और अपनाने की प्रवृत्ति: जैव-आधारित समाधानों के लाभों के बारे में किसानों और उद्योगों में जागरूकता और तकनीकी जानकारी का अभाव है।
    • नीतिगत प्रोत्साहन के बावजूद, जैव-उर्वरकों और जैव-कीटनाशकों को अपनाने की प्रवृत्ति कम बनी हुई है, और अधिकांश किसान रासायनिक आदानों पर निर्भर हैं।
  • समुद्री और अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी का सीमित अन्वेषण: समुद्री जैव प्रौद्योगिकी और गहरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों से प्राप्त जैव संसाधनों में अप्रयुक्त क्षमता।
    • भारत के ‘डीप सी मिशन’ (Deep Ocean Mission- DOM) का उद्देश्य समुद्री जैव संसाधनों का दोहन करना है, लेकिन अन्वेषण अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है।

वैश्विक जैव अर्थव्यवस्था नीति ढाँचे

देश

नीतिगत ढाँचा

प्रमुख फोकस क्षेत्र

भारत का संरेखण

USA राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी और जैव विनिर्माण पहल (2022)
  • जैव-विनिर्माण
  • जलवायु-स्मार्ट कृषि
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा संचालित दवाओं की खोज
भारत के BioE3 की तरह ही इसमें भी जैव-विनिर्माण केंद्रों और बायो-AI पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
यूरोपीय संघ यूरोपीय ग्रीन डील और जैव-अर्थव्यवस्था रणनीति (2023)
  • सर्कुलर बायोइकोनॉमी
  • वर्ष 2050 तक कार्बन तटस्थता
  • समुद्री जैव प्रौद्योगिकी
भारत के कार्बन कैप्चर और ब्लू इकोनॉमी मिशन यूरोपीय संघ की प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करते हैं।
ब्राजील राष्ट्रीय जैव अर्थव्यवस्था नीति (2024)
  • अमेजन जैव संसाधन
  • एथेनॉल और जैव ईंधन
  • जैव प्लास्टिक
भारत ने एथेनॉल पर GBA के माध्यम से सहयोग किया; ब्राजील के गन्ना मॉडल से सीखना।
जर्मनी जैव अर्थव्यवस्था परिषद रणनीति (BioEconomy Council Strategy)
  • औद्योगिक जैव प्रौद्योगिकी
  • स्थायी रसायन
  • जैव-आधारित सामग्री
भारत का जैव-औद्योगिक क्षेत्र ($78.2 बिलियन) जर्मनी के तकनीक-संचालित ऐप के साथ संरेखित है।

भारत में जैव अर्थव्यवस्था के लिए आगे की राह और नीतिगत सिफारिशें

  • नीति एकीकरण और समन्वय को मजबूत करना: कृषि, जैव प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा और उद्योग में प्रयासों को संरेखित करने के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय जैव-अर्थव्यवस्था रणनीति विकसित करना।
    • राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी विकास रणनीति और राष्ट्रीय जैव-अर्थव्यवस्था मिशन जैसी पहलों के बीच तालमेल सुनिश्चित करना।
  • सतत् कृषि और बायोमास उपयोग को बढ़ावा देना: पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए जैव-आधारित कृषि पद्धतियों, जैव-उर्वरकों और जैविक कृषि को प्रोत्साहित करना।
    • ऊर्जा और औद्योगिक उपयोग हेतु बायोमास संग्रहण और रूपांतरण को सुगम बनाने के लिए नीतियाँ स्थापित करना।
  • अनुसंधान एवं विकास और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देना: उच्च-मूल्य वाले जैव उत्पादों और जैव ईंधन पर केंद्रित जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान में निवेश करना।
    • नवीन जैव-आधारित समाधानों के व्यावसायीकरण में तेजी लाने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को बढ़ावा देना।
  • जैव-विनिर्माण और औद्योगिक क्लस्टर विकसित करना: उत्पादन, प्रसंस्करण और वितरण को एकीकृत करने के लिए जैव-रिफाइनरियों और जैव-औद्योगिक क्लस्टरों की स्थापना करना।
    • उद्योगों को जैव-आधारित प्रौद्योगिकियों और सामग्रियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना।
  • कौशल विकास और क्षमता निर्माण: जैव-उद्यमियों और कार्यबल के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करना।
    • जैव प्रौद्योगिकी, कृषि और औद्योगिक प्रक्रियाओं को मिलाकर संयुक्त शिक्षा को बढ़ावा देना।
  • जैव अर्थव्यवस्था के विकास के लिए डिजिटल तकनीकों का लाभ उठाना: जैव-आधारित उद्योगों में निगरानी, ​​पता लगाने की क्षमता और दक्षता में सुधार के लिए AI, IoT और ब्लॉकचेन का उपयोग करना।
    • जैव-संसाधन प्रबंधन में परिशुद्ध कृषि और वास्तविक समय डेटा-आधारित निर्णय लेने में सहायता करना।
  • वैश्विक सहयोग और बाजार पहुँच का विस्तार करना: ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए यूरोपीय संघ जैव-अर्थव्यवस्था रणनीति और अंतरराष्ट्रीय जैव-अर्थव्यवस्था मंच जैसे वैश्विक मंचों के साथ जुड़ना।
    • अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारत के जैव-आधारित उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए निर्यात-उन्मुख नीतियाँ विकसित करना।

निष्कर्ष

भारत की जैव-अर्थव्यवस्था में सतत् विकास, नवाचार और रोजगार को बढ़ावा देने की अपार क्षमता है। नियामक सुधारों, उन्नत अनुसंधान एवं विकास निवेश और लक्षित नीतिगत प्रोत्साहनों के माध्यम से नियामक चुनौतियों का समाधान करना भारत के लिए वर्ष 2047 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की जैव-अर्थव्यवस्था के अपने महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

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