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कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU)

Lokesh Pal February 27, 2026 04:26 15 0

संदर्भ

भारत सरकार औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन और जलवायु लक्ष्यों पर कार्रवाई को तेज कर रही है, जिसमें कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU) पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU) के बारे में

  • कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU) ऐसी प्रौद्योगिकियों का समूह है, जो औद्योगिक स्रोतों से या सीधे वायु से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को निष्कासित कर उसे उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करती हैं।
  • यह प्रक्रिया वायुमंडल से कार्बन को हटाकर उसे अर्थव्यवस्था में ईंधन, रसायन, निर्माण सामग्री या पॉलिमर के इनपुट के रूप में पुनः प्रविष्ट करती है।

भारत को CCU की आवश्यकता क्यों है?

  • उच्च उत्सर्जन प्रोफाइल: भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा CO₂ उत्सर्जक है, जहाँ विद्युत, सीमेंट, इस्पात और रसायन क्षेत्र से प्रमुख उत्सर्जन होता है।
  • कठिन-नियंत्रित उद्योग (Hard-to-Abate Industries): सीमेंट और इस्पात जैसे क्षेत्रों में प्रक्रिया-जनित उत्सर्जन होता है, जिसे केवल नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से समाप्त नहीं किया जा सकता है।
    • उदाहरण: केवल सीमेंट निर्माण ही वैश्विक CO₂ उत्सर्जन का लगभग 7–8% योगदान करता है।
  • केवल नवीकरणीय ऊर्जा की सीमाएँ: यद्यपि नवीकरणीय ऊर्जा भविष्य के उत्सर्जन को कम करती है, परंतु यह मौजूदा औद्योगिक कार्बन तीव्रता को पूर्णतः संबोधित नहीं कर सकती है।
  • औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन का उपकरण: CCU कार्बन-गहन उद्योगों से उत्सर्जन कम करने के लिए एक व्यावहारिक मार्ग प्रदान करता है।
  • आर्थिक अवसर: निष्कासित CO₂ को ईंधन, रसायन और निर्माण सामग्री में परिवर्तित कर नई मूल्य शृंखलाएँ विकसित की जा सकती हैं।
  • जलवायु लक्ष्यों के साथ सामंजस्य: यह भारत के वर्ष 2070 के नेट-जीरो लक्ष्य और चक्रीय, निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण का समर्थन करता है।

कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) में भारत की पहलें

  • सरकारी अनुसंधान एवं विकास (R&D) समर्थन: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) CCU अनुसंधान को वित्तपोषित कर रहा है तथा कार्बन उपयोग प्रौद्योगिकियों के लिए एक समर्पित R&D रोडमैप विकसित किया है।
  • नीतिगत रोडमैप (2030): पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने वर्ष 2030 का मसौदा CCUS रोडमैप जारी किया है, जिसमें बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन हेतु प्राथमिकता क्षेत्रों और पायलट परियोजनाओं की पहचान की गई है।
  • निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन
    • अंबुजा सीमेंट्स (अडानी समूह): IIT बॉम्बे के सहयोग से एक इंडो-स्वीडिश साझेदारी के अंतर्गत, CO₂ को ईंधन और मूल्य-वर्द्धित सामग्रियों में परिवर्तित करने की प्रौद्योगिकी का पायलट परीक्षण किया जा रहा है।
    • जेके सीमेंट पहल: हल्के कंकरीट ब्लॉक तथा ओलेफिन जैसे रसायनों के उत्पादन हेतु CO₂ को कैप्चर करने के लिए एक CCU परीक्षण मंच (टेस्टबेड) विकसित किया जा रहा है।
  • बायो-CCU नवाचार (ORSL): ऑर्गेनिक रीसाइक्लिंग सिस्टम्स लिमिटेड (ORSL) भारत के प्रथम पायलट-स्तरीय बायो-CCU प्लेटफ़ॉर्म का नेतृत्व कर रहा है, जो बायोगैस धाराओं से CO₂ को बायो-एल्कोहल और विशिष्ट रसायनों में परिवर्तित करता है।

कार्बन कैप्चर और उपयोग (CCU) में वैश्विक पहलें

  • यूरोपीय संघ: यूरोपीय संघ की बायोइकोनॉमी स्ट्रैटेजी और सर्कुलर इकोनॉमी एक्शन प्लान स्पष्ट रूप से CCU का समर्थन करती हैं, ताकि CO₂ को रसायनों, ईंधनों और सामग्रियों के लिए फीडस्टॉक में परिवर्तित किया जा सके तथा इसे परिपत्रता एवं स्थिरता लक्ष्यों से जोड़ा जा सके।
  • बेल्जियम: आर्सेलर मित्तल ने मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज और क्लाइमेट-टेक फर्म डी-सीआरबीएन के साथ साझेदारी में संयंत्र में ऐसी तकनीक का पायलट परीक्षण किया है, जो CO₂ को कार्बन मोनोऑक्साइड में बदलती है, जिसका उपयोग इस्पात और रासायनिक उत्पादन में किया जाता है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: संयुक्त राज्य अमेरिका CO₂-आधारित ईंधन और रसायनों के लिए CCU को बढ़ाने हेतु कर-छूट और वित्तपोषण के संयोजन का उपयोग करता है।
  • संयुक्त अरब अमीरात: संयुक्त अरब अमीरात की अल रेयादाह परियोजना तथा प्रस्तावित CO₂-से-रसायन हब, हरित हाइड्रोजन के साथ CCU को संरेखित करते हैं।

चुनौतियाँ

  • लागत प्रतिस्पर्द्धा की चुनौती: CO₂ का निष्कासन करना, शुद्ध करना और परिवर्तित करना ऊर्जा-गहन तथा महँगा है, जिससे नीतिगत प्रोत्साहनों के बिना CCU-आधारित उत्पाद सस्ते जीवाश्म-आधारित विकल्पों की तुलना में कम प्रतिस्पर्द्धी हो जाते हैं।
  • अवसंरचना अंतराल: CCU के लिए सह-स्थित औद्योगिक क्लस्टर, CO₂ का विश्वसनीय परिवहन तथा डाउनस्ट्रीम विनिर्माण के साथ एकीकरण आवश्यक है, जो भारत के औद्योगिक क्षेत्रों में समान रूप से विकसित नहीं हैं।
  • नियामकीय और बाजार अनिश्चितता: स्पष्ट मानकों, प्रमाणन व्यवस्था और बाजार संकेतों के अभाव से निवेशकों में अनिश्चितता बनी रहती है तथा CO₂-आधारित उत्पादों की माँग सीमित रहती है।

कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (CCS) और कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU) के बीच अंतर

आधार कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (CCS) कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (CCU)
अर्थ निष्कासित CO₂ को वातावरण में इसके उत्सर्जन को रोकने हेतु स्थायी रूप से भूमिगत संगृहीत किया जाता है। निष्कासित CO₂ को संगृहीत करने के स्थान पर उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है।
उद्देश्य भू-वैज्ञानिक पृथक्करण के माध्यम से दीर्घकालिक उत्सर्जन न्यूनीकरण। CO₂ के पुनः उपयोग के माध्यम से उत्सर्जन न्यूनीकरण के साथ मूल्य सृजन।
CO₂ का अंतिम उपयोग गहरे लवणीय जलभृतों तथा समाप्त तेल एवं गैस क्षेत्रों में इंजेक्ट किया जाता है। ईंधन, रसायन, निर्माण सामग्री तथा पॉलिमर में परिवर्तित किया जाता है।
आर्थिक उत्पादन प्रत्यक्ष राजस्व सीमित (उन्नत तेल पुनर्प्राप्ति को छोड़कर)। वाणिज्यिक उत्पादों तथा नई मूल्य शृंखलाओं का सृजन।
उदाहरण – भारत पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के मसौदा, 2030 CCUS रोडमैप के अंतर्गत समाप्त तेल क्षेत्रों में CO₂ भंडारण का प्रस्ताव। अंबुजा सीमेंट्स की पायलट परियोजना, जिसमें IIT बॉम्बे के साथ मिलकर निष्कासित CO₂ को ईंधन और सामग्रियों में परिवर्तित किया जा रहा है।
वैश्विक उदाहरण नॉर्वे का Sleipner CCS प्रोजेक्ट, जो उत्तरी सागर के समुद्रतल के नीचे CO₂ का भंडारण करता है। बेल्जियम में आर्सेलरमित्तल द्वारा निष्कासित CO₂ को इस्पात उत्पादन हेतु कार्बन मोनोऑक्साइड में परिवर्तित किया जा रहा है।
दीर्घकालिक प्रभाव केवल जलवायु शमन पर केंद्रित। जलवायु शमन के साथ परिपत्र अर्थव्यवस्था के लक्ष्यों का संयोजन।

आगे की राह

  • ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के साथ एकीकरण: CCU को भारत के राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन से जोड़ते हुए सिंथेटिक ईंधन (ई-मेथेनॉल, ई-केरोसीन) के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए, जैसा कि संयुक्त अरब अमीरात के CO₂-से-रसायन हब में किया जा रहा है।
  • मानक और प्रमाणन व्यवस्था का निर्माण: भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के माध्यम से स्पष्ट कार्बन लेखांकन मानक विकसित किए जाएँ, ताकि CO₂ आधारित निर्माण सामग्री और रसायनों का प्रमाणन हो सके तथा निवेशकों का विश्वास बढ़े।
  • अनुसंधान एवं विकास (R&D) वित्तपोषण में वृद्धि: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा कम-ऊर्जा कैप्चर तकनीकों और कार्बन-से-मूल्य (Carbon-to-Value) उपायों के लिए अनुदान में वृद्धि की जाए।

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