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केंद्र द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को अश्लील और आपत्तिजनक कंटेंट हटाने का निर्देश

Lokesh Pal January 01, 2026 12:57 30 0

संदर्भ 

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के अंतर्गत दायित्वों का हवाला देते हुए सामाजिक मीडिया प्लेटफॉर्म और मध्यस्थों को “अश्लील” तथा “आपत्तिजनक” कंटेंट को सक्रिय रूप से हटाने का निर्देश जारी किया है।

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी प्रमुख निर्देश

  • सामाजिक मीडिया मंचों को यह सुनिश्चित करना होगा कि अश्लील, पोर्नोग्राफिक, बाल यौन शोषण से संबंधित या अन्यथा अवैध सामग्री उनके मंचों पर न तो होस्ट की जाए और न ही प्रसारित हो।
  • बड़े प्लेटफॉर्म (जिनके उपयोगकर्ताओं की संख्या 50 लाख से अधिक है) को ऐसी सामग्री की पहचान और निष्कासन के लिए स्वचालित तकनीकी उपकरणों की तैनाती अनिवार्य रूप से करनी होगी।
  • कानूनी आधार: सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के नियम 3(2)(b) के अनुसार, मध्यस्थों पर यह दायित्व है कि वे उपयोगकर्ताओं को निषिद्ध सामग्री होस्ट या साझा करने से रोकने के लिए युक्तिसंगत प्रयास करें।
    • किसी व्यक्ति को यौन कृत्य में दर्शाने या उसकी यौन पहचान का प्रतिरूपण करने वाली सामग्री के संबंध में, प्रभावित व्यक्ति या उसके प्रतिनिधि से शिकायत प्राप्त होने के 24 घंटे के भीतर सामग्री हटानी या उस तक पहुँच निष्क्रिय करनी होगी।
  • नियामक एवं विधिक कार्रवाई: अनुपालन न होने पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के अंतर्गत प्रदत्त “सुरक्षित आश्रय” संरक्षण समाप्त हो जाएगा।

सुरक्षित आश्रय संरक्षण

  • सुरक्षित आश्रय, मंचों को उपयोगकर्ता-जनित सामग्री के दायित्व से संरक्षण प्रदान करता है, बशर्ते वे यथोचित सावधानी संबंधी आवश्यकताओं का पालन करें।
  • इस संरक्षण के अभाव में मंचों को उपयोगकर्ता सामग्री के लिए न्यायालय में विधिक रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।

भारत में अश्लीलता से संबंधित विधिक प्रावधान

  • भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 294
    • यह प्रावधान पुस्तकों, चित्रों, आकृतियों और इलेक्ट्रॉनिक कंटेंट सहित अश्लील कंटेंट के विक्रय, आयात, निर्यात, विज्ञापन या उससे लाभ अर्जन को दंडनीय बनाता है।
    • अश्लीलता को ऐसे कंटेंट के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो कामुक रुचियों को आकर्षित करती हो या दर्शकों या पाठकों को प्रभावित करने की संभावना रखता हो।
    • प्रथम अपराध पर अधिकतम 2 वर्ष का कारावास और ₹5,000 तक का जुर्माना; पुनरावृत्ति पर अधिकतम 5 वर्ष का कारावास और ₹10,000 तक का जुर्माना।
  • भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 296
    • सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील कृत्यों अथवा सार्वजनिक असुविधा उत्पन्न करने वाले अश्लील शब्दों या गीतों के उच्चारण को अपराध घोषित करती है।
    • दंड: अधिकतम 3 माह का कारावास या ₹1,000 तक का जुर्माना या दोनों।
  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67
    • इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील कंटेंट के प्रकाशन या प्रसारण से संबंधित है।
    • परिभाषा भारतीय न्याय संहिता के समान है, किंतु दंड अधिक कठोर है।
    • प्रथम अपराध पर अधिकतम 3 वर्ष का कारावास और ₹5 लाख तक का जुर्माना, पुनरावृत्ति पर अधिकतम 5 वर्ष का कारावास और ₹10 लाख तक का जुर्माना।
  • महिलाओं के अश्लील चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986
    • इस अधिनियम की धारा 4 किसी भी प्रकार के प्रकाशन, विज्ञापन या संचार में महिलाओं के अश्लील या भद्दे चित्रण को प्रतिबंधित करती है।
    • प्रथम अपराध के लिए तीन वर्ष तक की कारावास और 2,000 रुपये का जुर्माना हो सकता है, जबकि बार-बार अपराध करने पर पाँच वर्ष तक की कारावास और 10,000 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया नैतिकता) नियम, 2021
    • यह नियम डिजिटल मध्यस्थों पर उचित सावधानी बरतने और अश्लील कंटेंट एवं फेक न्यूज सहित गैर-कानूनी कंटेंट की मेजबानी या प्रसारण को रोकने के लिए उचित प्रयास करने का कानूनी दायित्व डालते हैं, जिससे डिजिटल क्षेत्र में सामग्री विनियमन को मजबूती मिलती है।
  • बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012
    • यह अधिनियम बाल यौन शोषण सामग्री, विशेष रूप से ऑनलाइन सामग्री के निर्माण, भंडारण, पहुँच और साझाकरण को अपराध घोषित करता है और इसके लिए कठोर दंड का प्रावधान है।
  • भारत के संविधान का अनुच्छेद-19(2)
    • संविधान राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, शालीनता और राज्य की सुरक्षा जैसे आधारों पर भाषण तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है।

अश्लीलता पर सर्वोच्च न्यायालय के अवलोकन

  • रंजीत डी. उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य (वर्ष 1964)
    • सर्वोच्च न्यायालय ने हिकलिन टेस्ट को लागू करते हुए यह माना कि यदि कोई कंटेंट संवेदनशील व्यक्तियों, जिनमें बच्चे और नैतिक रूप से कमजोर स्वभाव वाले व्यक्ति शामिल हैं, को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति रखती है, तो वह अश्लील है।
  • अवेक सरकार बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (वर्ष 2014)
    • न्यायालय ने हिकलिन परीक्षण से सामुदायिक मानक परीक्षण की ओर रुख करते हुए बोरिस बेकर की अश्लील इमेज के प्रकाशन से संबंधित अश्लीलता के आरोपों को खारिज कर दिया और इस बात पर जोर दिया कि अश्लीलता का मूल्यांकन उसके समकालीन सामाजिक संदर्भ में किया जाना चाहिए।
  • कॉलेज रोमांस केस (मार्च 2024)
    • सर्वोच्च न्यायालय ने वेब सीरीज ‘कॉलेज रोमांस’ के निर्माताओं के खिलाफ अश्लीलता संबंधी कार्यवाही रद्द कर दी और स्पष्ट किया कि केवल अपशब्दों का प्रयोग अश्लीलता नहीं माना जाता।
    • न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि किसी कंटेंट को अश्लील तभी कहा जा सकता है, जब उसमें यौन विचार उत्पन्न करने की प्रवृत्ति हो, न कि केवल इसलिए कि उसमें अभद्र भाषा या विवादास्पद अभिव्यक्ति हो।

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