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कार्यकारी नियुक्तियों में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका

Lokesh Pal February 26, 2025 02:15 13 0

संदर्भ 

हाल ही में भारत के उपराष्ट्रपति ने CBI निदेशक के चयन सहित कार्यकारी नियुक्तियों में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की भूमिका पर सवाल उठाया है।

कार्यकारी नियुक्तियों में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की भूमिका

  • सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति: राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश (उच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों के कॉलेजियम के साथ) से परामर्श करते हैं।
  • लोकपाल की नियुक्ति: मुख्य न्यायाधीश लोकपाल की नियुक्ति के लिए चयन समिति के सदस्य होते हैं, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, विपक्ष के नेता और एक प्रख्यात न्यायविद शामिल होते हैं।
  • केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के निदेशक की नियुक्ति: नियुक्ति समिति में अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP) और भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश शामिल होते हैं।

कार्यकारी नियुक्तियों में CJI की भागीदारी के सकारात्मक निहितार्थ

  • जाँच एवं संतुलन: मुख्य न्यायाधीश की भागीदारी महत्त्वपूर्ण नियुक्तियों में न्यायिक निगरानी सुनिश्चित करती है।
  • न्यायिक स्वतंत्रता: न्यायाधीशों जैसी नियुक्तियों में, कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से मुख्य न्यायाधीश की भूमिका न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत करती है।
  • योग्यता आधारित नियुक्तियाँ: मुख्य न्यायाधीश का परामर्श सुनिश्चित करता है कि नियुक्तियाँ राजनीतिक विचारों के बजाय योग्यता, ईमानदारी और अनुभव पर आधारित हों।
  • पारदर्शिता एवं जवाबदेही: मुख्य न्यायाधीश की भागीदारी, विशेष रूप से लोकपाल, CBI निदेशक और चुनाव आयुक्तों की समितियों में, पारदर्शिता को बढ़ावा देती है और प्रमुख संस्थानों में नियुक्तियों में जवाबदेही सुनिश्चित करती है।

कार्यकारी नियुक्तियों में मुख्य न्यायाधीश की भागीदारी से जुड़ी चिंताएँ

  • लोकतांत्रिक सिद्धांतों का हनन: CBI निदेशक के चयन में CJI की भागीदारी लोकतांत्रिक सिद्धांतों के साथ असंगत है।
    • ऐसी प्रथाएँ न्यायिक निर्णयों के कारण उभरी हैं, लेकिन उन पर पुनः विचार करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
  • न्यायिक अतिक्रमण: न्यायिक आदेश द्वारा कार्यकारी शासन को संवैधानिक विरोधाभास के रूप में वर्णित किया जा सकता है जो लोकतंत्र को कमजोर करता है।
    • न्यायपालिका को कार्यकारी एवं विधायी भूमिकाओं का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए।
  • शक्तियों के पृथक्करण के लिए खतरा: जब न्यायपालिका जैसी संस्थाएँ अपने संवैधानिक अधिदेश से आगे निकल जाती हैं, तो यह शक्ति संतुलन को कमजोर करती है और लोकतांत्रिक शासन को कमजोर करती है।
  • न्यायपालिका की सार्वजनिक भागीदारी: न्यायाधीशों के निर्णयों से अतिरिक्त बयान संस्थागत गरिमा को प्रभावित कर सकते हैं।
  • शक्तियों का कम पृथक्करण: कार्यकारी कार्यों में CJI की भागीदारी शक्तियों के पृथक्करण को कम कर सकती है, क्योंकि न्यायपालिका का उद्देश्य कार्यकारी निर्णय लेने में भागीदार के बजाय एक स्वतंत्र मध्यस्थ के रूप में कार्य करना है।
  • जवाबदेही की चिंताएँ: हालाँकि CJI कार्यकारी के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करता है, CJI की इन प्रक्रियाओं में स्वयं की जवाबदेही सीमित रहती है, क्योंकि CJI की सिफारिशों को चुनौती देने के लिए कोई औपचारिक तंत्र नहीं है।
  • हितों का टकराव: अधिकारियों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की संलिप्तता, जो बाद में न्यायालयों के समक्ष उपस्थित हो सकते हैं, हितों का टकराव उत्पन्न कर सकती है।

न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक अतिक्रमण

आधार

न्यायिक सक्रियता 

(Judicial Activism)

न्यायिक अतिक्रमण 

(Judicial Overreach)

परिभाषा न्यायालय विधायी या कार्यकारी निष्क्रियता को संबोधित करने के लिए कानूनों एवं संवैधानिक प्रावधानों की सक्रिय रूप से व्याख्या करते हैं। न्यायालय अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर विधायी या कार्यकारी कार्यों में अतिक्रमण करते हैं।
प्रकृति प्रकृति में सक्षमता प्रकृति में अतिक्रमणकारी
उदाहरण विधायी शून्यता के कारण यौन उत्पीड़न रोकने हेतु विशाखा दिशानिर्देश (1997) जारी किए गए। संसदीय सर्वसम्मति के बावजूद राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC), 2015 को रद्द करना।

आगे की राह 

  • स्पष्ट दिशा-निर्देश: कार्यकारी नियुक्तियों में CJI की भूमिका के लिए संहिताबद्ध दिशा-निर्देश स्थापित करना, ताकि निरंतरता सुनिश्चित हो और विवेकाधीन शक्ति कम हो।
  • संरचित परामर्श: CJI के परामर्श को अधिक संरचित और प्रलेखित बनाना, गोपनीयता से समझौता किए बिना पारदर्शिता सुनिश्चित करना।
  • आवधिक समीक्षा: नियुक्तियों की प्रक्रिया की नियमित समीक्षा करना, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह कुशल और निष्पक्ष बनी रहे।
  • व्यापक भागीदारी: जिन मामलों में CJI से परामर्श किया जाता है, उनमें अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों को शामिल करने से प्रक्रिया अधिक सामूहिक और पारदर्शी हो सकती है।
  • तटस्थ सदस्यों को शामिल करना: लोकपाल, CBI निदेशक तथा CEC जैसी प्रमुख नियुक्तियों के लिए चयन समितियों में विविध पृष्ठभूमि के सदस्य शामिल होने चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कोई एक संस्था प्रभावी न हो।
  • संसदीय निगरानी: एक संसदीय समिति न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कम किए बिना सिफारिशों की जाँच कर सकती है।

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