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जलवायु-लचीली कृषि (CRA)

Lokesh Pal January 05, 2026 03:02 35 0

संदर्भ

जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन मौसम के पैटर्न को अधिक अप्रत्याशित बनाता है, मृदा की गुणवत्ता को हानि पहुँचाता है और जल संकट को बढ़ाता है, जलवायु-लचीली कृषि (CRA) पर्यावरणीय क्षति को सीमित करते हुए उत्पादकता को बनाए रखने के लिए एक प्रौद्योगिकी-संचालित दृष्टिकोण के रूप में उभर रही है।

जलवायु-लचीली कृषि क्या है?

  • जलवायु-अनुकूल कृषि में जैव प्रौद्योगिकी और पूरक प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके कृषि पद्धतियों का मार्गदर्शन किया जाता है, रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम की जाती है और जलवायु तनाव के बावजूद उत्पादकता को बनाए रखा जाता है या उसमें सुधार किया जाता है।
  • प्रमुख प्रौद्योगिकियाँ: जलवायु-अनुकूल कृषि में जैव उर्वरक, जैव कीटनाशक, मृदा-सूक्ष्मजीव विश्लेषण और जीनोम-एडिटिंग फसलें शामिल हैं, जो सूखा, गर्मी, लवणता और कीटों के प्रति सहनशील होती हैं।
  • डिजिटल उपकरण (AI-संचालित विश्लेषण): जलवायु, मृदा और फसल डेटा को एकीकृत करके स्थान-विशिष्ट कृषि रणनीतियाँ विकसित की जाती हैं, जिससे बेहतर निर्णयन तथा संसाधनों का कुशलतापूर्वक उपयोग करने में मदद मिलती है।

  • जैविक उर्वरक: ये प्राकृतिक उर्वरक होते हैं, जिनमें जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं, जो नाइट्रोजन, फास्फोरस और अन्य सूक्ष्म तत्त्वों जैसे पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढ़ाकर पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं।
    • ये मृदा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने और रासायनिक कृत्रिम उर्वरकों की आवश्यकता को कम करने में सहायक होते हैं।
  • जैविक कीटनाशक: ये जैविक कारक (जैसे- प्राकृतिक शिकारी, रोगजनक या जैव रसायन) होते हैं, जिनका उपयोग कीटों और रोगों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
    • ये रासायनिक कीटनाशकों का पर्यावरण के अनुकूल विकल्प प्रदान करते हैं और पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में सहायक होते हैं।
  • मृदा-सूक्ष्मजीव विश्लेषण: इसमें मृदा में मौजूद सूक्ष्मजीवों के समुदाय का अध्ययन करके सूक्ष्मजीवों, पौधों और मृदा पर्यावरण के बीच की अंतःक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझा जाता है।
  • जीनोम-एडिटिड फसलें: ये वे फसलें हैं, जिन्हें जीनोम एडिटिंग तकनीकों (जैसे- CRISPR) के माध्यम से संशोधित किया गया है ताकि वे सूखा, गर्मी, लवणता और कीटों जैसे विशिष्ट जलवायु कारकों को सहन कर सकें।

जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी कृषि की प्रमुख रणनीतियाँ

  • जलवायु-अनुकूलित फसलें: जलवायु परिवर्तन से होने वाले उपज के नुकसान को कम करने के लिए, गर्मी, खारेपन, बाढ़ और सूखे के प्रति सहनशील फसलों की किस्मों को बढ़ावा देना (उदाहरण के लिए, जलमग्नता सहिष्णु चावल जैसे स्कूबा राइस)।
  • मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन: मृदा के अपरदन को कम करने, मृदा में नमी बनाए रखने की क्षमता बढ़ाने और मृदा में कार्बन की मात्रा बढ़ाने के लिए नो टिलेज’ खेती, आवरण फसलों और जैविक खाद का उपयोग करना।
  • कृषि वानिकी प्रणालियाँ: छाया, पवनरोधक, बेहतर सूक्ष्म जलवायु और विविध कृषि उत्पादन प्रदान करने के लिए फसलों और पशुधन के साथ वृक्षों को एकीकृत करना।
  • फसल विविधीकरण: जलवायु-संबंधी जोखिमों को न्यूनतम करने तथा कृषि आय में स्थिरता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एकल-फसली खेती से बहु-फसली खेती की ओर संक्रमण करना।
  • जल प्रबंधन: बढ़ते जल संकट के तहत जल उपयोग दक्षता को अधिकतम करने के लिए ड्रिप सिंचाई और सटीक सिंचाई, वर्षा जल संचयन और सूक्ष्म सिंचाई का विस्तार करना।
  • प्रौद्योगिकी एकीकरण: मौसम पूर्वानुमान, AI-आधारित सलाह और जलवायु चेतावनियों का लाभ उठाकर समय पर बुवाई, कटाई और जोखिम निवारण को सक्षम बनाना।

भारत में CRA की आवश्यकता 

  • कृषि की जलवायु संबंधी संवेदनशीलता: भारत के कुल बोए गए क्षेत्र का लगभग 51% हिस्सा वर्षा आधारित है, जिससे राष्ट्रीय खाद्य उत्पादन का लगभग 40% हिस्सा प्राप्त होता है, जो इसे जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाता है।
    • भारत की वार्षिक वर्षा का 75% हिस्सा मानसून के महीनों में होता है, जिससे सूखा-बाढ़ चक्र में वृद्धि होती है।
  • फसल पैदावार पर प्रभाव: जलवायु मॉडल बताते हैं कि पारंपरिक पद्धतियों के तहत सदी के अंत तक चावल की पैदावार में 3-22% की गिरावट आ सकती है और सबसे खराब स्थिति में यह गिरावट 30% से अधिक हो सकती है।
  • रणनीतिक और खाद्य सुरक्षा: पर्यावरणीय स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए, कृषि संबंधी अनुकूलन (CAR) भारत की खाद्य आयात पर निर्भरता को कम कर सकता है और खाद्य क्षेत्र में रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत कर सकता है।
  • आय स्थिरता: तनाव-सहनशील फसलों सहित कृषि संबंधी अनुकूलन पद्धतियाँ किसानों को चरम मौसम की घटनाओं और फसल खराब होने से होने वाली आय संबंधी हानि से बचाती हैं।

भारत में जलवायु परिवर्तन हेतु प्रतिरोधी कृषि के लिए उठाए गए कदम

  • जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधी कृषि में राष्ट्रीय नवाचार (NICRA)
    • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा वर्ष 2011 में शुरू की गई इस परियोजना में जलवायु परिवर्तन के अनुकूल 448 गाँवों में स्थान-विशिष्ट पद्धतियों का प्रदर्शन किया गया है।
    • इन पद्धतियों में धान की सघन खेती, वायुजनित धान की खेती, सीधी बुवाई आधारित धान की खेती, गेहूँ की ‘नो टिलेज’ कृषि, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल फसल किस्मों और खेतों में ही अवशेष प्रबंधन जैसी पद्धतियों को शामिल किया गया है।
  • सतत् कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन
    • जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना का एक प्रमुख घटक, NMSA कृषि आय को स्थिर करने के लिए वर्षा आधारित क्षेत्र विकास (RAD), कृषि-वानिकी, मृदा संरक्षण और एकीकृत कृषि प्रणालियों के माध्यम से जलवायु अनुकूलन पर जोर देता है।
  • मृदा स्वास्थ्य और जैविक कृषि संबंधी पहलें
    • परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) और मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का उद्देश्य जैविक इनपुट, संतुलित पोषक तत्त्व उपयोग और रासायनिक निर्भरता को कम करके मृदा की उर्वरता को बहाल करना और उसकी सहनशीलता को बढ़ाना है।
  • कुशल जल प्रबंधन–’पर ड्रॉप,मोर क्रॉप’ (Per Drop More Crop)
    • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तह, ’पर ड्रॉप,मोर क्रॉप’ घटक सूक्ष्म सिंचाई, ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणालियों और सटीक जल उपयोग को बढ़ावा देता है, जिससे सूखे और जल संकट के प्रति संवेदनशीलता कम हो जाती है।
  • BioE3 नीति: BioE3 नीति में जैव प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों के लिए CRA को प्राथमिकता क्षेत्र के रूप में पहचाना गया है।
  • संस्थागत और उद्योग समर्थन: ICAR, जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) तथा भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के माध्यम से देश में सुदृढ़ वैज्ञानिक क्षमता विद्यमान है, जिसके साथ-साथ एक उभरता हुआ निजी जैव-प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित हो रहा है।

BioE3 नीति

  • जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा वर्ष 2024 में शुरू की गई।
  • BioE3 नीति का उद्देश्य अत्याधुनिक उन्नत प्रौद्योगिकियों को अपनाने और जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए नवोन्मेषी अनुसंधान को संरेखित करने हेतु एक ढाँचा तैयार करना है।

वैश्विक प्रथाएँ

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की जलवायु-स्मार्ट कृषि और वानिकी पहल के माध्यम से, व्यापक सार्वजनिक निवेश के साथ, जलवायु परिवर्तन प्रतिरोधी क्षमता (CRA) को संघीय नीति में एकीकृत किया गया है।
  • यूरोपीय संघ: यह यूरोपीय संघ कीग्रीन डील’ और ‘फार्म टू फोर्क’ रणनीति में समाहित है, जो स्थिरता और रासायनिक इनपुट में कमी पर केंद्रित है।
  • चीन: यह जलवायु-सहिष्णु फसल, जल-बचत सिंचाई और कृषि डिजिटलीकरण पर जोर देता है।
  • ब्राजील: राज्य के स्वामित्व वाले जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्था EMBRAPA के मजबूत समर्थन के साथ, उष्णकटिबंधीय जलवायु-अनुकूलित फसल विकास में अग्रणी है।

CRA को विस्तार देने में प्रमुख चुनौतियाँ

  • सामर्थ्य और पहुँच संबंधी बाधाएँ: जलवायु-प्रतिरोधी बीजों, परिशुद्ध सिंचाई और डिजिटल उपकरणों की उच्च प्रारंभिक लागत भारत के अधिकांश कृषि क्षेत्र का गठन करने वाले छोटे और सीमांत किसानों के बीच इनके उपयोग को सीमित करती है।
  • जैविक इनपुट की गुणवत्ता संबंधी चिंताएँ: अनियमित और निम्न गुणवत्ता वाले जैव उर्वरकों के प्रसार से उनकी प्रभावशीलता कम हो जाती है, किसानों का विश्वास कम हो जाता है और प्रायः वे रासायनिक आधारित खेती को पुनः अपनाते हैं।
  • ज्ञान और क्षमता की कमी: सीमित जागरूकता, अपर्याप्त विस्तार सेवाएँ और कम डिजिटल साक्षरता किसानों की जलवायु-अनुकूल पद्धतियों को अपनाने, व्याख्या करने और AI-आधारित निर्णय-सहायता प्रणालियों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने की क्षमता को बाधित करती हैं।
  • खंडित भूमि जोत: छोटे और खंडित खेतों के आकार से मापदंड आधारित अर्थव्यवस्थाएँ कम हो जाती हैं, जिससे सूक्ष्म सिंचाई, मशीनीकरण और मृदा प्रबंधन प्रौद्योगिकियों में निवेश कम व्यवहार्य हो जाता है।
  • संस्थागत और नीतिगत समन्वय संबंधी मुद्दे: कृषि, जल, जलवायु और ग्रामीण विकास नीतियों में अपर्याप्त सामंजस्य और राज्य एवं स्थानीय स्तर पर असंगत कार्यान्वयन, जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन (CRA) के विस्तार में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • बाजार और प्रोत्साहन संबंधी सीमाएँ: जलवायु-लचीली फसलों और पद्धतियों के लिए सुनिश्चित बाजारों, मूल्य प्रोत्साहनों और जोखिम-साझाकरण तंत्रों की कमी किसानों को पारंपरिक, लागत-प्रधान कृषि से जलवायु परिवर्तन की ओर अग्रसर होने से हतोत्साहित करती है।

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