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ईज ऑफ डूइंग बिजनेस-भारत का सतत् नियामकीय रूपांतरण

Lokesh Pal February 07, 2026 03:19 5 0

संदर्भ

केंद्रीय बजट 2026–27 आर्थिक विकास के एक मूल स्तंभ के रूप में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of Doing Business– EoDB) को सुदृढ़ करता है।अनुमति-आधारित” मॉडल से विश्वास-आधारित अनुपालन ढाँचे की ओर संक्रमण करके, सरकार नियामकीय दक्षता का विकसित भारत @2047 के’ व्यापक विजन के साथ सामंजस्य स्थापित करना चाहती है।

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (EoDB) के बारे में

  • मूल परिभाषा: EoDB किसी देश के नियामकीय और संस्थागत ढाँचे की गुणवत्ता को दर्शाता है, जो यह निर्धारित करता है कि व्यवसाय किसी अर्थव्यवस्था में कितनी सुगमता से शुरू, संचालित, अनुपालित और बंद किए जा सकते हैं।
  • नियामकीय दक्षता: यह व्यावसायिक जीवन चक्र में प्रक्रियागत जटिलता, समय विलंब और अनुपालन लागत को कम करने पर केंद्रित है, विशेष रूप से लाइसेंसिंग, कराधान और अनुबंध प्रवर्तन में बाधाओं को लक्षित करता है।
  • लेन-देन लागत परिप्रेक्ष्य: आर्थिक दृष्टिकोण से, EoDB का उद्देश्य लेन-देन लागत और सूचना असमानताओं को न्यूनतम करना है, जिससे बाजार सहभागिता और समग्र आर्थिक दक्षता में सुधार होता है।
  • संस्थागत प्रकृति: यह केवल विनियमन-शिथिलीकरण तक सीमित नहीं है; बल्कि यह नियमों को लागू करने में राज्य संस्थानों की पूर्वानुमेयता, पारदर्शिता और निरंतरता को दर्शाता है।
  • वैश्विक मापन संदर्भ: इस अवधारणा को विश्व स्तर पर विश्व बैंक के डूइंग बिजनेस’ ढाँचे (2003–2020) के माध्यम से लागू किया गया, जिसमें ऋण प्राप्ति, अल्पसंख्यक निवेशकों की सुरक्षा और दिवालियापन समाधान जैसे संकेतकों का मूल्यांकन किया गया।
  • भारत का सुधार उन्मुखीकरण: भारतीय संदर्भ में, सुधारों ने डिजिटलीकरण (जैसे- NSWS), लाइसेंस-मुक्ति, समयबद्ध स्वीकृतियों और कानूनी सुधारों (जैसे- IBC 2016) को प्राथमिकता दी है, ताकि निवेशक विश्वास बढ़े और आर्थिक औपचारीकरण को गति मिले।
  • प्रतिस्पर्द्धी संघवाद का दृष्टिकोण: उप-राष्ट्रीय स्तर पर, EoDB को बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान (BRAP) के माध्यम से बढ़ावा दिया जाता है, जो राज्य-नेतृत्व आधारित प्रतिस्पर्द्धा का उपयोग कर जमीनी स्तर पर नियामकीय प्रदर्शन में सुधार करता है।
  • बिजनेस रेडी’ (B-READY) संक्रमण: वर्ष 2021 के बाद, ध्यान बिजनेस रेडी’ (B-READY) ढाँचे पर केंद्रित हो गया है, जो डी ज्यूरे” (दस्तावेज पर कानून) से “डी फैक्टो” (वास्तविक व्यवहार) की ओर बढ़ता है और इसमें डिजिटल तथा पर्यावरणीय स्थिरता को शामिल किया गया है।
  • सफलता के मानक
    • उद्यम वृद्धि: इन सुधारों का प्रभाव सक्रिय पंजीकृत कंपनियों की संख्या में 27% वृद्धि (फरवरी 2026 तक बढ़कर 1.98 लाख) में स्पष्ट है।
    • ऐतिहासिक FDI वृद्धि: भारत के दीर्घकालिक नियामकीय रूपांतरण के परिणामस्वरूप कुल FDI प्रवाह 748.38 अरब अमेरिकी डॉलर (2014–25) तक पहुँच गया है, जो पूर्ववर्ती 11 वर्षों की अवधि की तुलना में 143% वृद्धि दर्शाता है।

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ क्यों आवश्यक है? 

  • निवेश जुटाना और वैश्विक एकीकरण: एक स्थिर, पूर्वानुमेय और पारदर्शी नियामकीय वातावरण वैश्विक पूँजी के लिए एक “ग्रीन फ्लैग” के रूप में कार्य करता है।
    • FDI आकर्षण: प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की गति बनाए रखने के लिए एक स्थिर नीतिगत वातावरण आवश्यक है।
      • उदाहरण: PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) योजनाओं ने एप्पल के भागीदारों जैसे वैश्विक दिग्गजों को आकर्षित किया, जिससे भारत एक प्रमुख मोबाइल निर्यात केंद्र बन गया।
    • वैश्विक आपूर्ति शृंखला एकीकरण: रणनीतिक सुधार भारत को बदलती अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स और विशिष्ट रसायनों के क्षेत्र में, लाभ उठाने में सक्षम बनाते हैं।
    • आवंटन दक्षता: दिवालियापन और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) जैसे तंत्र यह सुनिश्चित करते हैं कि पूँजीजॉम्बी कंपनियों” (Zombie firms) में फँसी न रहे।
      • उदाहरण: भूषण स्टील जैसे मामलों का सफल समाधान संकटग्रस्त परिसंपत्तियों को उत्पादक इकाइयों द्वारा अधिग्रहित करने में सहायक हुआ, जिससे बैंकिंग प्रणाली में हजारों करोड़ रुपये वापस आए।
  • MSME सशक्तिकरण और आर्थिक औपचारीकरण: MSME अर्थव्यवस्था के आधार हैं, लेकिन अत्यधिक “नियामकीय भार” के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं।
    • MSME प्रतिस्पर्द्धात्मकता में वृद्धि: फाइलिंग को सरल बनाना और तैयार औद्योगिक अवसंरचना उपलब्ध कराना छोटे उद्यमों को प्रशासनिक संघर्ष के बजाय विस्तार पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम बनाता है।
    • अर्थव्यवस्था का औपचारीकरण: पंजीकरण की लागत कम करने से अनौपचारिक उद्यमों को औपचारिक क्षेत्र में प्रवेश के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
      • उदाहरण: उद्यम पंजीकरण पोर्टल ने प्रक्रिया को ‘एक-पृष्ठीय’ डिजिटल फॉर्म तक सरल बना दिया, जिससे लाखों छोटे व्यवसाय औपचारिक ढाँचे में आए और ऋण तक पहुँच प्राप्त हुई।
    • कर आधार का विस्तार: औपचारीकरण से GST संग्रह में वृद्धि होती है, जिससे सरकार को सार्वजनिक अवसंरचना के लिए अधिक संसाधन प्राप्त होते हैं।
  • सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और रोजगार सृजन: EoDB सामाजिक गतिशीलता और भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को समाहित करने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
    • व्यापक रोजगार सृजन: एक सशक्त पारिस्थितिकी तंत्र कंपनियों को विस्तार में सक्षम बनाता है, जो प्रतिवर्ष लाखों युवाओं को कार्यबल में शामिल करने का मुख्य आधार है।
    • उद्यमिता को बढ़ावा: प्रवेश बाधाओं में कमी से प्रथम-पीढ़ी के उद्यमियों को सशक्त बनाया जाता है औरस्टार्ट-अप इंडिया” को बल मिलता है।
      • उदाहरण: नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम (NSWS) स्टार्ट-अप्स को सभी आवश्यक राज्य और केंद्रीय स्वीकृतियाँ एक ही स्थान पर उपलब्ध कराता है, जिससेरेड टेप” “रेड कार्पेट” में बदल जाता है।
    • समावेशी विकास: संरचनात्मक बाधाओं को हटाकर, EoDB ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों की व्यापक भागीदारी को सक्षम बनाता है।
  • संस्थागत अखंडता और शासन: सुधार प्रगति में बाधा डालने वाली मानवीय अड़चनों को दूर करने पर केंद्रित हैं।
    • भ्रष्टाचार में कमी: डिजिटलीकरण और ‘फेसलेस’ आकलन व्यवसायों तथा नौकरशाहों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क को समाप्त करते हैं।
      • उदाहरण: आयकर फेसलेस आकलन योजना ने ऑडिट प्रक्रिया को गोपनीय बनाकर रिश्वतखोरी और उत्पीड़न की संभावना को अत्यधिक सीमा तक कम किया है।
    • अनुबंध प्रवर्तन: विवाद समाधान के लिए एक सुदृढ़ कानूनी ढाँचा अनुबंधों की पवित्रता सुनिश्चित करता है, जो दीर्घकालिक सार्वजनिक–निजी भागीदारी (PPP) के लिए आवश्यक है।
    • प्रतिस्पर्द्धी संघवाद: राज्य-स्तरीय रैंकिंग रेस-टू-द टॉप” को बढ़ावा देती है, जिससे अंतिम स्तर तक नियामकीय सेवा वितरण में सुधार होता है।
  • दक्षता और नवाचार: प्रशासनिक बाधा एक प्रछन्न कर” की तरह कार्य करती है, जो रचनात्मकता को बाधित करता है।
    • लेन-देन लागत में कमी: अनुपालन प्रबंधन में कमी एक प्रकार के राजकोषीय प्रोत्साहन की तरह कार्य करती है, जिससे कंपनियाँ अनुसंधान एवं विकास और नवाचार में पुनर्निवेश कर सकती हैं।
    • व्यवसाय की लागत में कमी: कुशल लॉजिस्टिक्स और त्वरित उपयोगिता इनपुट लागत को घटाते हैं।
      • उदाहरण: पीएम गति शक्ति मास्टर प्लान विभागीय आँकड़ों को एकीकृत कर अवसंरचना स्वीकृतियों को तेज करता है, जिससे भारतीय विनिर्माण को प्रभावित करने वाली उच्च लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आती है।

बजट 2026-27 : भारत के व्यावसायिक परिदृश्य को सुदृढ़ करना

बजट 2026-27 निवेश परिदृश्य को बेहतर बनाने के लिए संरचनात्मक परिवर्तन प्रस्तुत करता है:

  • संरचनात्मक कर सुधार- निश्चितता और सरलीकरण: यह बजट आयकर अधिनियम, 2025 को प्रस्तुत करता है, जो एक आधुनिक, विधिक ढाँचा प्रदान करने के लिए 65 वर्ष पुराने वर्ष 1961 के अधिनियम को प्रभावी ढंग से समाप्त करता है।
    • आयकर अधिनियम, 2025: 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी, यह ऐतिहासिक कानून कर की परिभाषा को सरल बनाता है तथा संबंधित धाराओं की संख्या को कम करता है। नई कर व्यवस्था (वित्त वर्ष 2025-26) के तहत एक नया स्लैब ढाँचा ₹12 लाख तक की आय (या वैतनिक कर्मचारियों के लिए ₹12.75 लाख) को आयकर-मुक्त बनाता है।
    • MAT का युक्तिकरण: न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) को 15% से घटाकर 14% कर दिया गया है। महत्त्वपूर्ण रूप से, इसे अब एक अंतिम कर के रूप में प्रस्तावित किया गया है, जो जटिल “क्रेडिट संचय” (Credit accumulation) प्रणाली को समाप्त करता है।
    • MAT क्रेडिट लचीलापन: वित्तीय बाधाओं को रोकने के लिए, कंपनियाँ अब नई कर व्यवस्था में अपनी कर देनदारी के 1/4 (25%) तक मौजूदा MAT क्रेडिट को ‘सेट-ऑफ’ कर सकती हैं। अनुमानित आधार पर भुगतान करने वाले अनिवासियों को अब MAT से छूट दी गई है।
    • विधिक मामलों से राहत: CIT(A) के समक्ष अपील करने के लिए प्री-पेमेंट की आवश्यकता को मुख्य आयकर माँग के 20% से घटाकर आधा अर्थात् 10% कर दिया गया है, जिसमें अपील अवधि के दौरान दंड पर कोई ब्याज देनदारी नहीं होगी।
  • MSME “चैंपियन” रणनीति: MSMEs को अस्तित्व बचाने की स्थिति से बड़े स्तर पर ले जाने के लिए, बजट ऋण-भारी सहायता से इक्विटी और तरलता (Liquidity) की ओर स्थानांतरित हो रहा है।
    • SME ग्रोथ फंड: ₹10,000 करोड़ का फंड, जो उच्च-क्षमता वाली फर्मों को विस्तार करने में सहायता के लिए इक्विटी पूँजी प्रदान करता है।
    • TReDS संस्थागतकरण: सभी CPSE खरीद के लिए व्यापार प्राप्य छूट प्रणाली (TReDS) को अनिवार्य करना, तत्काल तरलता सुनिश्चित करता है।
    • पेशेवर सहायता नेटवर्क: ICAI/ICSI के सहयोग से, सरकार टियर-II/III शहरों में MSMEs को मानकीकृत लागत पर अनुपालन में मदद करने के लिए, प्रशिक्षित पैरा-प्रोफेशनल्स/पेशेवरों का एक नेटवर्क बनाएगी।
  • सीमा शुल्क और व्यापार- “फैक्ट्री-टू-शिप” युग: व्यापार सुविधा को स्वचालन और विश्वास-आधारित मान्यता प्रणाली के माध्यम से सुधारा जा रहा है।
    • सीमा शुल्क एकीकृत प्रणाली (CIS): सभी सीमा शुल्क प्रक्रियाओं के लिए एकल, स्वचालित मंच शुरू करने के लिए दो वर्षों का रोडमैप। अप्रैल 2026 तक भोजन, दवाओं और वन्यजीवों (70% इंटरडिक्टेड कार्गो) के लिए प्रक्रियाएँ CIS पर लाइव हो जाएंगी।
    • AI-सक्षम पोर्ट स्कैनिंग: अहस्तक्षेप युक्त इमेजिंग और AI-जोखिम मूल्यांकन का उपयोग करके प्रमुख बंदरगाहों पर प्रत्येक कंटेनर को स्कैन करने का अधिदेश।
    • विश्वसनीय आयातक योजना: मान्यता प्राप्त फर्में अबफैक्ट्री-टू-शिप” क्लीयरेंस का लाभ उठा सकती हैं, जिससे भौतिक सत्यापन और बंदरगाह पर देरी में अत्यधिक कमी आएगी।
  • फ्रंटियर प्रौद्योगिकी मिशन (ISM 2.0 और SHAKTI): “भविष्य के क्षेत्रों” में रणनीतिक निवेश वैश्विक विनिर्माण नेतृत्व बनाने के लिए डिजाइन किए गए हैं।
    • इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0: एक नए परिव्यय के साथ, ISM 2.0 चिपमेकिंग उपकरण, सामग्री निर्माण और फुल-स्टैक भारतीय सेमीकंडक्टर IP निर्माण पर केंद्रित है।
    • बायोफार्मा शक्ति (SHAKTI) मिशन: जैविक (Biologics) पारितंत्र निर्माण के लिए 5 वर्षों में ₹10,000 करोड़ की पहल, जिसमें 3 नए NIPER और 1,000+ नैदानिक परीक्षण स्थलों का नेटवर्क शामिल है।
    • इलेक्ट्रॉनिक्स घटक योजना: चाइना+1″ गति का लाभ उठाने के लिए वर्ष 2025 में शुरू की गई योजना का परिव्यय लगभग दुगुना कर ₹40,000 करोड़ कर दिया गया है।
  • पूँजी और वैश्विक एकीकरण:
    • पोर्टफोलियो निवेश (PROI) उदारीकरण: भारत के बाहर रहने वाले व्यक्ति (PROI) के लिए व्यक्तिगत निवेश सीमा 5% से दुगुनी कर 10% कर दी गई है, साथ ही कुल सीमा को बढ़ाकर 24% कर दिया गया है।
    • GCC के लिए सेफ हार्बर: IT, KPO और R&D सेवाओं को 15.5% के समान सेफ हार्बर मार्जिन के साथ एक ही श्रेणी में समेकित किया गया है, जिससे भारत वैश्विक क्षमता केंद्रों के लिए वैश्विक केंद्र बन गया है।
    • जन विश्वास 2.0: अपराधमुक्त करने का यह अगला चरण 17 अतिरिक्त कानूनों में मामूली प्रक्रियात्मक खामियों को लक्षित करता है, जो उद्यमशीलता संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आपराधिक मुकदमों को मौद्रिक दंड से बदल देता है।

भारत की पहल और राज्य-स्तरीय नवाचार

  • राष्ट्रीय स्तर के “डिजिटल गेटवे”: प्रमुख पहलों ने नियामक अनुभव को केंद्रीकृत कर दिया है, जिससे खंडित अनुमोदनों से हटकर संपूर्ण सरकार” का दृष्टिकोण अपनाया गया है।
    • राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS): एक डिजिटल गेटवे” के रूप में कार्य करते हुए, यह प्लेटफॉर्म अब 32 से अधिक केंद्रीय विभागों और 32 राज्य सरकारों को एकीकृत करता है।
      • नो योर अप्रूवल (KYA): एक अनूठी विशेषता, जहाँ एक व्यवसाय का मालिक अपना क्षेत्र और स्थान दर्ज करता है, तथा उसे आवश्यक लाइसेंस की एक सूची प्राप्त होती है।
      • सुरक्षित दस्तावेज भंडार:एक बार अपलोड करें, हर जगह उपयोग करें” प्रणाली प्रदान करता है, जिससे कई मंत्रालयों के व्यक्तिगत दौरों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
    • इंडिया इंडस्ट्रियल लैंड बैंक (IILB): 4,000+ पार्कों में 5 लाख हेक्टेयर से अधिक औद्योगिक भूमि के वास्तविक समय डेटा के साथ एक GIS-मैप्ड राष्ट्रीय पोर्टल के माध्यम से ऐतिहासिक “भूमि की बाधा” को समाप्त करता है।
      • भौगोलिक स्पष्टता: निवेशक स्थानीय नौकरशाही देरी का सामना किए बिना उपलब्ध भूखंडों की पहचान कर सकते हैं, निकटतम कच्चे माल और कनेक्टिविटी नोडल बिंदुओं को देख सकते हैं।
    • परिवेश (PARIVESH) 3.0: पर्यावरणीय मंजूरी के लिए, यह डिजिटल हब अब AI-सक्षम सहायता और वनीकरण भूमि बैंकों को एकीकृत करता है, जो अनुमोदन के पश्चात अनुपालन निगरानी के लिए एक सकारात्मक चक्र प्रदान करता है।
  • अपराधमुक्ति और श्रम सुधार: “विश्वास-आधारित शासन” की ओर ध्यान स्थानांतरित हो गया है, जो विशेष रूप से व्यापार में सुगमता (EoDB) और जीवन जीने की सुगमता (Ease of Living) को लक्षित करता है।
    • जन विश्वास विधेयक, 2025: इसमें 355 प्रावधान शामिल हैं, जो विशेष रूप से अपराधमुक्ति के लिए 288 प्रावधानों और जीवन जीने की सुगमता बढ़ाने हेतु 67 प्रावधानों को लक्षित करते हैं।
    • जन विश्वास 2.0: विधिक युक्तिकरण में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास, जो 17 अतिरिक्त कानूनों तक विस्तृत है और तकनीकी चूक के लिए दंड (कारावास) को मौद्रिक दंड (दीवानी मामले) में परिवर्तित करता है।
    • 30-दिवसीय श्रम अधिदेश: नए श्रम कोड के तहत, कारखाने के निर्माण या विस्तार की अनुमति देने के लिए 30 दिनों की कठोर समय-सीमा निर्धारित की गई है, जो पिछले 90 दिनों की अवधि से कम है।
    • करदाता संरक्षण: कुछ मामूली कर चूकों (जैसे- TCS चूक) के लिए अभियोजन को हटाता है, जिससे उद्यमियों को प्रशासनिक त्रुटियों के लिए आपराधिक मुकदमों से बचाया जा सके।
  • प्रतिस्पर्द्धी संघवाद और राज्य नवाचार: व्यापार सुधार कार्य योजना (बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान – BRAP) एक 489-पॉइंट आधारित, पूरी तरह से फीडबैक-आधारित ढाँचे(2024-26) के माध्यम से राज्य-स्तरीय परिवर्तन को संचालित करता है, जो वास्तविक उपयोगकर्ता अनुभव का मूल्यांकन करता है।
    • प्रमुख सुधारक और मॉडल:
      • शीर्ष उपलब्धि: हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश को भूमि, श्रम तथा निर्माण परमिट में प्राथमिकता वाले सुधारों के 100% कार्यान्वयन के लिए मान्यता दी गई।
      • उत्तर प्रदेश (स्केल चैंपियन): “ट्रिपल क्राउन” प्राप्त किया—15 मिनट में व्यावसायिक पंजीकरण, श्रम अनुपालन में 40% की कमी, और 50% तेजी से भूमि लेनदेन।
      • भूमि उपयोग के लिए नकारात्मक सूचियाँ : असम, जम्मू और कश्मीर, ओडिशा तथा त्रिपुरा ने मिश्रित भूमि-उपयोग क्षेत्रों के लिए “नकारात्मक सूचियों” का प्रयोग किया, जहाँ सभी व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति तब तक डिफ़ॉल्ट रूप से होती है जब तक कि स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित न हो।
      • तृतीय-पक्ष सुरक्षा: छत्तीसगढ़, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तृतीय-पक्ष भवन योजना अनुमोदन की ओर बढ़े, जबकि तेलंगाना और त्रिपुरा ने अग्नि सुरक्षा मानदंडों के लिए तृतीय-पक्ष पेशेवरों को मान्यता दी।
    • स्थिरता और विशिष्ट लक्षयीकरण:
      • आंध्र प्रदेश (डिजिटल एकीकरण): वास्तविक समय की पर्यावरणीय ट्रैकिंग के लिए ऑनलाइन सहमति प्रबंधन तथा निगरानी प्रणाली की शुरुआत की, और चुनिंदा श्रेणियों के लिए भूमि परिवर्तन की आवश्यकताओं को समाप्त किया।
      • तमिलनाडु (सतत उद्योग): एकल-खिड़की औद्योगिक मंजूरी को डीकार्बोनाइजेशन योजनाओं के साथ एकीकृत किया। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के श्रम पूल का विस्तार करने के लिए विनिर्माण पारियों (manufacturing shifts) पर लिंग-आधारित प्रतिबंधों को हटा दिया।
      • केरल (ग्रीन-टेक फोकस): शून्य कार्बन या कार्बन-न्यूट्रल ग्राम पंचायतें लागू कीं और ग्रीन-टेक स्टार्टअप के लिए पंजीकरण को सरल बनाया।
      • छत्तीसगढ़ (उद्यमी प्रोत्साहन): इसकी स्टार्टअप नीति 2025-30 बीज पूँजी (seed funding), क्रेडिट जोखिम फंड और ब्याज सब्सिडी प्रदान करती है।
  • वित्तीय आधुनिकीकरण और फीडबैक इकोसिस्टम: MSME की दो सबसे बड़ी बाधाओं—तरलता (liquidity) और नियामक प्रतिनिधित्व —से निपटना।
    • TReDS अधिदेश: सभी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSEs) के लिए अब TReDS प्लेटफॉर्म के माध्यम से भुगतान करना अनिवार्य है, जिससे व्यापार प्राप्य (trade receivables) की छूट देकर MSMEs को तत्काल तरलता प्राप्त होना, सुनिश्चित हो सके।
    • SME ग्रोथ फंड: ₹10,000 करोड़ का फंड, जो उच्च-क्षमता वाली फर्मों को ऋण के बोझ के बिना विस्तार करने के लिए इक्विटी पूंजी प्रदान करता है।
    • CII ईज ऑफ डूइंग बिजनेस पोर्टल: नीतिगत उद्देश्य और जमीनी स्तर की वास्तविकता के बीच के अंतर को कम करने के लिए “रीयल-टाइम रेजोल्यूशन डैशबोर्ड” के माध्यम से निरंतर उद्योग फीडबैक की सुविधा प्रदान करता है।
  • संरचनात्मक सुधार:
    • RBI नियामक समेकन: 9,400 से अधिक परिपत्रों को निरस्त कर दिया, और ढांचे को केवल 238 कार्य-विशिष्ट मास्टर निर्देशों में समेकित किया।
    • बीमा क्षेत्र का उदारीकरण: सबका बीमा सबकी रक्षा अधिनियम, 2025 100% FDI की अनुमति देता है और विदेशी पुनर्बीमाकर्ताओं के लिए नेट ओन्ड फंड (NOF) को ₹5,000 करोड़ से घटाकर ₹1,000 करोड़ करता है।
    • डिजिटल क्रेडिट असेसमेंट मॉडल (CAM): सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने MSMEs के लिए डेटा-संचालित CAM को अपनाया। 2025 में, डिजिटल फुटप्रिंट का उपयोग करके 3.96 लाख से अधिक आवेदनों (₹52,300 करोड़) को मंजूरी दी गई।
    • GST 2.0: सितंबर 2025 के सुधारों ने एक सरल दो-दर संरचना को अपनाया, जिससे वस्त्र और उर्वरकों में इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (पृथक शुल्क संरचनाओं) को ठीक किया गया।

वैश्विक कार्य और पहलें

  • विश्व बैंक का “B-READY” प्रतिमान (2024-2026): “डूइंग बिजनेस” रैंकिंग की आगामी पहल के रूप में, बिजनेस रेडी (B-READY) राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता को मापने के तरीके में एक मूलभूत परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है।
    • तीन-स्तंभ दृष्टिकोण: केवलकागजी कानूनों” (De Jure) को देखने की बजाय, B-READY नियामक फ्रेमवर्क, सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता, और परिचालन दक्षता (कंपनियों का वास्तविक अनुभव – De Facto) का मूल्यांकन करता है।
    • फर्म जीवनचक्र: यह एक फर्म की पूरी यात्रा को कवर करने वाले दस मुख्य विषयों की निगरानी करता है: बिजनेस एंट्री और श्रम से लेकर उपयोगिता सेवाओं तथा व्यावसायिक दिवालियापन तक।
    • क्षैतिज विषय (Horizontal Themes): वर्ष 2026 में, किसी अर्थव्यवस्था के स्कोर को तीन विषयों द्वारा व्यापक महत्त्व दिया जाता है- डिजिटल स्वीकृति, पर्यावरणीय स्थिरता और लैंगिक समानता।
  • WTO और वैश्विक व्यापार सुविधा: अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक निकाय यह सुनिश्चित करने के लिए नियमों में सामंजस्य बनाने पर कार्य कर रहे हैं, कि प्रक्रियात्मक लालफीताशाही” वैश्विक विकास को न रोक सके।
    • विकास के लिए निवेश सुविधा (IFD): 120 से अधिक WTO सदस्यों (संगठन के 70% का प्रतिनिधित्व) द्वारा समर्थित, इस ऐतिहासिक बहुपक्षीय समझौते का उद्देश्य पारदर्शिता के लिए एक वैश्विक बेंचमार्क स्थापित करना है। यह प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और $4 ट्रिलियन के SDG निवेश अंतराल को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने पर केंद्रित है।
    • विनियमन का अधिकार”: जहाँ IFD प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करता है, वहीं यह स्पष्ट रूप से सार्वजनिक हित में विनियमित करने के देश के अधिकार की रक्षा करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सुविधा” का अर्थ आवश्यक मानकों का विनियमन हटाना नहीं है।
    • अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर (AEO) कार्यक्रम: WTO के व्यापार सुविधा समझौते के तहत, AEO कार्यक्रम “विश्वसनीय व्यापारियों” (उच्च अनुपालन रिकॉर्ड वाली फर्मों) को पसंदीदा उपचार प्राप्त करने की अनुमति देता है, जैसे कि तीव्र कार्गो क्लीयरेंस और कम भौतिक निरीक्षण।
  • UNCTAD- सतत FDI मॉडल: UNCTAD की वैश्विक निवेश सुविधा पहल किसी भी निवेश” से “गुणवत्तापूर्ण निवेश” की ओर बढ़ने पर बल देती है।
    • SDG-संरेखित विकास: विश्व निवेश मंच के माध्यम से, UNCTAD देशों को अपने व्यावसायिक परिदृश्य को सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के साथ जोड़ने के लिए प्रोत्साहित करता है।
    • क्षेत्रीय फोकस: वित्त वर्ष 2025-2026 में, FDI पूंजी-गहन, प्रौद्योगिकी-संचालित क्षेत्रों में अत्यधिक केंद्रित हो गया है।
      • उदाहरण के लिए, डेटा सेंटर और सेमीकंडक्टर अब वैश्विक ग्रीनफील्ड परियोजना मूल्यों का लगभग 25% आकर्षित करते हैं, जिसके लिए विशेष “फास्ट-ट्रैक” विनियामक विंडो की आवश्यकता होती है।
  • OECD- कठोर विनियामक शासन : AI क्रांति के साथ सामंजस्य सुनिश्चित करने के लिए, OECD ऐसे शासन का समर्थन करता है, जो उस तकनीक की तरह ही अनुकूलन योग्य हो जिसे वह विनियमित करता है।
    • विनियामक सैंडबॉक्स : OECD “सैंडबॉक्स” के उपयोग को बढ़ावा देता है, जहाँ कंपनियाँ पूर्ण अनुपालन के तत्काल बोझ के बिना विनियामक पर्यवेक्षण के तहत AI और डिजिटल नवाचारों का परीक्षण कर सकती हैं।
    • कठोर AI शासन: ध्यान “स्थिर सुरक्षा उपायों” से हटकर निरंतर निगरानी और लाइव, अनुकूलन योग्य नीतियों की ओर स्थानांतरित हो गया है, जो वास्तविक समय में एल्गोरिदम परिवर्तन” या निष्पक्षता विचलन का पता लगा सकते हैं।
    • अंतरराष्ट्रीय विनियामक सहयोग (IRC): यह खंडित नियमों” को वैश्विक तकनीक-आधारित विकास में बाधा डालने से रोकता है, यह सुनिश्चित करता है कि एक देश का स्टार्टअप 190 अलग-अलग डिजिटल नियमों का सामना किए बिना सीमाओं के पार विस्तार कर सके।
  • क्षेत्रीय भागीदारी और ESG एकीकरण: IPEF (इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क) और RCEP जैसे बड़े व्यापारिक समूहों में तेजी से समर्पितईज ऑफ बिजनेस” अध्याय शामिल किए जा रहे हैं।
    • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI): G20 सिद्धांतों द्वारा समर्थित, DPI का उपयोग वैश्विक अवसंरचना हब (GI Hub) जैसे पोर्टलों के माध्यम से परियोजना प्रायोजकों तथा वैश्विक फाइनेंसरों के मध्य सूचना अंतराल को कम करने के लिए किया जा रहा है।
    • ESG अधिदेश: वैश्विक पूंजी बाजार अब पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) रिपोर्टिंग को एक मुख्य व्यावसायिक मीट्रिक के रूप में देखते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्थिरता मानक बोर्ड (ISSB) के मानकीकृत रिपोर्टिंग ढाँचे नेईज ऑफ ग्रीन कम्प्लायंस” को वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए एक नया मोर्चा बना दिया है।
  • भारत का संरेखण: भारत सक्रिय रूप से अपने घरेलू सुधारों को इन वैश्विक बेंचमार्क के साथ एकीकृत कर रहा है। क्षेत्रों के उदारीकरण (जैसे- बीमा क्षेत्र में 100% FDI की अनुमति देना) और अपने सीमा शुल्क एकीकृत प्रणाली के डिजिटलीकरण के माध्यम से, भारत आगामी B-READY-2026 रिपोर्ट में स्वयं को एक “टॉप अचीवर” के रूप में स्थापित कर रहा है।

चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • न्यायिक विरोधाभास और अनुबंध प्रवर्तन: जहाँ भारत ने डिजिटल टैक्स फाइलिंग और बिजनेस रजिस्ट्रेशन में उपलब्धि प्राप्त की है, वहीं कानूनी प्रणाली अभी भी सुधारों का अंतिम लक्ष्य बनी हुई है।
    • लंबित मामलों का संकट: वर्ष 2026 तक, लगभग ₹24.7 लाख करोड़ (भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 7.5%) मामले विभिन्न न्यायाधिकरणों में वाणिज्यिक विवादों में लंबित हैं।
    • समाधान का समय: हालाँकि विशेष अदालतों में वाणिज्यिक मामलों के निपटान के समय में सुधार हुआ है (वर्ष 2020 में 1,445 दिनों से घटकर हाल के वर्षों में लगभग 626 दिन), लेकिन न्यायिक प्रणाली अभी भी जिला न्यायालयों में 4.6 करोड़ से अधिक लंबित मामलों से जूझ रही है।
    • प्रभाव: यह देरी अनुबंधों को कमजोर करती है, जिससे दीर्घकालिक निवेशक—विशेष रूप से अवसंरचना निर्माण क्षेत्र में महंगे तृतीय-पक्ष मध्यस्थता खंडों (Arbitration Clauses) के बिना पूंजी लगाने में संकोच करते हैं।
  • MSME का “विनियामक कठोरता”: व्यापार सुगमता (EoDB) के अधिकांश लाभों का असमान रूप से बड़े निगमों को लाभ हुआ है। छोटे उद्यमों को अभी भी अत्यधिक प्रशासनिक बोझ का सामना करना पड़ रहा है।
    • अनुपालन का बोझ : एक ही राज्य में काम करने वाले एक सामान्य विनिर्माण MSME को अभी भी वार्षिक 1,450 से अधिक विनियामक दायित्वों का पालन करना पड़ता है।
    • अनुपालन लागत: ये दायित्व छोटी इकाइयों के लिए प्रति वर्ष ₹13-17 लाख के वित्तीय बोझ में बदल जाते हैं, यह वह पूंजी है, जिसका उपयोग अन्यथा नवाचार या भर्ती के लिए किया जा सकता था।
    • इंस्पेक्टर राज” का बना रहना: डिजिटलीकरण के बावजूद, MSMEs को अभी भी 59 विभिन्न प्रकार के निरीक्षकों से निपटना पड़ता है और मामूली प्रक्रियात्मक खामियों के लिए 480 से अधिक कारावास खंडों का सामना करना पड़ता है।
  • कार्यान्वयन अंतराल और असममित संघवाद: भारत केप्रतिस्पर्द्धी संघवाद” ने “शीर्ष उपलब्धि हासिल करने वाले राज्यों और पिछड़ने वाले क्षेत्रों के बीच एक बड़ा अंतराल उत्पन्न कर दिया है।
    • प्रदर्शन का अंतर: आंध्र प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान (BRAP) को 100% संस्थागत बना दिया है।
      • हालाँकि, कई आंतरिक राज्य अंतिम सीमा तक पहुँच” के साथ संघर्ष कर रहे हैं, जिससे FDI का असमान संकेंद्रण हो रहा है।
    • कागज बनाम व्यवहार” का अंतर: हालाँकि किसी राज्य मेंडिजिटल सिंगल विंडो” (De Jure) हो सकती है, लेकिन जमीनी स्तर पर निष्पादन (De Facto) के लिए प्रायः अनौपचारिक “रेंट-सीकिंग” (रिश्वतखोरी) या स्थानीय अधिकारियों के साथ व्यक्तिगत कार्यों की आवश्यकता होती है।
  • भूमि और श्रम संबंधी ‘सॉफ्ट’ लिंकेज बाधाएँ:
    • भूमि अधिग्रहण: भूमि एक जटिल राज्य सूची का विषय बनी हुई है। औद्योगिक भूमि बैंक (IILB) के बावजूद, कई क्षेत्रों में डिजिटल और स्पष्ट भूमि शीर्षकों (titles) की कमी बड़े पैमाने की परियोजनाओं को रोकती है।
    • कौशल अंतराल: जहाँ पीएम गति शक्ति के माध्यम से भौतिक बुनियादी ढाँचे (सड़कों और बंदरगाहों) का आधुनिकीकरण किया जा रहा है, वहीं सॉफ्ट” बुनियादी ढाँचा—विशेष रूप से औपचारिक कौशल प्रशिक्षण—अभी भी कम है।
      • कार्यबल का केवल एक छोटा हिस्सा औपचारिक रूप से कुशल है, जो पूंजी-गहन क्षेत्रों (जैसे- सेमीकंडक्टर) में “रोजगारहीन विकास” और श्रम-गहन विनिर्माण आवश्यकताओं के मध्य असंतुलन उत्पन्न करता है।
  • विश्व बैंक B-READY-2026 में संक्रमण: मूल “डूइंग बिजनेस” इंडेक्स के बंद होने के साथ, भारत वर्तमान में एक “बेंचमार्क जीरो” की स्थिति से गुजर रहा है।
    • नए मानक: B-READY ढाँचे में परिवर्तन पर्यावरणीय स्थिरता और लैंगिक समानता को शामिल करने के लिए लक्ष्यों को बदल देता है।
    • भारत का पायलट प्रदर्शन: शुरुआती पायलट डेटा से पता चलता है, कि भारत डिजिटल स्वीकृति (स्तंभ 3) में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन उपयोगिता कनेक्शन और व्यावसायिक दिवालियापन से संबंधित सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता (स्तंभ 2) में पीछे है।

आगे की राह 

  • न्यायिक दक्षता और अनुबंध प्रवर्तन: वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की राह में विधिक प्रणाली अंतिम बाधा बनी हुई है। प्राथमिकता विवाद समाधान के समय को वर्षों से घटाकर सप्ताहों में करने की है।
    • विशेषीकृत वाणिज्यिक न्यायालय : ₹3 लाख से अधिक के मामलों को प्रबंधित करने के लिए जिला स्तर पर समर्पित वाणिज्यिक न्यायालयों का तेजी से विस्तार।
      • इसका लक्ष्य भारतीय समाधान समय (1,400 दिन) को 400 दिनों के वैश्विक औसत के निकट लाना है।
    • ADR को मुख्यधारा में लाना: वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR), जैसे- मध्यस्थता और सुलाह को विधिक मामलों से पूर्व अनिवार्य बनाना।
    • AI-सहायता प्राप्त मामलों का प्रबंधन: नियमित मामलों को स्वचालित करने और न्यायिक प्रक्रिया मेंमानवीय संघर्ष” को कम करने के लिए ई-कोर्ट्स मिशन मोड प्रोजेक्ट में AI टूल लागू करना।
  • स्थानीयकरण- D-BRAP युग: वास्तविक व्यावसायिक वार्ता स्थानीय स्तर पर पूर्ण होती है। वर्ष 2025 के अंत में शुरू किया गया जिला व्यापार सुधार कार्य योजना (D-BRAP), ध्यान राज्य की राजधानियों से हटाकर नगर पालिकाओं पर केंद्रित करता है।
    • अंतिम-लक्ष्य पहुँच कार्यान्वयन: निर्माण परमिट और उपयोगिता कनेक्शन के लिए शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) और जिला कलेक्ट्रेट को डिजिटल बुनियादी ढाँचे से युक्त करना।
    • U-PIN (विशिष्ट भूमि पार्सल पहचान संख्या): स्पष्ट, विवाद-मुक्त डिजिटल शीर्षक बनाने के लिए “भूमि के लिए आधार” का देशव्यापी रोलआउट, जो औद्योगिक भूमि अधिग्रहण के जोखिमों को अत्यंत कम करेगा।
    • टियर-II/III शहरों में स्टार्टअप सेल: पहली पीढ़ी के उद्यमियों के लिए संपर्क का एक एकल बिंदु प्रदान करने के लिए जिला स्तर पर समर्पित “सुविधा इकाइयाँ” स्थापित करना।
  • MSME-केंद्रित ‘विश्वास-आधारित’ शासन: MSMEs को पुलिसिंग’ की बजाय ‘हैंडहोल्डिंग’ (सहयोग) की आवश्यकता है। ध्यान अनुपालन बोझ को कम करने पर है, जो वर्तमान में उनके वार्षिक टर्नओवर (लाभ) का 6-8% कम करता है।
    • जन विश्वास 3.0: सभी मामूली प्रक्रियात्मक खामियों के सार्वभौमिक अपराधमुक्तीकरण की प्रतिबद्धता, यह सुनिश्चित करते हुए किप्रशासनिक अस्तित्व” के लिए जेल जाने का भर न रहे।
    • स्व-प्रमाणन और जोखिम-आधारित ऑडिट: सूक्ष्म उद्यमों को यादृच्छिक निरीक्षण के साथ सेल्फ-ऑडिट मॉडल’ पर स्थानांतरित करना, जिससे भौतिक “इंस्पेक्टर राज” कम हो सके।
    • कॉरपोरेट मित्र: छोटे शहरों में MSMEs को सस्ती, मानकीकृत लागत पर डिजिटल अनुपालन पोर्टलों को समझने में मदद करने के लिए मान्यता प्राप्त पेशेवरों को प्रशिक्षित करना।
  • वैश्विक “B-READY” और ESG मानकों के साथ संरेखण: विश्व बैंक के नए B-READY इंडेक्स में प्रतिस्पर्द्धी बने रहने के लिए, भारत स्थिरता को अपने व्यावसायिक परिदृश्य में एकीकृत कर रहा है।
    • सभी के लिए ESG रिपोर्टिंग: मानकीकृत पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) रिपोर्टिंग को प्रोत्साहित करना, जिससे हरित अनुपालन” वैश्विक निवेशकों के लिए गुणवत्ता का प्रतीक बन जाए।
    • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI): एंड-टू-एंड’ पेपरलेस अनुपालन यात्रा बनाने के लिएइंडिया स्टैक” (आधार, डिजिलॉकर) का लाभ उठाना, जहाँ डेटा कर, श्रम और उद्योग विभागों के बीच निर्बाध रूप से प्रवाहित हो।
  • नवाचार और R&D प्रोत्साहन: एक सर्विस-हब से डीप-टेक लीडर के रूप में परिवर्तन के लिए R&D हेतु “नियामक व्यवस्था” की आवश्यकता है।
    • अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF): लक्षित कर प्रोत्साहन और नियामक सैंडबॉक्स के माध्यम से R&D में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना।
    • IP सुधार: बौद्धिक संपदा कार्यालय मेंलंबित मामलों” को कम करना, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भारत में पेटेंट फाइलिंग प्रक्रिया उतनी ही तीव्र हो जितनी अमेरिका या सिंगापुर में होती है।

निष्कर्ष

$5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था और विकसित भारत@2047 की यात्रा केवल विनियमन हटाने पर नहीं, बल्कि बेहतर विनियमन पर निर्भर करती है। प्रतिस्पर्द्धी संघवाद को डिजिटल गवर्नेंस के साथ जोड़कर, भारत अपनेईज ऑफ डूइंग बिनेस” को अपने उद्यमियों तथा नागरिकों के लिए समान रूप से स्थायी “जीवन जीने की सुगमता” में परिवर्तित कर सकता है।

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