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भारत में अनुसंधान एवं विकास करने की सुगमता

Lokesh Pal April 13, 2026 05:40 13 0

संदर्भ

नीति आयोग ने “भारत में अनुसंधान एवं विकास करने की सुगमता ” और ‘भारत में अनुसंधान एवं विकास की सुगमता पर सर्वेक्षण रिपोर्ट’ शीर्षक से दो रिपोर्टें जारी की हैं।

भारत में अनुसंधान एवं विकास की सुगमता पर रिपोर्ट और इसके सर्वेक्षण के बारे में

  • उद्देश्य: इन रिपोर्टों का उद्देश्य भारत में एक अधिक कुशल, सुविधाजनक और नवाचार-प्रेरित अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है।
  • रिपोर्टें भारत के अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र का आकलन करती हैं और वित्तपोषण, शासन, विनियामक ढाँचे तथा अनुसंधान रूपांतरण पर क्रियाशील सिफारिशें प्रस्तुत करती हैं।
  • कार्यप्रणाली: ये रिपोर्टें राष्ट्रीय स्तर के सर्वेक्षणों, हितधारक परामर्शों और क्षेत्रीय बैठकों पर आधारित हैं, जो एक साक्ष्य-आधारित ढाँचा सुनिश्चित करती हैं।
  • विजन: यह पहल भारत के विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार में वैश्विक नेता बनने के लक्ष्य के अनुरूप है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • वित्तपोषण संबंधी बाधाएँ: अनुसंधान एवं विकास के लिए वित्तपोषण कई अभिकरणों में वितरित है, जिससे दोहराव और अक्षमता उत्पन्न होती है।
  • प्रशासनिक बोझ: शोधकर्ताओं को उच्च स्तर के अनुपालन भार का सामना करना पड़ता है, जिससे मुख्य अनुसंधान के लिए समय कम हो जाता है।
  • कठोर वित्तीय नियम: वर्तमान मानदंड अनम्य और प्रक्रिया-उन्मुख हैं, जो नवाचार को सीमित करते हैं।
  • उद्योग संबंधों में कमी: शैक्षणिक संस्थानों और उद्योग के मध्य कमजोर सहयोग वाणिज्यीकरण को सीमित करता है।
  • निम्न निजी निवेश: अनुसंधान एवं विकास मुख्यतः सार्वजनिक वित्तपोषण पर निर्भर है, जिसमें निजी क्षेत्र की भूमिका सीमित है।
    • अनुसंधान एवं विकास में सार्वजनिक क्षेत्र का योगदान लगभग 60% है और निजी क्षेत्र का योगदान लगभग 35–36% है, जबकि उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में निजी क्षेत्र का योगदान 70% से अधिक है।
  • कमजोर अनुसंधान रूपांतरण: कमजोर प्रणालियाँ अनुसंधान को व्यावहारिक अनुप्रयोगों में परिवर्तित करने में बाधा उत्पन्न करती हैं।

प्रमुख सिफारिशें

  • वित्तपोषण का तर्कसंगठन: दोहराव और विलंब को कम करने के लिए एक समन्वित और सुव्यवस्थित वित्तपोषण संरचना स्थापित की जाए।
  • लचीले वित्तीय मानदंड: दक्षता और नवाचार में सुधार हेतु परिणाम-आधारित और लचीले वित्तीय नियम लागू किए जाएँ।
  • विनियामक सरलीकरण: अनुसंधान प्रक्रियाओं को सुगम बनाने के लिए सिंगल-विंडो, पारदर्शी और सरल विनियामक प्रणाली विकसित की जाए।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: अनुसंधान एवं विकास के वित्तपोषण को सुदृढ़ करने हेतु उद्योग निवेश, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल, और कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) फंडिंग को बढ़ावा दिया जाए।
    • अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना को अनुसंधान एवं विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के लिए शुरू किया गया है।
  • मिशन-आधारित एवं रूपांतरणीय अनुसंधान: मिशन-प्रेरित अनुसंधान एवं विकास संरचनाओं का विकास किया जाए और अनुसंधान को व्यावहारिक अनुप्रयोगों में परिवर्तित करने के तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।

भारत का अनुसंधान एवं विकास पारिस्थितिकी तंत्र

  • भारत का अनुसंधान एवं विकास पर सकल व्यय (GERD), GDP का लगभग 0.64% है, जो अपेक्षाकृत कम निवेश को दर्शाता है।
  • वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII) में भारत की रैंकिंग 81 (2015) से बढ़कर 38 (2025) हो गई है।
  • अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना ₹14,000 करोड़ के बजट के साथ की गई है।
  • ₹1 लाख करोड़ अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) फंड को निजी निवेश और डीप-टेक अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया।
  • नवाचार के लिए राष्ट्रीय मिशन: प्रमुख मिशनों में नेशनल क्वांटम मिशन, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन, और नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन शामिल हैं, जो उच्च-प्रौद्योगिकी क्षमताओं को बढ़ावा देते हैं।
  • नवाचार एवं स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र: निधि (NIDHI), BIRAC, आईडेक्स, और टाइड 2.0 जैसे कार्यक्रम स्टार्ट-अप्स, प्रोटोटाइपिंग और स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के वाणिज्यीकरण को समर्थन देते हैं।
  • नीतिगत समर्थन: जियोस्पेशियल नीति 2022, अंतरिक्ष नीति 2023, और बायोE3 नीति 2024 जैसी नीतियाँ निजी भागीदारी और नवाचार को प्रोत्साहित करती हैं।

अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) योजना

  • भारत सरकार द्वारा अनुसंधान, विकास और नवाचार में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के लिए RDI योजना शुरू की गई है।
  • नोडल अभिकरण: विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग नोडल अभिकरण है तथा कार्यान्वयन दिशा-निर्देशों को अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन द्वारा अनुमोदित किया गया है।
  • वित्तपोषण तंत्र: उच्च-जोखिम और डीप-टेक अनुसंधान के लिए दीर्घकालिक पूँजी उपलब्ध कराने हेतु ₹1 लाख करोड़ का कोष स्थापित किया गया है।
  • कोष प्रबंधन: प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड और जैव-प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद को द्वितीय-स्तरीय कोष प्रबंधक के रूप में नामित किया गया है।
  • फोकस क्षेत्र: यह योजना रणनीतिक और उदीयमान क्षेत्रों को लक्षित करती है तथा उभरती प्रौद्योगिकियों में नवाचार को बढ़ावा देती है।

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