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AI की पर्यावरणीय लागत

Lokesh Pal January 16, 2026 03:56 40 0

संदर्भ 

विभिन्न क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को तेजी से अपनाने से पर्यावरण को काफी नुकसान होता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बारे में

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंप्यूटर विज्ञान की एक शाखा है, जिसका उद्देश्य तर्क (नियमों का उपयोग करके निष्कर्ष निकालना), अधिगम (सूचना और उसके उपयोग के लिए नियम प्राप्त करना) और स्वतः सुधार करने में सक्षम प्रणालियाँ विकसित करना है।
  • उद्देश्य
    • आर्थिक विकास, उत्पादकता वृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देना।
    • AI नेतृत्व भू-राजनीतिक शक्ति, आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा और रणनीतिक स्वायत्तता का निर्धारक है।
  • अनुप्रयोग के प्रमुख क्षेत्र: शासन, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, रक्षा, विनिर्माण, शिक्षा, वित्त, जलवायु परिवर्तन संबंधी कार्रवाई और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना।

AI बाजार आयाम

  • वैश्विक AI बाजार: वैश्विक AI अर्थव्यवस्था का अनुमान लगभग 400-450 अरब अमेरिकी डॉलर (2026) है और 2030 के दशक की शुरुआत तक इसके 2-2.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर को पार करने का अनुमान है।
    • वृद्धि दर: AI बाजार लगातार उच्च दोहरे अंकों की वृद्धि (लगभग 26-30% CAGR) दर्ज कर रहा है।
    • बुनियादी ढाँचे पर व्यय: AI क्षेत्र में उच्च पूँजीगत व्यय (डेटा सेंटर, एडवांस चिप्स, क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर) वर्ष 2026 के अंत में कुल मिलाकर 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है।
  • भारतीय AI बाजार: भारत का AI बाजार वर्ष 2027 तक लगभग 15-20 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
    • वृद्धि दर: भारत वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ते AI बाजारों में से एक है, जिसकी अनुमानित CAGR 25-35% है।
    • प्रतिभा का लाभ: भारत का योगदान वैश्विक AI प्रतिभा भंडार में लगभग 16% हिस्सा है, जो इसे विश्व स्तर पर दूसरा स्थान देता है।
      • वर्ष 2026 के अंत तक AI कार्यबल की माँग 10 लाख पेशेवरों तक पहुँचने की उम्मीद है।

पर्यावरण में AI की भूमिका

  • प्रदूषण एवं पर्यावरण शासन: AI प्लेटफॉर्म पर्यावरण संबंधी डेटा की निगरानी, ​​अनुपालन और जनता की पहुँच में सुधार करते हैं।
    • उदाहरण: महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का ग्रीनमाइंड AI नियामकों और नागरिकों को पर्यावरण अनुपालन में सहायता करता है।
  • सतत् कृषि: AI सटीक खेती, फसलों में रोगों की शीघ्र पहचान और संसाधनों के अनुकूलित उपयोग को सक्षम बनाता है, जिससे रासायनिक इनपुट और जल खपत कम होती है।
    • उदाहरण: IIIT इलाहाबाद की AI प्रणाली वास्तविक समय में फसल में रोगों का पता लगाती है, जिससे शीघ्र हस्तक्षेप में मदद मिलती है और अनावश्यक रासायनिक इनपुट कम होते हैं।
  • स्मार्ट शहरी एवं संसाधन प्रबंधन: AI यातायात प्रवाह और वायु गुणवत्ता निगरानी को अनुकूलित करता है, जिससे शहरी पर्यावरण पर दबाव कम होता है।
    • उदाहरण: प्रोजेक्ट ग्रीन लाइट, गूगल की एक पहल है, जो शहरी चौराहों पर यातायात प्रवाह को बेहतर बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग करती है, जिससे वाहनों के निष्क्रिय रहने का समय, ईंधन की खपत और कार्बन उत्सर्जन कम होता है।
  • अपशिष्ट प्रबंधन: पुनर्चक्रण सुविधाओं में AI-संचालित छवि पहचान तकनीक सामग्रियों को पृथक-पृथक करने में सुधार करती है, अपशिष्ट को नए उत्पादों या ऊर्जा में परिवर्तित करने की क्षमता को बढ़ाती है।
  • जैव विविधता संरक्षण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एल्गोरिदम जैव विविधता को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों, जैसे कि वनों की कटाई और वन्यजीवों की घटती आबादी, की वास्तविक समय में निगरानी करने में सक्षम बनाते हैं।
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) मॉडल अवैध गतिविधियों, जैसे कि शिकार और वनों की कटाई, का पता लगा सकते हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण पारिस्थितिकी तंत्र में होने वाले परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाने में मदद कर सकते हैं।
    • केरल वन विभाग द्वारा भारत की पहली AI-सक्षम वन्यजीव निगरानी प्रणाली स्थापित की गई है।
  • ऊर्जा दक्षता एवं जलवायु परिवर्तन संबंधी उपाय: AI स्मार्ट ग्रिड, भवन ऊर्जा अनुकूलन और इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग में सुधार करके ऊर्जा खपत तथा उत्सर्जन को कम करता है।
  • जलवायु मॉडलिंग एवं आपदा प्रबंधन: AI मौसम पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और जलवायु जोखिम पूर्वानुमान को बेहतर बनाकर आपदा की तैयारी में सहायक होता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता की पर्यावरणीय लागत

  • ऊर्जा की खपत
    • उच्च ऊर्जा माँग: OECD के एक कार्यपत्र के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एल्गोरिदम का विकास ऊर्जा-गहन है और इसके परिणामस्वरूप पर्यावरण पर भारी लागत आती है।
      • उदाहरण के लिए, GPT-3 जैसे बड़े AI मॉडल को प्रशिक्षित करने में 2,56,000 किलोवाट-घंटे बिजली की खपत होती है, जो किसी घर को 20 वर्षों से अधिक समय तक विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है।
  • कार्बन फुटप्रिंट
    • वैश्विक सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) उद्योग, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (GHG) के लगभग 1.8%-3.9%  उत्सर्जन  के लिए जिम्मेदार है।
  • संसाधनों की कमी
    • AI सर्वर एंड कूलिंग: UNEP की एक रिपोर्ट के अनुसार, AI डेटा सेंटर वर्ष 2027 तक शीतलन प्रणालियों के लिए 4.2 से 6.6 अरब घन मीटर जल का उपयोग कर सकते हैं।
    • कच्चा माल: AI हार्डवेयर के लिए दुर्लभ मृदा धातुएँ, लीथियम, कोबाल्ट, ताँबा और स्वर्ण आवश्यक हैं।
      • इन सामग्रियों के खनन से पर्यावास का विनाश, जल प्रदूषण और अत्यधिक ऊर्जा खपत होती है।
  • ई-अपशिष्ट उत्पादन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के नवाचार की तीव्र गति के कारण हार्डवेयर अप्रचलित हो रहे हैं और ई-अपशिष्ट उत्पन्न हो रहा है।
    • अनुसंधान के अनुसार, वर्ष 2030 तक ई-अपशिष्ट की कुल मात्रा 12 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 50 लाख मीट्रिक टन तक पहुँच सकती है, जो वर्ष 2023 में उत्पादित ई-कचरे से लगभग 1000 गुना अधिक है।
  • जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव
    • अप्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन: हालाँकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग ऊर्जा दक्षता को अनुकूलित करने के लिए किया जा सकता है (उदाहरण के लिए, स्मार्ट ग्रिड या स्वचालित इमारतों में), लेकिन इसका समग्र कार्बन फुटप्रिंट चिंताजनक है।
      • बड़े AI मॉडल, जैसे कि लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM), को प्रशिक्षित करने और संचालित करने से जीवाश्म ईंधन से संचालित होने पर कार्बन उत्सर्जन में महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता है।
        • उदाहरण के लिए, एक एकल LLM को प्रशिक्षित करने से लगभग 3,00,000 किलोग्राम CO2 उत्सर्जित होती है, जो पाँच कारों द्वारा अपने पूरे जीवनकाल में उत्पादित उत्सर्जन के बराबर है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए वैश्विक पहल

  • यूनेस्को की अनुशंसा (2021): ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता पर सिफारिश’ को लगभग 190 देशों ने अपनाया है।
    • यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े पर्यावरणीय जोखिमों को पहचानने और कम करने की आवश्यकता पर बल देती है।
  • ‘पेरिस एक्शन समिट’ की विरासत (2025): पिछले शिखर सम्मेलनों के आधार पर, पेरिस शिखर सम्मेलन ने आधिकारिक तौर पर सुरक्षा के साथ-साथ AI स्थिरता को तीसरे स्तंभ के रूप में शामिल किया।
  • G7 AI हब फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (2025): G7 देशों और UNDP द्वारा समर्थित यह पहल, वैश्विक दक्षिण में नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना को AI डेटा केंद्रों के साथ एकीकृत करती है।
  • अमेरिका: कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर्यावरणीय प्रभाव अधिनियम (2024)
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के कार्बन फुटप्रिंट पर रिपोर्टिंग और पारदर्शिता को अनिवार्य बनाता है।
    • AI के विकास और तैनाती के लिए स्थिरता मानकों को प्रोत्साहित करता है।
  • यूरोपीय संघ (EU): समरूप कृत्रिम बुद्धिमत्ता नियमों पर संकल्प
    • AI विनियमन में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को एकीकृत करता है।
    • सदस्य देशों में हरित AI प्रथाओं को बढ़ावा देता है।
    • ऊर्जा, जल और उत्सर्जन के लिए मानकीकृत मापदंडों पर ध्यान केंद्रित करता है।

सतत AI के लिए भारत की पहलें

  • प्लैनेट सूत्रा फ्रेमवर्क (IndiaAI इंपैक्ट समिट, 2026): भारत ने IndiaAI इंपैक्ट समिट की मेजबानी करते हुए प्लैनेट सूत्रा पेश किया, जिससे वह ग्लोबल साउथ में एक नेतृत्वकारी राष्ट्र के रूप में अपनी स्थिति स्थापित करता है।
    • यह अनिवार्य पारदर्शिता, सार्वभौमिक ग्रीन कंप्यूट और राष्ट्रीय AI रोडमैप में पर्यावरणीय उत्तरदायित्व को एकीकृत करने पर जोर देता है।
  • ग्रीन कंप्यूट स्तंभ (IndiaAI मिशन): ₹10,372 करोड़ में से एक बड़ा हिस्सा ग्रीन डेटा सेंटरों को आवंटित किया गया है, जिन्हें नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र (RECs) का उपयोग करना और पॉवर यूसेज इफेक्टिवनेस (PUE) 1.2 से कम बनाए रखना अनिवार्य है। इससे AI अवसंरचना में ऊर्जा का कुशल उपयोग सुनिश्चित होता है।
  • भारतजेन मॉडल (2025): भारत का यह आधारभूत AI मॉडल मितव्ययी प्रशिक्षण का उपयोग करता है, जिससे यह भारतीय भाषाओं के लिए उच्च प्रदर्शन प्राप्त करता है, जबकि वैश्विक समकक्ष मॉडलों की तुलना में लगभग 40% कम कंप्यूट शक्ति का उपयोग करता है।
    • यह दर्शाता है कि AI की दक्षता और पर्यावरणीय सततता एक साथ सह-अस्तित्व में रह सकती हैं।

एजेंटिक AI कृत्रिम बुद्धिमत्ता की एक नई पीढ़ी है, जो स्वायत्तता और उद्देश्यपूर्ण कार्यक्षमता के साथ कार्य करती है। यह केवल निर्देशों पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि लक्ष्य निर्धारित करने, योजना बनाने तथा न्यूनतम मानव हस्तक्षेप के साथ कार्यों को निष्पादित करने में सक्षम होती है।

AI के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में चुनौतियाँ

  • जटिल मापन मानक: AI के कार्बन लेखांकन के लिए कोई सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत ढाँचा उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण आकलन असंगत रहते हैं और विभिन्न संगठनों के बीच तुलनात्मकता कमजोर हो जाती है।
  • एजेंटिक AI का उभार: लगातार पृष्ठभूमि में कार्य करने वाले एजेंटिक AI के बढ़ते उपयोग से केवल दो वर्षों में इंफरेंस ऊर्जा खपत में लगभग 300% की वृद्धि हुई है। इससे डेटा केंद्रों और ऊर्जा अवसंरचना पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है।
  • रिबाउंड प्रभाव (जेवन्स विरोधाभास): AI की दक्षता में हुई वृद्धि प्रायः कुल उपभोग में बढोतरी का कारण बनती है, क्योंकि परिचालन लागत घटने से इसके उपयोग में तेजी आती है। परिणामस्वरूप, शुद्ध ऊर्जा माँग बढ़ जाती है, जिसे जेवन्स विरोधाभास के रूप में समझा जाता है।
  • डेटा प्रामाणिकता और विमर्शगत पक्षपात: AI के कार्बन फुटप्रिंट से संबंधित रिपोर्टें अक्सर अधूरी या भ्रामक होती हैं। वर्तमान विमर्श में AI को जलवायु समाधान के रूप में अत्यधिक प्रस्तुत किया जाता है, जबकि बड़े पैमाने के AI मॉडलों के प्रशिक्षण से होने वाली पर्यावरणीय लागतों की उपेक्षा की जाती है।
  • नियामक एवं नीतिगत अंतराल: MeitY की AI गवर्नेंस दिशा-निर्देश (2025) सुरक्षा, लचीलापन और सततता पर बल देते हैं, किंतु इनमें जीवन-चक्र ऊर्जा रिपोर्टिंग, दक्षता लक्ष्य अथवा बड़े पैमाने के AI के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) जैसे बाध्यकारी पर्यावरणीय प्रावधानों का अभाव है। परिणामस्वरूप एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत शून्य उत्पन्न होता है, जिसकी पूर्ति के लिए कानून निर्माण या मिशन-स्तरीय हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
  • सामाजिक एवं समानता से जुड़े प्रभाव: AI अवसंरचना से उत्पन्न पर्यावरणीय बोझ असमान रूप से ग्लोबल साउथ और संवेदनशील समुदायों पर पड़ता है। प्रमुख डेटा केंद्रों के आस-पास के जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में इसका प्रभाव स्थानीय जनसंख्या और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल रूप से दिखाई देता है।

आगे की राह 

  • ग्रीन डेटा सेंटर नेतृत्व: भारत द्वारा IndiaAI मिशन के अंतर्गत डेटा केंद्रों के लिए पावर यूसेज इफेक्टिवनेस (PUE) 1.2 से कम तथा 100% नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाण-पत्र (RECs) को अनिवार्य किया जाना, विकासशील देशों के लिए एक वैश्विक मानक स्थापित करता है। यह दर्शाता है कि उच्च-प्रदर्शन AI अवसंरचना आक्रामक डी-कार्बनाइजेशन लक्ष्यों के साथ सह-अस्तित्व में रह सकती है।
  • मितव्ययी एवं लघु भाषा मॉडल: भारत युक्‍ति और वार्ता जैसे SLMs को प्राथमिकता दे रहा है, जिन्हें मोबाइल उपकरणों या एज सर्वरों पर संचालित किया जा सकता है। इससे डेटा केंद्रों पर भार, नेटवर्क ट्रैफिक तथा ऊर्जा खपत में उल्लेखनीय कमी आती है।
    • युक्‍ति और वार्ता भारत के IndiaAI मिशन के अंतर्गत विकसित किए गए नए लघु भाषा मॉडल  (SLM) हैं।
  • परिपत्र हार्डवेयर अर्थव्यवस्था: ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियमों को सुदृढ़ कर तथा हार्डवेयर पासपोर्टिंग को अनिवार्य बनाकर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि प्रत्येक GPU और AI हार्डवेयर के लिए पुनर्चक्रण तथा पुनर्नवीनीकरण की स्पष्ट व्यवस्था हो। इससे कोबाल्ट और लीथियम जैसे दुर्लभ खनिजों की पुनर्प्राप्ति संभव होगी।
  • सतत् AI प्रथाएँ: पूर्व-प्रशिक्षित मॉडलों को अपनाना, नवीकरणीय ऊर्जा आधारित डेटा केंद्रों की स्थापना तथा ऊर्जा-कुशल प्रशिक्षण तकनीकों का उपयोग यह सुनिश्चित करता है कि AI विकास की कार्बन फुटप्रिंट न्यूनतम रहे।
  • ग्रीन-फिकेशन के लिए AI: राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, स्मार्ट ग्रिड तथा जलवायु निगरानी जैसी पहलों में AI का उपयोग, AI के स्वयं के पर्यावरणीय प्रभाव की क्षतिपूर्ति करने में सहायक होता है, जिससे AI समाधान का माध्यम भी बनता है और जिम्मेदार संसाधन उपभोक्ता भी।
  • मानकीकरण और मापन: ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, ऊर्जा, जल तथा प्राकृतिक संसाधन उपभोग से संबंधित सततता मापदंडों को लागू करना नीति-निर्माण, विनियमन तथा कॉरपोरेट उत्तरदायित्व को दिशा प्रदान कर सकता है।
  • अन्य 
    • बड़े AI मॉडलों के लिए अनिवार्य पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA): EIA अधिसूचना, 2006 का विस्तार कर उच्च-कंप्यूट AI परियोजनाओं को इसके दायरे में लाया जाना चाहिए। इसके अंतर्गत चिप निर्माण, मॉडल प्रशिक्षण, परिनियोजन तथा ई-अपशिष्ट निपटान तक पूरे जीवन-चक्र का पर्यावरणीय आकलन अनिवार्य किया जाए।
    • ग्रीन कंप्यूट टैक्सोनॉमी: ऊर्जा दक्षता, कार्बन तीव्रता तथा जल उपयोग के आधार पर AI प्रणालियों के वर्गीकरण हेतु राष्ट्रीय ग्रीन कंप्यूट टैक्सोनॉमी विकसित की जाए, जिसमें कम-कार्बन AI मॉडलों को कर एवं वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किए जाएँ।
    • जिला-स्तरीय डेटा सेंटर जोनिंग: जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में डेटा सेंटर की स्थापना को सीमित करने हेतु जिला-स्तरीय जोनिंग लागू की जाए तथा नवीकरणीय ऊर्जा-समृद्ध और कम-जोखिम वाले तटीय क्षेत्रों में AI अवसंरचना को प्रोत्साहित किया जाए।

निष्कर्ष

भारत का संधारणीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के प्रति दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद-48A और 51A(g) में निहित प्रावधानों के अनुरूप है। यह दृष्टिकोण इस बात को सुदृढ़ करता है कि राज्य का दायित्व है कि वह तकनीकी प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखे।

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